भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 79

१/९१-९४ ] “नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम्॥” अर्थात् “समस्त प्रकारकी कर्म-वासनाओंसे रहित होनेपर भी मोक्षकी प्राप्तिका साक्षात् साधन-निर्मल ब्रह्मज्ञान यदि भगवान् श्रीहरिकी भक्तिसे रहित हो, तो वह भी शोभा नहीं देता। इसलिये जो साधन और सिद्धि दोनों ही अवस्थाओंमें सदा ही अमङ्गलस्वरूप तथा दुःखप्रद हैं, वे काम्य कर्म और यहाँ तक कि निष्काम कर्म भी यदि भगवान्‌को अर्पण नहीं किये गये हों, तो वे कर्म भी कैसे सुशोभित हो सकते हैं? इसका कारण है कि वे भगवत्-सेवा और सत्त्व-शुद्धिके भावसे रहित होते हैं।” और भागवत (१/६/३६)— “यमादिभिर्योगपथैः कामलोभहतो मुहुः। मुकुन्दसेवया यद्वत् तथाद्धात्मा न शाम्यति॥” अर्थात् “निरन्तर काम-लोभादि रूप शत्रुओंके वशीभूत अशान्त मन भगवान् श्रीमुकुन्दकी सेवाके द्वारा जिस प्रकारसे प्रत्यक्ष शान्तिका अनुभव करता है, यम-नियमादिसे युक्त अष्टाङ्गयोग-मार्गका अवलम्बन करनेसे वह वैसा शान्त नहीं हो पाता॥”९१॥ तार मध्ये मोक्षवाञ्छा कैतवप्रधान। याहा हैते कृष्णभक्ति हय अन्तर्धान॥९२॥ अनुवाद—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन सबमेंसे मोक्षकी कामना प्रधान कैतव है, क्योंकि इसके द्वारा श्रीकृष्णभक्ति लुप्त हो जाती है॥९२॥ उक्त श्लोककी श्रीधरस्वामिकृत भावार्थदीपिकामें— “प्र-शब्देन मोक्षाभिसन्धिरपि कैतवं निरस्तं” इति॥९३॥ अनुवाद—‘प्र’ शब्दका अभिप्राय मोक्षकी इच्छारूपी कैतवके परित्यागसे है॥९३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उनमेंसे मुक्तिवाञ्छा ही प्रधान कैतव है। इसलिये श्रीधरस्वामिपादके अनुसार भी प्र-शब्दका तात्पर्य मोक्षके अभिसन्धिरूप कैतवसे रहित होना है॥९२-९३॥ कृष्णभक्तिर बाधक—यत शुभाशुभ कर्म। सेह एक जीवेर अज्ञानतमो-धर्म॥९४॥ अनुवाद—श्रीकृष्णभक्तिके पथमें बाधा उत्पन्न करनेवाले जितने भी शुभ अर्थात् सांसारिक सुख अथवा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाले पुण्य कार्य अथवा अशुभ अर्थात् निकृष्ट योनि और नरक प्राप्त करानेवाले पाप कार्य हैं, वे जीवके अज्ञानरूपी अन्धकार (तमोगुणी-धर्म) के कारण हैं॥९४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु, ये दो भाई सूर्य और चन्द्रके समान हैं। वे दोनों उदित होकर जीवोंके हृदयके अन्धकारको दूर करते हैं। इन पद्योंका तात्पर्य यही है कि जीव चित्स्वरूप तत्त्व है। श्रीकृष्ण-भक्ति और श्रीकृष्ण-प्रेम ही जीवका स्वधर्म (स्वरूपगत-धर्म) है। शुभकर्म (पुण्य), अशुभकर्म (पाप) और मोक्षकी कामना—ये मिलकर पहला अध्याय | ३७