भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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१/६३-६७ ] श्रीमद्भागवत (१/१३/१०)— भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं प्रभो। तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता॥६३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आपके जैसे भागवतजन स्वयं तीर्थस्वरूप हैं। आपलोग अपने अन्तःस्थित भगवान्‌की पवित्रताके बलसे पापियोंके पापोंसे मलिन सभी तीर्थोंको पवित्र करते हैं॥६३॥ अनुभाष्य—विदुरजीके विभिन्न तीर्थ-स्थानोंमें भ्रमण करनेके बाद हस्तिनापुर लौटनेपर युधिष्ठिर महाराजने इस श्लोकके द्वारा उनका अभिवादन किया था— हे प्रभो ! भवादृशाः तीर्थभूताः भागवताः (सन्तः) स्वान्तःस्थेन (स्वस्य अन्तःस्थितेन) गदाभृता (भगवता विष्णुना) तीर्थानि (मलिनजनसम्पर्केन अतीर्थानि सन्ति पुनः) तीर्थीकुर्वन्ति (महातीर्थीकुर्वन्ति) [भवताञ्च तीर्थाटनं तीर्थानामेव भाग्येन]। श्लोक-भावानुवाद—आपके समान तीर्थस्वरूप सन्त अपने हृदयमें स्थित भगवान् विष्णुके प्रभावसे पापियोंके सम्पर्कसे क्षीण-प्रभाव तीर्थोंको पुनः महातीर्थ बना देते हैं। [वस्तुतः आप लोगोंका तीर्थोंमें आगमन तीर्थोंका ही सौभाग्य है] ॥६३॥ सेइ भक्तगण हय द्विविध प्रकार। पार्षदगण एक, साधकगण आर॥६४॥ अनुवाद—भगवद्भक्त—पार्षद और साधक भेदसे दो प्रकारके होते हैं॥६४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्त दो प्रकारके होते हैं—भगवत्पार्षद और साधक। भगवत्पार्षदगण सिद्धसेवक मण्डलीके अन्तर्गत होते हैं। उनमेंसे कोई-कोई ऐश्वर्यपरायण होकर परव्योममें अवस्थान करते हैं, कोई-कोई माधुर्यपर होकर श्रीवृन्दावनमें श्रीकृष्णकी सेवामें अनुरक्त होते हैं। जो भक्त सेवासिद्धि प्राप्त करनेके लिये वैधी अथवा रागानुगा साधन-भक्तिका अवलम्बन करते हैं, उनको साधक कहा जाता है॥६४॥ ईशावतारके प्रकार :— ईश्वरेर अवतार ए तिन प्रकार। अंश-अवतार, आर गुण-अवतार॥६५॥ शक्त्यावेश-अवतार—तृतीय एमत। अंश-अवतार—पुरुष-मत्स्यादिक यत॥६६॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव—तिन गुणावतारे गणि। शक्त्यावेशावतार पृथु, व्यासमुनि॥६७॥ अनुवाद—भगवान्‌के अवतार तीन प्रकारके होते हैं—अंशावतार, गुणावतार और शक्त्यावेशावतार। पुरुषके रूपमें श्रीराम, वामनादि और अन्य रूपोंमें मत्स्यादि सब अंशावतार हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव—ये तीन गुणावतार हैं तथा पृथु, व्यासमुनि आदि शक्त्यावेश अवतार हैं॥६५-६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अंशावतार श्रीविष्णुके साक्षात् अवतार हैं अर्थात् ये अवतार मायाधीश हैं। सत्त्व, रजः और तमः, इन तीन गुणोंसे प्रतिभात भगवत्-अवतार गुणावतार हैं। जिन सभी पहला अध्याय | २९