श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगया है। इस प्रकार चैतन्यचरितामृतके अनेक वाक्य उद्धृत करके दिखाया जा सकता है कि ज्ञानयोगियों अथवा राजयोगियोंके द्वारा प्राप्य मुक्ति श्रीचैतन्यचरितामृत और श्रीमन्महाप्रभुका मत नहीं है। श्रीमन्महाप्रभुका मत श्रीमद्भागवतमें लिपिबद्ध है। श्रीमन्महाप्रभुने उस भागवत-प्रतिपाद्य भक्तिका ही प्रचार किया। महाप्रभुका मत कहकर अन्य जो कोई भी मत प्रचारित हैं अथवा भविष्यमें होंगे, वे पाषण्ड कल्पित मतवाद मात्र ही जानने होंगे॥९०॥ श्रीमद्भागवत (१/१/२)— धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्। श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किंवापरैरीश्वरः सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ ९१ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह श्रीमद्भागवत ग्रन्थ सर्वप्रथम महामुनि श्रीनारायणके द्वारा चतुःश्लोकी (अर्थात् चार श्लोकों) के रूपमें निर्मित है। इसमें निर्मत्सर अर्थात् सब जीवोंके प्रति दयालु व्यक्तियोंके लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तक कैतवसे शून्य अर्थात् छलरहित परमधर्मकी व्याख्या हुई है। यह धर्म जीवके त्रितापका नाश करनेवाला, शिवद अर्थात् मङ्गल प्रदान करनेवाला और वास्तव-वस्तुके तत्त्व-ज्ञानको प्रदान करनेवाला है। इसको श्रवण करनेके इच्छुक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार ईश्वरको अपने हृदयमें अवरुद्ध करनेमें समर्थ होते हैं। इसलिये श्रीमद्भागवतके अतिरिक्त अन्य किसी शास्त्रकी क्या आवश्यकता है?॥९१॥ अनुभाष्य—महामुनिकृते (श्रीनारायणमहामुनिरचिते) अत्र श्रीमद् भागवते (श्रीमति शोभामये भागवते) प्रोज्झितकैतवः (प्रकर्षेण उज्झितं निरस्तं कैतवं धर्मार्थकाममोक्षात्मकं फलाभिसन्धिलक्षणं कपटं यस्मिन् सः केवल भगवत्सेवालक्षणः) सतां (हरिजानानां) निर्मत्सराणां (कामक्रोधलोभमोहमदमत्सरशून्यानां) परमः (श्रेष्ठ, कर्मज्ञानशास्त्रनिरासपरत्वात्) धर्मः [वर्णितः] अत्र (श्रीमद्भागवते) तापत्रयोन्मूलनं (आध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविक- पापविनाशकं) शिवदं (मङ्गलप्रदं) वास्तवं (शश्वत् पारमार्थिकम् अद्वयं) वस्तु वेद्यम्। अत्र (श्रीमद्भागवते) शुश्रूषुभि (श्रोतुमिच्छद्भिः) कृतिभिः (सुकृतिवद्भिः) हृदि तत्क्षणात् सद्यः (कालव्यवधानरहितः) ईश्वरः अवरुद्ध्यते। श्लोक-भावानुवाद—(काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्य आदिसे रहित) हरिजनोंके लिये श्रीनारायण महामुनिके द्वारा रचित, सम्पूर्ण रूपसे कैतव (अर्थात् धर्म-अर्थ-काम-मोक्षादि फलरूपी कपट) से शून्य, (केवल भगवत्सेवारूपी, कर्म-ज्ञान-शास्त्रकी अपेक्षा नहीं रखनेवाले) श्रेष्ठ धर्मका वर्णन इस (श्रीमती राधिकाकी महिमासे शोभित) श्रीमद्भागवतमें हुआ है। यह आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक, इन तीन तापों और इनके मूल पापोंका विनाशकर मङ्गलप्रदाता एवं शाश्वत् पारमार्थिक अद्वयज्ञान वस्तुके तत्त्वज्ञानको प्रदान करनेवाला है। इस श्रीमद्भागवतके श्रवणकी इच्छा करनेवाले सुकृतिवान् भक्तके हृदयमें तत्क्षणात् भगवान् बँध जाते हैं॥९१॥ अमृतानुकणिका—भागवतका प्रतिपाद्य विषय 'निरस्त-कुहक' है। वही भागवतके प्रथम और द्वितीय श्लोकमें ग्रथित है। भागवतके निम्नलिखित श्लोकोंकी आलोचना करनेसे भी सारग्राही व्यक्तिको ज्ञानयोग और राजयोगकी तुच्छता उपलब्ध होगी। भागवत (१/५/१२)—