भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 719, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 719

14/61–67 ] लगे-“निरन्तर सबके साथ ऐसा ही व्यवहार करता है, परस्परके दर्शनसे दोनोंको सुख :- लोगोंको अच्छी तरह गङ्गा-स्नान भी नहीं करने देता। ताँरे देखि' प्रभुर हइल साभिलाष मन। अभी शीघ्र ही उसे दण्ड देनेके लिये जाता हूँ।” लक्ष्मी चित्ते सुख पाइल प्रभुर दर्शन ॥ 63 ॥ उस समय सब बालकोंके बीचमें श्रीगौरसुन्दर अनुवाद—उन्हें देखकर महाप्रभुके मनमें एक अभिलाषा गङ्गाजलमें क्रीड़ा करते हुए अत्यन्त मनोहर लग रहे जाग्रत हुई और महाप्रभुको देखकर लक्ष्मीदेवीके मनमें थे। क्रोधपूर्वक जब मिश्रजी घरसे चले, तो सर्वान्तर्यामी भी प्रसन्नता हुई ॥ 63 ॥ श्रीगौराङ्गने जान लिया। तभी कन्याओंने आकर कहा दोनोंकी नित्यसिद्ध स्वाभाविक प्रीति और हर्ष :- कि हे निमाइ भाग जाओ, तुम्हारे पिताजी क्रोधित होकर साहजिक प्रीति दुँहार करिल उदय। आ रहे हैं। महाप्रभुने सब बालकोंको सिखा दिया कि बाल्यभावे छन्न-तनु हइल निश्चय ॥ 64 ॥ पिताजी जब आयें, तो ऐसा कहना कि आपका पुत्र तो दुँहा देखि' दुहार चित्ते हइल उल्लास। अभी स्नान करने ही नहीं आया। वह तो आज देवपूजा-छले कैल दुँहे परकाश ॥ 65 ॥ पाठशालासे उसी मार्गसे सीधा घर चला गया था, हम अनुवाद—उन दोनोंकी स्वभाविक प्रीति जो अभी भी यहाँ उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।” इस प्रकार सबको तक बाल्यभावसे ढकी हुई थी, वह आज निश्चित सिखाकर महाप्रभु दूसरे रास्तेसे घर चले गये और इधर रूपसे प्रकटित हो गयी। एक दूसरेको देखकर दोनोंके मिश्रजी गङ्गाघाटपर आ पहुँचे। गङ्गाघाटपर आकर हृदयमें उल्लास हुआ और देवपूजाके छलसे दोनोंने उन्होंने चारों ओर देखा, परन्तु बालकोंके बीचमें अपने अपने-अपने हृदयकी बातको प्रकाशित कर दिया ॥ 64-65 ॥ पुत्रको कहीं भी न देख पाये। मिश्रजीने बालकोंसे अमृतप्रवाह भाष्य—लक्ष्मीजी भगवान्‌की नित्य पत्नी पूछा, — “विश्वम्भर कहाँ गया?” सभी बालकोंने वही हैं और भगवान् लक्ष्मीजीके नित्यपति हैं। अतः उन कहा जैसा निमाइने सिखाया था। हाथमें छड़ी लिये दोनोंमें जो नित्यप्रीति है, वह स्वाभाविक है। वह प्रीति मिश्रजीने चारों ओर देखा, परन्तु पुत्रको न देखकर बाल्यभावसे आच्छादित थी और अब उसकी प्रतीति तर्जन-गर्जन करने लगे। जिन ब्राह्मणोंने मिश्रजीके पास हुई ॥ 64 ॥ जाकर महाप्रभुका अन्याय निवेदन किया था, उन्हीं सब महाप्रभुका लक्ष्मीको अपने अर्चनके लिये आदेश :- ब्राह्मणोंने पुनः कहा, — “मिश्रजी ! विश्वम्भर आपके डरके प्रभु कहे,—“आमा' पूज, आमि महेश्वर। मारे घरको भाग गया है; आप घर जाइये, उससे कुछ आमारे पूजिले पाबे अभीप्सित वर ॥” 66 ॥ कहना नहीं। अब पुनः यदि वह चञ्चलता करेगा, तो अनुवाद—महाप्रभुने लक्ष्मीदेवीसे कहा, — “तुम मेरी हम स्वयं ही उसे पकड़कर आपके पास ले आयेंगे।” पूजा करो, मैं महेश्वर हूँ। मेरी पूजा करनेसे तुम्हें (चैःभाः आदिखण्ड छठा अध्याय) ॥ 61 ॥ मनोवाञ्छित वरकी प्राप्ति होगी ॥” 66 ॥ वल्लभकी पुत्री लक्ष्मीदेवीके साथ साक्षात्कार :- लक्ष्मीका आदेश-पालन :- एकदिन वल्लभाचार्य-कन्या 'लक्ष्मी' नाम। लक्ष्मी ताँर अङ्गे दिल स-पुष्प-चन्दन। देवता पूजिते आइल करि' गङ्गास्नान ॥ 62 ॥ मल्लिकार माला दिया करिल वन्दन ॥ 67 ॥ अनुवाद—एक दिन श्रीवल्लभाचार्यकी पुत्री 'लक्ष्मी' देवपूजनके लिये गङ्गा स्नान करने आयीं ॥ 62 ॥ चौदहवाँ अध्याय | 183

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