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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ १/६१-६२ ईशभक्तका तत्त्व और प्रकार-भेद :- ईश्वरस्वरूप भक्त—ताँर अधिष्ठान। भक्तेर हृदये कृष्णेर सतत विश्राम ॥६१॥ अनुवाद—जो भक्त निरन्तर कृष्णभजनमें निमज्जित रहते हैं, वे ईश्वरस्वरूप कहे जाते हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण सदा उनके हृदयमें विश्राम अर्थात् सुखपूर्वक वास करते हैं ॥६१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ईश्वरके सच्चिदानन्दस्वरूपमें जिनकी भक्ति है, उनमें ही अर्थात् उनका हृदय ही श्रीकृष्णका वास स्थान है॥६१॥ अनुभाष्य—ईश्वर ही एकमात्र अद्वितीय वस्तु हैं। वही ईश्वर सर्वशक्तिमान् हैं। भक्त उनके शक्तिजातीय स्वरूप हैं, शक्तिमान्-जातीय वस्तु नहीं हैं। श्रीकृष्णसे सम्बन्धित सेवावृत्ति भजनशील-भक्तमें अवस्थित है, इसलिये भक्तरूपी आधारमें श्रीकृष्णकी स्थिति है॥६१॥ अमृतानुकणिका—भक्तका हृदय श्रीकृष्णके विश्रामस्थलके तुल्य है। भक्तके प्रेमके वशीभूत होकर श्रीकृष्ण सदा केवल आनन्दके उपभोग और आनन्द प्रदान करनेके लिये भक्तके हृदयमें अवस्थान करते हैं। वे भक्तके प्रेम-रसका आस्वादन करके आनन्द उपभोग करते हैं और अपने सौन्दर्य-माधुर्य आदिका आस्वादन कराके भक्तको आनन्द प्रदान करते हैं। किसी समय और किसी प्रकारके उद्वेगकी छाया भी उस स्थानको स्पर्श नहीं कर सकती, क्योंकि भक्त कभी भी अपने दुःख-दैन्यकी बात भगवान्को नहीं बतलाते ॥६१॥ श्रीमद्भागवत (९/४/६८)— साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्। मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥६२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साधुजन मेरा हृदय और मैं ही साधुजनोंका हृदय हूँ। वे लोग मेरे अतिरिक्त अन्य किसीको भी नहीं जानते हैं; मैं भी उनके अतिरिक्त किसी अन्यको अपना नहीं मानता हूँ॥६२॥ अनुभाष्य—परम भागवत अम्बरीष महाराजके चरणोंमें दुर्वासा ऋषिके द्वारा अपराध किये जानेपर जब विष्णुचक्र दुर्वासा ऋषिके प्राण संहार करनेके लिये उद्यत हुए, तब वे सभी देवताओंसे सहायताके लिये प्रार्थना करने लगे। अन्तमें भगवान् श्रीविष्णुने दुर्वासा ऋषिको अम्बरीष महाराजके श्रीचरणोंमें क्षमा-भिक्षा करनेके लिये उपदेश देते हुए वास्तवमें इस श्लोकके माध्यमसे भागवत-साधुओंका परम महत्व दिखलाया— साधवः मह्यं (मम) हृदयं (प्राणतुल्याः), साधूनां तु अहं हृदयम्। ते (साधवः) मदन्यत् (मत्तः अन्यत्) न जानन्ति, अहम् (अपि) तेभ्यः (सकाशात्) मनाक् (ईषत्) अन्यत् न [जानामि, भक्तानामहमेव सर्वात्मना सदा चिन्तनीयः, ममापि मदनुशीलनैकपराः सर्वात्मनाश्रितपदा भक्ताः सदा ध्येयाः]। श्लोक-भावानुवाद—साधु मेरे प्राणोंके समान हैं और साधुओंका हृदय मैं हूँ। मेरे अतिरिक्त वे किसी अन्यको नहीं जानते हैं, मैं भी निकटसे किञ्चित् अन्य किसीको नहीं जानता हूँ [अर्थात् भक्तोंके द्वारा मैं ही सम्पूर्णरूपसे सतत् चिन्तनीय हूँ और मैं भी अपने सभी प्रकारसे मुझपर आश्रित ऐकान्तिक भजन करनेवाले भक्तोंका सदा ध्यान करता हूँ] ॥६२॥ २८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

१/६३-६७ ] श्रीमद्भागवत (१/१३/१०)— भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं प्रभो। तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता॥६३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आपके जैसे भागवतजन स्वयं तीर्थस्वरूप हैं। आपलोग अपने अन्तःस्थित भगवान्‌की पवित्रताके बलसे पापियोंके पापोंसे मलिन सभी तीर्थोंको पवित्र करते हैं॥६३॥ अनुभाष्य—विदुरजीके विभिन्न तीर्थ-स्थानोंमें भ्रमण करनेके बाद हस्तिनापुर लौटनेपर युधिष्ठिर महाराजने इस श्लोकके द्वारा उनका अभिवादन किया था— हे प्रभो ! भवादृशाः तीर्थभूताः भागवताः (सन्तः) स्वान्तःस्थेन (स्वस्य अन्तःस्थितेन) गदाभृता (भगवता विष्णुना) तीर्थानि (मलिनजनसम्पर्केन अतीर्थानि सन्ति पुनः) तीर्थीकुर्वन्ति (महातीर्थीकुर्वन्ति) [भवताञ्च तीर्थाटनं तीर्थानामेव भाग्येन]। श्लोक-भावानुवाद—आपके समान तीर्थस्वरूप सन्त अपने हृदयमें स्थित भगवान् विष्णुके प्रभावसे पापियोंके सम्पर्कसे क्षीण-प्रभाव तीर्थोंको पुनः महातीर्थ बना देते हैं। [वस्तुतः आप लोगोंका तीर्थोंमें आगमन तीर्थोंका ही सौभाग्य है] ॥६३॥ सेइ भक्तगण हय द्विविध प्रकार। पार्षदगण एक, साधकगण आर॥६४॥ अनुवाद—भगवद्भक्त—पार्षद और साधक भेदसे दो प्रकारके होते हैं॥६४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्त दो प्रकारके होते हैं—भगवत्पार्षद और साधक। भगवत्पार्षदगण सिद्धसेवक मण्डलीके अन्तर्गत होते हैं। उनमेंसे कोई-कोई ऐश्वर्यपरायण होकर परव्योममें अवस्थान करते हैं, कोई-कोई माधुर्यपर होकर श्रीवृन्दावनमें श्रीकृष्णकी सेवामें अनुरक्त होते हैं। जो भक्त सेवासिद्धि प्राप्त करनेके लिये वैधी अथवा रागानुगा साधन-भक्तिका अवलम्बन करते हैं, उनको साधक कहा जाता है॥६४॥ ईशावतारके प्रकार :— ईश्वरेर अवतार ए तिन प्रकार। अंश-अवतार, आर गुण-अवतार॥६५॥ शक्त्यावेश-अवतार—तृतीय एमत। अंश-अवतार—पुरुष-मत्स्यादिक यत॥६६॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव—तिन गुणावतारे गणि। शक्त्यावेशावतार पृथु, व्यासमुनि॥६७॥ अनुवाद—भगवान्‌के अवतार तीन प्रकारके होते हैं—अंशावतार, गुणावतार और शक्त्यावेशावतार। पुरुषके रूपमें श्रीराम, वामनादि और अन्य रूपोंमें मत्स्यादि सब अंशावतार हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव—ये तीन गुणावतार हैं तथा पृथु, व्यासमुनि आदि शक्त्यावेश अवतार हैं॥६५-६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अंशावतार श्रीविष्णुके साक्षात् अवतार हैं अर्थात् ये अवतार मायाधीश हैं। सत्त्व, रजः और तमः, इन तीन गुणोंसे प्रतिभात भगवत्-अवतार गुणावतार हैं। जिन सभी पहला अध्याय | २९

[ १/६५-७० श्रेष्ठ जीवोंमें श्रीकृष्णकी किसी विशेष शक्तिका आवेश होता है, उन्हें शक्त्यावेश अवतार कहा जाता है॥ ६५॥ अनुभाष्य—'ईश्वरेर' अर्थात् स्वयंरूप भगवान् श्रीकृष्ण। विस्तृत विवरणके लिये लघुभागवतामृतके पूर्वखण्डमें उपास्य और अवतार प्रसङ्ग तथा श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला बीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य हैं॥ ६५-६७॥ भगवत् प्रकाशका लीलाभेद :— दुइरूपे हय भगवानेर प्रकाश। एके त' प्रकाश हय, आरे त' विलास॥६८॥ अनुवाद—भगवान् स्वयंको दो रूपोंमें प्रकट करते हैं, एक प्रकाश और दूसरे विलासरूपमें॥ ६८॥ अनुभाष्य—'भगवानेर' अर्थात् स्वयंरूपका। मध्यलीला बीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ ६८॥ अमृतानुकणिका—यहाँ पारिभाषिक अर्थमें 'प्रकाश' शब्दका व्यवहार नहीं हुआ है, क्योंकि 'प्रकाश और विलास' नामसे इसी प्रकाशके जो दो भेदोंका उल्लेख किया गया है, उनमें 'विलास' में पारिभाषिक प्रकाशका लक्षण नहीं है। भगवान् दो रूपोंमें स्वयंको प्रकट (प्रकाश) करते हैं; उनमें एक रूपका नाम प्रकाश और दूसरे रूपका नाम विलास है॥ ६८॥ ईशप्रकाश :— एकइ विग्रह यदि हय बहुरूप। आकारे त' भेद नाहि, एकइ स्वरूप॥ ६९॥ महिषी-विवाहे यैछे, यैछे कैल रास। इहाके कहिये कृष्णेर 'मुख्य प्रकाश'॥ ७०॥ अनुवाद—एक ही विग्रह (भगवान् श्रीकृष्ण) यदि अनेक रूप धारण करें, जिनमें आकार और स्वरूपमें कोई भेद नहीं हो, तो उन्हें श्रीकृष्णका 'मुख्य प्रकाश' कहा जाता है। जैसे द्वारकाकी महिषियोंके साथ विवाहमें और असंख्य गोपियोंके साथ रासमें श्रीकृष्णने अनेक रूप धारण किये॥ ६९-७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान्‌का प्रकाश दो प्रकारका होता है, जिन्हें 'प्रकाश' और 'विलास' कहा जाता है। द्वारकामें महिषियोंके साथ विवाहमें और श्रीवृन्दावनमें रासलीलामें श्रीकृष्णने एक साथ अनेक रूपोंका प्रकाश किया था, जिनमें कोई आकार भेद नहीं था। एक ही विग्रह अनेक रूप हुए थे। इसे ही श्रीकृष्णका 'मुख्य प्रकाश' कहते हैं॥ ६८-७०॥ अनुभाष्य—“प्रकाशस्तु न भेदेषु गण्यते स हि नो पृथक्” अर्थात् 'प्रकाश' की किसी भी प्रकारसे भेदमें गणना नहीं होती, क्योंकि वह किसी प्रकार भी स्व-स्वरूपसे पृथक् नहीं है (लघुभागवतामृत, पूर्वखण्ड)। “एक वपु बहुरूप यैछे हैल रासे॥” अर्थात् रासलीलामें एक श्रीकृष्णने अनेक रूप धारण किये। “महिषी विवाहे हैल बहुविध मूर्त्ति। 'प्राभवविलास' एइ शास्त्र-परिसिद्धि॥” जब श्रीकृष्णने द्वारकामें सोलह हजार एक सौ आठ महिषियोंसे विवाह किया, तो उन्होंने उतने ही रूप बनाये; शास्त्रमें इन रूपोंको 'प्राभवविलास' कहते हैं (मध्यलीला, बीसवाँ अध्याय)॥ ६९-७०॥ ३० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

अमृतानुक्रमणिका—'मुख्य प्रकाश' अर्थात् मुख्य आविर्भाव अथवा मुख्य अभिव्यक्ति। पयार संख्या ६८में जिस अर्थमें प्रकाश-शब्दका प्रयोग हुआ है, इस पयारमें भी वही अर्थ है। यह मुख्य प्रकाश अथवा मुख्य आविर्भाव ही पारिभाषिक 'प्रकाश'-रूप है; स्वयंरूपसे इसका किसी प्रकार रूप पार्थक्य नहीं है, इसलिये इसको मुख्य प्रकाश (आविर्भाव) कहा गया है॥६९-७०॥ श्रीमद्भागवत (१०/३३/३-५)— रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपीमण्डलमण्डितः। योगेश्वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः॥७१॥ प्रविष्टेन गृहीतानां कण्ठे स्वनिकटं स्त्रियः। यं मन्येरन्नभवत्तावद्विमानशतसङ्कुलम्॥७२॥ दिवौकसां सदाराणामत्यौत्सुक्याभृतात्मनाम्। ततो दुन्दुभयो नेदुर्नियेतुः पुष्पवृष्टयः॥७३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७१-७३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-योगेश्वर श्रीकृष्ण अपनी अचिन्त्यशक्तिके बलसे दो-दो गोपियोंके बीच एक-एक मूर्ति प्रकाशितकर गोपीमण्डलमें शोभायमान होकर रासोत्सवमें प्रवृत्त हुए। उनके इस प्रकार गोपीमण्डलमें प्रविष्ट होनेसे प्रत्येक गोपीको ऐसा अनुभव हुआ कि श्रीकृष्ण अपनी भुजाओंको उसके गलेमें डालकर उसका ही आलिङ्गन कर रहे हैं। उसी समय रासके दर्शनकी उत्सुकतावश देवतागण अपनी-अपनी पत्नियोंके साथ विमानोंमें सवार होकर आये और शत-शत विमान आकाशमार्गमें दिखने लगे। उसके बाद आकाशमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और पुष्पवृष्टि होने लगी॥७१-७३॥ अनुभाष्य-तासां (मण्डलरूपेण अवस्थितानां) द्वयोर्द्वयोर्मध्ये (एकैकरूपेण) प्रविष्टेन यं (श्रीकृष्णं) स्वनिकटं (स्वनिकटस्थं) (मामेव आश्लिष्टवान् इति) मन्येरन्, [तेन] योगेश्वरेण कृष्णेन कण्ठे गृहीतानां (उभयतः आलिङ्गितानां) गोपीमण्डल-मण्डितः (गोपीमण्डलैः शोभमानः) रासोत्सवः संप्रवृत्त। तावत् (तत्क्षणमेव) अत्यौत्सुक्यभृतात्मनां (दर्शनौत्सुक्येन अतिव्याकुलमनसां) सदाराणां (सस्त्रीकाणां) दिवौकसां (देवानां) विमानशतसङ्कुलं (विमानशतैः सङ्कुलं व्याप्तं सङ्कीर्णं) [नभः] अभवत् (बभूव)। ततो दुन्दुभयः नेदुः, पुष्पवृष्टयः निपेतुः। श्लोक-भावानुवाद-मण्डलाकारमें स्थित गोपियोंके मध्य श्रीकृष्ण एक-एक रूपसे प्रविष्ट हुए। श्रीकृष्णके निकट स्थित प्रत्येक गोपीने ऐसा सोचा कि श्रीकृष्ण मेरा ही आलिङ्गन कर रहे हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण गोपियोंको आलिङ्गनबद्ध करके गोपियोंके मध्य सुशोभित होकर रासोत्सवमें प्रवृत्त हुए। उसी क्षण ही दर्शनकी उत्सुकतासे अति व्याकुल मनवाले पत्नियों सहित देवताओंके आनेसे उनके सैकड़ों विमानोंकी भीड़ आकाशमें हो गयी। तब आकाशमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और पुष्पवृष्टि होने लगी॥७१-७३॥ श्रीमद्भागवत (१०/६९/२)— चित्रं बतैतदेकेन वपुषा युगपत् पृथक्। गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय एक उदावहत्॥७४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७४॥

[ १/७४-७७ अमृतप्रवाह भाष्य—आश्चर्यका विषय यह है कि एक ही श्रीकृष्णने एक-एक स्वरूपमें प्रत्येक घरमें एक साथ सोलह हजार स्त्रियोंके साथ विवाह किया॥७४॥ अनुभाष्य—बत (अहो) एतत् चित्रम्। एकः (कृष्णः) एकेन वपुषा युगपत् पृथग्गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं (षोडश-सहस्रं) स्त्रियः (महिषीः) उदावहत् (उपयेमे)। श्लोक-भावानुवाद—अहो! यह आश्चर्य है। एक ही श्रीकृष्णने एक-एक रूपसे, एक साथ सोलह हजार महिषियोंके साथ विवाह किया॥७४॥ लघुभागवतामृत, पूर्वखण्डमें आवेषकथनमें (१/२१) :- अनेकत्र प्रकटता रूपस्यैकस्य यैकदा। सर्वथा तत्स्वरूपैव स प्रकाश इतीर्यते॥७५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक ही रूपमें एक ही साथ अनेक अभिन्न प्रकाशोंको 'प्रकाश' कहते हैं ॥७५॥ अनुभाष्य—एकदा (एकस्मिन् काले) एकस्य रूपस्य या अनेकत्र प्रकटता, सर्वथा तत्स्वरूपा (आकृत्या गुणैर्लीलाभिश्चैकस्वरूपा) एव स प्रकाश इतीर्यते। श्लोक-भावानुवाद—एक ही समयमें एक रूप, जो अनेक स्थानोंमें प्रकट होते हैं और उनके रूप-गुण-लीला एक स्वरूप ही होते हैं, तो उन्हें 'प्रकाश' कहते हैं॥७५॥ ईशविलास :- एकइ विग्रह यदि आकारे हय आन। अनेक प्रकाश हय, 'विलास' तार नाम॥७६॥ अनुवाद—जब भगवान्‌के द्वारा प्रकाशित विग्रह उनसे भिन्न आकारवाले होते हैं, तो वे 'विलास-विग्रह' कहलाते हैं॥७६॥ अमृतानुकणिका—प्रकाशके समान विलास भी एक ही विभुरूपके अविर्भाव विशेष हैं, तो भी उनमें यह पार्थक्य है कि प्रकाशमें अङ्ग-सन्निवेश, रूप, गुणादि मूल स्वरूपके तुल्य होता है, किन्तु विलासमें आकृति और रूपादि मूल स्वरूपसे भिन्न होता है तथा शक्ति आदि भी मूल स्वरूपसे कुछ कम होती है॥७६॥ लघुभागवतामृतमें तदेकात्मरूपकथन (१/१५)— स्वरूपमन्याकारं यत्तस्य भाति विलासतः। प्रायेणात्मसमं शक्त्या स विलासो निगद्यते॥७७॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णकी अचिन्त्य शक्तिविलाससे जब उनका स्वरूप प्रायः अपने ही समान अन्य रूपमें प्रकाशित होता है, तो उसे 'विलास' कहा जाता है॥७७॥ अनुभाष्य—तस्य (मूलरूपस्य) यत् स्वरूपं अन्याकारं (विलक्षणाङ्गसन्निवेशं), विलासतः (लीला-विशेषात्) प्रायेण (कैश्चिद्गुणैरूपाधिकं) आत्मसमं (निजमूलरूपतुल्यं) शक्त्या भाति, स विलासः निगद्यते। ३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

१/७७-८१ ]

श्लोक-भावानुवाद-जब मूलरूपके विलक्षण अङ्गोंके सन्निवेशवाला, अपने मूलरूपके समान शक्तिसम्पन्न और विशेष लीलामें कुछ गुणों एवं रूपमें अधिक भी हो, तो उसे ‘विलास’ कहते हैं॥७७॥ यैछे बलदेव, परव्योमे नारायण। यैछे वासुदेव प्रद्युम्नादि सङ्कर्षण॥७८॥ अनुवाद-जैसे [वृन्दावन और द्वारकामें] श्रीबलदेव प्रभु, वैकुण्ठमें श्रीनारायण और चतुर्व्यूह [श्रीवासुदेव, श्रीसङ्कर्षण, श्रीप्रद्युम्न और श्रीअनिरुद्धादि] भगवान् श्रीकृष्णकी विलासमूर्ति हैं॥७८॥ अनुभाष्य-श्रीबलदेव श्रीकृष्णके स्वयं प्रकाश हैं और श्रीनारायण उनके प्राभवविलास हैं॥७८॥ ईशशक्ति :- ईश्वरेर शक्ति हय त्रिविध प्रकार। एक लक्ष्मीगण, पुरे महिषीगण आर॥७९॥ व्रजे गोपीगण आर सबाते प्रधान। व्रजेन्द्रनन्दन यां'ते स्वयं भगवान्॥८०॥ अनुवाद-ईश्वरकी शक्तियाँ तीन प्रकारकी हैं-वैकुण्ठमें लक्ष्मियाँ, द्वारकामें महिषियाँ और व्रजमें गोपियाँ। व्रजकी गोपियाँ ही इनमें सबसे श्रेष्ठ हैं, क्योंकि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं॥७९-८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘यद्यपि आमार गुरु’ (संख्या ४४) से लेकर ‘साधकगण आर’ (संख्या ६४) तक-गुरु और भक्त, इन दो तत्त्वोंका विचार हुआ है। ‘ईश्वरेर अवतार’ (संख्या ६५) से लेकर ‘पृथु व्यासमुनि’ (संख्या ६७) तक-भगवान् और भगवत्-अवतारका विचार हुआ है। ‘दुईरूपे हय’ (संख्या ६८) से ‘प्रद्युम्नादि-सङ्कर्षण’ (संख्या ७८) तक-उनके ‘प्रकाश’ और ‘विलास’ का विचार हुआ है। उसके बाद ‘ईश्वरेर शक्ति हय’ (संख्या ७९) से ‘स्वयं भगवान्’ (संख्या ८०) तक उनकी शक्तिका विचार किया गया॥४४-८०॥ स्वयंरूप कृष्णेर कायव्यूह-ताँर सम। भक्त सहिते हय ताँहार आवरण॥८१॥ अनुवाद-स्वयंरूप श्रीकृष्णके कायव्यूह उनके ही समान हैं। वे भक्तोंसे सदा परिवेष्टित रहते हैं, इसलिये भक्त उनका आवरण हैं॥८१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘स्वयंरूप’, ‘तदेकात्म’ आदि भागवतामृतके श्लोकोंके विचारसे द्विभुज श्रीकृष्ण ही स्वयंरूप हैं। उनके कायव्यूह उनके समान हैं। कायव्यूहका अर्थ होता है, अपनी कायाका विस्तार। उसी स्वरूपके निकट जो भक्त होते हैं, वे ही उनका आवरण हैं। आवरण और वेष्टित (आवृत)-तत्त्वका एक साथ विचार करनेसे पूर्वोक्त छह तत्त्वोंका एकत्व ही निर्धारित होता है। इस प्रकारका निर्धारण केवल अचिन्त्य-भेदाभेदतत्त्व-विचारसे ही सिद्ध होता है॥८१॥

पहला अध्याय | ३३

[ १/८२-८६

भक्त आदि क्रमे कैल सबार वन्दन। ए-सबार वन्दन सर्वशुमेर कारण॥८२॥ अनुवाद—(अब तक) मैंने भगवान्‌के भक्त, शक्ति, अवतार, प्रकाशादिकी क्रमानुसार वन्दना की है। इन सबकी वन्दना समस्त शुभोंका कारण है॥८२॥ प्रथम श्लोके सामान्य मङ्गलाचरण। द्वितीय श्लोकेते करि विशेष वन्दन॥८३॥ अनुवाद—प्रथम श्लोकमें सामान्य-मङ्गलाचरण किया है और द्वितीय श्लोकमें विशेष वन्दना की है॥८३॥ प्रथम चौदह श्लोकोंमेंसे द्वितीय श्लोककी व्याख्या :— वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्दौ सहोदितौ। गौड़ोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ शन्दौ तमोनुदौ॥८४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उदयाचलरूप गौड़देशमें युगपत् सूर्य-चन्द्र-स्वरूप आश्चर्यजनक रूपमें उदित, मङ्गलदाता, जीवोंके अन्धकारविनाशी श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्दकी मैं वन्दना करता हूँ॥८४॥ अनुभाष्य—गौड़ोदये (गौड़देशः एव उदयाचलः तस्मिन्) सहोदितौ (एककाले उदयं प्राप्तौ) पुष्पवन्तौ (युगपत् दिवाकरनिशाकरौ, अतः) चित्रौ (आश्चर्यौ) शन्दौ (कल्याणप्रदौ) तमोनुदौ (अन्धकारविनाशकौ) श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्दौ [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—गौड़देशके उदयाचलपर एक साथ सूर्य एवं चन्द्ररूपमें आश्चर्यजनक रूपसे जगत्‌का कल्याण तथा अन्धकारका विनाशके लिये उदित हुए श्रीकृष्णचैतन्य एवं श्रीनित्यानन्द प्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥८४॥ सूर्य-चन्द्रके साथ दोनों भाइयोंकी उपमाकी सार्थकता :— व्रजे ये विहरे पूर्वे कृष्ण-बलराम। कोटीसूर्यचन्द्र जिनि दोंहार निजधाम॥८५॥ ‘गौड़ोदये पुष्पवन्तौ’ :— सेइ दुइ जगतेरे हइये सदय। गौड़देशे पूर्व-शैले करिल उदय॥८६॥ अनुवाद—जो श्रीकृष्ण-बलराम पहले व्रजमें विचरण करते थे और जिनकी अङ्गकान्ति करोड़ों सूर्य एवं चन्द्रमाओंको पराभूत करती है, वही दोनों जगत्‌के प्रति कृपालु होकर गौड़देशके उदयाचल (पूर्वी क्षितिज) पर उदित हुए हैं॥८५-८६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘निजधाम’—ज्योति (प्रकाश), ‘पूर्वशैले’—गौड़रूप उदयाचलमें गङ्गाके पूर्वतटपर॥८५-८६॥ अमृताणुकणिका—दोनोंकी अङ्गकान्ति करोड़ों सूर्योंकी ज्योतिसे भी उज्ज्वल और करोड़ों

३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

१/८५-९० ] चन्द्रमाओंकी ज्योतिसे स्निग्ध है। करोड़ों सूर्योंकी अपेक्षा उज्ज्वल होनेपर भी उसमें सूर्यके तेजके समान ज्वाला नहीं है, अपितु करोड़ों चन्द्रमाओंकी अपेक्षा भी स्निग्ध है, यही तात्पर्य है॥८५-८६॥ श्रीकृष्णचैतन्य आर प्रभु नित्यानन्द। याँहार प्रकाशे सर्व जगत आनन्द॥८७॥ अनुवाद—उन श्रीकृष्णचैतन्य और श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रकट होनेसे सारे विश्वमें आनन्द छा गया है॥८७॥ 'तमोनुदौ' और 'शन्दौ' :— सूर्यचन्द्र हरे यैछे सब अन्धकार। वस्तु प्रकाशिया करे धर्मेर प्रचार॥८८॥ अहैतुकी दयाका निर्देश :— एइ मत दुइ भाइ जीवेर अज्ञान। तमोनाश करि' करे वस्तु-तत्त्वज्ञान॥८९॥ अनुवाद—जिस प्रकार सूर्य और चन्द्र समस्त अन्धकारको दूर करके वस्तुओंको प्रकाशितकर उनके धर्म (रूप-गुणादि) को प्रकट करते हैं, उसी प्रकार इन दोनों भाइयोंने भी जीवोंके अज्ञानरूपी अन्धकारका विनाशकर उन्हें परमतत्त्वका ज्ञान दिया है॥८८-८९॥ कैतवका अर्थ :— अज्ञान-तमेर नाम कहिये 'कैतव'। धर्म-अर्थ-काम-वाञ्छा आदि एइ सब॥९०॥ अनुवाद—अज्ञानरूपी अन्धकारका ही दूसरा नाम 'कैतव' (कपट) है। (अपने भोगके लिये) धर्म, अर्थ, कामादि ही अज्ञानरूपी अन्धकार है॥९०॥ अमृताणुकणिका—धर्मका तात्पर्य यहाँ वर्णाश्रम-धर्म, माता-पिताकी सेवा, गुरुजनोंकी सेवा, सत्य बोलना, दानादि है। इस धर्मके पालनका फल अर्थकी प्राप्ति है; अर्थका तात्पर्य धन-सम्पत्ति और देहके सुखके लिये जो भी वस्तुएँ हैं। इस अर्थसे जितनी प्रकारकी सांसारिक कामनाएँ हैं, वे पूर्ण होंगी; इसे काम कहते हैं। तब काम पुनः धर्मके पालनमें प्रवृत्त करेगा, जिससे अर्थकी निरन्तर प्राप्ति होती रहे और कामनाओंकी पूर्ति अबाध रूपसे होती रहे। इस प्रकार इन तीनोंका चक्र चलता रहता है, जिसे 'त्रिवर्ग' कहते हैं। यह एक ऐसा चक्रव्यूह है, जिससे कोई निकल नहीं सकता। जिधरसे भी प्रयास करें, पुनः इसमें फंस जायेंगे; यह दलदलसे निकलनेकी चेष्टाके समान है। कोई सौभाग्यवान् जीव किसीके सङ्गसे निकल जाते हैं, किन्तु मुक्तिरूपी अर्थमें फंस जाते हैं। मुक्ति चार पुरुषार्थोंमें एक अर्थ है, परन्तु यह परमार्थका एक अंशमात्र है। यह अन्तिम लक्ष्य नहीं है, अपितु यहाँसे परमार्थका प्रारम्भ होता है। यथार्थ परमार्थ मार्ग तो श्रीकृष्णभक्ति है, जिसे पञ्चम पुरुषार्थ कहते हैं। धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूपी पुरुषार्थोंको ही जीवनका परम लक्ष्य मानना अज्ञानरूपी अन्धकार है और इसे ही कैतव कहा पहला अध्याय | ३५

गया है। इस प्रकार चैतन्यचरितामृतके अनेक वाक्य उद्धृत करके दिखाया जा सकता है कि ज्ञानयोगियों अथवा राजयोगियोंके द्वारा प्राप्य मुक्ति श्रीचैतन्यचरितामृत और श्रीमन्महाप्रभुका मत नहीं है। श्रीमन्महाप्रभुका मत श्रीमद्भागवतमें लिपिबद्ध है। श्रीमन्महाप्रभुने उस भागवत-प्रतिपाद्य भक्तिका ही प्रचार किया। महाप्रभुका मत कहकर अन्य जो कोई भी मत प्रचारित हैं अथवा भविष्यमें होंगे, वे पाषण्ड कल्पित मतवाद मात्र ही जानने होंगे॥९०॥ श्रीमद्भागवत (१/१/२)— धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्। श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किंवापरैरीश्वरः सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ ९१ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह श्रीमद्भागवत ग्रन्थ सर्वप्रथम महामुनि श्रीनारायणके द्वारा चतुःश्लोकी (अर्थात् चार श्लोकों) के रूपमें निर्मित है। इसमें निर्मत्सर अर्थात् सब जीवोंके प्रति दयालु व्यक्तियोंके लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तक कैतवसे शून्य अर्थात् छलरहित परमधर्मकी व्याख्या हुई है। यह धर्म जीवके त्रितापका नाश करनेवाला, शिवद अर्थात् मङ्गल प्रदान करनेवाला और वास्तव-वस्तुके तत्त्व-ज्ञानको प्रदान करनेवाला है। इसको श्रवण करनेके इच्छुक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार ईश्वरको अपने हृदयमें अवरुद्ध करनेमें समर्थ होते हैं। इसलिये श्रीमद्भागवतके अतिरिक्त अन्य किसी शास्त्रकी क्या आवश्यकता है?॥९१॥ अनुभाष्य—महामुनिकृते (श्रीनारायणमहामुनिरचिते) अत्र श्रीमद् भागवते (श्रीमति शोभामये भागवते) प्रोज्झितकैतवः (प्रकर्षेण उज्झितं निरस्तं कैतवं धर्मार्थकाममोक्षात्मकं फलाभिसन्धिलक्षणं कपटं यस्मिन् सः केवल भगवत्सेवालक्षणः) सतां (हरिजानानां) निर्मत्सराणां (कामक्रोधलोभमोहमदमत्सरशून्यानां) परमः (श्रेष्ठ, कर्मज्ञानशास्त्रनिरासपरत्वात्) धर्मः [वर्णितः] अत्र (श्रीमद्भागवते) तापत्रयोन्मूलनं (आध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविक- पापविनाशकं) शिवदं (मङ्गलप्रदं) वास्तवं (शश्वत् पारमार्थिकम् अद्वयं) वस्तु वेद्यम्। अत्र (श्रीमद्भागवते) शुश्रूषुभि (श्रोतुमिच्छद्भिः) कृतिभिः (सुकृतिवद्भिः) हृदि तत्क्षणात् सद्यः (कालव्यवधानरहितः) ईश्वरः अवरुद्ध्यते। श्लोक-भावानुवाद—(काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्य आदिसे रहित) हरिजनोंके लिये श्रीनारायण महामुनिके द्वारा रचित, सम्पूर्ण रूपसे कैतव (अर्थात् धर्म-अर्थ-काम-मोक्षादि फलरूपी कपट) से शून्य, (केवल भगवत्सेवारूपी, कर्म-ज्ञान-शास्त्रकी अपेक्षा नहीं रखनेवाले) श्रेष्ठ धर्मका वर्णन इस (श्रीमती राधिकाकी महिमासे शोभित) श्रीमद्भागवतमें हुआ है। यह आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक, इन तीन तापों और इनके मूल पापोंका विनाशकर मङ्गलप्रदाता एवं शाश्वत् पारमार्थिक अद्वयज्ञान वस्तुके तत्त्वज्ञानको प्रदान करनेवाला है। इस श्रीमद्भागवतके श्रवणकी इच्छा करनेवाले सुकृतिवान् भक्तके हृदयमें तत्क्षणात् भगवान् बँध जाते हैं॥९१॥ अमृतानुकणिका—भागवतका प्रतिपाद्य विषय 'निरस्त-कुहक' है। वही भागवतके प्रथम और द्वितीय श्लोकमें ग्रथित है। भागवतके निम्नलिखित श्लोकोंकी आलोचना करनेसे भी सारग्राही व्यक्तिको ज्ञानयोग और राजयोगकी तुच्छता उपलब्ध होगी। भागवत (१/५/१२)—

१/९१-९४ ] “नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम्॥” अर्थात् “समस्त प्रकारकी कर्म-वासनाओंसे रहित होनेपर भी मोक्षकी प्राप्तिका साक्षात् साधन-निर्मल ब्रह्मज्ञान यदि भगवान् श्रीहरिकी भक्तिसे रहित हो, तो वह भी शोभा नहीं देता। इसलिये जो साधन और सिद्धि दोनों ही अवस्थाओंमें सदा ही अमङ्गलस्वरूप तथा दुःखप्रद हैं, वे काम्य कर्म और यहाँ तक कि निष्काम कर्म भी यदि भगवान्‌को अर्पण नहीं किये गये हों, तो वे कर्म भी कैसे सुशोभित हो सकते हैं? इसका कारण है कि वे भगवत्-सेवा और सत्त्व-शुद्धिके भावसे रहित होते हैं।” और भागवत (१/६/३६)— “यमादिभिर्योगपथैः कामलोभहतो मुहुः। मुकुन्दसेवया यद्वत् तथाद्धात्मा न शाम्यति॥” अर्थात् “निरन्तर काम-लोभादि रूप शत्रुओंके वशीभूत अशान्त मन भगवान् श्रीमुकुन्दकी सेवाके द्वारा जिस प्रकारसे प्रत्यक्ष शान्तिका अनुभव करता है, यम-नियमादिसे युक्त अष्टाङ्गयोग-मार्गका अवलम्बन करनेसे वह वैसा शान्त नहीं हो पाता॥”९१॥ तार मध्ये मोक्षवाञ्छा कैतवप्रधान। याहा हैते कृष्णभक्ति हय अन्तर्धान॥९२॥ अनुवाद—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन सबमेंसे मोक्षकी कामना प्रधान कैतव है, क्योंकि इसके द्वारा श्रीकृष्णभक्ति लुप्त हो जाती है॥९२॥ उक्त श्लोककी श्रीधरस्वामिकृत भावार्थदीपिकामें— “प्र-शब्देन मोक्षाभिसन्धिरपि कैतवं निरस्तं” इति॥९३॥ अनुवाद—‘प्र’ शब्दका अभिप्राय मोक्षकी इच्छारूपी कैतवके परित्यागसे है॥९३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उनमेंसे मुक्तिवाञ्छा ही प्रधान कैतव है। इसलिये श्रीधरस्वामिपादके अनुसार भी प्र-शब्दका तात्पर्य मोक्षके अभिसन्धिरूप कैतवसे रहित होना है॥९२-९३॥ कृष्णभक्तिर बाधक—यत शुभाशुभ कर्म। सेह एक जीवेर अज्ञानतमो-धर्म॥९४॥ अनुवाद—श्रीकृष्णभक्तिके पथमें बाधा उत्पन्न करनेवाले जितने भी शुभ अर्थात् सांसारिक सुख अथवा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाले पुण्य कार्य अथवा अशुभ अर्थात् निकृष्ट योनि और नरक प्राप्त करानेवाले पाप कार्य हैं, वे जीवके अज्ञानरूपी अन्धकार (तमोगुणी-धर्म) के कारण हैं॥९४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु, ये दो भाई सूर्य और चन्द्रके समान हैं। वे दोनों उदित होकर जीवोंके हृदयके अन्धकारको दूर करते हैं। इन पद्योंका तात्पर्य यही है कि जीव चित्स्वरूप तत्त्व है। श्रीकृष्ण-भक्ति और श्रीकृष्ण-प्रेम ही जीवका स्वधर्म (स्वरूपगत-धर्म) है। शुभकर्म (पुण्य), अशुभकर्म (पाप) और मोक्षकी कामना—ये मिलकर पहला अध्याय | ३७

[ १/९४-१०० सभी जीवोंमें (विकृत) स्वधर्मके रूपमें प्रवेशकर उन्हें तमो-धर्ममय कर रहे हैं। कर्म और ज्ञानके प्रतिपादक समस्त उपदेश ही कैतव अर्थात् छल हैं, इसलिये वे तमोधर्मके अन्तर्गत हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रकट होनेसे पहले यह तमोधर्म जीवोंके हृदयको दूषित कर रहा था। दोनों भाइयोंने जगत्में अवतरित होकर जीवोंके अन्तःकरणसे उस तमोधर्मको दूर करके वास्तव वस्तु-तत्त्वका प्रकाश किया है॥९४॥ निताइ-गौरकी कृपाका फल :- ताँहार प्रसादे एइ तमो हय नाश। तमो नाश करि' करे तत्त्वेर प्रकाश॥९५॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपासे इस अन्धकारका विनाश होता है और उन्होंने अन्धकारका विनाश करके वास्तविक तत्त्वका प्रकाश किया है॥९५॥ तत्त्ववस्तुका परिचय :- तत्त्ववस्तु—कृष्ण, कृष्णभक्ति, प्रेमरूप। नाम-सङ्कीर्त्तन—सर्व आनन्दस्वरूप॥९६॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण ही एकमात्र तत्त्ववस्तु हैं, उनकी भक्ति प्रेमस्वरूपा है और भगवान्के नामोंका सङ्कीर्त्तन उसे प्राप्त करानेवाला है, ये तीनों ही समस्त आनन्दस्वरूप हैं॥९६॥ सूर्य-चन्द्रकी अपेक्षा उनकी अधिक कल्याणकारिता :- सूर्य चन्द्र बाहिरेर तमः से विनाशे। बहिर्वस्तु घट-पट-आदि से प्रकाशे॥९७॥ दुइ भाइ हृदयेर क्षालि' अन्धकार। दुइ भागवत-सङ्गे करान साक्षात्कार॥९८॥ अनुवाद—सूर्य और चन्द्र तो केवलमात्र बाहरी अन्धकारको दूरकर बाहरी जागतिक वस्तुओं जैसे देह-वस्त्रादिको ही प्रकाशित करते हैं, परन्तु श्रीगौर-नित्यानन्द नामक ये दो भाई हृदयके आन्तरिक अन्धकारका विनाशकर दोनों भागवतोंका साक्षात्कार करा देते हैं॥९७-९८॥ एक भागवत बड़—भागवत शास्त्र। आर भागवत—भक्त भक्ति-रस-पात्र॥९९॥ दुइ भागवत द्वारा दिया भक्तिरस। ताँहार हृदये ताँर प्रेमे हय वश॥१००॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९९-१००॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भागवत-शास्त्र (ग्रन्थ श्रीमद्भागवतम्) रूपी एक भागवत हैं और दूसरे भागवत भक्त हैं, जो भक्तिरसके पात्र अर्थात् हृदयमें भक्तिरसको धारण करनेवाले हैं। श्रीगौर-नित्यानन्द जीवोंको इन दोनोंके साक्षात्कारके द्वारा भक्तिरस प्रदान करवाकर स्वयं उनके प्रेमके वशीभूत हो जाते हैं॥९९-१००॥ अमृताणुकणिका—'भक्त भक्ति-रस-पात्र'—प्रेमाभक्तिको ही जो परम पुरुषार्थ मानते हैं, ऐसे ३८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

भक्तिरस-रसिक भक्तोंको ही यहाँ भागवत कहा गया है। ऐसे भक्तोंके सङ्गके प्रभावसे ही हृदयमें भक्तिका बीज अङ्कुरित होता है। कर्मी और ज्ञानी आदि लोग भी आनुषङ्गिक भावसे भक्तिका अनुष्ठान करते हैं, किन्तु वे भक्तिको परम-पुरुषार्थ नहीं मानते। भक्तिका आस्वादन उनके लिये लोभनीय नहीं हैं और भक्ति उनके हृदयमें रसरूपमें परिणत नहीं हो पाती, इसलिये वे भक्तिरसपात्र नहीं हैं। इसलिये इस पयारमें 'भागवत' शब्द कर्मी-ज्ञानी आदि लोगोंके लिये अभिप्रेत नहीं है॥९९-१००॥ एक अद्भुत समकाले दोँहार प्रकाश। आर अद्भुत-चित्तगुहार तमः करे नाश॥१०१॥ अनुवाद-सूर्य और चन्द्ररूपी श्रीगौर और श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनों एक ही साथ प्रकट हुए हैं, यह एक आश्चर्य है और दूसरी अद्भुत बात यह है कि वे हृदयकी गहराइयोंमें छिपे अज्ञानरूपी अन्धकारका भी नाश करते हैं॥१०१॥ एइ चन्द्र सूर्य दुइ परम सदय। जगतेर भाग्ये गौड़े करिल उदय॥१०२॥ अनुवाद-ये दोनों चन्द्र और सूर्य, अत्यन्त दयामय हैं और जगत्वासियोंके सौभाग्यवश गौड़देशमें उदित हुए हैं॥१०२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'जगतेर भाग्ये' अर्थात् उन्हीं दो भाइयोंके द्वारा प्रचारित प्रेमधर्म क्रमशः इस जगत्में सर्वत्र व्याप्त होगा, यही इस जगत्का भाग्य है। 'गौड़े'-मल्लदह जिलाके अन्तर्गत प्राचीन गौड़नगरसे सेनवंशीय राजा अपना राजसिंहासन श्रीनवद्वीपमण्डलमें ले आये थे, इसलिये श्रीनवद्वीपमण्डलको गौड़भूमि कहा जाता है। उसी गौड़में गङ्गाके पूर्वतटमें श्रीमन्महाप्रभुने जन्म ग्रहण किया था और श्रीनित्यानन्द प्रभु वहाँ आकर मिलित होकर उदित हुए थे॥१०२॥ सेइ दुइ प्रभुर करि चरण-वन्दन। याँहा हइते विघ्ननाश, अभीष्टपूरण॥१०३॥ अनुवाद-इन दोनों प्रभुओंके श्रीचरणोंकी मैं वन्दना करता हूँ, जो समस्त विघ्नोंका नाश और मनोभीष्टको पूर्ण करनेवाले हैं॥१०३॥ एइ दुइ श्लोके कैल मङ्गल-वन्दन। तृतीय श्लोकेर अर्थ शुन सर्वजन॥१०४॥ अनुवाद-इन दो श्लोकोंके द्वारा मैंने मङ्गलकारी वन्दना की। अब सब लोग कृपापूर्वक तृतीय श्लोकका अर्थ श्रवण करें॥१०४॥ वक्तव्य-बाहुल्य, ग्रन्थ-विस्तारेर डरे। विस्तारे ना वर्णि, सारार्थ कहि अल्पाक्षरे॥१०५॥ अनुवाद-वर्णन करने योग्य बहुत कुछ होनेपर भी ग्रन्थ-विस्तारके भयसे मैं विस्तृत वर्णन नहीं करके संक्षेपमें केवल सारार्थ ही प्रस्तुत कर रहा हूँ॥१०५॥

[ १/१०६-१०९ अनादिकालसे व्यवहारसिद्ध प्राचीन स्वशास्त्रकी उक्ति :- “मितञ्च सारञ्च वचो हि वाग्मिता” इति ॥१०६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अल्प शब्दोंमें सारवाक्यकी उक्तिको ‘वाग्मिता’ कहा जाता है॥१०६॥ अनुभाष्य—मितञ्च (प्रजल्परहितं प्रयोजनमात्रं) सारञ्च (उद्देशकं) वचः हि वाग्मिता (वाक्पटुता)। श्लोक-भावानुवाद—प्रजल्परहित केवल प्रयोजनको लक्ष्य करनेवाले सार वचनको ही वाक्पटुता कहते हैं॥१०६॥ शुनिले खण्डिबे चित्तेर अज्ञानादि दोष। कृष्णे गाढ़ प्रेम हबे, पाइबे सन्तोष॥१०७॥ अनुवाद—इसको (श्रद्धापूर्वक) श्रवण करनेसे हृदयकी अज्ञानता आदि समस्त दोष नष्ट हो जायेंगे और श्रीकृष्णमें गाढ़ प्रेम होगा तथा हृदयको शान्ति मिलेगी॥१०७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—“कृष्णे गाढ़ प्रेम हबे” के स्थानपर किसी-किसी अन्य संस्करणमें “सर्वतत्त्व ज्ञान हइबे” पाया जाता है॥१०७॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये प्रथम परिच्छेद। पहले अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य—महाभारतके उद्योगपर्वमें ४३/१६ श्लोकमें बारह प्रकारके दोषोंका और विष्णुपुराणमें अठारह प्रकारके दोषोंका उल्लेख किया गया। स्वरूपकी दुर्ज्ञेयताके कारण ये पाँच प्रकारके अज्ञान हैं— (१) अज्ञान—जड़शरीरमें ‘मैं’ की बुद्धि; (२) विपर्यास—जड़वस्तुओंके भोक्ताका अभिमान; (३) भेद—द्वितीयाभिनिवेश (श्रीकृष्णसेवाको त्यागकर देह सम्बन्धी कार्योंमें अभिनिवेश); (४) भय और विरूप ग्रहण तथा (५) शोक॥१०७॥ इति अनुभाष्ये प्रथम परिच्छेद। पहले अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। अमृतानुकणिका—विष्णुयामलमें अठारह दोषोंका वर्णन इस प्रकार है—(१) मोह, (२) तन्द्रा, (३) भ्रम, (४) रुक्षरसता अर्थात् प्रेम-सम्बन्धके बिना भी राग, (५) उत्कट-काम (दुःखप्रद लौकिक काम), (६) चञ्चलता, (७) मद, (८) मात्सर्य (दूसरोंका उत्कर्ष सहन करनेमें अक्षमता), (९) हिंसा, (१०) खेद, (११) परिश्रम, (१२) असत्य बोलना, (१३) क्रोध, (१४) प्रबल आकाङ्क्षा, (१५) आशङ्का, (१६) विश्वविभ्रम अर्थात् विश्वपालनेच्छा-आवेश, (१७) विषमता और (१८) पराक्षेपा॥१०७॥ ग्रन्थमें वर्णनीय विषय :- श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत-महत्त्व। ताँर भक्त-भक्ति-नाम-प्रेम-रसतत्त्व॥१०८॥ भिन्न भिन्न लिखियाछि करिया विचार। शुनिले जानिबे सब वस्तुतत्त्वसार॥१०९॥ ४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

१/१०८-११० ] अनुवाद-मैं श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्यकी महिमा और उनके भक्तों, भगवद्भक्ति, भगवन्नाम, प्रेम एवं रसतत्त्वका पृथक्-पृथक् विचारपूर्वक वर्णन करूँगा, जिसे श्रवण करनेसे समस्त वस्तुतत्त्वके सारका ज्ञान हो जायेगा ॥ १०८-१०९ ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ ११० ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिषण्डे गुर्वादि-वन्दन-मङ्गलाचरणं नाम प्रथमः परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ ११० ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिषण्डमें गुरु आदिका वन्दन-मङ्गलाचरण नामक पहले अध्यायका अनुवाद समाप्त। पहला अध्याय | ४१

नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिना- मात्मास्यधीशाखिललोकसाक्षी। नारायणोऽङ्गं नरभू-जलायना- त्तच्चापि सत्यं न तवैव माया॥

दूसरा अध्याय दूसरे अध्यायका कथासार— इस दूसरे अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभुका श्रीकृष्णके साथ एकत्व प्रकाशित करते हुए ब्रह्मको उनकी अङ्गज्योति और परमात्माको उनका अंश प्रमाणित किया है। श्रीकृष्णको पुरुषावतारोंका और समस्त जीवोंका परम आश्रय प्रमाणित करके उनका मूल नारायण होना स्थापित करते हुए श्रीकृष्णके स्वरूप और उनकी तीन प्रकारकी शक्तियोंके ज्ञानको जाननेकी आवश्यकतापर बल दिया गया है। श्रीकृष्णके स्वरूपके प्राभव-वैभव भेदसे दो प्रकारके प्रकाश, अंश-शक्त्यावेश भेदसे दो प्रकारके अवतार और बाल्य-पौगण्ड अवस्था भेदसे दो प्रकारादि लीलाओंका वर्णनकर किशोरस्वरूप श्रीकृष्ण स्वयं अवतारी हैं, यह सिद्धान्त स्थापित किया गया है। चित्शक्तिका वैभव वैकुण्ठादि लोक, मायाशक्तिका वैभव अनन्त ब्रह्माण्ड और जीवशक्तिका वैभव अनन्त जीव हैं, यह भी दिखलाया गया है। श्रीकृष्णचैतन्य ही सर्वकारणोंके कारण, सभीके आदि (मूल) और स्वयं अनादि नित्य-सच्चिदानन्द विग्रह साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र हैं, यह स्थिर किया है। भक्तिमें दृढ़ता लानेके लिये सभी भक्तोंको श्रीकृष्णका स्वरूपज्ञान, उनकी तीन शक्तियोंका ज्ञान और विलासज्ञानरूप सम्बन्धज्ञान होना आवश्यक है, यह भी सिद्ध किया गया है। (अमृतप्रवाह भाष्य) भक्तिसिद्धान्त-विचारसे श्रीगौरवन्दना :— श्रीचैतन्यप्रभुं वन्दे बालोऽपि यदनुग्रहात्। तरेत्रानामतग्राहव्याप्तं सिद्धान्तसागरम्॥ १॥ अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य— जिनकी कृपासे अज्ञ व्यक्ति भी नाना प्रकारके मतवादरूपी मगरमच्छादिसे परिपूर्ण सिद्धान्त-समुद्रको अनायास ही पार कर जाता है, उन श्रीचैतन्य महाप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १॥ अनुभाष्य— यदनुग्रहात् (यस्य कृपया) बालोऽपि (अनभिज्ञोऽर्भकोऽपि) नानामतग्राहव्याप्तं (औलूक्यजिन-बुद्ध- जैमिनि-पतञ्जलि-गौतम-कणाद-कपिल-शङ्कर-दत्तात्रेय-कथित-मिथो-विवदमान-नक्रमकर-प्रतिम-जड़स्वार्थ- सङ्कुल-मतवादपूर्णं) सिद्धान्तसागरं (विचारसमुद्रं) तरेत् (तेषां सङ्कीर्णमतवादानि तृणीकृत्य अमलं कृष्णचरणं जानाति) [तं] श्रीचैतन्यप्रभुं [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद— जिनकी कृपासे अनभिज्ञ बालक भी (औलूक्य और जैन दर्शन एवं बुद्ध-जैमिनि-पतञ्जलि-गौतम-कणाद-कपिल-शङ्कराचार्य-दत्तात्रेयके द्वारा प्रचारित परस्पर विरोधी, जड़स्वार्थसे व्याप्त मतरूपी) मगरमच्छोंसे परिपूर्ण विचारसमुद्रसे तर जाता है अर्थात् उनके विभिन्न मतोंको तुच्छ मानकर अमल श्रीकृष्णके चरणोंको जीवनका लक्ष्य जान जाता है, उन श्रीचैतन्यप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १॥

[ २/२-४ श्रीकृष्णकीर्त्तनके लिये श्रीचैतन्यकी दया भिक्षा :- कृष्णोत्कीर्त्तन-गान-नर्त्तनकला-पाथोजनि-भ्राजिता सद्भक्तावलि-हंस-चक्र-मधुपश्रेणी-विहारास्पदम्। कर्णानन्दि-कलध्वनिर्वहतु मे जिह्वा-मरुप्राङ्गणे श्रीचैतन्यदयानिधे तव लसल्लीलासुधास्वर्धुनी ॥ २ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे दयाके समुद्र श्रीचैतन्यदेव! श्रीकृष्ण विषयक उच्च स्वरसे कीर्त्तन-गीत-नृत्यादि कमलोंसे सुशोभित और हंस-चक्रवाक-भ्रमररूपी सभी साधुभक्तोंका विहार-स्थान एवं सभीके कानोंको आनन्द प्रदान करनेवाले जलस्रोतकी भाँति मधुर कलकल ध्वनिरूप आपकी देदीप्यमान् लीलामृत-भागीरथी मेरी मरुस्थलरूपी जिह्वापर निरन्तर बहती रहे॥२॥ अनुभाष्य-हे दयानिधे श्रीचैतन्य! कृष्णोत्कीर्त्तनगाननर्त्तन-कलापाथोजनि-भ्राजिता (कृष्णस्य नामरूपगुण- लीलादीनां उत्कीर्त्तनम् उच्चैर्भाषणं गानं नर्त्तनञ्च तद्रूपाः कलाः ता एव पाथोजनीनि पद्मानि तैर्भ्राजिता शोभिता) सद्भक्तावलि-हंसचक्र-मधुपश्रेणीविहारास्पदं (हंसचक्रवाक-भ्रमरश्रेणीभेदप्रतिमानां भाव-भेदावस्थितानां सद्भक्तावलीनां शुद्धभक्तवृन्दानां विहारास्पदं विलासक्षेत्रं, यस्यां लीलायां शुद्धभक्तवृन्दानां परमामोदो भवतीति भावः) कर्णानन्दिकलध्वनिः (कर्णानन्दी भक्तानां कर्णरसायनः कलध्वनिः हंसचक्रवाक-भ्रमरोपम-हरिजनैः गीत-हरिलीला-प्रवाहाणामस्फुटमधुरनिनादः) [एवम्भूता] तव लसल्लीलासुधास्वर्धुनी (लसती दीव्यती गौरलीलारूपामृतमयी स्वर्धुनी स्वर्गङ्गा मन्दाकिनी) मे (मम) जिह्वामरु-प्राङ्गणे (गौरलीलारसास्वादवञ्चिते रसवर्जिते जिह्वारूपे नीवृति) वहतु। श्लोक-भावानुवाद-हे दयाके भण्डार श्रीचैतन्य! श्रीकृष्णका उच्च स्वरसे नाम-रूप-गुण- लीलादिका कीर्त्तन-गान-नर्तन कलारूपी कमलोंसे सुशोभित, हंस-चक्रवाक-भ्रमरादि विविध प्राणियोंके समान भिन्न-भिन्न भावोंवाले शुद्धभक्तोंका विलासक्षेत्र अर्थात् आपकी जिस लीलामें शुद्धभक्तोंको परमानन्द प्राप्त होता है अथवा हंस-चक्रवाक-भ्रमर सदृश हरिजनोंके द्वारा गान की गयी हरिलीला जलप्रवाहकी मधुर कलकल ध्वनिके समान भक्तोंके लिये कर्णरसायन अर्थात् उनके कानोंको आनन्द प्रदान करनेवाली है, इस प्रकारकी उपरोक्त तीन विशेषणोंसे शोभित गौरलीलारूप अमृतमयी मन्दाकिनी मेरी (गौरलीलाके रसास्वादनसे वञ्चित) मरुभूमि सदृश जिह्वारूपी राज्यमें बहती रहे॥२॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥३॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव की जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥३॥ प्रथम चौदह श्लोकोंमेंसे तीसरे श्लोककी व्याख्या; वस्तु निर्देश :- तृतीय श्लोकेर अर्थ करि विवरण। वस्तु-निर्देशरूप मङ्गलाचरण॥४॥ अनुवाद-अब मैं तृतीय श्लोककी व्याख्या कर रहा हूँ जिसके द्वारा वस्तु-निर्देश (ग्रन्थके प्रतिपाद्य विषय) के रूपमें मङ्गलाचरण किया गया है॥४॥ ४४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

२/५ ] यदद्वैतं ब्रह्मोपनिषदि तदप्यस्य तनुभा य आत्मान्तर्यामी पुरुष इति सोऽस्यांशविभवः। षडैश्वर्यैः पूर्णो य इह भगवान् स स्वयमयं न चैतन्यात् कृष्णाज्जगति परतत्त्वं परमिह॥५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उपनिषदोंमें जिनको अद्वैत ब्रह्म कहा जाता है, वे मेरे प्रभुकी अङ्गकान्ति हैं। जिनको योगशास्त्रोंमें अन्तर्यामी पुरुष या परमात्मा कहते हैं, वे मेरे प्रभुके अंशस्वरूप हैं। जिनको ब्रह्म और परमात्माका आश्रय एवं अंशिस्वरूप षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् कहा जाता है, मेरे प्रभु वे स्वयं-भगवान् हैं। इसलिये श्रीकृष्णचैतन्यकी अपेक्षा जगत्में और कोई परतत्त्व नहीं है॥५॥ अनुभाष्य—उपनिषदि (ब्रह्मविद्याभिधान-सर्वोन्नत-वेदशाखाविशेषे, उप-नि-पूर्वकस्य विशरणगत्यवसादनाथर्स्य षद्लृधातोः क्विप् प्रत्ययान्तस्येदं—तत्र, उप उपगम्य गुरूपदेशाल्लब्धेति यावत्। उपस्थितत्वाद्व्रह्मविद्यां निश्चयेन तन्निष्ठतया ये दृष्टानुश्रविक-विषय-वितृष्णाः सन्तः तेषां संसारबीजस्य सद् विशरणकर्त्री शिथिलयित्री अवसादयित्री विनाशयित्री ब्रह्मगमयित्रीति तत्र) यद् अद्वैतं (द्वितीयरहितं) ब्रह्म [अभिधीयते] तदपि अस्य (गौरकृष्णस्य) तनुभा (अप्राकृतदेहस्य कान्तिः); यः आत्मा (परमात्मा सर्वजीवादि-नियन्ता) अन्तर्यामी पुरुषः सोऽस्य अंशविभवः (ऐश्वर्यस्यान्यतमः विभुत्वविशेषः); इह (अस्मिन् तत्त्वविचारे) यः षडैश्वर्यैः (षड्भिः समग्रैश्वर्यवीर्ययशःश्रीज्ञानवैराग्यैः ऐश्वर्यैः प्रभुत्वैः) पूर्णः (अपेक्षाशून्यः परिपूर्णः) सः अयं श्रीकृष्णचैतन्यः स्वयं भगवान्; इह (जगति तत्त्वविचारे कलौ वा) चैतन्यात् कृष्णात् (कृष्ण-चैतन्यात्) परं (अन्यत्) परतत्त्वं (श्रेष्ठाश्रयः) न (नास्तीत्यर्थः)। [ज्ञानशास्त्रप्रयोजनं ब्रह्मवस्तु, तथा योगशास्त्रलक्ष्यः परमात्मा भगवता सह तत्त्वसाम्येऽपि अधिकारोचित-दृष्टिभेदेन भगवद्विग्रहस्य चित्-प्रभांशरूपपुटद्वयमात्रम्, न तु सम्पूर्ण-सविशेष-शक्तिमत् स्वयं वस्तु यथा भगवान्]। श्लोक-भावानुवाद—उपनिषद् (ब्रह्मविद्या नामक सर्वोत्तम विद्या विशेष)—इसकी व्युत्पत्ति उप और नि उपसर्गपूर्वक विशरण (शिथिल), गति, अवसाद (विनाश) अर्थपरक षद्लृ धातुके अन्तमें क्विप् प्रत्यय लगानेसे हुई है। इस व्युत्पत्तिमें 'उप' शब्दका अर्थ है—गुरुके निकट जाकर उनसे उपदेश प्राप्त करना। गुरुके निकट उपस्थित होनेसे ब्रह्मविद्याको निश्चयपूर्वक अर्थात् निष्ठापूर्वक जाना जाता है। दृष्टानुश्रविक—दृष्ट अर्थात् इन्द्रियोंके द्वारा गोचर तथा आनुश्रविक अर्थात् अनुभव करनेवाले—जो इन दोनों प्रकारकी विषयतृष्णासे वैराग्य प्राप्त करना चाहते हैं, उपनिषद् उनके संसार बीजका सद्‌विशरण अर्थात् उसे शिथिल करनेवाली, अवसाद अर्थात् विनाश करनेवाली, गति अर्थात् ब्रह्मको प्राप्त करवाने वाली ब्रह्मविद्या है। जिसे अद्वैत ब्रह्म कहते हैं, वह भी श्रीगौरकृष्णकी अप्राकृत देहकी कान्ति है; जो सब जीवोंके नियन्ता परमात्मा हैं, वे उनके ऐश्वर्यके एक अंश सर्वव्यापकता गुणसे युक्त अंश विशेष हैं; इस तत्त्वविचारमें छह प्रकारके ऐश्वर्यों अर्थात् समस्त वैभव, बल, यश, सौन्दर्य, ज्ञान और वैराग्यसे स्वयं परिपूर्ण (किसी अन्यकी अपेक्षा ना रखते हुए) वे यही श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं-भगवान् हैं अर्थात् इस जगत्में तत्त्व विचारसे अथवा कलिकालमें श्रीकृष्णचैतन्यसे श्रेष्ठ अन्य कोई आश्रय नहीं है (यह अर्थ है) [ज्ञानशास्त्रोंका प्रयोजन ब्रह्म है, योगशास्त्रोंका प्रयोजन परमात्मा है। तत्त्वकी दृष्टिसे यद्यपि ब्रह्म और परमात्माका भगवान्‌से साम्य है, तथापि अधिकारकी दृष्टिसे वे क्रमशः दूसरा अध्याय | ४५

[ २/५ भगवत्-विग्रहकी अङ्गकान्ति और अंशरूप दो प्रकाशमात्र हैं। वे सम्पूर्ण-सविशेष-शक्तिमान् स्वयं वस्तु अर्थात् भगवान् नहीं हैं]। इस श्लोकके साथ श्रील जीवगोस्वामीकृत तत्त्वसन्दर्भमें संख्या आठमें प्रदत्त श्लोक विचारणीय है— “यस्य ब्रह्मेति संज्ञां क्वचिदपि निगमे याति चिन्मात्रसत्ताप्यंशो यस्यांशकैः स्वैर्विभवति वशयन्नेव मायां पुमांश्च। एकं यस्यैव रूपं विलसति परमव्योम्नि नारायणाख्यं, स श्रीकृष्णो विधत्ते स्वयमिह भगवान् प्रेम तत्पाद-भाजाम्॥” अर्थात् “जिनकी चिन्मात्र-सत्ताको वेद किसी-किसी स्थानपर 'ब्रह्म' नामसे वर्णन करते हैं, जिनके एक अंश माया-नियन्ता 'पुरुष' अपने अंश (लीलावतार और गुणावतार) रूपोंमें वैभव प्रकाश करते हैं और जिनके एक रूप 'श्रीनारायण' नामसे परव्योममें विलास करते हैं, वे स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण अपने चरणकमलोंका भजन करनेवाले भक्तोंको प्रेम प्रदान करें।” सच्चिदानन्द भगवान्के सर्वदा आनन्दप्रद दर्शनसे वञ्चित रहकर जो उन चिन्मयलीलायुक्त तत्त्ववस्तुकी केवल सम्वित्-वृत्तिका अवलम्बन करते हैं, उन्हें ब्रह्मका ही दर्शन होता है और जो केवल उनकी सत्-चित्वृत्तिका अवलम्बन करते हैं, वे परमात्माका ही दर्शन करते हैं। इसलिये सच्चिदानन्द लीलावियह भगवान्की चिन्मय अङ्गकी ज्योति ही चित्-विलासहीन-निराकार -मायारहित ब्रह्म और उनके ऐश्वर्यकी अंश विभूति ही परमात्मा हैं॥५॥ अमृताणुकणिका—परम-सम्बन्ध निर्णयमें अखिल-रसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण और उनकी ही औदार्य-मूर्ति श्रीचैतन्य निर्णीत हुए हैं। श्रीकृष्णके अतिरिक्त ब्रह्म, परमात्मा और किम्वा भगवान्के अन्य किसी भी अवतारमें समस्त रसोंका एकत्र युगपत् समावेश नहीं देखा जाता। श्रीचैतन्यदेव और श्रीकृष्ण एक ही अभिन्न वस्तु हैं और वे ही परतत्त्व हैं। इस जगत्में आरोह अथवा अधिरोह पथसे क्रमसे श्रेष्ठताके विचारसे ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्की अनुभूतिका पार्थक्य लक्षित होता है। बहिरङ्गा शक्तिके रहित-विचारसे अर्थात् नेति-नेति विचारसे 'ब्रह्म', तटस्थाशक्तिके सहित-विचारसे अर्थात् जीवोंके अन्तर्यामी विचारसे 'परमात्मा' और अन्तरङ्गा अथवा स्वरूपशक्तिके सहित-विचारसे वैकुण्ठविग्रह अधोक्षज 'भगवान्'का ज्ञान होता है। 'ब्रह्म'- ब्रह्ममें परब्रह्मका क्लीवत्व और निर्विशेष भाव मात्र प्रकाशित है। केवल क्लीव अथवा स्त्री (शक्ति)की उपासनासे मानवताका चरम विकास और आकाङ्क्षा परितृप्त नहीं होती। जहाँ अप्राकृत पुरुष और अप्राकृत प्रकृति एक साथ अर्थात् जहाँ चित्-लीला-युगलकी सेवा है, वहीं मानवका धर्म पूर्ण है। क्लीवत्व (ब्रह्म) सायुज्य लाभको 'मानवका परम धर्म' ना कहकर उसे चेतनताकी बन्धन-योग्य-वृत्ति अथवा चेतनताकी आत्महत्याका आराध्य धर्म कहा जा सकता है। ब्रह्म और जीवमें चेतनताके गुणका साम्य है, इसलिये श्रुतिमें “अहं ब्रह्मास्मि" मन्त्रका तात्पर्य यह है कि समजातीय ना होनेपर उपासना सुष्ठु रूपसे नहीं हो सकती। इसलिये स्मृति-शास्त्रमें देखा जाता है- “नादेवो देवमर्चयेत्" अर्थात् जो देवता नहीं हैं अर्थात् जिनमें देवताओंके समान गुण नहीं हैं, वे देवताओंकी अर्चना नहीं कर पाते। इसलिये मानवके परमधर्ममें भी परम मानव ही उपास्य हैं। वे- 'गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम्'। वे ही 'भगवान् गूढ़ः कपटमानुषः'। वे ही अन्य श्रुति मन्त्रके 'रसो वै सः' अर्थात् रसस्वरूप हैं। क्लीवत्वमें कभी ४६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

२/५ ]

भी रस नहीं है। पुरुषोत्तममें ही रस है और वह प्राकृत रस नहीं है, अप्राकृत रस-परम रस है। जिसके विषयमें गीता (२/५९) में कहा गया है— “रसवर्जं रसोऽपस्य परं दृष्ट्वा निवर्त्तते॥” “परम रस प्राप्त करके क्षुद्र प्राकृत रससमूह विलुप्त हो जाते हैं।” ‘परमात्मा’—वे परम रसस्वरूप भगवत्-वस्तुका आंशिक प्रकाश हैं; वे जीवान्तर्यामी तत्त्व मात्र हैं। व्यष्टि अथवा समष्टि अन्तर्यामीके मध्य मानवताके चरम विकासकी सभी आकाङ्क्षाएँ तृप्त नहीं हो सकती। ‘भगवान्’—चतुर्भुज नारायणके चार हाथ हैं, परन्तु वे तुरीय वस्तुका सन्धान देनेपर भी मानवके परम धर्मकी समस्त विश्रम्भ सेवाकी चमत्कारिता प्रकाश नहीं कर सकते। अर्द्ध-मानव और अर्द्ध-सिंह जो नित्य वैकुण्ठ-अवतीर्ण नृसिंह-मूर्ति प्रकाश करते हैं, उनकी लीलाके द्वारा वैकुण्ठ वस्तुका अचिन्त्य शक्तित्व प्रकाशित होनेपर भी उनके द्वारा भी मानव धर्मके पूर्णतम विकासकी बात नहीं देखी जाती। तत्पश्चात् जब क्षुद्र (बौने) मानवरूपमें वामनदेवने आत्मप्रकाश करके तीन पग भूमिकी भिक्षा माँगी, तब बलिने अतिमर्त्य लीलापुरुषोत्तमको अनुग्रह प्रार्थी क्षुद्र मानव ही समझा। परन्तु वामनदेवने अपना त्रिविक्रमरूप प्रकाशकर उसका समस्त राज्य मापकर अपनी त्रिपाद विभूतिका प्रकाश मात्र किया। तथाकथित सभ्यताके अभिमानमें क्षत्रिय-धर्मका अपव्यवहार करके सनातन ब्रह्मण्य-धर्म विष्णुभक्तिको विनाश करनेकी चेष्टा उदित होनेपर असभ्य-मानवरूपी श्रीपरशुरामादि भगवत्-आवेशावतार प्रकाशित होते हैं। इसके द्वारा सनातन धर्मकी कथञ्चित् प्रतिष्ठा होनेपर भी मानवके परम धर्मकी आकाङ्क्षा पूर्ण नहीं होती है। असभ्य नरावस्थाके बाद आदर्श सभ्य मानव और आदर्श क्षत्रिय-राजरूपी भगवान् श्रीरामचन्द्रने अवतीर्ण होकर मानवके नैतिक धर्मकी अकाङ्क्षाकी तृप्ति की। परन्तु मानवके परम नैतिक धर्मका अर्थात् स्वराट् लीलापुरुषोत्तमका अथवा निरङ्कुश स्वेच्छाचारिताका सुसमन्वय जिस आदर्शमें पूर्णतमरूपमें अभिव्यक्त होता है, वह उस समय प्रकाशित नहीं हुआ। मानव-चरित्रकी समग्रता जिन मानवरूपी स्वराट् लीलापुरुषोत्तमके चरित्रमें सम्यक् रूपसे प्रकाशित होती है, वे अप्राकृतिक परमतत्त्व अखिलरसामृतमूर्ति मनुष्यलिङ्ग परब्रह्म व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही मानवके परमधर्मका विषय होकर नित्य विराजित हैं। परममुक्त आत्माकी सर्वाङ्गीण सेवावृत्तिका अभिसार दर्शन करके जो परमपुरुष आत्म-प्रकाश करते हैं, वे सर्वकारण-कारण द्विभुज मुरलीधर, श्रीराधानाथ श्यामसुन्दर हैं। वे जिस प्रकार परम विषय हैं, उनकी परमा शक्ति भी उसी प्रकार ही परम आश्रय हैं। “देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता। सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः सम्मोहिनी परा॥” (बृहद्गौतमीयतन्त्र) “परदेवता राधिका देवी ‘साक्षात् कृष्णमयी’, ‘सर्वलक्ष्मीमयी’, ‘सर्वकान्ति’, ‘कृष्णसम्मोहिनी’ और ‘पराशक्ति’ कही गयी हैं।” वे परम विषय और परम आश्रय लीलास्वादनके लिये एक होकर भी दो रूप प्रकाश करते हैं और फिर दोनों मिलित होकर श्रीकृष्णचैतन्य रूप प्रकाश करते हैं॥५॥

दूसरा अध्याय | ४७