भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 714

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[ 14/35-39 एत बलि' जननीर कोलेते चड़िया। स्तनपान करे प्रभु ईषत् हासिया॥ 35 ॥ अनेक प्रकारसे ऐश्वर्यलीला-प्रकाश :- एइमते नाना छले ऐश्वर्य देखाय। बाल्यभाव प्रकटिया पश्चात् लुकाय॥ 36 ॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभु शचीमाताकी गोदमें चढ़ गये और मन्द-मन्द मुसकाते हुए उनका स्तनपान करने लगे। इस प्रकार महाप्रभु नाना प्रकार छलसे ऐश्वर्य दिखते और बाल्यभावको प्रकटकर अपने ऐश्वर्यको छिपा लेते॥ 35-36 ॥ तैर्थिक ब्राह्मणका अन्नभोजन और उद्धार :- अतिथि-विप्रेर अन्न खाइल तिनबार। पाछे गुप्ते सेइ विप्रे करिल निस्तार॥ 37 ॥ अनुवाद-एक बार महाप्रभुने एक अतिथि-ब्राह्मणके भोजनको तीन बार खाया और बादमें गुप्तरूपसे उसका उद्धार किया॥ 37 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-एक तैर्थिक ब्राह्मण श्रीजगन्नाथ मिश्रके घरमें अतिथि बनकर आया। श्रीजगन्नाथ मिश्रने उन्हें रसोई बनानेकी सामग्री लाकर दी और उस ब्राह्मणने ठाकुरजीके लिये भोग बनाया। तैर्थिक ब्राह्मणने जब ध्यानमें गोपालको भोग निवेदन किया, तब निमाइ आकर उस भोगको खाने लगे। निमाइके द्वारा स्पर्श किये हुए अन्नको त्यागकर अतिथि ब्राह्मणने और एक बार भोग बनाया। इस बार भी ध्यानमें निवेदनके समय वही घटना हुई। उसने तीसरी बार जब भोग बनाया, तब घरमें सभी लोग सो रहे थे। ब्राह्मणने जब ध्यानमें गोपालको भोग निवेदन कर रहा था, तब निमाइ आकर वह भोग खाने लगे। ब्राह्मण अपनेको दुर्भागा मानकर हाहाकार करने लगा। तब निमाइ बोले,-'हे ब्राह्मण ! जब मैं व्रजमें यशोदा-दुलाल था, तब भी तुम्हारे साथ ऐसी ही घटना घटी थी। इस बार भी तुम्हारी भक्तिसे आकृष्ट होकर मैंने कृपाकर तुम्हें इसके दर्शन करवा दिये हैं।' तब ब्राह्मणने अपने इष्टदेवका दर्शन करके महाप्रेममें मुग्ध होकर स्वयंको धन्य माना और उसने निमाइके अवशिष्ट प्रसादसेवा की अर्थात् उस प्रसादको ग्रहण किया। महाप्रभुने उसको इस गुप्तलीलाको किसीके समक्ष प्रकाश करनेके लिये निषेध किया॥ 37 ॥ अनुभाष्य-चैःभाः आदिखण्ड पाँचवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 37 ॥ चोरोंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न करना :- चोरे लञा गेल प्रभुके बाहिरे पाइया। तार स्कन्धे चढ़ि' आइला तारे भुलाइया॥ 38 ॥ अनुवाद-एक बार महाप्रभुको घरसे बाहर खेलते हुए पाकर चोर उन्हें उठा ले गये, परन्तु अपने प्रभावसे महाप्रभु उनको मार्ग भुलाकर उन्हींके कन्धोंपर चढ़कर घर लौट आये॥ 38 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभु जब अभी छोटेसे बालक थे, तब वे स्वर्णके अलङ्कारोंसे भूषित होकर द्वारके बाहर खेलने गये। दो चोर उन्हें 'सन्देश' (बङ्गालकी एक मिठाई) खिलानेका लोभ देकर अपने कन्धेपर चढ़ाकर ले गये। चोरोंने सोचा कि वनमें ले जाकर इस बालकको मारकर हम इसके सारे अलङ्कार ले लेंगे। महाप्रभुने अपनी मायाका विस्तार करके उन दोनोंको मार्ग भुला दिया और चोरोंके कन्धोंपर चढ़कर उन्हें अपने ही घरके द्वारपर ले आये। महाप्रभुके जानेपर उनके परिवारके लोग उनको खोजनेके लिये इधर-उधर भागदौड़ कर रहे थे और वे चोर उन सबके सामने बालकको छोड़कर भाग गये। तब महाप्रभुके परिवारजन बहुत कठिनाईसे उन्हें शचीमाताके आङ्गनमें लाये॥ 38 ॥ अनुभाष्य-चैःभाः आदिखण्ड चौथा अध्याय द्रष्टव्य है॥ 38 ॥ एकादशीमें हिरण्य-जगदीशके घरमें विष्णुनैवेद्य-भोजन :- व्याधि-छले जगदीश-हिरण्य-सदने। विष्णु-नैवेद्य खाइल एकादशी-दिने॥ 39 ॥ 178 | श्रीचैतन्यचरितामृत