श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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मनोहरा (सकलहृदयाकर्षिणी) पौगण्ड लीला (पञ्चम-हायनमारभ्य दश-पर्यन्त-व्यापक-काल पौगण्डं तत्र या लीला) अति सुविस्तृता (सुबहुला)। श्लोक भावानुवाद—श्रीराधाकृष्ण अभिन्न भगवान् श्रीचैतन्यकृष्णकी विद्यारम्भसे विवाहतक सर्वाकर्षक पौगण्ड (पाँच वर्षकी आयुसे लेकर दस वर्षकी आयूतक) लीला अत्यन्त विस्तृत है॥4॥ पण्डित गङ्गादाससे व्याकरण-अध्ययन :- गङ्गादास पण्डित-स्थाने पड़ेन व्याकरण। श्रवण-मात्रे कण्ठे कैल सूत्रवृत्तिगण॥5॥ अनुवाद—गङ्गादास पण्डितके टोलमें महाप्रभु व्याकरण पढ़ते थे। वे केवल सुनने मात्रसे ही सूत्रवृत्ति आदिको कण्ठस्थ कर लेते॥5॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पहले विष्णु और सुदर्शनसे सामान्य विद्या उपार्जन करके महाप्रभु गङ्गादास पण्डितसे व्याकरण पढ़ने लगे॥5॥ अल्प समयमें ही पारदर्शिता :- अल्पकाले हैला पञ्जी-टीकाते प्रवीण। चिरकालेर पडुया जिने हइया नवीन॥6॥ अनुवाद—थोड़े समयमें ही महाप्रभु पञ्जी-टीकामें प्रवीण हो गये। वे अभी नवीन छात्र होते हुए भी बहुत समयसे पढ़ रहे छात्रोंको पराजित कर देते॥6॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘पञ्जी-टीका'—व्याकरणकी 'पञ्जी-टीका' नामक एक प्रसिद्ध टीका थी, महाप्रभुने उसकी टिप्पणी प्रस्तुत की थी॥6॥ अध्ययन-लीला प्रभुर दास-वृन्दावन। ‘चैतन्यमङ्गले' कैल विस्तारित वर्णन॥7॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने ‘चैतन्यमङ्गल' में महाप्रभुकी अध्ययन लीलाका विस्तारसे वर्णन किया है॥7॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड, छठा, सातवाँ, आठवाँ और दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥7॥ एकदिन मातार पदे करिया प्रणाम। प्रभु कहे,—“माता, मोरे देह एक दान॥"8॥ शचीमाताको एकादशी-व्रत पालनमें प्रवृत्त करना :- माता बोले,—“ताइ दिब, या तुमि मागिबे।” प्रभु कहे,—“एकादशीते अन्न ना खाइबे॥"9॥ शची कहे,—“ना खाइब, भालइ कहिला।” सेइ हैते एकादशी करिते लागिला॥10॥ अनुवाद—एक दिन शचीमाताके श्रीचरणोंमें प्रणाम करके महाप्रभुने कहा,–“माता! मुझे एक दान दीजिये।” माताने प्रसन्नतासे कहा,–“जो तुम माँगोगे, मैं वही दूँगी।” महाप्रभुने कहा,–“आप एकादशीके दिन अन्न नहीं खाना।” शचीमाताने कहा,–“तुमने ठीक ही कहा है, मैं अबसे एकादशीके दिन अन्न नहीं खाऊँगी।” उस दिनसे शचीमाता एकादशी व्रतका पालन करने लगीं॥8-10॥ अनुभाष्य—श्रीजीव गोस्वामीने भक्ति सन्दर्भके 299 संख्यामें लिखा है— “स्कान्दे—‘मातृहा पितृहा चैव भ्रातृहा गुरुहा तथा। एकादश्यान्तु यो भुङ्क्ते विष्णुलोकच्युतो भवेत्॥' अत्र वैष्णवानां निराहारत्वं नाम महाप्रसादान्न परित्याग एव; तेषामन्यभोजनस्य नित्यमेव निषिद्धत्वात्। आग्नेये—‘एकादश्यां न भोक्तव्यं तद्व्रतं वैष्णवं महत्।' तत्र तावदस्य अवैष्णवेऽपि नित्यत्वम्।” “स्कन्दपुराणमें कहा गया है–‘जो व्यक्ति एकादशीके दिन भोजन करता है, वह मातृ-हत्या, पितृ-हत्या, भ्रातृ-हत्या और गुरु-हत्या न करते हुए भी उनके पापोंका भागी होता है तथा उस व्यक्तिकी कभी भी विष्णुलोकमें जानेकी आशा नहीं है।' यहाँ वैष्णवोंके द्वारा निराहार रहनेसे महाप्रसादके त्यागको भी समझना चाहिये, क्योंकि वैष्णवोंके लिये महाप्रसादको छोड़कर अन्य भोजन सदा ही वर्जनीय है। अग्निपुराणमें भी
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