भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ १/८२-८६

भक्त आदि क्रमे कैल सबार वन्दन। ए-सबार वन्दन सर्वशुमेर कारण॥८२॥ अनुवाद—(अब तक) मैंने भगवान्‌के भक्त, शक्ति, अवतार, प्रकाशादिकी क्रमानुसार वन्दना की है। इन सबकी वन्दना समस्त शुभोंका कारण है॥८२॥ प्रथम श्लोके सामान्य मङ्गलाचरण। द्वितीय श्लोकेते करि विशेष वन्दन॥८३॥ अनुवाद—प्रथम श्लोकमें सामान्य-मङ्गलाचरण किया है और द्वितीय श्लोकमें विशेष वन्दना की है॥८३॥ प्रथम चौदह श्लोकोंमेंसे द्वितीय श्लोककी व्याख्या :— वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्दौ सहोदितौ। गौड़ोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ शन्दौ तमोनुदौ॥८४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उदयाचलरूप गौड़देशमें युगपत् सूर्य-चन्द्र-स्वरूप आश्चर्यजनक रूपमें उदित, मङ्गलदाता, जीवोंके अन्धकारविनाशी श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्दकी मैं वन्दना करता हूँ॥८४॥ अनुभाष्य—गौड़ोदये (गौड़देशः एव उदयाचलः तस्मिन्) सहोदितौ (एककाले उदयं प्राप्तौ) पुष्पवन्तौ (युगपत् दिवाकरनिशाकरौ, अतः) चित्रौ (आश्चर्यौ) शन्दौ (कल्याणप्रदौ) तमोनुदौ (अन्धकारविनाशकौ) श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्दौ [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—गौड़देशके उदयाचलपर एक साथ सूर्य एवं चन्द्ररूपमें आश्चर्यजनक रूपसे जगत्‌का कल्याण तथा अन्धकारका विनाशके लिये उदित हुए श्रीकृष्णचैतन्य एवं श्रीनित्यानन्द प्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥८४॥ सूर्य-चन्द्रके साथ दोनों भाइयोंकी उपमाकी सार्थकता :— व्रजे ये विहरे पूर्वे कृष्ण-बलराम। कोटीसूर्यचन्द्र जिनि दोंहार निजधाम॥८५॥ ‘गौड़ोदये पुष्पवन्तौ’ :— सेइ दुइ जगतेरे हइये सदय। गौड़देशे पूर्व-शैले करिल उदय॥८६॥ अनुवाद—जो श्रीकृष्ण-बलराम पहले व्रजमें विचरण करते थे और जिनकी अङ्गकान्ति करोड़ों सूर्य एवं चन्द्रमाओंको पराभूत करती है, वही दोनों जगत्‌के प्रति कृपालु होकर गौड़देशके उदयाचल (पूर्वी क्षितिज) पर उदित हुए हैं॥८५-८६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘निजधाम’—ज्योति (प्रकाश), ‘पूर्वशैले’—गौड़रूप उदयाचलमें गङ्गाके पूर्वतटपर॥८५-८६॥ अमृताणुकणिका—दोनोंकी अङ्गकान्ति करोड़ों सूर्योंकी ज्योतिसे भी उज्ज्वल और करोड़ों

३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत