भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 72

[ १/६५-७० श्रेष्ठ जीवोंमें श्रीकृष्णकी किसी विशेष शक्तिका आवेश होता है, उन्हें शक्त्यावेश अवतार कहा जाता है॥ ६५॥ अनुभाष्य—'ईश्वरेर' अर्थात् स्वयंरूप भगवान् श्रीकृष्ण। विस्तृत विवरणके लिये लघुभागवतामृतके पूर्वखण्डमें उपास्य और अवतार प्रसङ्ग तथा श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला बीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य हैं॥ ६५-६७॥ भगवत् प्रकाशका लीलाभेद :— दुइरूपे हय भगवानेर प्रकाश। एके त' प्रकाश हय, आरे त' विलास॥६८॥ अनुवाद—भगवान् स्वयंको दो रूपोंमें प्रकट करते हैं, एक प्रकाश और दूसरे विलासरूपमें॥ ६८॥ अनुभाष्य—'भगवानेर' अर्थात् स्वयंरूपका। मध्यलीला बीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ ६८॥ अमृतानुकणिका—यहाँ पारिभाषिक अर्थमें 'प्रकाश' शब्दका व्यवहार नहीं हुआ है, क्योंकि 'प्रकाश और विलास' नामसे इसी प्रकाशके जो दो भेदोंका उल्लेख किया गया है, उनमें 'विलास' में पारिभाषिक प्रकाशका लक्षण नहीं है। भगवान् दो रूपोंमें स्वयंको प्रकट (प्रकाश) करते हैं; उनमें एक रूपका नाम प्रकाश और दूसरे रूपका नाम विलास है॥ ६८॥ ईशप्रकाश :— एकइ विग्रह यदि हय बहुरूप। आकारे त' भेद नाहि, एकइ स्वरूप॥ ६९॥ महिषी-विवाहे यैछे, यैछे कैल रास। इहाके कहिये कृष्णेर 'मुख्य प्रकाश'॥ ७०॥ अनुवाद—एक ही विग्रह (भगवान् श्रीकृष्ण) यदि अनेक रूप धारण करें, जिनमें आकार और स्वरूपमें कोई भेद नहीं हो, तो उन्हें श्रीकृष्णका 'मुख्य प्रकाश' कहा जाता है। जैसे द्वारकाकी महिषियोंके साथ विवाहमें और असंख्य गोपियोंके साथ रासमें श्रीकृष्णने अनेक रूप धारण किये॥ ६९-७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान्‌का प्रकाश दो प्रकारका होता है, जिन्हें 'प्रकाश' और 'विलास' कहा जाता है। द्वारकामें महिषियोंके साथ विवाहमें और श्रीवृन्दावनमें रासलीलामें श्रीकृष्णने एक साथ अनेक रूपोंका प्रकाश किया था, जिनमें कोई आकार भेद नहीं था। एक ही विग्रह अनेक रूप हुए थे। इसे ही श्रीकृष्णका 'मुख्य प्रकाश' कहते हैं॥ ६८-७०॥ अनुभाष्य—“प्रकाशस्तु न भेदेषु गण्यते स हि नो पृथक्” अर्थात् 'प्रकाश' की किसी भी प्रकारसे भेदमें गणना नहीं होती, क्योंकि वह किसी प्रकार भी स्व-स्वरूपसे पृथक् नहीं है (लघुभागवतामृत, पूर्वखण्ड)। “एक वपु बहुरूप यैछे हैल रासे॥” अर्थात् रासलीलामें एक श्रीकृष्णने अनेक रूप धारण किये। “महिषी विवाहे हैल बहुविध मूर्त्ति। 'प्राभवविलास' एइ शास्त्र-परिसिद्धि॥” जब श्रीकृष्णने द्वारकामें सोलह हजार एक सौ आठ महिषियोंसे विवाह किया, तो उन्होंने उतने ही रूप बनाये; शास्त्रमें इन रूपोंको 'प्राभवविलास' कहते हैं (मध्यलीला, बीसवाँ अध्याय)॥ ६९-७०॥ ३० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत