श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमृतानुक्रमणिका—'मुख्य प्रकाश' अर्थात् मुख्य आविर्भाव अथवा मुख्य अभिव्यक्ति। पयार संख्या ६८में जिस अर्थमें प्रकाश-शब्दका प्रयोग हुआ है, इस पयारमें भी वही अर्थ है। यह मुख्य प्रकाश अथवा मुख्य आविर्भाव ही पारिभाषिक 'प्रकाश'-रूप है; स्वयंरूपसे इसका किसी प्रकार रूप पार्थक्य नहीं है, इसलिये इसको मुख्य प्रकाश (आविर्भाव) कहा गया है॥६९-७०॥ श्रीमद्भागवत (१०/३३/३-५)— रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपीमण्डलमण्डितः। योगेश्वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः॥७१॥ प्रविष्टेन गृहीतानां कण्ठे स्वनिकटं स्त्रियः। यं मन्येरन्नभवत्तावद्विमानशतसङ्कुलम्॥७२॥ दिवौकसां सदाराणामत्यौत्सुक्याभृतात्मनाम्। ततो दुन्दुभयो नेदुर्नियेतुः पुष्पवृष्टयः॥७३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७१-७३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-योगेश्वर श्रीकृष्ण अपनी अचिन्त्यशक्तिके बलसे दो-दो गोपियोंके बीच एक-एक मूर्ति प्रकाशितकर गोपीमण्डलमें शोभायमान होकर रासोत्सवमें प्रवृत्त हुए। उनके इस प्रकार गोपीमण्डलमें प्रविष्ट होनेसे प्रत्येक गोपीको ऐसा अनुभव हुआ कि श्रीकृष्ण अपनी भुजाओंको उसके गलेमें डालकर उसका ही आलिङ्गन कर रहे हैं। उसी समय रासके दर्शनकी उत्सुकतावश देवतागण अपनी-अपनी पत्नियोंके साथ विमानोंमें सवार होकर आये और शत-शत विमान आकाशमार्गमें दिखने लगे। उसके बाद आकाशमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और पुष्पवृष्टि होने लगी॥७१-७३॥ अनुभाष्य-तासां (मण्डलरूपेण अवस्थितानां) द्वयोर्द्वयोर्मध्ये (एकैकरूपेण) प्रविष्टेन यं (श्रीकृष्णं) स्वनिकटं (स्वनिकटस्थं) (मामेव आश्लिष्टवान् इति) मन्येरन्, [तेन] योगेश्वरेण कृष्णेन कण्ठे गृहीतानां (उभयतः आलिङ्गितानां) गोपीमण्डल-मण्डितः (गोपीमण्डलैः शोभमानः) रासोत्सवः संप्रवृत्त। तावत् (तत्क्षणमेव) अत्यौत्सुक्यभृतात्मनां (दर्शनौत्सुक्येन अतिव्याकुलमनसां) सदाराणां (सस्त्रीकाणां) दिवौकसां (देवानां) विमानशतसङ्कुलं (विमानशतैः सङ्कुलं व्याप्तं सङ्कीर्णं) [नभः] अभवत् (बभूव)। ततो दुन्दुभयः नेदुः, पुष्पवृष्टयः निपेतुः। श्लोक-भावानुवाद-मण्डलाकारमें स्थित गोपियोंके मध्य श्रीकृष्ण एक-एक रूपसे प्रविष्ट हुए। श्रीकृष्णके निकट स्थित प्रत्येक गोपीने ऐसा सोचा कि श्रीकृष्ण मेरा ही आलिङ्गन कर रहे हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण गोपियोंको आलिङ्गनबद्ध करके गोपियोंके मध्य सुशोभित होकर रासोत्सवमें प्रवृत्त हुए। उसी क्षण ही दर्शनकी उत्सुकतासे अति व्याकुल मनवाले पत्नियों सहित देवताओंके आनेसे उनके सैकड़ों विमानोंकी भीड़ आकाशमें हो गयी। तब आकाशमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और पुष्पवृष्टि होने लगी॥७१-७३॥ श्रीमद्भागवत (१०/६९/२)— चित्रं बतैतदेकेन वपुषा युगपत् पृथक्। गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय एक उदावहत्॥७४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७४॥