श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
अन्तरङ्ग भक्तोंके साथ विप्रलम्भ-रसास्वादनके द्वारा श्रीकृष्णचन्द्रने श्रीगौरसुन्दररूपमें अपनी वाञ्छा पूर्ण की थी। परमहंसकुल-शिरोमणि श्रीदामोदरस्वरूप और श्रीराय रामानन्द जैसे अद्वितीय चिन्मय श्रीकृष्णरस-तत्त्ववेत्ताओंके साथ स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने इन तीन भक्तों (विद्यापति, चण्डीदास और जयदेव) के द्वारा रचित जिन अप्राकृत गीतोंका आस्वादन किया, वही अद्वितीय भोक्ता सच्चिदानन्दविग्रह श्रीनन्दनन्दनके प्रति 'कृष्णमयी' श्रीराधिकाके महाभाव-वैचित्र्यसमूहका विकास है। यह इस नश्वर स्थूल-सूक्ष्म जगत्के भोग और त्याग-इन दोनोंसे उदासीन, परममुक्त और निष्किञ्चन, राधादास्यके नित्य अभिलाषी, महासौभाग्यवान् व्यक्तियोंके ही नित्य अनुसरणका विषय है। प्राकृत काव्यरसके आमोदी, निरीश्वर साहित्य-प्रिय, इन्द्रिय विषय-भोगी व्यक्तियोंके द्वारा इन अप्राकृत गीतोंकी गवेषणाके कारण तथा प्राकृत सहजिया सम्प्रदायके लोगोंने अपनी जड़ेन्द्रियोंके भोगके लिये स्वयंमें 'रागानुगा' होनेका अभिमान करके चण्डीदास, विद्यापति और जयदेवके गीतोंकी जो आलोचना करनेकी धृष्टता दिखलायी है, उसके फलस्वरूप वह जगत्में नास्तिकता और व्यभिचारकी वृद्धि कराकर उनको नरकगामी बना रही है। उनकी इस आलोचना और व्याख्याको स्वीकारकर देहात्मबुद्धिवाले असत्-तृष्णामय, अनर्थयुक्त अनधिकारी लोग परममुक्त भक्तोंके आराध्य श्रीराधाकृष्णकी अलौकिक लीलाविलासको प्राकृत नायक-नायिकाके वैरस्यमय घृणित काम-क्रीड़ा-विलास अथवा उसके समान मानकर स्वयंकी इन्द्रियोंकी तृप्तिमें लग जाते हैं। वे श्रीराधाकृष्णकी अप्राकृत लीलाके वर्णनके अधिकारी नहीं हैं॥42॥ श्रीराधाकी कृष्णविरह-चेष्टासे उत्पन्न कृष्णप्रेमास्वादनके द्वारा अपनी तीन वाञ्छाओंकी पूर्ति :- कृष्णेर वियोगे यत प्रेम-चेष्टित। आस्वादिया पूर्ण कैल आपन वाञ्छित॥43॥
अनन्त चैतनलीला क्षुद्र जीव हञा। के वर्णिते पारे, ताहा विस्तार करिया॥44॥ स्वयं अनन्तदेव भी गौरलीलाका अन्त पानेमें असमर्थ :- सूत्र करि' गणे यदि आपने अनन्त। सहस्र-वदने तेँहो नाहि पाय अन्त॥45॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके वियोगमें श्रीमती राधिकाकी जो प्रेम-चेष्टाएँ थीं, उस प्रेम-वैचित्रीका आस्वादनकर महाप्रभुने अपनी इच्छाओंकी पूर्ति की। श्रीचैतन्य महाप्रभुकी अनन्त लीलाएँ हैं, मैं एक क्षुद्र जीव होकर उनका विस्तारसे कैसे वर्णन कर सकता हूँ? यदि स्वयं अनन्त शेष भी सूत्र रूपसे उनका वर्णन करना चाहें, तो भी वे अपने हजारों मुखोंसे उनका वर्णन नहीं कर सकते॥43-45॥ मुरारिगुप्त और श्रीस्वरूप दामोदरके द्वारा रचित सूत्रमें आदि और शेषलीलाका लेखन :- दामोदर-स्वरूप, आर गुप्त मुरारि। मुख्यमुख्यलीला सूत्रे लिखियाछे विचारि'॥46॥ उन्हीं सूत्रोंके अनुसार वृन्दावनदासके द्वारा गौरलीला-वर्णन :- सेइ अनुसारे लिखि लीला-सूत्रगण। विस्तारि' वर्णियाछेन ताहा दास-वृन्दावन॥47॥ श्रीवृन्दावनदासकी रचना-माधुर्य-वर्णन :- चैतन्य-लीलार व्यास,-दास वृन्दावन। मधुर करिया लीला करिला रचन॥48॥ ग्रन्थकारके द्वारा उनके द्वारा छोड़े गये अंशोंके वर्णनकी प्रतिज्ञा :- ग्रन्थ-विस्तार-भये छाड़िला ये ये स्थाने। सेइ सेइ स्थाने किछु करिब व्याख्याने॥49॥ श्रीवृन्दावनदास ठाकुरको ग्रन्थकारके द्वारा मर्यादा-प्रदान :- प्रभुर लीलामृत तेँहो करिल स्वादन। ताँर भुक्त-शेष किछु करिये चर्वण॥50॥
तेरहवाँ अध्याय | 153
[ 13/46-58 अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीमुरारिगुप्तने भी केवल मुख्य-मुख्य लीलाएँ ही सूत्ररूपमें विचारपूर्वक लिखी हैं। उन्हींके अनुसार मैं उन लीलाओंको सूत्ररूपमें लिख रहा हूँ, जिनका श्रीवृन्दावनदासने विस्तारसे वर्णन किया है। श्रीचैतन्यलीलाके व्यास श्रीवृन्दावनदास हैं। उन्होंने लीलाओंका इस प्रकारसे वर्णन किया है कि वे और भी सरस और मधुर हो गयी हैं। ग्रन्थके विस्तारके भयसे उन्होंने जिस-जिस स्थानपर कुछ लीलाओंको छोड़ा है, मैं उन-उन स्थानोंपर उन लीलाओंका कुछ विस्तारसे वर्णन करनेका प्रयास करूँगा। महाप्रभुके लीलामृतका उन्होंने आस्वादन किया है, मैं तो केवल उनके उच्छिष्टका कुछ चर्वण करूँगा ॥ 46-50 ॥
आदिलीला-सूत्रारम्भ :- आदिलीला-सूत्र लिखि, शुन, भक्तगण। संक्षेपे लिखिये सम्यक् ना याय लिखन ॥ 51 ॥
अनुवाद—हे भक्तगण! सुनिये, मैं आदिलीलाको सूत्ररूपमें लिख रहा हूँ। मैं लीलाओंको संक्षेपमें लिख रहा हूँ, क्योंकि समस्त लीलाओंको लिखना सम्भव नहीं है ॥ 51 ॥
तीन इच्छाओंकी पूर्तिके लिये श्रीकृष्णका गौररूपमें अवतार :- कोन वाञ्छा पूरण लागि' व्रजेन्द्रकुमार। अवतीर्ण हैते मने करिला विचार ॥ 52 ॥
अनुवाद—किसी इच्छाकी पूर्तिके लिये मनमें विचार करके व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्णने अवतीर्ण होनेका निश्चय किया ॥ 52 ॥
श्रीकृष्णके गुरुजनोंका अवतार :- आगे अवतारिल ये गुरु-परिवार। संक्षेपे कहिये, कहा ना याय विस्तार ॥ 53 ॥
अनुवाद—पहले उन्होंने अपने जिन गुरुवर्ग और परिवारको अवतीर्ण करवाया, उनका मैं संक्षेपमें वर्णन करूँगा, क्योंकि विस्तारसे वर्णन करना सम्भव नहीं है ॥ 53 ॥
गुरुवर्गके नाम :- श्रीशची-जगन्नाथ, श्रीमाधवपुरी। केशव भारती, आर श्रीईश्वरपुरी ॥ 54 ॥ अद्वैत आचार्य, आर पण्डित श्रीवास। आचार्यरत्न, विद्यानिधि, ठाकुर हरिदास ॥ 55 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णने श्रीशचीदेवी, श्रीजगन्नाथ मिश्र, श्रीमाधवेन्द्रपुरी, श्रीकेशव भारती, श्रीईश्वरपुरी, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीवास पण्डित, आचार्यरत्न, विद्यानिधि और श्रीहरिदास ठाकुरको पहले अवतीर्ण करवाया ॥ 54-55 ॥
श्रीहट्ट-निवासी श्रीउपेन्द्रमिश्र-नाम। वैष्णव, पण्डित, धनी, सद्गुण-प्रधान ॥ 56 ॥
अनुवाद—श्रीहट्टके निवासी श्रीउपेन्द्रमिश्र भी पहले अवतरित हुए। वे परम वैष्णव, विद्वान, धनी और सद्गुण सम्पन्न थे ॥ 56 ॥
अनुभाष्य— 'श्रीउपेन्द्रमिश्र'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 35वाँ श्लोक)— “पर्जन्यो नाम गोपाल आसीत् कृष्णपितामहः। उपेन्द्रमिश्रः सञ्जातः श्रीहट्टे सप्त पुत्रवान्॥ 35॥” “व्रजमें जो पर्जन्य नामक गोप श्रीकृष्णके पितामह (दादा) थे, उन्होंने ही श्रीहट्टमें श्रीउपेन्द्र मिश्रके रूपमें जन्म ग्रहण किया है।” श्रीहट्ट जिलाके अन्तर्गत 'ढाका-दक्षिण' ग्राम इनका वासस्थान था ॥ 56 ॥
उपेन्द्र मिश्रके सात पुत्र :- सप्त मिश्र ताँर पुत्र-सप्त ऋषीश्वर। कंसारि, परमानन्द, पद्मनाभ, सर्वेश्वर ॥ 57 ॥ जगन्नाथ, जनार्द्दन, त्रैलोक्यनाथ। नदीयाते गङ्गावास कैल जगन्नाथ ॥ 58 ॥
154 | श्रीचैतन्यचरितामृत
13/57-62 ]
अनुवाद—श्रीउपेन्द्र मिश्रके सात पुत्र थे—कंसारि, परमानन्द, पद्मनाभ, सर्वेश्वर, जगन्नाथ, जनार्दन और त्रैलोक्यनाथ—ये सातों ऋषियोंके समान बड़े प्रभावशाली थे। इनमेंसे श्रीजगन्नाथ मिश्रने गङ्गाके तटपर वास करनेके उद्देश्यसे नदियामें अपना निवास स्थान बनाया॥ 57-58 ॥
श्रीकृष्णावतारमें जगन्नाथका परिचय :— जगन्नाथ मिश्रवर—पदवी 'पुरन्दर'। नन्द-वसुदेव पूर्वे सद्गुण-सागर ॥ 59 ॥
अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रजीकी 'पुरन्दर' पदवी (उपाधि) थी। वे पूर्वमें नन्द महाराज और श्रीवसुदेव थे और सद्गुणोंके सागर थे॥ 59 ॥
शची और नीलाम्बर चक्रवर्ती :— ताँर पत्नी 'शची'-नाम, पतिव्रता सती। याँर पिता 'नीलाम्बर' नाम चक्रवर्त्ती ॥ 60 ॥
अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रकी पत्नीका नाम शचीदेवी था और वे पतिव्रता सती नारी थीं; शचीदेवीके पिता नीलाम्बर चक्रवर्त्ती थे॥ 60 ॥
अनुभाष्य—'नीलाम्बर चक्रवर्त्ती'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका श्लोक 104-105)— “नीलाम्बरश्चक्रवर्त्ती गौरस्य भावि जन्म यत्। सभायां कथयामास तेनासौ गर्ग उच्यते ॥ 104 ॥ श्रीशच्या जनकत्वेन सुमुखो वल्लवो मतः ॥ 105(क) ॥" “सभामें श्रीगौरहरिके भावी जन्मका अर्थात् श्रीगौरहरिके जन्म होनेके उपरान्त उनके भविष्यका वर्णन करनेवाले श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्तीको गर्गाचार्य कहा जाता है। श्रीशचीदेवीके पिता होनेके कारण श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्तीको (श्रीयशोदाके पिता) सुमुख गोप माना जाता है।” इनके वंशधर फरिदपुर जिलामें मग्डोबा ग्राममें हैं। इनके भतीजे जगन्नाथ चक्रवर्ती अथवा 'मामुठाकुर' श्रीगदाधर पण्डितके शिष्यरूपमें श्रीक्षेत्रमें टोटा-गोपीनाथके सेवक थे। 'प्रेम-विलास' ग्रन्थके अनुसार नीलाम्बर चक्रवर्तीका नवद्वीपमें वासस्थान 'बेलपुकुरिया' में था। और काजीपाड़ामें इनका वासस्थान होनेसे ग्राम-सम्बन्धसे काजीने स्वयंको महाप्रभुका मामा कहा था (चैःचः आदिलीला, 17/148-149 संख्या द्रष्टव्य है)। काजीके घर और समाधिके तितर-बितर (पृथक्-पृथक्) होनेकी सम्भावना नहीं होनेके कारण पूर्वकथित 'बेलपुकुरिया' मुहल्ला ही वर्तमानमें 'वामनपुकुर'-नामक मुहल्ला है—ऐसा जाना जाता है, क्योंकि काजीकी समाधि अभी भी 'वामनपुकुर'में है॥ 60 ॥
श्रीनित्यानन्द, गङ्गादास, मुरारि, मुकुन्द :— राढ़देशे जन्मिला ठाकुर नित्यानन्द। गङ्गादास पण्डित, गुप्त मुरारि, मुकुन्द ॥ 61 ॥
सबके बादमें स्वयं अवतीर्ण :— असंख्य भक्तेर कराइला अवतार। शेषे अवतीर्ण हैला व्रजेन्द्रकुमार ॥ 62 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु राढ़देशमें अवतीर्ण हुए। गङ्गादास पण्डित, मुरारि गुप्त और मुकुन्दादि असंख्य भक्तोंको अवतीर्ण करवाकर तब स्वयं श्रीकृष्ण अवतरित हुए॥ 61-62 ॥
अनुभाष्य—'राढ़देशमें'—वीरभूम जिलाके अन्तर्गत एकचक्रा-ग्राममें। एकचक्रा ग्राम उत्तर-दक्षिण दिशामें चार कोस लम्बा है। 'वीरचन्द्रपुर' अथवा 'वीरभद्रपुर' एकचक्रा-ग्रामकी सीमामें ही स्थित है। वीरभद्र प्रभुके नामपर ही इस स्थानका नाम वीरचन्द्रपुर अथवा वीरभद्रपुर हुआ है। 1331 बङ्गाब्दके आषाढ़ मासमें बिजली गिरनेसे मन्दिरका चूड़ा टूट गया था और मन्दिरको भी बहुत क्षति पहुँची थी। इसके पूर्व कभी भी श्रीमन्दिरके ऊपर इस प्रकारका दैविक प्रकोप नहीं हुआ था। मन्दिरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीकृष्ण-विग्रह हैं,—जिनका नाम श्रीबङ्किमराय अथवा 'बाँका-राय' है। श्रीबङ्किमरायके दाहिने ओर श्रीजाह्नवा और बायीं ओर श्रीमती राधिका हैं। सेवायेत लोगोंका
तेरहवाँ अध्याय | 155
[ 13/61-62 कहना है कि श्रीबङ्किमरायमें श्रीनित्यानन्द प्रभु प्रवेश कर गये थे और उस समयके बाद श्रीबङ्किमरायके दायेंमें जाह्नवा-माताका विग्रह स्थापित हुआ था। बादमें और भी अन्यान्य श्रीविग्रह स्थापित हुए। श्रीमन्दिरमें एक और सिंहासनपर 'मुरलीधर' और 'राधामाधव' श्रीविग्रह विराजमान हैं। एक अन्य पृथक् सिंहासनपर मुर्शिदाबाद जिलाकी विप्रघाटी-गद्दीके श्रीमनोमोहन, श्रीवृन्दावनचन्द्र और श्रीनिताइ-गौरविग्रह लाये गये हैं। एकमात्र श्रीबङ्किमराय ही प्राचीन और श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रतिष्ठित विग्रह हैं। लोकमान्यता है कि श्रीमन्दिरकी पूर्व दिशामें कदम्बखण्डीके घाटपर यमुनाजलमें श्रीबङ्किमराय-विग्रह तैर रहे थे; श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस विग्रहको जलसे उठाकर सेवाके लिये प्रतिष्ठित किया। और वीरचन्द्रपुरसे आधा मील पश्चिममें 'भड़ापुर' नामक स्थानमें नीमके वृक्षके नीचे श्रीमती राधिका प्रकाशित हुईं थीं। इसलिये बहुत पहले श्रीबङ्किमरायकी श्रीमतीको 'भड़ापुरकी ठाकुराणी' के नामसे बुलाते थे। श्रीमन्दिरमें अन्य एक सिंहासनपर श्रीबाँकारायके दाहिनी ओर 'योगमाया' विराजमान हैं। श्रीमन्दिर और जगमोहन ऊँचे पक्के चबूतरेके ऊपर स्थित हैं। सामने ही छोटा नाट्य मन्दिर है। सुना जाता है कि श्रीबाँकारायके मन्दिरकी उत्तरी दिशाकी ओर 'भाण्डीश्वर' शिव अधिष्ठित थे और हाड़ाइ पण्डित उन वैष्णवराज शिवकी आराधना करते थे। अभी वह शिवलिङ्ग अन्तर्धान हो चुका है और उस स्थानपर श्रीजगन्नाथ विग्रह प्रतिष्ठित हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुने किसी मन्दिरादिका निर्माण नहीं किया था। वीरभद्र प्रभुके समयका मन्दिर 1298 (बङ्गाब्द) में टूट जानेपर 'शिवानन्द स्वामी' नामक एक ब्रह्मचारीने उस मन्दिरका संस्कार किया। यहाँपर सेवायेत 'गोस्वामी' लोग श्रीनित्यानन्दकी शाखा श्रीगोपीजन-वल्लभानन्दकी शाखाके वंशज हैं। मन्दिरसे कुछ दूर 'विश्रामतला' नामक स्थान है। कहा जाता है कि इसी स्थानपर श्रीनित्यानन्द प्रभु बाल्यकालमें सखाओंके साथ नाना प्रकारकी व्रजलीला और रासलीलाका अभिनय किया करते थे। 'आमलीतला' नामक स्थानपर एक बड़ा इमलीका वृक्ष विराजित है। नेड़ादि सम्प्रदायके लोगोंने इस स्थानके सम्बन्धमें अनेक प्रकारकी मन-गड़न्त कहानियाँ बनायी हैं। वे कहते हैं कि 'श्वेतगङ्गा' नामक एक सरोवरकी खुदाई वीरभद्र प्रभुके अनुगत 1200 नेड़ाओंने की थी। कुछ ही दूर गोस्वामियोंका समाधि-स्तम्भ है; मौड़ेश्वरसे द्वारकेश्वर नद तक उत्तरकी ओर बहनेवाली यमुनाको पार करके आधे मीलके भीतर श्रीनित्यानन्द प्रभुका सूतिका-मन्दिर (जन्मस्थान) है। सूतिका-मन्दिरके सामने एक प्राचीन नाट-मन्दिर था, अब वह टूटकर एक बड़े वटवृक्षके द्वारा आच्छादित हो चुका है। बादमें उस प्राङ्गणमें एक भव्य मन्दिरका निर्माण हुआ था—इसमें श्रीगौरनित्यानन्द-विग्रह विराजमान हैं। जगमोहनके पत्थरके पटलपर स्वर्गीय प्रसन्नकुमार कारफरमाकी स्मृतिकी रक्षाके लिये 1323 वर्ष, वैशाख मासमें इस मन्दिरके संस्कारका उल्लेख है। जिस स्थानपर सूतिका-मन्दिर अवस्थित है, उस स्थानको 'गर्भवास' नामसे कहा जाता है। गर्भवासके निकट हाड़ाइ पण्डितकी संस्कृत व्याकरणकी पाठशाला थी। उस स्थानके सेवायेतोंके नाम—(1) श्रीराघव-चन्द्र गोस्वामी (गौरगणोद्देश-दीपिका 162 श्लोक—व्रजमें जो श्रीराधाकी प्राणस्वरूपा श्रीचम्पकलता सखी थीं, वे ही अब श्रीराघव गोस्वामी हैं। ये वही राघव गोस्वामी हैं, जिन्होंने श्रीगोवर्धनको अपना निवास स्थान बनाया तथा 'भक्तिरत्न-प्रकाश' नामक ग्रन्थकी रचना की (?) तिरोभाव-तिथि—ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी), (2) जगदानन्ददास (तिरोभाव-तिथि—श्रीराधाष्टमी), (3) कृष्णदास (चिड़िया-कुञ्जके, तिरोभाव-तिथि—श्रीकृष्णजन्माष्टमी, (4) नित्यानन्ददास, (5) रामदास, (6) ब्रजमोहनदास, (7) कानाइ दास, (8) गौरदास, (9) शिवानन्द दास, (10) हरिदास। गर्भवास अथवा सूतिका-मन्दिरसे कुछ ही दूरीपर बकुलतला है। इस स्थानपर श्रीनित्यानन्द प्रभु सखाओंके 156 | श्रीचैतन्यचरितामृत
13/61-68 ] साथ 'झाल-झपेटा' खेल खेलते थे। यह बकुलवृक्ष अति आश्चर्यजनक है, इस वृक्षकी शाखाएँ-प्रशाखाएँ ठीक सर्पकी भाँति मुख-फणादियुक्त हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अनन्तदेव श्रीनित्यानन्द प्रभुकी इच्छासे ही इस रूपमें प्रकाशित हैं। वृक्ष भी बहुत प्राचीन है। सुना जाता है कि इस वृक्षके दो डाल पहले अलग-अलग थे, खेलते समय सखाओंको एक डालसे दूसरे डालपर आने-जानेमें कष्ट होता देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने दोनों शाखाओंको एक साथ मिला दिया। 'हाँटुगाड़ा'-लोकमान्यता है कि श्रीनित्यानन्द प्रभुने समस्त तीर्थोंको इस स्थानपर लाकर उनका समावेश किया था। आज भी इस धामके वासी गङ्गादि तीर्थोंमें न जाकर इस तीर्थमें ही स्नान करते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुने इस स्थानपर दधि-चिड़ा-महोत्सव किया था। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने इस स्थानपर घुटनोंपर बैठकर दधि-चिड़ाका भोजन किया था और उनके इस प्रकार बैठनेके कारण यहाँ एक गढ्ढा बन गया था। इसलिये इस स्थानका नाम 'हाँटुगाड़ा' हो गया। वर्षमें बारह महीनों इस कुण्डमें जल रहता है। कार्तिक-मासमें गोष्ठके समय इस स्थानपर बड़ा मेला होता है। माघी शुक्ला त्रयोदशीमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके जन्मोत्सवके समय भी वीरचन्द्रपुरमें विराट मेलेका आयोजन होता है। गौरगणोद्देशदीपिका 11 श्लोक- “भक्तस्वरूपो नित्यानन्दो व्रजे यः श्रीहलायुधः॥11(क)॥ बलदेवो विश्वरूपो व्यूहः सङ्कर्षणो मतः॥58(ख)॥ नित्यानन्दावधूतश्च प्रकाशेन स उच्यते॥59(क)॥" “जो व्रजमें श्रीहलधर (श्रीबलदेव) प्रभु हैं, वे ही भक्तस्वरूपमें श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। श्रीबलदेवके सङ्कर्षण व्यूहको विश्वरूप (श्रीचैतन्य महाप्रभुके बड़े भाई) माना जाता है। वे सङ्कर्षण ही प्रकाशभेदसे अवधूत श्रीनित्यानन्द कहे जाते हैं।” यही व्रजके श्रीबलराम हैं। चैःचः आदिलीला, 3/93 संख्या द्रष्टव्य है॥61-62॥ महाप्रभुके पहले श्रीअद्वैताचार्य ही सभीके पूज्य और प्रधान :- प्रभुर आविर्भाव-पूर्वे यत वैष्णवगण। अद्वैत-आचार्येर स्थाने करेन गमन॥63॥ श्रीअद्वैतप्रभुकी भक्ति-व्याख्या :- गीता-भागवत कहे आचार्य-गोसाञि। ज्ञान-कर्म निन्दि' करे भक्तिर बड़ाइ॥64॥ एकमात्र श्रीकृष्णभक्तिकी ही अभिधेयके रूपमें व्याख्या :- सर्वशास्त्रे कहे कृष्णभक्तिर व्याख्यान। ज्ञान, योग, तपो-धर्म नाहि माने आन॥65॥ उनको प्रधान-मानकर सभी वैष्णवोंके द्वारा श्रीकृष्णभजन :- ताँर सङ्गे ताते करे वैष्णवेर गण। कृष्णकथा, कृष्णपूजा, नामसङ्कीर्त्तन॥66॥ अनुवाद-महाप्रभुके अवतीर्ण होनेसे पहले सभी वैष्णव श्रीअद्वैताचार्यके घर एकत्रित हुआ करते थे। श्रीअद्वैताचार्य गीता और भागवतादिकी व्याख्या करते हुए कर्म-ज्ञान मार्गको तुच्छ बतलाकर भक्तिकी श्रेष्ठता स्थापित करते थे। वे शास्त्रोंकी आलोचना करके यही बतलाते थे कि सभी शास्त्र मुख्यरूपसे श्रीकृष्णभक्तिकी महिमाका ही गान करते हैं। ज्ञान, योग और तप मुख्य धर्म नहीं हैं। उनके साथ वैष्णव लोग श्रीकृष्णकथा, श्रीकृष्णपूजा और कृष्णनामका सङ्कीर्तन करते हुए आनन्दित होते थे॥63-66॥ प्रकट होकर आचार्यको जीवोंकी इन्द्रियसुखमें तत्परताको देखकर दुःखकी प्राप्ति :- किन्तु सर्वलोक देखि' कृष्णबहिर्मुख। विषये निमग्न लोक, देखि' पाइल दुःख॥67॥ लोगोंके उद्धारके लिये आचार्यकी गम्भीर चिन्ता :- लोकेर निस्तार-हेतु करेन चिन्तन। केमने ए सर्वलोकेर हइबे तारण॥68॥ तेरहवाँ अध्याय | 157
[ 13/67-74 स्वयं श्रीकृष्णके अवतार द्वारा ही लोगोंका उद्धार सम्भवपर :- कृष्ण अवतरि' करेन भक्तिर विस्तार। तबे त' सकल लोकेर हइबे निस्तार॥ 69॥ अनुवाद-किन्तु सभी लोगोंको कृष्णबहिर्मुख और केवल विषयोंमें ही निमग्न देखकर श्रीअद्वैताचार्यके मनमें बहुत दुःख होता। वे लोगोंके कल्याणके लिये विचार करने लगे। वे चिन्तन करने लगे कि इन सब लोगोंका उद्धार कैसे होगा? तब उन्होंने सोचा कि यदि स्वयं श्रीकृष्ण अवतरित होकर अपनी भक्तिका प्रचार करेंगे, तभी सब लोगोंका उद्धार होगा॥ 67-69॥ स्वयं श्रीकृष्णको अवतरित करानेके लिये श्रीकृष्णपूजा :- कृष्ण अवतारिते आचार्य प्रतिज्ञा करिया। कृष्णपूजा करे तुलसी-गङ्गाजल दिया॥ 70॥ श्रीकृष्णका आह्वान और श्रीकृष्णका आकर्षण :- कृष्णेर आह्वान करे सघन हुङ्कार। हुङ्कारे आकृष्ट हैला व्रजेन्द्रकुमार॥ 71॥ अनुवाद-इसलिये उन्होंने श्रीकृष्णको अवतीर्ण करानेकी प्रतिज्ञा की और तुलसीदल और गङ्गाजलसे श्रीकृष्णकी पूजा करने लगे। वे सघन हुङ्कार करके श्रीकृष्णका आह्वान करने लगे, जिसे सुनकर श्रीव्रजेन्द्रकुमार उनकी ओर आकृष्ट हुए॥ 70-71॥ अनुभाष्य-चैःचः आदिलीला, 3/95-109 संख्या और चैःभाः आदिखण्ड, द्वितीय अध्याय द्रष्टव्य हैं॥ 67-71॥ गौरावतारसे पहले मिश्र और शचीकी आठ कन्याओंकी मृत्यु :- जगन्नाथमिश्र-पत्नी शचीर उदरे। अष्ट कन्या क्रमे हैल, जन्मि' जन्मि' मरे॥ 72॥ मिश्रका दुःख और पुत्र प्राप्तिके लिये विष्णुकी आराधना :- अपत्य-विरहे मिश्रेर दुःखी हैल मन। पुत्र लागि' आराधिल विष्णुर चरण॥ 73॥ उनकी नवम सन्तान-विश्वरूप :- तबे पुत्र जनमिल 'विश्वरूप' नाम। महा-गुणवान् तेँह-'बलदेव'-धाम॥ 74॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ मिश्रकी पत्नी शचीदेवीके गर्भसे एक-एक करके आठ कन्याएँ उत्पन्न हुईं, परन्तु वे जन्मके बाद ही मर गयीं। सन्तानके विरहमें श्रीजगन्नाथमिश्र और शचीदेवीका मन बड़ा दुःखी हो गया और वे पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे भगवान् विष्णुकी आराधना करने लगे। तब उनके घर एक पुत्रका जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने 'विश्वरूप' रखा। विश्वरूपमें महान् गुण थे, क्योंकि वे श्रीबलदेव प्रभुके अवतार थे॥ 72-74॥ अनुभाष्य-'विश्वरूप'—श्रीगौरहरिके बड़े भाई थे। विवाहसे पहले ही इन्होंने गृह त्यागकर संन्यास ग्रहण किया और इनका नाम 'शङ्करारण्य' हुआ। विश्वरूप 1431 शाकाब्दमें महाराष्ट्र 'पाण्डेरपुर' में अप्रकट हुए। वे विश्वके 'उपादान' और 'निमित्त'-दोनों कारणस्वरूप हैं। गौरगणोद्देशदीपिका 58-62 श्लोक- “अंश-अंशिनोरभेदेन व्यूह आद्यः शचीसुतः। बलदेवो विश्वरूपो व्यूहः सङ्कर्षणो मतः॥ 58॥ नित्यानन्दावधूतश्च प्रकाशेन स उच्यते। गौरचन्द्रोदये धर्मं प्रति वाक्यं कलेर्यथा-॥ 59॥ 'अस्याग्रजस्त्वकृतदारपरिग्रहः सन् सङ्कर्षणः स भगवान् भुवि विश्वरूपः। स्वीयं महः किल पुरीश्वरमापयित्वा पूर्वं परिव्रजित एव तिरोबभूव॥' इति॥ 60॥ 'नित्यानन्दावधूतो मह इति महितम् हन्त सङ्कर्षणं यः।' इति च॥ 61॥ यदा विश्वरूपोऽयं तिरोभूतः सनातनः। नित्यानन्दावधूतेन मिलित्वापि तदा स्थितः॥ 62॥" “अंश और अंशीमें अभेद होनेके कारण आद्यव्यूह 158 | श्रीचैतन्यचरितामृत
13/74-79 ] श्रीवासुदेवको श्रीशचीनन्दन माना जाता है। श्रीबलदेवके सङ्कर्षण व्यूहको ही विश्वरूप (श्रीचैतन्य महाप्रभुके बड़े भाई) माना जाता है। वे सङ्कर्षण ही प्रकाशभेदसे अवधूत श्रीनित्यानन्द कहे जाते हैं। श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकके प्रथम अङ्कके अड़तीसवें तथा इकत्तीसवें श्लोकमें धर्मके प्रति कलिने इस प्रकार कहा है—‘जगत्में श्रीविश्वरूपके नामसे विख्यात श्रीगौरहरिके अग्रज (बड़े भाई) साक्षात् सङ्कर्षण हैं। इन्होंने विवाहसे पूर्व ही संन्यास ग्रहण किया था तथा तीर्थ भ्रमण करते समय अपने तेजको श्रीपरमानन्द पुरीमें (धरोहरकी भाँति) स्थापित करके अन्तर्द्धान हो गये।' और "ब्रह्मादिके द्वारा पूजित महातेजोमय श्रीसङ्कर्षण ही अवधूत श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं।' इसलिये अपने अन्तर्धानके समय सनातन श्रीविश्वरूप श्रीनित्यानन्द अवधूतसे मिलकर उनके शरीरमें विराजमान हो गये॥" 74॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 77॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अनन्त भगवान् जगदीश्वरमें यह कुछ भी आश्चर्यका विषय नहीं है, क्योंकि उनमें यह विश्व वस्त्रके सूतकी भाँति ओत-प्रोतरूपमें प्रतीत होता है॥ 77॥ अनुभाष्य—श्रीबलदेवके द्वारा धेनुकासुर-वध-लीलाको लक्षित करके शुकदेव गोस्वामीने राजा परीक्षितसे कहा— हे अङ्ग (राजन्), यस्मिन् इदं विश्वं तन्तुषु पटः (वसनं) यथा ओतं प्रोतं (मिथः सम्मिलितं) [तथा] अनन्ते (अपरिविच्छित्रे) जगदीश्वरे [तस्मिन्] भगवति (विष्णौ) एतत् (असुर-निधनादिकं) चित्रम् (आश्चर्यं) न हि भवति। श्लोक भावानुवाद—हे राजन्! जिनके द्वारा यह जगत् वस्त्रमें धागेके समान ओत-प्रोत है, उन अनन्त जगदीश्वर भगवान् विष्णुके द्वारा इस असुरका मारा जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है॥ 77॥ विश्वरूप ही वैकुण्ठके महासङ्कर्षण :— बलदेव-प्रकाश—परव्योमे 'सङ्कर्षण'। तेंह—विश्वेर उपादान-निमित्त-कारण॥ 75॥ महाप्रभुका विश्वरूपको 'बड़ा भाई' कहना :— अतएव प्रभु ताँरे बले, 'बड़ भाई'। कृष्ण-बलराम दुइ—चैतन्य-निताइ॥ 78॥ अनुवाद—महासङ्कर्षण वैकुण्ठमें श्रीबलदेव प्रभुके प्रकाश हैं और वे जगत्की सृष्टिके उपादान और निमित्त कारण हैं॥ 75॥ अनुवाद—(श्रीबलरामजी ही विश्वरूप हुए हैं) इसलिये महाप्रभु उन्हें अपना बड़ा भाई कहते हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण और श्रीबलरामजी अब श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु हुए हैं॥ 78॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विश्वरूप'—परव्योममें स्थित महासङ्कर्षणके अवतार हैं॥ 75॥ अमृतप्रवाह भाष्य—क्योंकि महासङ्कर्षण 'उपादान' और 'निमित्त' कारणरूपमें विश्वमें ओत-प्रोत होकर विराजमान हैं, इसलिये उनको महाप्रभुके 'बड़े भाई' कहकर कहा जाता है। परन्तु श्रीकृष्णलोकमें जो श्रीकृष्ण और श्रीबलराम हैं, वे ही श्रीचैतन्य-निताइ हैं। इसलिये श्रीनित्यानन्द प्रभु—मूल सङ्कर्षण अर्थात् श्रीबलदेव प्रभु हैं॥ 78॥ ताँहा बइ विश्वे किछु नाहि देखि आर। अतएव 'विश्वरूप' नाम ये ताँहार॥ 76॥ अनुवाद—यह समस्त विश्व उनका ही रूप है और उनके अतिरिक्त जगत्में कुछ भी नहीं दिखायी देता है, इसलिये उनका नाम 'विश्वरूप' है॥ 76॥ श्रीमद्भागवत (10/15/35)— नैतच्चित्रं भगवति ह्यनन्ते जगदीश्वरे। ओतं प्रोतमिदं यस्मिन् तन्तुष्वङ्ग यथा पटः॥ 77॥ पुत्र-प्राप्तिसे मिश्र-शचीको आनन्द :— पुत्र पाञा दम्पति हैला आनन्दित मन। विशेषे सेवन करे गोविन्दचरण॥ 79॥ तेरहवाँ अध्याय | 159
[ 13/79-86 अनुवाद—पुत्रको प्राप्त करके दोनों पति-पत्नीका मन आनन्दित हो गया और वे श्रीगोविन्दके चरणोंकी विशेषभावसे सेवा करने लगे॥79॥ प्रकट होनेसे तेरह मास पूर्व श्रीकृष्णका शचीदेवीके गर्भमें प्रवेश :— चौद्दशत छय शके शेष माघ मासे। जगन्नाथ-शचीर देहे कृष्णेर प्रवेशे॥80॥ अनुवाद—शकाब्द चौदह सौ छहके माघ मासके अन्तमें श्रीकृष्णने जगन्नाथ मिश्र और शचीदेवीके शरीरमें प्रवेश किया॥80॥ शचीकी आलौकिक अवस्थाको देखकर मिश्रका विस्मित होना :— मिश्र कहे शचीस्थाने,—"देखि अन्य रीत। ज्योतिर्मय देह, गेह लक्ष्मी-अधिष्ठित॥81॥ याँहा ताँहा सर्वलोक करये सम्मान। घरे पाठाइया देय धन, वस्त्र, धान॥"82॥ अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रने शचीदेवीसे कहा—"मैं आश्चर्य देख रहा हूँ। तुम्हारी देहसे ज्योति निकल रही है और ऐसा लगता है कि घरमें लक्ष्मीदेवी निवास कर रही हैं। मैं जहाँ भी जाता हूँ, लोग मेरा सम्मान करते हैं और बिना कहे ही वे हमारे घर धन, वस्त्र, धानादि भिजवा देते हैं॥"81-82॥ देवताओंको स्तुति करते हुए देखकर शचीका विस्मित होना :— शची कहे,—"मुञि देखों आकाश-उपरे। दिव्यमूर्त्ति लोक आसि' स्तुति येन करे॥"83॥ अनुवाद—शचीमाताने कहा—"मैं भी देखती हूँ कि ऊपर आकाशमें दिव्य शरीरवाले लोग आकर मानों स्तुति कर रहे हों॥"83॥ श्रीकृष्णका पहले मिश्रके हृदयमें प्रवेश, बादमें शचीके हृदयमें प्रवेश :— जगन्नाथ मिश्र कहे,—"स्वप्न ये देखिल। ज्योतिर्मय-धाम मोर हृदये पशिल॥84॥ किसी महापुरुषके आविर्भावकी सम्भावना :— आमार हृदय हैते गेला तोमार हृदये। हेन बुझि, जन्मिबेन कोन महाशये॥"85॥ अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रने कहा—"मैंने स्वप्नमें देखा कि एक ज्योतिर्मय-धाम मेरे हृदयमें प्रवेश कर गया और वह मेरे हृदयसे तुम्हारे हृदयमें चला गया। मैं समझता हूँ कि तुम्हारे गर्भसे किसी महापुरुषका जन्म होगा॥"84-85॥ दोनोंके द्वारा विशेष रूपसे नारायण-सेवा :— एत बलि' दुँहे रहे हरषित हञा। शालग्राम सेवा करे विशेष करिया॥86॥ अनुवाद—यह कहकर वे दोनों बड़े आनन्दसे रहने लगे और शालग्रामकी सेवा विशेष मनोयोगसे करने लगे॥86॥ अनुभाष्य—सिद्धान्त यह है कि श्रीजगन्नाथ और श्रीशची नित्यसिद्ध परिकर हैं, इस कारण उनका हृदय और शरीर शुद्धसत्त्वमय है, वह साधारण प्राकृत जीवकी भाँति पञ्च-भौतिक नहीं है। विशुद्धसत्त्वका नाम 'वसुदेव' है; वसुदेवमें ही चिद्विलासी वासुदेव प्रकट होते हैं (भा: 4/3/23 श्लोकके गौड़ीय भाष्यके अन्तर्गत 'विवृति' द्रष्टव्य है)। जड़ेन्द्रियोंके भोगके लिये प्राकृत रक्त-मांसके शरीरवाले स्त्री-पुरुषकी कामक्रीड़ा एवं गर्भधारणकी भाँति श्रीजगन्नाथ और श्रीशचीदेवीका मिलन तथा गर्भ-सञ्चार नहीं हुआ; इसलिये मनमें भी इस प्रकार चिन्तन करना अपराध है। भगवत् सेवोन्मुख चित्तमें विचार करनेसे शुद्ध-सत्त्वमयी श्रीशचीदेवीकी अप्राकृत-गर्भ-महिमा हृदयङ्गम होगी। भा: 10/2/16 श्लोक— 160 | श्रीचैतन्यचरितामृत
13/86 ]
“भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः। आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः ॥” इस श्लोककी श्रीधरस्वामीकी टीका— 'मन आविवेश' मनस्याविर्बभूव—जीवानामिव न धातुसम्बन्ध इत्यर्थः। “श्रीभगवान्ने श्रीवसुदेवजीके मनमें प्रवेश किया। जीवोंका जन्म ग्रहण पिता-माताके शुक्र-शोणितके सम्पर्कसे होता है, परन्तु भगवान्का स्वरूप सच्चिदानन्दघन है, उन्हें ऐसे पञ्चभौतिक देहकी कोई आवश्यकता नहीं होती।” इस प्रसङ्गमें भाः 10/2/18-19 श्लोक भी द्रष्टव्य हैं। इस सम्बन्धमें श्रील रूपगोस्वामीके रचित लघुभागवतामृतमें 160-165 श्लोकका मर्मानुवाद— भाः 10/2/16 श्लोकमें वर्णित प्रकटलीला आविर्भावके प्रसङ्गमें 'आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः'—इस वचनके अनुसार श्रीकृष्ण पहले आनक-दुन्दुभि (वसुदेव महाराज) के हृदयमें प्रकट हुए। तत्पश्चात् आनकदुन्दुभिके हृदयसे देवकीके हृदयमें प्रकट हुये। देवकीके वात्सल्यरूप प्रेमानन्दमृतके द्वारा पालित होकर श्रीकृष्णने उन देवकीके हृदयमें चन्द्रकी भाँति उत्तरोत्तर अपनी वृद्धिका प्रदर्शन किया। तदनन्तर देवकीके हृदयसे निकलकर श्रीकृष्ण कंसके कारागारमें स्थित सूतिकाघरमें देवकीकी शय्यापर आविर्भूत हुए। योगमायाके प्रभावसे देवकीने यही अनुभव किया कि लौकिक रीतिके अनुसार ही शिशुने परमसुखसे जन्म ग्रहण किया है (भक्त और भगवान्की नरलीला-अनुरूप सम्बन्धके अनुसार परस्पर जो अप्राकृत भावसमूह उदित होते हैं, वे परम श्रेष्ठ हैं। ये सभी भाव प्रकाशित होकर परम चमत्कारमय चिद्-लीला विलासमें सहायक होते हैं, भक्त और भगवान् दोनों ही इसका आस्वादन करते हैं। किन्तु दूसरी ओर ये मायासे मुग्ध महाविद्वान व्यक्तियोंको भी विमोहितकर भ्रमित कर देते हैं। इन्हीं परम आस्वादनीय अप्राकृत भाव वैचित्रीके कारण परव्योम-वैकुण्ठसे भी मथुरा धामकी श्रेष्ठता प्रमाणित होती है।)। श्रीकृष्ण नित्यकाल नित्य यशोदाके नित्यपुत्रके रूपमें विराजमान होकर अनन्त अप्रकट-लीलाओंमें भी इसी प्रकार विलास कर रहे हैं। प्रियतम भक्तोंके लिये आनन्ददायक और स्वयंके लिये भी चमत्कारिक इस प्रकारकी लीलाओंके उल्लासके द्वारा लीलापुरुषोत्तम श्रीकृष्ण नित्यकाल व्रजमें विलास करते हैं। अप्राकृत नन्द-यशोदाके अप्राकृत असमोर्द्ध-वात्सल्यके वशमें भगवान् नित्य ही स्वयंको उनके नित्य पुत्रके रूपमें जानते हैं। श्रीभागवत (10/5/1) में—“पुत्रके उत्पन्न होनेपर महात्मा श्रीनन्द अत्यन्त आनन्दित हुए।” श्रीभागवत (10/6/43) में— “उदार हृदय श्रीनन्दने विदेश (मथुरा) से लौटकर निजपुत्र श्रीकृष्णको गोदमें उठाकर उसका मस्तक सूँघकर परम आनन्दको प्राप्त किया।” फिर (10/9/21) में—“ये भगवान् गोपिका-सुत (श्रीकृष्ण) भक्तोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, देहात्मवादी, तपस्वी अथवा आत्मदर्शी ज्ञानियोंके लिये कभी भी उस प्रकार सुलभ नहीं है।” श्रीपाद बलदेव विद्याभूषण— “तदिदमानकदुन्दुभेर्हृदयस्थेन स्वयंभगवता रूपेण कृष्णेण सहैक्यं प्राप्य देवकीहृदि प्राकट्यं गच्छेत्—ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं समाहितं ('सम्यग्भूतमेवाहितं वैधदीक्षया अर्पितम्' इति स्वामिचरणाः)। शूरसुतेन देवी ('शुद्धसत्त्वेत्यर्थः' इति स्वामिचरणाः।) दधार सर्वात्मकमात्मभूतं काष्ठा यथानन्दकरं मनस्तः॥” (भाः 10/2/18) इति शुकोक्तेः। यद्यपि देवकीहृदीत्युक्तं, तथापि तद्गर्भस्थितिबोध्या, - 'दिष्ट्याम्ब, ते कुक्षिगतः परः पुमान्' (भाः 10/2/41) इति देवस्तोत्रात्। जन्मप्रकरणे—'देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सर्वगुहाशयः। अविरासीद् यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः॥' (भाः 10/3/8) इति”। “अनन्तर पूर्व दिशा जिस प्रकार चन्द्रके उदयको व्यक्त करती है, उसी प्रकार शुद्धसत्त्वमयी देवकीने शूरसुत वसुदेवके द्वारा कृष्णदीक्षा प्राप्तकर जगत्के मङ्गलस्वरूप सर्वात्मा और परमात्मा श्रीअच्युतको हृदयमें धारण किया, -श्रीमद्भागवतके इस वाक्यसे जाना जाता है कि श्रीआनकदुन्दुभिके (वसुदेवके) हृदयसे स्वयं भगवान् देवकीके हृदयमें प्रकट हुए। इस स्थानपर यद्यपि 'देवकीके हृदयमें' कहा गया है, तथापि इसके
तेरहवाँ अध्याय | 161
[ 13/86-90 [बायाँ स्तम्भ] द्वारा 'देवकीके गर्भमें स्थित' ही समझना चाहिये। क्योंकि श्रीमद्भागवतमें “हे माता! आपके गर्भमें परम पुरुष अधिष्ठित हैं”—यह देवस्तुति देखी जाती है। भगवान्के जन्म-प्रकरणमें भी—“पूर्णचन्द्र जिस प्रकार पूर्वदिशामें उदित होता है, उसी प्रकार सर्वगुहाशय (सर्वान्तर्यामी) विष्णु देवकीके हृदयसे आविर्भूत हुए”—यह भागवत-वाक्य विशेषरूपसे द्रष्टव्य है। यहाँ (79 पयार में) “विशेषे सेवन करे गोविन्द चरण” इस वाक्यसे श्रीजगन्नाथ मिश्र और शचीमाताके नित्य श्रीगोविन्दचरणसेवा-निमग्न हृदयमें ही श्रीगौरसुन्दर आविर्भूत हुए, ऐसा जानना चाहिये॥86॥ तेरह मासमें भी अवतरित होनेकी असम्भावना :- हैते हैते हैल गर्भ त्रयोदश मास। तथापि भूमिष्ठ নহে,—मिश्रेर हैल त्रास ॥ 87 ॥ नीलाम्बर चक्रवर्तीकी गणना :- नीलाम्बर चक्रवर्त्ती कहिल गणिया। एइ मासे पुत्र हबे शुभक्षण पाञा ॥ 88 ॥ महाप्रभुका अवतरण :- चौद्दशत सात शके मास ये फाल्गुन। पौर्णमासीर सन्ध्याकाले हैले शुभक्षण ॥ 89 ॥ सिंह-राशि, सिंह-लग्न, उच्च ग्रहगण। षड्वर्ग, अष्टवर्ग, सर्व सुलक्षण ॥ 90 ॥ अनुवाद—इस प्रकार होते-होते तेरह मासका गर्भ हो गया, परन्तु सन्तानका जन्म नहीं हुआ, इसलिये जगन्नाथ मिश्रको बहुत भय लगने लगा। तब नीलाम्बर चक्रवर्त्तीने ज्योतिष गणना करके बतलाया कि इस मासमें शुभ क्षणमें एक पुत्रका जन्म होगा। वह शुभ क्षण शकाब्द चौदह सौ सातमें फाल्गुन मासकी पूर्णिमाकी सन्ध्याके समय आया। उस समय सिंह-राशि और सिंह-लग्न होनेके कारण षड्वर्ग और अष्टवर्गके प्रभावमें ग्रह उच्च अवस्थामें थे, इसलिये वह क्षण सभी सुलक्षणोंसे युक्त था॥87-90॥ [दायाँ स्तम्भ] अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुकी जन्मपत्री इस प्रकार है— शक 1407/10/22/28/48 दिनं 7 11 8 15 54 38 40 37 40 13 6 23 महाप्रभुके जन्मकालमें—मेषमें शुक्र अश्विनी-नक्षत्रमें, सिंहमें केतु उत्तरफाल्गुनी-नक्षत्रमें और चन्द्र पूर्वफाल्गुनी-नक्षत्रमें, वृश्चिकमें शनि ज्येष्ठा-नक्षत्रमें, धनुमें बृहस्पति पूर्वाषाढ़ा-नक्षत्रमें, मकरमें मङ्गल श्रवणा-नक्षत्रमें, कुम्भमें रवि पूर्वभाद्रपदमें और राहु पूर्वभाद्रपद-नक्षत्रमें तथा मीनमें बुध उत्तरभाद्रपद-नक्षत्रमें मेष-लग्न। नवमाधिपति मङ्गल उच्च, शुक्र और शनि उच्चप्राय, बृहस्पति अपने गृहमें धर्मस्थानपर शुक्रपर दृष्टिपात करते हुए; दशमाधिपति गुरु-दृष्ट शुक्र नवम गृहमें॥89॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटकके अन्तमें— “शाके चतुर्दशशत रविवाजियुक्ते गौरो हरिर्धरणीमण्डल आविरासीत्।” अनेक घटनाओं और निर्दिष्ट कालके साथ इस शकाब्दमें श्रीमहाप्रभुके उदय-कालका सामञ्जस्य नहीं होता, ऐसा कहकर किसी-किसीके मतानुसार 1426 अथवा अन्य शकाब्द ही शुद्ध होगा, वे ऐसा मानते हैं॥89॥ षड्वर्ग—क्षेत्र, होरा, द्रेष्काण, नवांश, द्वादशांश और त्रिंशांश, इन छहको 'षड्वर्ग' कहते हैं। लग्नके स्पष्ट अंशके अनुसारसे कथित षड्वर्गके अधिपतिका विचार करके सुलक्षण स्थिर किया। अष्टवर्ग—'बृहज्जातकादि' ग्रन्थोंमें कथित ग्रहके तात्कालिक स्थानसे निर्दिष्ट रेखापात करके अष्टवर्ग गिने जाते हैं। इससे फल-योजनाके द्वारा होराशास्त्रविद्गण 162 | श्रीचैतन्यचरितामृत
13/90-99 ] शुभाशुभ-निर्णयकी व्यवस्था करते हैं। इस गणनासे भी नीलाम्बर चक्रवर्त्तीने महाप्रभुके सुलक्षण दर्शन किये॥ 90 ॥ चन्द्रमाको तिरस्कार करते हुए ही जैसे श्रीगौरचन्द्रका उदय :- अ-कलङ्क गौरचन्द्र दिला दरशन। स-कलङ्क चन्द्रे आर कोन् प्रयोजन ॥ 91 ॥ चन्द्रग्रहण और उसके उपलक्ष्यमें जीवोंका हरिनाम्-ग्रहण :- एत जानि' चन्द्रे राहु करिला ग्रहण। 'कृष्ण' 'कृष्ण' 'हरि' नामे भासे त्रिभुवन ॥ 92 ॥ जय जय ध्वनि हैल सकल भुवन। चमत्कार हैया लोक भावे मने मन ॥ 93 ॥ जीवोंके हरिनाम ग्रहणकालमें महाप्रभुका अवतार :- जगत् भरिया लोक बोले—'हरि' 'हरि'। सेइक्षणे गौरकृष्ण भूमे अवतरि ॥ 94 ॥ अनुवाद—जब निष्कलङ्क श्रीगौरचन्द्र प्रकट होकर दर्शन दे रहे हैं, तब कलङ्कयुक्त चन्द्रमासे क्या प्रयोजन ? यह जानकर राहुने चन्द्रमाको ग्रास कर लिया। उस समय 'कृष्ण-कृष्ण' और 'हरि-हरि' नामसे तीनों लोक परिपूर्ण हो गये। सभी लोकोंमें जय-जयकारकी ध्वनि होने लगी और लोग मन-ही-मन चमत्कारका अनुभव करने लगे। जिस समय सारे जगत्के लोग 'हरि-हरि' बोल रहे थे, उसी क्षण श्रीगौरकृष्ण पृथ्वीपर अवतरित हुए॥ 91-94 ॥ उस समय यवनोंके द्वारा भी उपहासके छलसे हरिनाम-ग्रहण :- प्रसन्न हइल सब जगतेर मन। 'हरि' बलि' हिन्दुके हास्य करये यवन ॥ 95 ॥ स्वर्गमें देवताओंको आनन्द :- 'हरि' बलि' नारीगण देइ हुलाहुलि। स्वर्ग वाद्य-नृत्य करे देव कुतूहली ॥ 96 ॥ सर्वत्र आनन्दकी लहर :- प्रसन्न हैल दशदिक्, प्रसन्न नदीजल। स्थावर-जङ्गम हैल आनन्दे विह्वल ॥ 97 ॥ अनुवाद—समस्त जगतवासियोंका मन तब प्रसन्न हो गया और यहाँ तक यवन लोग भी 'हरि-हरि' बोलकर हिन्दुओंसे उपहास करने लगे। 'हरि-हरि' बोलकर महिलाएँ 'हुलाहुलि' ध्वनि करने लगीं। स्वर्गके देवता भी आनन्दसे वाद्य बजाते हुए नृत्य करने लगे। दसों दिशाएँ प्रफुल्लित हो गयीं, आनन्दसे नदियोंके जलमें उत्ताल तरङ्गों उठने लगीं। सभी चल-अचल प्राणी आनन्दमें विह्वल हो गये॥ 95-97 ॥ अमृतानुकणिका—शास्त्रोंमें तन्त्री, ताल, झाँझ, नगाड़ा और तुरही—इन पाँच प्रकारके बाजोंके शब्द एवं वेदध्वनि, वन्दिध्वनि, जयध्वनि, शङ्खध्वनि और हुलूध्वनि (हुलाहुलि)—इन पाँच प्रकारकी ध्वनियोंको मङ्गलमय कहा है॥ 95-97 ॥ महाप्रभुकी जन्मलीला-सूत्ररूपमें; हरिनाम-कीर्त्तनके मध्य श्रीगौरहरिका आविर्भाव :- नदीया-उदयगिरि, पूर्णचन्द्र गौरहरि, कृपा करि' हइल उदय। पाप-तमो हैल नाश, त्रिजगतेर उल्लास, जगभरि' हरिध्वनि हय ॥ 98 ॥ अनुवाद—नदियाके उदयाचलपर पूर्णचन्द्र श्रीगौरहरि कृपापूर्वक उदय हुए। उनके उदय होनेसे पापरूपी अन्धकारका नाश हो गया, तीनों लोकोंमें उल्लास छा गया और सर्वत्र हरिध्वनि होने लगी ॥ 98 ॥ श्रीअद्वैतप्रभुका आनन्दित होकर नृत्य करना :- सेइकाले निजालय, उठिया अद्वैत राय, नृत्य करे आनन्दित मने। हरिदासे लञा सङ्गे, हुङ्कार-कीर्त्तन-रङ्गे, केने नाचे, केह नाहि जाने ॥ 99 ॥ तेरहवाँ अध्याय | 163
[ 13/99-103 [बायाँ स्तम्भ] अनुवाद—उस समय अपने घरमें श्रीअद्वैताचार्य उठकर आनन्दपूर्वक नृत्य करने लगे और वे अपने साथ हरिदास ठाकुरको लेकर आनन्दसे हुङ्कार और कीर्तन करने लगे, परन्तु कोई नहीं जानता था कि वे क्यों नृत्य कर रहे हैं॥ 99 ॥ अनुभाष्य—'निजालय'—शान्तिपुरके घरमें। महाप्रभुके जन्मवाले दिन हरिदास ठाकुर शान्तिपुरमें थे॥ 99 ॥ चन्द्रग्रहणमें लोगोंके द्वारा हरिध्वनि :— देखि' उपराग हासि', शीघ्र गङ्गाघाटे आसि', आनन्दे करिल गङ्गास्नान। पाञा उपराग-छले, आपनार मनोबले, ब्राह्मणेरे दिल नाना दान ॥ 100 ॥ अनुवाद—चन्द्रग्रहण आरम्भ होते देखकर अथवा चन्द्रग्रहण देखकर हँसकर श्रीअद्वैत आचार्यने हरिदास ठाकुरके साथ शीघ्र ही गङ्गाघाटपर आकर आनन्दसे स्नान किया। चन्द्रग्रहणके बहाने मनमें आनन्द होनेसे ब्राह्मणोंको अनेक वस्तुएँ दान कीं॥ 100 ॥ अनुभाष्य—'उपराग'—ग्रहण। 'मनोबले'—मनके उत्साहसे अथवा मनके द्वारा ब्राह्मणोंको दान किया था। (भाः 10/3/11)— “स विस्मयोत्फुल्लविलोचनो हरिं सुतं विलोक्यानकदुन्दुभिस्तदा। कृष्णावतारोत्सवसम्भ्रमोऽस्पृशन् मुदा द्विजेभ्योऽयुतमाप्लुतो गवाम्॥” “भगवान् श्रीहरिको पुत्रके रूपमें दर्शन करके वसुदेवजीने कृष्णजन्मोत्सवके कारण आनन्दित होकर कारागारमें मन-ही-मन दस हजार गैयाँ ब्राह्मणोंको दान कीं॥” 100 ॥ श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा हरिदासको महाप्रभुके शुभाविर्भावका इङ्गित :— जगत् आनन्दमय, देखि' मने सविस्मय, ठारे-ठोरे कहे हरिदास। “तोमार ऐछन रङ्ग, मोर मन परसन्न, देखि—किछु कार्ये आछे भास॥” 101 ॥ [दायाँ स्तम्भ] अनुवाद—सारे जगत्को आनन्दमय देखकर हरिदास ठाकुर आश्चर्यचकित होकर श्रीअद्वैत आचार्यको इङ्गित करके कहने लगे कि आप इतने आनन्दमें हैं और मेरा मन भी अति प्रसन्न है, तो ऐसा लगता है कि कोई विशेष कार्य प्रकाशित होनेवाला है॥ 101 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'देखि किछु कार्ये आछे भास'—ऐसा प्रतीत होता है कि किसी विशेष कार्यका प्रकाश हुआ है॥ 101 ॥ अनुभाष्य—'ठारे-ठोरे'—इङ्गित करके॥ 101 ॥ श्रीवासका आनन्दपूर्वक हरिनाम-कीर्तन :— आचार्यरत्न, श्रीनिवास, हैल मने सुखोल्लास, याइ' स्नान कैल गङ्गाजले। आनन्दे विह्वल मन, करे हरिसङ्कीर्त्तन, नाना दान कैल मनोबले ॥ 102 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखर आचार्य और श्रीनिवास (श्रीवास) पण्डितके मनमें भी आनन्दके कारण अपूर्व उल्लास हुआ और उन्होंने जाकर गङ्गाजलमें स्नान किया। उनका मन आनन्दसे विह्वल हो रहा था और वे हरिसङ्कीर्तन करने लगे तथा उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अनेक प्रकारका दान दिया॥ 102 ॥ जगत्के सभी भक्तोंके हृदयमें आनन्द :— एइ मत भक्तयति, याँर येइ देशे स्थिति, ताहाँ ताहाँ पाञा मनोबले। नाचे, करे सङ्कीर्त्तन, आनन्दे विह्वल मन, दान करे ग्रहणेर छले ॥ 103 ॥ अनुवाद—इस प्रकार जिस-जिस स्थानपर जो भी भक्त थे, सभीका मन आनन्दसे विह्वल हो गया और वे भी कीर्तन करते हुए नृत्य करने लगे। मनमें आनन्द होनेके कारण चन्द्रग्रहणके छलसे अनेक दान करने लगे॥ 103 ॥ 164 | श्रीचैतन्यचरितामृत
13/104-107 ]
स्वर्णकान्ति शिशुके दर्शनसे नर-नारी सभीको आनन्द :- ब्राह्मण-सज्जन-नारी, नाना द्रव्य पात्र भरि', आइला सबे यौतुक लइया। येन काँचा-सोना-द्युति, देखि' बालकेर मूर्त्ति, आशीर्वाद करे सुख पाञा॥ 104॥
अनुवाद- (शची माताके पुत्र हुआ है, यह समाचार पाकर) ब्राह्मणों और भक्तोंकी स्त्रियाँ नवजात-शिशुके दर्शनके लिये अनेक पात्रोंमें नाना प्रकारके उपहार और भेंट लेकर आयीं। शिशुकी नवीन स्वर्णके समान कान्ति देखकर परम आनन्दित होकर सभीने उसको आशीर्वाद दिया॥ 104॥
ब्राह्मणी-वेशमें देवियोंके द्वारा मर्त्यलोकमें आकर श्रीगौरदर्शन :- सावित्री, गौरी, सरस्वती, शची, रम्भा, अरुन्धती, आर यत देव-नारीगण। नाना द्रव्य पात्र भरि', ब्राह्मणीर वेश धरि', आसि' सबे करेन दरशन॥ 105॥
अनुवाद-सावित्री, गौरी, सरस्वती, शची, रम्भा, अरुन्धती और जितनी भी देवताओंकी स्त्रियाँ थी, वे सभी ब्राह्मणियोंका वेश धारण करके नाना प्रकारके माङ्गलिक द्रव्योंको पात्रोंमें भरकर नवजात शिशुके दर्शनके लिये आयीं॥ 105॥
अनुभाष्य- 'सावित्री'—ब्रह्माजीकी पत्नी; 'गौरी'— शिवजीकी पत्नी; 'सरस्वती'—श्रीनृसिंहकान्ता, जैसे श्रीधरस्वामीकी टीकामें कहा है- “वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि। यस्यास्ते हृदये सम्वित् तं नृसिंहमहं भजे॥” “मैं ऐसे नृसिंह भगवान्की वन्दना करता हूँ, जिनके मुखके भीतर वाणीकी स्वामिनी सरस्वती निवास करती हैं, जिनके वक्षस्थलपर लक्ष्मी वास करती हैं और हृदयमें चेतनाकी दैवीशक्ति निवास करती हैं।”
'शची'—इन्द्रकी पत्नी; 'रम्भा'—स्वर्गकी नर्तकी; 'अरुन्धती'—वशिष्ठ ऋषिकी पत्नी॥ 105॥
आकाशमें देवतादिका आनन्द, प्रणाम, स्तुति और नृत्य :- अन्तरीक्षे देवगण, सिद्ध, गन्धर्व, चारण, स्तुति-नृत्य करे वाद्य-गीत। नर्त्तक, वादक, भाट, नवद्वीपे यार नाट, सबे आसि' नाचे पाञा प्रीत॥ 106॥
अनुवाद-अन्तरिक्षमें देवता, सिद्ध, गन्धर्व और चारण वाद्य-गीतके द्वारा स्तुति करते हुए नृत्य करने लगे। नवद्वीपमें जितने नर्तक, वादक और भाट थे, सभी मिश्रभवनमें आकर प्रीतिपूर्वक आनन्दसे नृत्य करने लगे॥ 106॥
अनुभाष्य- 'सिद्ध'—मन्त्रसिद्धिसे प्राप्त-देवयोनि। 'गन्धर्व'—स्वर्गके गायक, ब्रह्माकी कान्तिसे उत्पन्न; गुह्यलोक इनका वासस्थान है। 'चारण'—'देवानां गायनास्ते च चारणाः स्तुतिपाठकाः।' ये देवयोनिमें विशेष जाति हैं, जो स्तुति-पाठ करते हैं॥ 106॥
केबा आसे केबा याय, केबा नाचे केबा गाय, सम्भाळिते नारे कार बोल। खण्डिलेक दुःख-शोक, प्रमोदपूरित लोक, मिश्र हैला आनन्दे विह्वल॥ 107॥
अनुवाद-कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, कौन नाच रहा है, कौन गा रहा है, किसीको पता नहीं चल रहा था और कौन क्या बोल रहा है, किसीकी समझमें नहीं आ रहा था। सभी लोकोंके दुःख-शोकका नाश हो गया और सभी लोग प्रसन्नतासे पूरित हो गये। श्रीजगन्नाथ मिश्रके आनन्दकी कोई सीमा नहीं रही और वे आनन्दसे विह्वल हो गये॥ 107॥
अनुभाष्य- 'सम्भालिते'—समझनेमें। देव, नर, सिद्धादि
तेरहवाँ अध्याय | 165
[ 13/107-114
भिन्न-भिन्न श्रेणियोंमें स्थित हैं, इसलिये वे एक-दूसरेकी बात समझनेमें असमर्थ हैं।॥ 107 ॥ महाप्रभुका जातकर्म :- आचार्यरत्न, श्रीनिवास, जगन्नाथमिश्र-पाश, आसि' ताँरे करे सावधान। कराइल जातकर्म, ये आछिल विधि-धर्म, तबे मिश्र करे नाना दान॥ 108 ॥ अनुवाद-श्रीचन्द्रशेखर आचार्य और श्रीनिवास पण्डितने श्रीजगन्नाथ मिश्रके पास आकर उन्हें सचेत किया और विधि-विधानके अनुसार जातकर्म संस्कार करवाये तथा तब श्रीजगन्नाथ मिश्रने अनेक वस्तुएँ दान की॥ 108 ॥ अनुभाष्य-'आचार्यरत्न'-चन्द्रशेखर; 'श्रीनिवास'-श्रीवास पण्डित ॥ 108 ॥ शुभकर्मके उपलक्ष्यमें मिश्रके द्वारा दान :- यौतुक पाइल यत, घरे वा आछिल कत, सब धन विप्रे दिल दान। यत नर्त्तक, गायन, भाट, अकिञ्चन जन, धन दिया कैल सबार मान॥ 109 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ मिश्रने जो कुछ भी भेंट और उपहारमें सामान आया था और जो कुछ उनके घरमें था, वह सब उन्होंने ब्राह्मणोंको दान किया। नर्तकों, गायकों, भाट और दरिद्र लोगोंको धन दानकर उनका यथायोग्य सम्मान किया॥ 109 ॥ मालिनी ठाकुरानी और महाप्रभुकी मौसीके द्वारा माङ्गलिक कार्य :- श्रीवासेर ब्राह्मणी, नाम ताँर 'मालिनी', आचार्यरत्नेर पत्नी-सङ्गे। सिन्दूर, हरिद्रा, तैल, खइ, कला, नाना फल, दिया पूजे नारीगण रङ्गे॥ 110 ॥ अनुवाद-श्रीवासजीकी पत्नीने जिनका नाम मालिनी था, श्रीचन्द्रशेखर आचार्यकी पत्नीके साथ मिलकर आनन्दसे सिन्दूर, हल्दी, तेल, चावल, केला और अनेक प्रकारके फलोंसे नवजात शिशुके दर्शनके लिये आनेवाली स्त्रियोंका (शचीमाताकी ओरसे) सम्मान किया॥ 110 ॥ सीता ठाकुरानीके कृत्य :- अद्वैत-आचार्य-भार्या, जगत्पूजिता आर्या, नाम ताँर 'सीताठाकुराणी'। आचार्येर आज्ञा पाञा, गेला उपहार लञा, देखिते बालक-शिरोमणि॥ 111 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यकी पत्नी जगत् पूज्यनीया 'सीताठाकुराणी' उनकी आज्ञा पाकर उपहार लेकर उस बालक-शिरोमणिके दर्शनके लिये शचीमाताके घर आयीं॥ 111 ॥ अनुभाष्य-महाप्रभुके जन्मदिनके पश्चात् एक दिन श्रीअद्वैताचार्यकी अनुमति पाकर उनकी पत्नी सीतादेवी उपहार लेकर शान्तिपुरसे नवद्वीपमें शिशुदर्शनके लिये आयीं। यद्यपि उस समय नवद्वीपमें भी श्रीअद्वैतप्रभुका घर था, तथापि 'निजालय' का उल्लेख होनेसे उस समय वे शान्तिपुरमें ही थे, ऐसा प्रतीत होता है।॥ 111 ॥ शिशुरूपी महाप्रभुके अलङ्कार :- सुवर्णेर कड़ि-बाउलि, रजतमुद्रा-पांशुलि, सुवर्णेर अङ्गद, कङ्कण। दु-बाहुते दिव्य शङ्ख, रजतेर मलबङ्ग, स्वर्णमुद्रार नाना हारगण॥ 112 ॥ व्याघ्रनख हेमजड़ि, कटि-पट्टसूत्र-डोरी, हस्त-पदेर यत आभरण। चित्रवर्ण पट्टसाड़ी, बुनि फोतो पट्टपाड़ी, स्वर्ण-रौप्य-मुद्रा बहुधन॥ 113 ॥ माङ्गलिक अनुष्ठान :- दुर्वा, धान्य, गोरोचन, हरिद्रा, कुङ्कुम, चन्दन, मङ्गल-द्रव्य पात्र भरिया। वस्त्र-गुप्त दोला चड़ि', सङ्गे लञा दासी चेड़ी, वस्त्रालङ्कार पेटारि भरिया॥ 114 ॥
166 | श्रीचैतन्यचरितामृत
13/112–116 ] भक्ष्य, भोज्य, उपहार, सङ्गे लइल बहु भार, शचीगृहे हैल उपनीत। देखिया बालक-ठाम, साक्षात् गोकुल-कान, वर्णमात्र देखि विपरीत॥115॥ अनुवाद—उन्होंने अपने साथ नवजात बालक और उसकी माताके लिये सोनेकी किङ्किणी, चाँदीकी नूपुर, सोनेके अङ्गद और कङ्कन, दोनों भुजाओंके लिये दिव्य शङ्खसे बने कङ्कन, चाँदीके पाँवके कड़े और सोनेकी मुद्राओंके अनेक प्रकारके हार, सोनेमें जड़े बाघके नख, कमरमें बाँधनेवाली गोटा और किनारेसे युक्त रेशमी डोरी, हाथों और पाँवोंके लिये आभूषण, चित्रकलासे युक्त रेशमी साड़ियाँ, शिशुके पहननेके लिये रेशमी वस्त्र, सोने एवं चाँदीकी मुद्रायें तथा बहुतसा धन उपहारके रूपमें एकत्रित किये और इन्हें एक पेटीमें रखा। उन्होंने एक पात्रमें दूर्वाघास, धान्य, गोरोचन, हल्दी, कुङ्कुम, चन्दनादि मङ्गल-द्रव्योंको भरा। तब वे कपड़ेसे ढकी पालकीमें बैठकर ये सब उपहार और खानेका बहुतसा सामान तथा अनेक दासियोंको साथमें लेकर शचीमाताके घर पहुँचीं। सीतादेवीने उस शिशुको देखकर विचार किया कि उसके शरीरका गठन तो साक्षात् गोकुलके कान्हाके समान है, परन्तु वर्णमात्र ही विपरीत है॥112-115॥ अनुभाष्य—'कड़ि-बउलि'—स्वर्णकी बनी हुई कटि-बन्ध (कमर-पेटी); 'पाशुलि'—चाँदीके पैरोंके विशेष आभूषण; 'सुवर्णेर अङ्गद, कङ्कण'—सोनेकी चूड़ियाँ, बालियाँ; 'दिव्य शङ्ख'—शङ्खसे बने कङ्कन; 'मलवङ्ग'—पाँवोंके वक्र-कड़े। 'व्याघ्रनख हेमजड़ि'—बाघके नख जड़े हुए सोनेके अलङ्कार; 'कटिपट्टसूत्रडोरि'—कटि (कमर) में बाँधनेवाला रंगीन धागा; 'चित्रवर्ण पट्टसाड़ी'—विचित्र रेशमी वस्त्र; 'बूनि फोटो पट्टपाड़ी'—बुना हुआ रेशमका शिशुके पहननेवाला जामा। 'गोरोचन'—गोमस्तकसे प्राप्त उज्ज्वल पीतद्रव्य; 'कुङ्कुम'—काश्मीर देशमें उत्पन्न होनेवाला एक विशेष गन्धद्रव्य। “काश्मीर-देशजे क्षेत्रे कुङ्कुमं यद्भवैत् हि तत्। सूक्ष्म-केशरमारक्तं पद्मगन्धि तदुत्तमम्॥ बाहीकदेशसञ्जातं कुङ्कुमं पाण्डुरं भवेत्। केतकीगन्धयुक्तं तन्मध्यमं सूक्ष्मकेशरम्॥ कुङ्कुमं पारसीकेयं मधुगन्धि तदीरितम्। ईषत् पाण्डुवर्णं तदधमं स्थूलकेशरम्॥” “काश्मीर देशके खेतोंमें जो कुङ्कुम होता है, वह सूक्ष्म केशरवाला, लाल रङ्गका और पद्मकी गन्धवाला होता है—यह उत्तम कुङ्कुम है। बाहीक देशमें (भारत और पाकिस्तानमें पंजाब क्षेत्रमें) उत्पन्न होनेवाला कुङ्कुम सूक्ष्म केशरवाला, पीले रङ्गका और केतकीकी गन्धसे युक्त होता है—यह मध्यम कुङ्कुम है। पारसिक देशमें (वर्तमान ईरानमें) उत्पन्न होनेवाला कुङ्कुम स्थूल केशरवाला, शहदकी गन्धयुक्त और थोड़ा पीले रङ्गका होता है—यह कुङ्कुम अधम जातिका कहा गया है।” 'वस्त्रगुप्तदोला'—कपड़ेके द्वारा आवृत डोली; 'चेड़ी'—दासी। 'ठाम'—गठन; 'कान'—कानू अथवा कृष्ण; 'कृष्णेर वर्ण'—इन्द्रनील-घनश्याम; 'विश्वम्भरेर वर्ण'—उसके विपरीत गौरवर्ण॥112-115॥ शिशुकी स्वर्णकान्तियुक्त देहके दर्शनसे स्त्रियोंमें वात्सल्यकी उत्पत्ति :— सर्व अङ्ग—सुनिर्माण, सुवर्ण-प्रतिमा-भान, सर्व अङ्ग—सुलक्षणमय। बालकेर दिव्य ज्योति, देखि' पाइल बहु प्रीति, वात्सल्यते द्रविल हृदय॥116॥ अनुवाद—उन्होंने देखा कि उसके सभी अङ्गोंकी रचना अति सुन्दर और सभी सुलक्षणोंसे युक्त है तथा उसका शरीर स्वर्णके समान वर्णका है। उस शिशुकी दिव्य ज्योतिको देखकर उन्हें बहुत आनन्द हुआ और वात्सल्य-भावसे उनका हृदय द्रवित हो गया॥116॥ अनुभाष्य—'सुनिर्माण'—सुन्दर रूपसे अङ्ग-प्रत्यङ्गका गठन; 'भान'—भ्रम॥116॥ तेरहवाँ अध्याय | 167
[ 13/117-119 शिशुको आशीर्वाद और रक्षाकवच-बन्धन :- दुर्वा, धान्य, दिल शीर्षे, कैल बहु आशिषे, चिरजीवि हओ दुइ भाइ। डाकिनी-शाँखिनी हैते, शङ्का उपजिल चिते, डरे नाम थुइल 'निमाइ' ॥117॥ अनुवाद—उन्होंने शिशुके शीषपर दुर्वा, धान्यादि मङ्गल पदार्थोंको रखकर अनेक आशीर्वाद देकर उन दोनों भाइयों (श्रीविश्वरूप और महाप्रभु) की दीर्घ आयुकी कामना की। तब शिशुके सुन्दर रूपको देखकर उनके मनमें डाकिनी-शाँखिनीके द्वारा शिशुके अमङ्गलकी शङ्का उनके हृदयमें हुई, इसलिये उस भयके कारण उन्होंने बालकका नाम 'निमाई' रखा॥117॥ अनुभाष्य—'दुई भाई'—विश्वरूप और विश्वम्भर। 'डाकिनी-शाँखिनी'—पार्वती-महेशके सहवर्त्तिनी (अनुगामिनी) स्त्री-योनिवाली अशुभ-कारिणी विशेष प्रेतयोनि हैं। ये सब अपदेवता पवित्र नीमवृक्ष और नीमवृक्षके आस-पासके स्थानपर जानेमें असमर्थ हैं॥117॥ शची-मिश्रके द्वारा पूजा :- पुत्रमाता-स्नानदिने, दिल वस्त्र विभूषणे, पुत्रसह मिश्रेर सम्मनि' । शची-मिश्रेर पूजा लञा, मनेते हरिष हञा, घरे आइला सीता ठाकुराणी ॥118॥ अनुवाद—पुत्र निमाइ और माता शचीदेवीके स्नानके दिन श्रीसीता ठाकुराणीने निमाइ और श्रीजगन्नाथ मिश्रको वस्त्र और आभूषण देकर उनका सम्मान किया। तब वे शचीदेवी और श्रीजगन्नाथ मिश्रके द्वारा पूजित (सम्मानित) होकर मन-ही-मन हर्षित होती हुई अपने घर शान्तिपुर लौट आयीं ॥118॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पुत्रमाता स्नान दिने'—अर्थात् पाँचवें दिन 'पाँचट' और नवें दिन 'नत्ता' दिवसमें ॥118॥ अनुभाष्य—'पुत्रमाता-स्नान दिने' अर्थात् बाहर आनेवाले दिनमें। प्राचीनकालमें बङ्गालमें ब्राह्मणादि वर्ण जननाशौचका समय (सन्तान उत्पन्न होनेके बाद जितने समय माताको सूतिका गृहमैं ही रहना पड़ता था) चार मास स्वीकार करते थे और उसके बाद ही वह सूर्यदेवका दर्शन करती थी। बादमें चार मासके बदले विप्रादि द्विजवर्णमें इक्कीस दिन [महाप्रभुके जन्मके समय यह काल एक मासका था] जननाशौच स्वीकार करनेकी व्यवस्था है; परन्तु शूद्रादिके लिये एक मासकी व्यवस्था है। कर्त्ताभजा और सतीमा-दलमें 'हरिनुटमें' (सङ्कीर्तनमें कुछ मिठाई फेंककर) तत्काल ही शिशुकी माताकी सूतिका गृहसे बाहर निकलनेकी प्रथा देखी जाती थी। 'शची-मिश्रेर पूजा लञा'—बङ्गालमें सामाजिक-व्यवहारमें वर्तमान कालमें भी यह विदायीके समयकी रीत दिखायी देती है। निज-परिवारिकजनके घर आनेपर उनकी विदायीके समय गृहस्थ उनको वस्त्रादि देकर सम्मान किया करते हैं। श्रीजगन्नाथ मिश्र एवं श्रीशचीदेवीके द्वारा इस प्रकार सम्मान पाकर सीताठाकुराणी शान्तिपुर लौट आयीं ॥118॥ शची और मिश्रको पुत्र-प्राप्तिसे आनन्द :- ऐछे शची-जगन्नाथ, पुत्र पाञा लक्ष्मीनाथ, पूर्ण हइल सकल वाञ्छित। धन-धान्य भरे घर, लोकमान्य कलेवर, दिने दिने हय आनन्दित ॥119॥ अनुवाद—इस प्रकार साक्षात् श्रीलक्ष्मीनाथ (सर्वलक्ष्मीमयी श्रीमती राधिकाके नाथ व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण) को पुत्रके रूपमें पाकर शचीदेवी और श्रीजगन्नाथकी समस्त कामनायें पूर्ण हो गयीं। उस दिनसे उनका घर सदा धन-धान्यसे भरा रहता था। पुत्र निमाइके दिव्य शरीरको देखकर उनका आनन्द दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया ॥119॥ अनुभाष्य—'लोकमान्य-कलेवर'—श्रीमहाप्रभुके श्रीअङ्ग लोकमान्य होनेके कारण अर्थात् उनके सौन्दर्य, ऐश्वर्य और लावण्य-दर्शनसे आकृष्ट होकर देव, नर तथा 168 | श्रीचैतन्यचरितामृत
13/119-123 ] अन्यान्य लोगोंको सम्मान देते हुए देखकर पिता-माताको आनन्द प्राप्त हुआ। ॥ 119 ॥ मिश्र-शान्त, संयत और उदार वैष्णव :- मिश्र-वैष्णव, शान्त, अलम्पट, शुद्ध, दान्त, धनभोगे नाहि अभिमान। पुत्रेर प्रभावे यत, धन आसि' मिले तत, विष्णुप्रीते द्विजे देन दान ॥ 120 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ मिश्र परम वैष्णव थे। वे शान्त, सदाचारी, शुद्ध और संयमी थे। उनमें धन भोगनेकी कोई इच्छा नहीं थी। पुत्रके प्रभावसे जितना भी धन आता, उसे वे विष्णुकी प्रसन्नताके लिये ब्राह्मणोंको दान कर देते थे ॥ 120 ॥ अनुभाष्य-जगत्के विषयी लोग जिस प्रकारसे स्त्री-पुत्रादिकी बातोंमें आकर धनादिके भोगके अभिमानमें व्यस्त रहते हैं, शुद्धभक्त श्रीजगन्नाथ मिश्र वैसे नहीं थे। पुत्रके प्रभावसे उन्हें जो कुछ भी प्राप्त हो रहा था, उसे उन्होंने अपने भोगके लिये स्वीकार नहीं किया, अपितु सब कुछ भगवान्को अर्पणकर ब्राह्मणादि योग्यपात्रोंको उसका अवशेष प्रदान किया ॥ 120 ॥ चक्रवर्त्ती द्वारा महाप्रभुकी कुण्डली-गणना :- लग्न गणि' हर्षमति, नीलाम्बर चक्रवर्त्ती, गुप्ते किछु कहिल मिश्रेरे। महापुरुषेर चिह्न, लग्ने अङ्गे भिन्न भिन्न, देखि, —एइ तारिबे संसारे ॥ 121 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके जन्मके लग्नकी गणना करके नीलाम्बर चक्रवर्त्तीने हर्षित मनसे एकान्तमें श्रीजगन्नाथ मिश्रसे कहा कि मैंने इस बालकके जन्मके मुहूर्तमें और इसके अङ्गोंमें महापुरुषोंके भिन्न-भिन्न लक्षण देखे हैं और यह समस्त जगत्का उद्धार करेगा ॥ 121 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'लग्ने अङ्गे भिन्न भिन्न'-(सामुद्रिक मतमें) 'लग्ने' अर्थात् जातक-कुण्डलीमें (जिससे नवजात शिशुका शुभ-अशुभ फल कहा जाता है, फलित ज्योतिषके उस अङ्गमें) और 'अङ्गे' अर्थात् शरीरमें ॥ 121 ॥ इति अमृतप्रवाह भाष्ये त्रयोदश परिच्छेद। तेरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य - 'गुप्ते' - अप्रकाशित ॥ 121 ॥ जन्मवृत्तान्त-श्रवण-माहात्म्य :- ऐछे प्रभु शची-घरे, कृपाय कैल अवतारे, येइ इहा करेय श्रवण। गौरप्रभु दयामय, ताँरे हुयेन सदय, सेइ पाय ताँहार चरण ॥ 122 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु कृपापूर्वक शचीमाताके घरमें अवतीर्ण हुए। महाप्रभु परम दयालु हैं और जो भी उनके जन्मकी लीलाका श्रवण करता है, उसके प्रति वे दया करके उसे अपने चरणोंका आश्रय प्रदान करते हैं ॥ 122 ॥ श्रीगौर-विरोधी विषयी लोगोंका दुर्भाग्य :- पाइया मानुष जन्म, ये ना सुने गौरगुण, हेन जन्म तार व्यर्थ हैल। पाइया अमृतधुनी, पिये विषगर्त्त-पानि, जन्मिया से केने नाहि मैल ॥ 123 ॥ अनुवाद-मनुष्य जन्म पाकर भी जो श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके गुणोंका श्रवण नहीं करता है, उसका जन्म व्यर्थ ही जाता है। जो (श्रीगौरसुन्दरके गुण कीर्तनरूपी) अमृत-नदीको छोड़कर (इन्द्रिय-विषयभोगरूपी) विषसे भरे गढ्ढेका जल पीता है, वह जन्म लेते ही क्यों नहीं मर गया ? ॥ 123 ॥ अनुभाष्य - 'अमृतधुनी' अर्थात् सुधा-नदी। श्रीकृष्णभक्तिरूप सुधा-स्रोतका जलपान त्याग करके जो व्यक्ति विषय-कूपका (आत्माके लिये विषकर) जल पीता है, वह नितान्त मूढ़ है और उसका जीवन धारण करना उचित नहीं है। तेरहवाँ अध्याय | 169
श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती-कृत चैतन्य-चन्द्रामृतमें- “अचैतन्यमिदं विश्वं यदि चैतन्यमीश्वरम्। न भजेत् सर्वतो मृत्युरुपास्यममरोत्तमैः ॥ 95 ॥ अचैतन्यमिदं विश्वं यदि चैतन्यमीश्वरम्। न विदुः सर्वशास्त्रज्ञा ह्यपि भ्राम्यन्ति ते जनाः ॥ 37 ॥ प्रसारित-महाप्रेम-पीयूषरस-सागरे। चैतन्यचन्द्रे प्रकटे यो दीनो दीन एव सः ॥ 36 ॥ अवतीर्णो गौरचन्द्रे विस्तीर्णे प्रेमसागरे। सुप्रकाशित-रत्नौघे यो दीनो दीन एव सः ॥ 34 ॥” “यह श्रीकृष्णभक्तिहीन बहिर्मुख जगत् (अर्थात् बहिर्मुख व्यक्ति) यदि शिव-ब्रह्मादि उत्तम देवताओंके उपास्य सर्वनियन्ता स्वयं भगवान् श्रीकृष्णचैतन्यका भजन नहीं करता, तो वह जन्म-मरणके वशीभूत होकर सुख-दुःखादि कर्मफल ही भोग करता है। जो श्रीचैतन्य महाप्रभुको 'स्वयं भगवान्' के रूपमें स्वीकार नहीं करते, वे सब शास्त्रोंके ज्ञाता होनेपर भी इस अचित्-जगत्में अर्थात् हरिविमुखताके राज्यमें ही भ्रमण करते हैं। श्रीचैतन्यचन्द्रके द्वारा उदित होकर महाभावामृत-रससागरका वर्धन करनेपर भी जो व्यक्ति 'दीन' अर्थात् प्रेमामृतपानसे वञ्चित है, वह यथार्थमें ही 'दीन' अर्थात् परम दुर्भागा है। अनन्त प्रेमसिन्धुसे श्रीगौरचन्द्रने समुदित होकर श्रवण कीर्तनादि नवविध-भक्तिरत्नराशिको सुप्रकाशित किया है; इस प्रकार सुयोग प्राप्त करके भी जो व्यक्ति दरिद्र ही रह गया अर्थात् जिसने भक्ति-रत्नोंकी उपलब्धि नहीं की, वह निश्चय ही परम दुर्भागा है, इसमें सन्देह नहीं है।” (भाः 2/3/19,20,23)- “श्वविड्वराहोष्ट्र न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदाग्रजः ॥ 19 ॥ बिले बतोरुक्रमविक्रमान् ये न शृण्वतः कर्णपुटे नरस्य। जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत न चोपगायत्युरुगायगाथाः ॥ 20 ॥ जीवच्छवो भागवताङ्घ्रिरेणुं न जातु मर्त्योऽभिलभेत यस्तु। श्रीविष्णुपद्या मनुजस्तुलस्याः श्वसञ्छवो यस्तु न वेद गन्धम् ॥ 23 ॥” “जिनके कानोंमें कभी भी श्रीकृष्णके नामने प्रवेश नहीं किया, वे मानव कुत्ते, ग्रामके शूकर, ऊँट और गधेके समान पशु कहे गये हैं, अर्थात् ऐसे श्रीकृष्ण-भजनसे हीन मनुष्योंको पशुसे भी अधिक निन्दनीय माना गया है। जो व्यक्ति अपने कानोंसे प्रचुर गुणोंसे युक्त भगवान्के पराक्रमकी कथा नहीं सुनते, उनके दोनों कानोंके छिद्र बिलके समान व्यर्थ ही हैं। जिसकी जिह्वा भगवान्की लीलाओंका कीर्तन नहीं करती, अर्थात् जो जिह्वा अपने पति भगवान् हृषीकेशकी लीलाओंका गुणगान न करके तरह-तरहकी सांसारिक वार्त्ताको ही कहती रहती है, वह असती नारी अथवा वेश्याके समान है; वह मेंढककी जिह्वाके समान केवल टर्र-टर्रका शोर मचाकर कालसर्पके समान मृत्युका ही आह्वान करती है। जिस व्यक्तिने कभी भी भगवद्भक्तोंकी चरणरेणुको भलीभाँति अपने समस्त अङ्गोंमें नहीं लगाया, जीवित रहनेपर भी उस व्यक्तिके अङ्ग प्रेतके समान हैं, क्योंकि वह सदा-सर्वदा साधुओंसे भयभीत रहता है। उसके हाथोंके द्वारा की गयी पूजा-सेवाको भी भगवान् स्वीकार नहीं करते। इसी प्रकार जो मनुष्य भगवान् श्रीविष्णुके श्रीचरणोंमें अर्पित तुलसीकी सुगन्धको लेकर आनन्दित नहीं होता, वह व्यक्ति साँस लेते हुए भी मृत प्राणीके समान ही है।” (भाः 10/1/4)- “निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद्- भवौषधाच्छ्र क उत्तमःश्लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात् ॥ 4 ॥” “जिनकी सांसारिक भोगोंकी कामना सदाके लिये समाप्त हो गयी है, वे जीवन्मुक्त महापुरुष भी पूर्ण प्रेमसे अतृप्त रहकर श्रीकृष्णकी गुणावलीका कीर्तन किया करते हैं। मुक्तिकामियोंके लिये भी जो भवरोगकी अमोघ औषधि है और विषयी लोगोंके लिये भी उनके कानों और मनको परम आह्लाद देनेवाला है, भगवान् श्रीकृष्णके ऐसे मधुर गुणानुवादसे पशुघाती अथवा आत्मघाती मनुष्यके अतिरिक्त कौन ऐसा है जो उससे विमुख हो जाय, उससे प्रीति न करे।” (भा. 3/23/56)- “xx न तीर्थपदसेवायै जीवन्नपि मृतो हि सः ॥ 56 ॥ “जिसका वैराग्य तीर्थपद श्रीहरिकी सेवामें पर्यवसित नहीं होता, वह व्यक्ति जीवित होनेपर भी मृत ही है।” ॥ 123 ॥ 170 | श्रीचैतन्यचरितामृत
श्रीचैतन्य-नित्यानन्द, आचार्य अद्वैतचन्द्र, स्वरूप-रूप-रघुनाथदास। इँहा-सबार श्रीचरण, शिरे वन्दि निजधन, जन्मलीला गाइल कृष्णदास ॥ 124 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे जन्ममहोत्सव-वर्णनं नाम त्रयोदश परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप और श्रीरघुनाथ गोस्वामी, इन सबको अपना एकमात्र धन जानकर तथा इन सभीके श्रीचरणोंमें अपने शीशको रखकर उनकी वन्दना करते हुए कृष्णदासने महाप्रभुकी जन्मलीलाका गान किया है॥ 124 ॥ अनुभाष्य—श्रीमन्महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैत प्रभु, श्रीदामोदरस्वरूप, श्रीरूप और श्रीरघुनाथदासके श्रीचरणकमल ही श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी एवं उनके अनुगत शुद्धभक्त अथवा अन्तरङ्ग भक्तोंके निजधन हैं। विषयोंका धन मायिक दाम (बन्धन-स्वरूप रस्सी) है; वास्तवमें उसे 'ऋण' कहना ही उचित है। श्रीकृष्ण-विमुख जीव, परमार्थको धन न मानकर जड़-भोगमय ऋणरूप कामको 'धन' समझते हैं। जिन सब वस्तुओंको 'धन' समझकर विषयी जीव व्यस्त हैं, हरिजनोंकी उनमें ऋण-बुद्धि है, धन-बुद्धि नहीं है। पक्षान्तरमें, निजकृपारूप धनदानसे भगवान् जिन्हें धनी बनाते हैं, उनके जागतिक धनसमूहका वे अपहरण कर लेते हैं। (भाः 10/88/8) भगवान् श्रीकृष्णने युधिष्ठिर महाराजसे कहा— “यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनैः।” “मैं जिसके ऊपर कृपा करता हूँ, उसका सारा धन धीरे-धीरे छीन लेता हूँ।” श्रीनरोत्तम ठाकुरने भी अपने पदोंमें कहा है— 13/124 ] “धन मोर नित्यानन्द” “राधाकृष्ण-श्रीचरण, सेइ मोर प्राणधन” “श्रीनित्यानन्द ही मेरे धन हैं”; “राधाकृष्णके श्रीचरण, मेरे प्राणधन हैं”; “जय पतितपावन, देह मोरे एइ धन, तुया बिना अन्य नाहि भाय” “हे पतितपावन! आपकी जय हो, मुझे यही धन दो, आपके बिना मुझे संसारमें कुछ नहीं भाता है”; “श्रीरूपमञ्जरी-पद, सेइ मोर सम्पद, सेइ मोर भजन-पूजन। सेइ मोर प्राणधन” “श्रीरूप-मञ्जरीके चरणकमल ही मेरी सम्पत्ति हैं, वे ही मेरा भजन-पूजन हैं और वे ही मेरे प्राणधन हैं”; “प्रेमरतन-धन हेलाय हराइनु। अधने यतन करि' धन तेयागिनु” “प्रेमरत्न-धनकी उपेक्षा करके उसे मैंने गवाँ दिया और जो धन नहीं है, उसके लिये प्रयास करके वास्तविक धनका त्याग कर दिया” आदि। स्मार्त्त-लोग अपनी शौक्रबुद्धि अर्थात् जन्मके आधारपर जातिका निर्णय करते हैं। इस कारण वे श्रीरघुनाथदासको ब्राह्मणकुलमें जन्म न लेनेके कारण कायस्थकुलमें उत्पन्न शूद्र मानते हैं। ऐसी मति सम्पन्न लोगोंकी भक्ति उनका धन नहीं अपितु ऋण अर्थात् नकारात्मक है। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके चरणकमलोंमें उनको अप्राकृत ब्राह्मण स्वीकार करना ही भक्तोंकी सम्पत्ति और सकारात्मक बुद्धि भावना है। इसका तात्पर्य यह है कि वैष्णवोंमें अप्राकृत बुद्धि रखकर भजन करनेसे ही भक्ति 'धन' होती है अन्यथा वह ऋण ही है॥ 124 ॥ इति अनुभाष्य त्रयोदश परिच्छेद। तेरहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डमें जन्ममहोत्सव-वर्णन नाम तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ। तेरहवाँ अध्याय | 171
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