भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 713, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 713

14/25-34 ] अनुभाष्य-चैतन्यभागवतके आदिखण्ड चतुर्थ अध्यायमें कही गई अन्यान्य बाल्य-लीलाओंमें इस घटनाका वर्णन नहीं है, इसका यहींपर वर्णन किया गया है॥ 25 ॥ शचीके द्वारा उसका कारण पूछना :- देखि' शची धाञा आइला करि' हाय, हाय'। माटि काड़ि' लञा बले—'माटि केने खाय' ॥ 26 ॥ अनुवाद-यह देखकर शचीमाता 'हाय, हाय' करती हुईं दौड़कर आयीं और महाप्रभुके हाथसे मिट्टीको छीनकर बोलीं,- 'मिट्टी क्यों खाते हो?' ॥ 26 ॥ निमाइका दार्शनिक उत्तर :- कान्दिया बलेन शिशु, - "केने करे रोष। तुमि माटि खाइते दिले, मोर किबा दोष ॥ 27 ॥ सब कुछ ही मिट्टीका विकार :- खइ-सन्देश-अन्न, यतेक-माटिर विकार। इह माटि, सेह माटि, कि भेद-विचार ॥ 28 ॥ माटि-देह, माटि-भक्ष्य, देखह विचारि'। अविचारे देह दोष, कि बलिते पारि ॥" 29 ॥ अनुवाद-रोते हुए निमाइने कहा, - "क्रोध क्यों करती हो? आपने ही तो मुझे मिट्टी खानेको दी है, इसमें मेरा क्या दोष है? खील, सन्देश और अन्न, सभी (मिट्टीसे उत्पन्न होनेके कारण) मिट्टीके ही तो विकार हैं। यह भी मिट्टी है और वह भी मिट्टी है, इसमें क्या भेद-विचार है? विचार करके देखो कि यह शरीर भी मिट्टीसे बना है और खानेके पदार्थ भी मिट्टीसे बने हैं। परन्तु आप बिना विचार किये ही मुझपर दोष लगा रही हैं, तो मैं क्या कह सकता हूँ?" ॥ 27-29 ॥ शचीका प्रत्युत्तर :- अन्तरे विस्मित शची बलिल ताहारे। “माटि खाइते ज्ञानयोग के शिखाल तोरे ॥ 30 ॥ द्रव्य और उसके विकारकी विशेषता अथवा अनुकूल और प्रतिकूलका वैशिष्ट्य :- माटिर विकार अन्न खाइले देह-पुष्टि हय। माटि खाइले रोग हय, देह याय क्षय ॥ 31 ॥ माटिर विकार घटे पानि भरि' आनि। माटि-पिण्डे धरि यबे, शोषि' याय पानि ॥”32 ॥ अनुवाद-यह सुनकर शचीमाता मन-ही-मन बहुत विस्मित हुईं, परन्तु वात्सल्यके कारण बोलीं, - "मिट्टी खानेका ज्ञानयोग तुम्हें किसने सिखलाया है? मिट्टीके विकार अन्नको खानेसे शरीर पुष्ट होता है, परन्तु मिट्टी खानेसे शरीरमें रोग हो जाता है और शरीरका नाश हो जाता है। (सुनो पुत्र!) मिट्टीके विकार घड़ेमें जल भरकर लाया जा सकता है, परन्तु मिट्टीके ढेलेपर जल डालनेसे वह जलको सोख लेता है ॥” 30-32 ॥ उसको सुनकर महाप्रभुकी उक्ति :- आत्म लुकाइते प्रभु बलिला ताहारे। “आगे केन इहा, माता, ना शिखाले मोरे ॥ 33 ॥ एबे से जानिलाङ, आर माटि ना खाइब। क्षुधा लागे यबे, तबे तोमार स्तन पिब ॥”34 ॥ अनुवाद-(माताके वचन सुनकर) महाप्रभुने अपने स्वरूपको छिपाते हुए कहा, - “आपने पहले मुझे इस बातकी शिक्षा क्यों नहीं दी? अब मैं जान गया हूँ, इसलिये पुनः मिट्टी नहीं खाऊँगा। मुझे जब भी भूख लगेगी, आपके स्तनका दूध ही पीऊँगा ॥”33-34 ॥ अनुभाष्य- (अपने सुखके लिये ही) भोज्य-विषयोंको ग्रहण करना जड़ीय चेष्टा है, उसमें हरिसेवा नहीं है। निर्विशेषवादी लोग भ्रमवश ऐसे प्रतिकूल विषयों और श्रीकृष्णसेवाके अनुकूल विषयोंको (अर्थात् श्रीकृष्णको भोग अर्पण करनेको) सजातीय समझते हैं। इस प्रकारकी धारणा प्राकृत सिद्धान्तका नितान्त भ्रमयुक्त अस्फुट विकास है। उसी प्रकारकी मूढ़-निर्विशेष-चिन्ताकी अकर्मण्यताको, श्रीमन् महाप्रभुने माताके मुखसे मिट्टी और घटके सहज दृष्टान्तके द्वारा प्रदर्शित किया ॥ 27-33 ॥ चौदहवाँ अध्याय | 177