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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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गङ्गा-स्नान भी नहीं कर पाते हैं।” कोई कहने लगे,—“वह जल फेंककर हमारा ध्यान भङ्ग कर देता है। फिर कहता है,—अरे ! तुम किसका ध्यान करते हो? देखो, कलियुगमें मैं ही प्रत्यक्ष नारायण हूँ।” कोई कहते,—“वह मेरा शिवलिङ्ग चुरा लेता है।” कोई कहते,—“मेरा उत्तरीय लेकर भाग जाता है।” कोई कहते,—“पुष्प, दूर्वा, नैवेद्य, चन्दनादि श्रीविष्णुपूजाकी सामग्री और श्रीविष्णुका आसन रखकर मैं तो उधर स्नान करने लग जाता हूँ और इधर आपका बालक उस आसनपर आ बैठता है और वहाँ सारा नैवेद्य खाकर तथा माल्यादि पहनकर भाग जाता है। फिर ऊपरसे कहता है—तुम अपने दुःखी क्यों होते हो? जिसके लिये ये सब तुमने किया था, वही स्वयं आकर खा गया।” कोई कहने लगे,—“जब मैं गङ्गाजलमें खड़ा होकर सन्ध्या कर रहा होता हूँ, तब यह डुबकी लगाकर मेरे पाँव पकड़कर खींचता है।” कोई कहने लगे,—“मेरे पुष्पचयन पात्र और धोतीको ही उठाकर ले जाता है।” कोई कहने लगे,—“मेरी गीताकी पोथीको चुराकर ले जाता है।” किसीने कहा,—“मेरा लड़का अभी बहुत छोटा है, यह उसके कानमें जल डाल देता है, जिससे वह बहुत रोता है।” किसीने कहा,—“मेरी पीठपर पैर रखकर कन्धेपर चढ़ जाता है और 'मैं ही महेश हूँ', ऐसा कहकर गङ्गामें कूद जाता है।” कोई कहने लगे,—“मेरे पूजाके आसनपर स्वयं बैठ जाता है और नैवेद्य खाकर स्वयं ही विष्णुपूजा करने लगता है। हम स्नान करके ऊपर उठते हैं, तब हमारे शरीरपर रेत डाल देता है और जितने भी चञ्चल बालक हैं, वे सब इसके साथ रहते हैं। कभी-कभी स्त्रियों और पुरुषोंके कपड़े बदलकर रख देता है, जिनको पहनते समय सब लज्जासे विकल हो जाते हैं। हे मिश्रजी ! आप हमारे परम-बान्धव हैं, एक दिनकी बात नहीं, यह प्रतिदिन ऐसा ही व्यवहार करता है, तभी तो हम कहने आये हैं। दो प्रहरतक यह जलसे बाहर ही नहीं निकलता। बताओ, फिर इसका शरीर कैसे ठीक रहेगा ?”

उसी समय पड़ोसमें रहनेवाली सब बालिकाएँ शचीदेवीके पास क्रोधित होकर आ पहुँचीं। वे सब शचीमातासे कहने लगीं,—“हे ठकुरानी ! अपने पुत्रकी करतूतें सुनिये—वह हमारे वस्त्रोंको चुरा लेता है और हमसे बहुत बुरे शब्द बोलता है। जब हम कुछ उत्तर देती हैं, तो हमारे ऊपर जल फेंकता है और झगड़ने लगता है। हम व्रत करनेके लिये जो-जो फल-फूल ले जाती हैं, जबरदस्ती हमसे छीनकर फेंक देता है। स्नान करके आनेपर वह हमारे शरीरपर रेत फेंक देता है। कभी छिपकर आता है और हठात् कानके निकट आकर उच्च स्वरसे चीत्कार करता है।” कोई कहने लगीं—“आज इसने मेरे मुखपर कुल्ला कर दिया। फिर हम सबके बालोंमें ओकड़ाका फल (शरीरपर लगनेसे जिससे शरीरमें तीव्र खुजलाहट होती है) चिपका देता है।” कोई कहने लगी,—“मुझसे तो यह विवाह करना चाहता है। यह प्रतिदिन ऐसा व्यवहार करता है, जैसे तुम्हारा निमाइ कोई राजकुमार हो ? पूर्वकालमें जैसे श्रीनन्दके कुमारके विषयमें सुना जाता है, उसी प्रकार तुम्हारा निमाइ सब आचरण करता है। दुःखी होकर जिस दिन हम अपने पिता-मातासे ये सब बातें कहेंगी, उसी दिन आपके साथ उनका झगड़ा हो जायेगा। इसलिये आप अपने छोटे बालकको तुरन्त रोक दें। नदिया नगरीमें ऐसा आचरण करना कभी भी अच्छा नहीं है।” महाप्रभुकी जननी ये सब बातें सुनकर हँस पड़ीं और सबको गोदीमें लेकर प्रियवाणी कहने लगीं—“आज निमाइके घर आनेपर उसको बाँधकर लाठीसे मारूँगी, जिसे वह फिर और उपद्रव न करे।” यह सुनकर सबने शचीमाताकी चरणधूलि लेकर अपने सिरपर धारण की और सभी पुनः स्नानके लिये गङ्गा-घाटपर चली गयीं। महाप्रभु जिनके साथ जितनी भी चञ्चलता करते, वास्तवमें उससे उन सबके मनमें बड़ा सन्तोष होता। वे कौतुकवश मिश्रजीके पास कहने आये थे। उनकी बातें सुनकर मिश्रजी क्रोधित होकर तर्जन-गर्जन करने

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