श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१/८५-९० ] चन्द्रमाओंकी ज्योतिसे स्निग्ध है। करोड़ों सूर्योंकी अपेक्षा उज्ज्वल होनेपर भी उसमें सूर्यके तेजके समान ज्वाला नहीं है, अपितु करोड़ों चन्द्रमाओंकी अपेक्षा भी स्निग्ध है, यही तात्पर्य है॥८५-८६॥ श्रीकृष्णचैतन्य आर प्रभु नित्यानन्द। याँहार प्रकाशे सर्व जगत आनन्द॥८७॥ अनुवाद—उन श्रीकृष्णचैतन्य और श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रकट होनेसे सारे विश्वमें आनन्द छा गया है॥८७॥ 'तमोनुदौ' और 'शन्दौ' :— सूर्यचन्द्र हरे यैछे सब अन्धकार। वस्तु प्रकाशिया करे धर्मेर प्रचार॥८८॥ अहैतुकी दयाका निर्देश :— एइ मत दुइ भाइ जीवेर अज्ञान। तमोनाश करि' करे वस्तु-तत्त्वज्ञान॥८९॥ अनुवाद—जिस प्रकार सूर्य और चन्द्र समस्त अन्धकारको दूर करके वस्तुओंको प्रकाशितकर उनके धर्म (रूप-गुणादि) को प्रकट करते हैं, उसी प्रकार इन दोनों भाइयोंने भी जीवोंके अज्ञानरूपी अन्धकारका विनाशकर उन्हें परमतत्त्वका ज्ञान दिया है॥८८-८९॥ कैतवका अर्थ :— अज्ञान-तमेर नाम कहिये 'कैतव'। धर्म-अर्थ-काम-वाञ्छा आदि एइ सब॥९०॥ अनुवाद—अज्ञानरूपी अन्धकारका ही दूसरा नाम 'कैतव' (कपट) है। (अपने भोगके लिये) धर्म, अर्थ, कामादि ही अज्ञानरूपी अन्धकार है॥९०॥ अमृताणुकणिका—धर्मका तात्पर्य यहाँ वर्णाश्रम-धर्म, माता-पिताकी सेवा, गुरुजनोंकी सेवा, सत्य बोलना, दानादि है। इस धर्मके पालनका फल अर्थकी प्राप्ति है; अर्थका तात्पर्य धन-सम्पत्ति और देहके सुखके लिये जो भी वस्तुएँ हैं। इस अर्थसे जितनी प्रकारकी सांसारिक कामनाएँ हैं, वे पूर्ण होंगी; इसे काम कहते हैं। तब काम पुनः धर्मके पालनमें प्रवृत्त करेगा, जिससे अर्थकी निरन्तर प्राप्ति होती रहे और कामनाओंकी पूर्ति अबाध रूपसे होती रहे। इस प्रकार इन तीनोंका चक्र चलता रहता है, जिसे 'त्रिवर्ग' कहते हैं। यह एक ऐसा चक्रव्यूह है, जिससे कोई निकल नहीं सकता। जिधरसे भी प्रयास करें, पुनः इसमें फंस जायेंगे; यह दलदलसे निकलनेकी चेष्टाके समान है। कोई सौभाग्यवान् जीव किसीके सङ्गसे निकल जाते हैं, किन्तु मुक्तिरूपी अर्थमें फंस जाते हैं। मुक्ति चार पुरुषार्थोंमें एक अर्थ है, परन्तु यह परमार्थका एक अंशमात्र है। यह अन्तिम लक्ष्य नहीं है, अपितु यहाँसे परमार्थका प्रारम्भ होता है। यथार्थ परमार्थ मार्ग तो श्रीकृष्णभक्ति है, जिसे पञ्चम पुरुषार्थ कहते हैं। धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूपी पुरुषार्थोंको ही जीवनका परम लक्ष्य मानना अज्ञानरूपी अन्धकार है और इसे ही कैतव कहा पहला अध्याय | ३५