भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 80

[ १/९४-१०० सभी जीवोंमें (विकृत) स्वधर्मके रूपमें प्रवेशकर उन्हें तमो-धर्ममय कर रहे हैं। कर्म और ज्ञानके प्रतिपादक समस्त उपदेश ही कैतव अर्थात् छल हैं, इसलिये वे तमोधर्मके अन्तर्गत हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रकट होनेसे पहले यह तमोधर्म जीवोंके हृदयको दूषित कर रहा था। दोनों भाइयोंने जगत्में अवतरित होकर जीवोंके अन्तःकरणसे उस तमोधर्मको दूर करके वास्तव वस्तु-तत्त्वका प्रकाश किया है॥९४॥ निताइ-गौरकी कृपाका फल :- ताँहार प्रसादे एइ तमो हय नाश। तमो नाश करि' करे तत्त्वेर प्रकाश॥९५॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपासे इस अन्धकारका विनाश होता है और उन्होंने अन्धकारका विनाश करके वास्तविक तत्त्वका प्रकाश किया है॥९५॥ तत्त्ववस्तुका परिचय :- तत्त्ववस्तु—कृष्ण, कृष्णभक्ति, प्रेमरूप। नाम-सङ्कीर्त्तन—सर्व आनन्दस्वरूप॥९६॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण ही एकमात्र तत्त्ववस्तु हैं, उनकी भक्ति प्रेमस्वरूपा है और भगवान्के नामोंका सङ्कीर्त्तन उसे प्राप्त करानेवाला है, ये तीनों ही समस्त आनन्दस्वरूप हैं॥९६॥ सूर्य-चन्द्रकी अपेक्षा उनकी अधिक कल्याणकारिता :- सूर्य चन्द्र बाहिरेर तमः से विनाशे। बहिर्वस्तु घट-पट-आदि से प्रकाशे॥९७॥ दुइ भाइ हृदयेर क्षालि' अन्धकार। दुइ भागवत-सङ्गे करान साक्षात्कार॥९८॥ अनुवाद—सूर्य और चन्द्र तो केवलमात्र बाहरी अन्धकारको दूरकर बाहरी जागतिक वस्तुओं जैसे देह-वस्त्रादिको ही प्रकाशित करते हैं, परन्तु श्रीगौर-नित्यानन्द नामक ये दो भाई हृदयके आन्तरिक अन्धकारका विनाशकर दोनों भागवतोंका साक्षात्कार करा देते हैं॥९७-९८॥ एक भागवत बड़—भागवत शास्त्र। आर भागवत—भक्त भक्ति-रस-पात्र॥९९॥ दुइ भागवत द्वारा दिया भक्तिरस। ताँहार हृदये ताँर प्रेमे हय वश॥१००॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९९-१००॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भागवत-शास्त्र (ग्रन्थ श्रीमद्भागवतम्) रूपी एक भागवत हैं और दूसरे भागवत भक्त हैं, जो भक्तिरसके पात्र अर्थात् हृदयमें भक्तिरसको धारण करनेवाले हैं। श्रीगौर-नित्यानन्द जीवोंको इन दोनोंके साक्षात्कारके द्वारा भक्तिरस प्रदान करवाकर स्वयं उनके प्रेमके वशीभूत हो जाते हैं॥९९-१००॥ अमृताणुकणिका—'भक्त भक्ति-रस-पात्र'—प्रेमाभक्तिको ही जो परम पुरुषार्थ मानते हैं, ऐसे ३८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत