भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 727

पन्द्रहवाँ अध्याय पन्द्रहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें महाप्रभुका गङ्गादास पण्डितसे व्याकरण पढ़ना, पञ्जी-टीकामें प्रवीणता प्राप्त करना, माताको एकादशीमें अन्न खानेका निषेध करना वर्णित है। विश्वरूपने संन्यास ग्रहणकर महाप्रभुको भी संन्यास लेनेके लिये आह्वान किया, परन्तु महाप्रभुने उनकी बात न सुनकर पिता-माताकी सेवा करनेकी इच्छा व्यक्त की, इसलिये विश्वरूपने उन्हें वापिस घर भेज दिया, इस प्रकार एक आख्यान है। पुरन्दर मिश्रका परलोकगमन, वल्लभाचार्यकी पुत्री लक्ष्मीदेवीका पाणिग्रहण आदिका विवरण सूत्ररूपमें वर्णित हुआ है। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौरकी पूजा करनेसे दुर्बुद्धिकी भी सुबुद्धि :— हरिभक्तिविलास (7/1)— कुमनाः सुमनस्त्वं हि याति यस्य पदाब्जयोः। सुमनोऽर्पणमात्रेण तं चैतन्य प्रभुं भजे॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके श्रीचरणकमलोंमें सुमन (पुष्प) अर्पण करने मात्रसे ही कुमनवाला व्यक्ति भी सुमनत्व लाभ करता है, उन श्रीचैतन्य महाप्रभुका मैं भजन करता हूँ॥1॥ अनुभाष्य—कुमनाः (कृष्णेतरविषयाविष्टं मनो यस्य सः) यस्य (चैतन्यदेवस्य) पदाब्जयोः (चरणकमलयोः) सुमनोऽर्पणमात्रेण (सुमनसां पुष्पाणां सु शुभं कृष्णसेवापरं मनस्तस्य वा अर्पणमात्रेण) सुमनस्त्वम् (अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतं कृष्णानुशीलनपर-स्वभावं) हि (निश्चितं) याति (प्राप्नोति) तं चैतन्यप्रभुम् अहं वन्दे। श्लोक भावानुवाद—जिसका मन श्रीकृष्णेतरविषयोंमें आविष्ट है, ऐसे कुमनवाला व्यक्ति जिनके चरणकमलोंमें सुमन (पुष्प अर्थात् श्रीकृष्णसेवापर मन) अर्पण करने मात्रसे सुमनत्व (श्रीकृष्णेतर अभिलाषिताऑसे शून्य, ज्ञान-कर्मादिसे अनावृत श्रीकृष्णानुशीलनपर स्वभाव) निश्चित ही प्राप्त करता है, उन श्रीचैतन्य महाप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥1॥ जय जय श्रीचैतन्य, जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव की जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥2॥ पौगण्ड-लीलामें अध्ययन-लीला ही प्रधान :— पौगण्ड-लीलार सूत्र करिये गणन। पौगण्ड-वयसे प्रभुर मुख्य अध्ययन॥3॥ अनुवाद—अब मैं पौगण्ड-लीलाका सूत्ररूपसे वर्णन करूँगा। पौगण्ड अवस्थामें महाप्रभुकी अध्ययन-लीला ही मुख्य है॥3॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मुख्य अध्ययन'—मुख्य कार्य ही अध्ययन-लीला है॥3॥ महाप्रभुकी सुविस्तृत पौगण्डलीला :— पौगण्ड-लीला चैतन्यकृष्णस्यातिसुविस्तृता। विद्यारम्भमुखा पाणिग्रहणान्ता मनोहरा॥4॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥4॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णचैतन्यकी विद्या आरम्भसे लेकर पाणिग्रहण तक मनोहर पौगण्डलीला अत्यन्त विस्तृत है॥4॥ अनुभाष्य—चैतन्यकृष्णस्य (भगवतो राधाकृष्णाभिन्नविग्रहस्य विश्वम्भरस्य) विद्यारम्भमुखा (विद्याभ्यासारम्भः मुखे आदौ यस्याः सा) पाणिग्रहणान्ता (पाणिग्रहणं च अन्तः समाप्तौ यस्यां सा)