श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 729, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें15/9-11 ] कहा गया है—'एकादशी तिथिके दिन भोजन मत करो, क्योंकि यह व्रत विष्णु सम्बन्धी है और महान् है।' यह एकादशी-व्रत अवैष्णवोंके लिये भी अवश्य कर्त्तव्य है।" वैष्णव लोग महाप्रसादके अतिरिक्त अन्य कोई भी वस्तु किसी दिन, किसी भी समय स्वीकार नहीं करते, किन्तु एकादशीके दिन महाप्रसाद-त्याग करनेका नाम ही 'उपवास' है॥9॥ अमृतानुकणिका—हःभःविः (12/3)— “अत्र व्रतस्य नित्यत्वादवश्यं तत् समाचरेत्। सर्वपापापहं सर्वार्थदं श्रीकृष्णतोषणम्॥” “एकादशी व्रत नित्य और अवश्य पालनीय है। इसका अनुष्ठान करनेसे सभी पाप नाश होते हैं, सर्वार्थकी प्राप्ति होती है और सर्वोपरि श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं।” हःभःविः (12/5) में मत्स्य और भविष्यपुराणसे उद्धृत श्लोक— “एकादश्यां निराहारो यो भुङ्क्ते द्वादशीदिने। शुक्ले वा यदि कृष्णे तद्व्रतं वैष्णवं महत्॥” “शुक्ल और कृष्ण, दोनों पक्षोंकी एकादशीमें उपवासी रहकर द्वादशीके दिन भोजन करनेसे इस व्रतसे श्रीकृष्ण परम सन्तुष्ट होते हैं।” एकादशीके दिन भोजन निषेध है। जैसे अग्निपुराणमें (हःभःविः 12/6)— “एकादश्यां न भुञ्जीत व्रतमेतद्धि वैष्णवम्॥” तथा नारदीय पुराण और पद्मपुराणमें (हःभःविः 12/12) कहा गया है— “न भोक्तव्यं न भोक्तव्यं संप्राप्ते हरिवासरे॥” चारों आश्रमोंमें स्थित व्यक्तियोंके लिये एकादशी पालनीय है, ऐसा विष्णुधर्मोत्तर (हःभःविः 12/25) में कहा गया है— “ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽथवा यतिः। एकादश्यां हि भुञ्जानो भुङ्क्ते गोमांसमेव हि॥” “ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, अथवा संन्यासी, जो कोई भी हो,—हरिवासरमें भोजन करनेपर वह गोमांस भोजन होता है।” बृहन्नारदीये पुराण (हःभःविः 12/7) में सभी वर्णोंके लिये भी एकादशी पालनका निर्देश दिया गया है— “ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणाञ्चैव योषिताम्। मोक्षदं कुर्वतां भक्त्या विष्णु प्रियतरं द्विजाः॥” “हे द्विजवृन्द! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, नारी—जो कोई भी क्यों न हो, भक्तिपूर्वक श्रीविष्णु-प्रीतिप्रद एकादशी व्रतका पालन करनेसे मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।” इस श्लोकमें नारी कहनेसे सधवा और विधवा, दोनोंको लक्ष्य किया गया है। परन्तु कुछ लोगोंका मत है कि सधवा नारीको एकादशीका व्रत नहीं करना चाहिये, ऐसा वे एक स्मृति वाक्यको लेकर कहते हैं— “पत्यौ जीविति या नारी उपवासव्रतंश्चरेत्। आयुः सा हरति भर्तुर्नरकाञ्चैव गच्छति॥” “पतिके जीवित रहते जो नारी उपवास-व्रतका आचरण करती है, वह अपने पतिकी आयुका हरण करके नरकमें गमन करती है।” इस वाक्यका उद्देश्य एकादशी व्रतका निषेध नहीं है, अपितु अन्य सभी व्रतोपवासोंका ही निषेध है, अन्यथा इस वाक्यका अन्य शास्त्र प्रमाणोंसे विरोध होता है। विष्णुधर्मोत्तर (हःभःविः 12/47) में कहा है— “सपुत्रश्च सभार्थ्याश्च स्वजनैर्भक्तिसंयुक्तः। एकादश्यामुपवसेत् पक्षयोरुभयोरपि॥” “भक्तिसे युक्त होकर पत्नी, पुत्र और स्वजनोंके सहित दोनों पक्षोंकी एकादशी तिथिमें उपवास करना चाहिये।” यहाँ पत्नी सहित कहनेसे यह स्पष्ट है कि सधवा स्त्रियोंको भी एकादशीका व्रतोपवास करना चाहिये। इसलिये महाप्रभुने भी अपनी सधवा मातासे एकादशी उपवासके अनुरोध किया और श्रीशची माताने उसे सहर्ष स्वीकार किया॥9-10॥ विश्वरूपका विवाह करानेकी चेष्टा :— तबे मिश्र विश्वरूपेर देखिया यौवन। कन्या मागि' विवाह दिते कैल मन॥11॥ पन्द्रहवाँ अध्याय | 193