श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 715, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें14/39-43 ] अनुवाद-एक बार एकादशीके दिन महाप्रभुने रोगके छलसे हिरण्य और जगदीश पण्डितके घरमें विष्णुके लिये बने नैवेद्यको खाया ॥ 39 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जगदीश और हिरण्य पण्डितके घरमें एकादशीके दिन (विष्णु)-नैवेद्य तैयार हो रहा था। महाप्रभुने उस नैवेद्यको खानेकी आशासे अपने पिताजीको हिरण्य-जगदीशके घरमें भेजा। हिरण्य-जगदीश बालककी प्रार्थना सुनकर आश्चर्यचकित होकर बोले,- “आज एकादशी है और हमारे घरमें विष्णु-नैवेद्य बन रहा है, इस बातका इस बालकको कैसे पता चला है? अवश्य ही उसमें कोई वैष्णवी-शक्ति है।” उन्होंने उस नैवेद्यकी वस्तुओंको बालकके खानेके लिये भेज दीं। शरीर रोगग्रस्त हुआ है और विष्णु-नैवेद्य खानेसे उस रोगसे मुक्ति मिलेगी-इस बहानेसे महाप्रभुने नैवेद्य मँगवाया था। जगन्नाथ मिश्रने लाये गये नैवेद्यको पहले बालकोंको खिलाया और फिर स्वयं भी कुछ खाया। इससे महाप्रभु रोगसे मुक्त हो गये। जगन्नाथ मिश्रके घरसे हिरण्य-जगदीशका भवन लगभग एक कोस दक्षिण-पूर्व दिशाकी ओर है, इसलिये बालकके लिये इतनी दूरकी बातको जानना असम्भव है ॥ 39 ॥ अनुभाष्य-चैःभाः आदिखण्ड छठा अध्याय द्रष्टव्य है ॥ 39 ॥ बालकोचित्त लीला-चोरी और कलहादि :- शिशुगण लये पाड़ा-पड़सीर घरे। चुरि करि' द्रव्य खाय, मारे बालकेरे ॥ 40 ॥ अनुवाद-महाप्रभु बालकोंको साथ लेकर पड़ोसियोंके घर जाते और वहाँ जाकर खाद्य सामग्रीकी चोरी करके खाते तथा (उस घरके) बालकोंको मारते भी थे ॥ 40 ॥ अनुभाष्य-चैःभाः आदिखण्ड चौथा अध्याय,– “निकटे बसये यत बन्धुवर्ग घरे। प्रतिदिन कौतुके आपने चुरि करे ॥ 100 ॥ कारो घरे दुग्ध पिये, कारो भात खाय। हाँड़ि भाङ्गे, यार घरे किछुइ ना पाय ॥ 101 ॥ घरे यदि शिशु थाके, ताहारे काँदाय ॥ 102 (क) ॥” “निकटमें जितने बन्धु-बान्धवोंके घर थे, महाप्रभु उनके घरोंमें प्रतिदिन कौतुकसे चोरी करते। किसीके घरमें चोरी करके दूध पीते और किसीके घरमें भात खाते। जिस घरमें उन्हें कुछ नहीं मिलता, उनकी हाँडी फोड़ देते। जिस घरमें छोटा बच्चा होता, तो उसे रुलाते।” चैःभाः छठा अध्याय,– “केह बोले,-पुत्र अति-बालक आमार। कर्णे जल दिया तारे कान्दाय अपार ॥ 65 ॥” “(जगन्नाथ मिश्रको उलाहना देते हुए) कोई कहता कि मेरा बालक अभी बहुत छोटा है और आपका पुत्र उसके कानमें जल डाल देता है, जिससे वह बहुत रोता है ॥” 40 ॥ शचीसे शिकायत और शचीके द्वारा फटकार :- शिशुसब शची-स्थाने कैल निवेदन। शुनि' शची पुत्रे किछु दिला ओलाहन ॥ 41 ॥ “केने चुरि कर, केने मारह शिशुरे। केने पर-घरे याह, किवा नाहि घरे ॥” 42 ॥ अनुवाद-सभी बालकोंने शचीमाताके पास जाकर निमाइके क्रिया-कलाप बतलाये। जिसे सुनकर शचीमाताने निमाइको डाँटते हुए पूछा, – “तुम चोरी क्यों करते हो? बालकोंको क्यों मारते हो? दूसरोंके घर क्यों जाते हो? हमारे घरमें क्या कमी है?” ॥ 41-42 ॥ अनुभाष्य- 'ओलाहन'- तिरस्कार, भर्त्सना ॥ 41 ॥ महाप्रभुका क्रोध और घरमें उपद्रव :- शुनि' क्रु धरे यत भाण्ड छिल, फेलिल भाङ्गिया ॥ 43 ॥ अनुवाद-(शचीमाताके द्वारा इस प्रकार डाँटनेपर) निमाइ क्रोधित होकर घरके भीतर गये और घरके सभी बर्तनोंको फेंककर तोड़ दिया ॥ 43 ॥ चौदहवाँ अध्याय | 179