श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १/६१-६२ ईशभक्तका तत्त्व और प्रकार-भेद :- ईश्वरस्वरूप भक्त—ताँर अधिष्ठान। भक्तेर हृदये कृष्णेर सतत विश्राम ॥६१॥ अनुवाद—जो भक्त निरन्तर कृष्णभजनमें निमज्जित रहते हैं, वे ईश्वरस्वरूप कहे जाते हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण सदा उनके हृदयमें विश्राम अर्थात् सुखपूर्वक वास करते हैं ॥६१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ईश्वरके सच्चिदानन्दस्वरूपमें जिनकी भक्ति है, उनमें ही अर्थात् उनका हृदय ही श्रीकृष्णका वास स्थान है॥६१॥ अनुभाष्य—ईश्वर ही एकमात्र अद्वितीय वस्तु हैं। वही ईश्वर सर्वशक्तिमान् हैं। भक्त उनके शक्तिजातीय स्वरूप हैं, शक्तिमान्-जातीय वस्तु नहीं हैं। श्रीकृष्णसे सम्बन्धित सेवावृत्ति भजनशील-भक्तमें अवस्थित है, इसलिये भक्तरूपी आधारमें श्रीकृष्णकी स्थिति है॥६१॥ अमृतानुकणिका—भक्तका हृदय श्रीकृष्णके विश्रामस्थलके तुल्य है। भक्तके प्रेमके वशीभूत होकर श्रीकृष्ण सदा केवल आनन्दके उपभोग और आनन्द प्रदान करनेके लिये भक्तके हृदयमें अवस्थान करते हैं। वे भक्तके प्रेम-रसका आस्वादन करके आनन्द उपभोग करते हैं और अपने सौन्दर्य-माधुर्य आदिका आस्वादन कराके भक्तको आनन्द प्रदान करते हैं। किसी समय और किसी प्रकारके उद्वेगकी छाया भी उस स्थानको स्पर्श नहीं कर सकती, क्योंकि भक्त कभी भी अपने दुःख-दैन्यकी बात भगवान्को नहीं बतलाते ॥६१॥ श्रीमद्भागवत (९/४/६८)— साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्। मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥६२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साधुजन मेरा हृदय और मैं ही साधुजनोंका हृदय हूँ। वे लोग मेरे अतिरिक्त अन्य किसीको भी नहीं जानते हैं; मैं भी उनके अतिरिक्त किसी अन्यको अपना नहीं मानता हूँ॥६२॥ अनुभाष्य—परम भागवत अम्बरीष महाराजके चरणोंमें दुर्वासा ऋषिके द्वारा अपराध किये जानेपर जब विष्णुचक्र दुर्वासा ऋषिके प्राण संहार करनेके लिये उद्यत हुए, तब वे सभी देवताओंसे सहायताके लिये प्रार्थना करने लगे। अन्तमें भगवान् श्रीविष्णुने दुर्वासा ऋषिको अम्बरीष महाराजके श्रीचरणोंमें क्षमा-भिक्षा करनेके लिये उपदेश देते हुए वास्तवमें इस श्लोकके माध्यमसे भागवत-साधुओंका परम महत्व दिखलाया— साधवः मह्यं (मम) हृदयं (प्राणतुल्याः), साधूनां तु अहं हृदयम्। ते (साधवः) मदन्यत् (मत्तः अन्यत्) न जानन्ति, अहम् (अपि) तेभ्यः (सकाशात्) मनाक् (ईषत्) अन्यत् न [जानामि, भक्तानामहमेव सर्वात्मना सदा चिन्तनीयः, ममापि मदनुशीलनैकपराः सर्वात्मनाश्रितपदा भक्ताः सदा ध्येयाः]। श्लोक-भावानुवाद—साधु मेरे प्राणोंके समान हैं और साधुओंका हृदय मैं हूँ। मेरे अतिरिक्त वे किसी अन्यको नहीं जानते हैं, मैं भी निकटसे किञ्चित् अन्य किसीको नहीं जानता हूँ [अर्थात् भक्तोंके द्वारा मैं ही सम्पूर्णरूपसे सतत् चिन्तनीय हूँ और मैं भी अपने सभी प्रकारसे मुझपर आश्रित ऐकान्तिक भजन करनेवाले भक्तोंका सदा ध्यान करता हूँ] ॥६२॥ २८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत