भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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14/52-61 ] हो। तुम्हारा हम सबसे ऐसा कहना उचित नहीं है। देवताओंके लिये लायी गयी पूजा-सामग्रीको मत लो, ऐसा अन्याय मत करो॥" 52-53 ॥ छलसे महाप्रभुका वरदान :- प्रभु कहे,–“तोमा-सबाके दिलाङ एइ वर। तोमा सबार भर्त्ता हबे परम सुन्दर ॥ 54 ॥ पण्डित, विदग्ध, युवा, धनधान्यवान्। सात सात पुत्र हबे—चिरायु, मतिमान् ॥” 55 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,–“मैं तुम सबको यह वर देता हूँ कि तुम्हारा पति परम सुन्दर, पण्डित, कुशल, नवयुवक और धन-धान्यसे युक्त होगा तथा तुम सबके सात-सात चिरायु तथा बुद्धिमान पुत्र होंगे ॥" 54-55 ॥ वर शुनि' कन्यागणेर अन्तरे सन्तोष। बाहिरे भर्त्सन करे करि' मिथ्या रोष ॥ 56 ॥ अनुवाद-वर सुनकर सभी कन्याओंके हृदयमें सन्तोष हुआ, परन्तु बाहरसे मिथ्या रोष प्रकट करते हुए वे महाप्रभुकी भर्त्सना करने लगीं ॥ 56 ॥ भागने वाली कन्याओंके प्रति शापके छलसे कृत्रिम क्रोध :- कोन कन्या पलाइल नैवेद्य लइया। तारे डाकि' कहे प्रभु सक्रोध हइया ॥ 57 ॥ “यदि नैवेद्य ना देह हइया कृपणी। बूढ़ा भर्त्ता हबे, आर चारि सतिनी ॥” 58 ॥ अनुवाद-कई कन्याएँ नैवेद्य लेकर भागने लगीं, तो महाप्रभुने उन्हें पुकारते हुए क्रोधित होकर कहा,–“यदि तुम कृपणता करके मुझे नैवेद्य नहीं दोगी, तो तुम्हें बूढ़ा पति और चार-चार सौतने प्राप्त होंगी ॥” 57-58 ॥ भयसे बालिकाओंके द्वारा नैवेद्य-अर्पण :- इहा शुनि' ता-सबार मने हइल भय। “कोन किछु जाने, किबा देवाविष्ट हय ॥” 59 ॥ आनिया नैवेद्य तारा सम्मुखे धरिल। खाइया नैवेद्य तारे इष्टवर दिल ॥ 60 ॥ अनुवाद-यह सुनकर वे सब मन-ही-मन भयभीत हो गयीं और सोचने लगीं,–“हो सकता है कि निमाइ कुछ ज्योतिष जानता है अथवा इसमें किसी देवताका आवेश है।” निमाइके वचन सत्य नहीं हो जाँय, इस भयसे वे लौट आयीं और अपने नैवेद्यको महाप्रभुके सामने रख दिया। महाप्रभुने उस नैवेद्यको खाकर उन्हें मनोभीष्ट वर प्रदान किया ॥ 59-60 ॥ महाप्रभुकी मधुर चापल्य-लीलासे सभीको सुख :- एइ मत चापल्य सब लोकेरे देखाय। दुःख कारो मने नहे, सबे सुख पाय ॥ 61 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु सबसे चपलता करते, किन्तु इसके द्वारा किसीके भी मनमें दुःख नहीं होता, अपितु सभी सुखका ही अनुभव करते ॥ 61 ॥ अमृतानुकणिका-'एइ मत चापल्य'–कौतुकी विश्वम्भर बालकोंके साथ जब गङ्गा स्नानके लिये जाते, तो वे एक-दूसरेपर जल फेंका करते थे। सब बालकोंको साथ लेकर महाप्रभु गङ्गामें तैरते। पलभरमें डुबकी लगाते, तो दूसरे ही पल ऊपर दिखाई देते। इस प्रकार महाप्रभु नाना क्रीड़ाएँ करते रहते। श्रीगौरसुन्दर जब जलक्रीड़ा करते, तो वे चरणोंसे जल उछालते जो अन्य सबके शरीरपर लगता था। किसीके तो शरीरपर जलका कुल्ला ही कर देते थे। इस प्रकार महाप्रभु सबको बारम्बार स्नान करवाते। सबके मना करनेपर वे किसीकी भी बात नहीं मानते थे, एक स्थानपर स्थिर न रहनेके कारण कोई उन्हें पकड़ भी नहीं पाता था। महाप्रभुको न पकड़ पानेके कारण सब ब्राह्मण उनके पिता जगन्नाथ मिश्रके पास पहुँचे। सब मिलकर कहने लगे,–“हे परम बान्धव मिश्रवर ! सुनिये, सुनिये, हम सब आपको आपके पुत्रके अन्यायपूर्ण व्यवहारकी बातें सुनाते हैं, जिसके कारण हम लोग अच्छी तरह चौदहवाँ अध्याय | 181