श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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श्लोक-भावानुवाद-जब मूलरूपके विलक्षण अङ्गोंके सन्निवेशवाला, अपने मूलरूपके समान शक्तिसम्पन्न और विशेष लीलामें कुछ गुणों एवं रूपमें अधिक भी हो, तो उसे ‘विलास’ कहते हैं॥७७॥ यैछे बलदेव, परव्योमे नारायण। यैछे वासुदेव प्रद्युम्नादि सङ्कर्षण॥७८॥ अनुवाद-जैसे [वृन्दावन और द्वारकामें] श्रीबलदेव प्रभु, वैकुण्ठमें श्रीनारायण और चतुर्व्यूह [श्रीवासुदेव, श्रीसङ्कर्षण, श्रीप्रद्युम्न और श्रीअनिरुद्धादि] भगवान् श्रीकृष्णकी विलासमूर्ति हैं॥७८॥ अनुभाष्य-श्रीबलदेव श्रीकृष्णके स्वयं प्रकाश हैं और श्रीनारायण उनके प्राभवविलास हैं॥७८॥ ईशशक्ति :- ईश्वरेर शक्ति हय त्रिविध प्रकार। एक लक्ष्मीगण, पुरे महिषीगण आर॥७९॥ व्रजे गोपीगण आर सबाते प्रधान। व्रजेन्द्रनन्दन यां'ते स्वयं भगवान्॥८०॥ अनुवाद-ईश्वरकी शक्तियाँ तीन प्रकारकी हैं-वैकुण्ठमें लक्ष्मियाँ, द्वारकामें महिषियाँ और व्रजमें गोपियाँ। व्रजकी गोपियाँ ही इनमें सबसे श्रेष्ठ हैं, क्योंकि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं॥७९-८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘यद्यपि आमार गुरु’ (संख्या ४४) से लेकर ‘साधकगण आर’ (संख्या ६४) तक-गुरु और भक्त, इन दो तत्त्वोंका विचार हुआ है। ‘ईश्वरेर अवतार’ (संख्या ६५) से लेकर ‘पृथु व्यासमुनि’ (संख्या ६७) तक-भगवान् और भगवत्-अवतारका विचार हुआ है। ‘दुईरूपे हय’ (संख्या ६८) से ‘प्रद्युम्नादि-सङ्कर्षण’ (संख्या ७८) तक-उनके ‘प्रकाश’ और ‘विलास’ का विचार हुआ है। उसके बाद ‘ईश्वरेर शक्ति हय’ (संख्या ७९) से ‘स्वयं भगवान्’ (संख्या ८०) तक उनकी शक्तिका विचार किया गया॥४४-८०॥ स्वयंरूप कृष्णेर कायव्यूह-ताँर सम। भक्त सहिते हय ताँहार आवरण॥८१॥ अनुवाद-स्वयंरूप श्रीकृष्णके कायव्यूह उनके ही समान हैं। वे भक्तोंसे सदा परिवेष्टित रहते हैं, इसलिये भक्त उनका आवरण हैं॥८१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘स्वयंरूप’, ‘तदेकात्म’ आदि भागवतामृतके श्लोकोंके विचारसे द्विभुज श्रीकृष्ण ही स्वयंरूप हैं। उनके कायव्यूह उनके समान हैं। कायव्यूहका अर्थ होता है, अपनी कायाका विस्तार। उसी स्वरूपके निकट जो भक्त होते हैं, वे ही उनका आवरण हैं। आवरण और वेष्टित (आवृत)-तत्त्वका एक साथ विचार करनेसे पूर्वोक्त छह तत्त्वोंका एकत्व ही निर्धारित होता है। इस प्रकारका निर्धारण केवल अचिन्त्य-भेदाभेदतत्त्व-विचारसे ही सिद्ध होता है॥८१॥
पहला अध्याय | ३३