भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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भक्तिरस-रसिक भक्तोंको ही यहाँ भागवत कहा गया है। ऐसे भक्तोंके सङ्गके प्रभावसे ही हृदयमें भक्तिका बीज अङ्कुरित होता है। कर्मी और ज्ञानी आदि लोग भी आनुषङ्गिक भावसे भक्तिका अनुष्ठान करते हैं, किन्तु वे भक्तिको परम-पुरुषार्थ नहीं मानते। भक्तिका आस्वादन उनके लिये लोभनीय नहीं हैं और भक्ति उनके हृदयमें रसरूपमें परिणत नहीं हो पाती, इसलिये वे भक्तिरसपात्र नहीं हैं। इसलिये इस पयारमें 'भागवत' शब्द कर्मी-ज्ञानी आदि लोगोंके लिये अभिप्रेत नहीं है॥९९-१००॥ एक अद्भुत समकाले दोँहार प्रकाश। आर अद्भुत-चित्तगुहार तमः करे नाश॥१०१॥ अनुवाद-सूर्य और चन्द्ररूपी श्रीगौर और श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनों एक ही साथ प्रकट हुए हैं, यह एक आश्चर्य है और दूसरी अद्भुत बात यह है कि वे हृदयकी गहराइयोंमें छिपे अज्ञानरूपी अन्धकारका भी नाश करते हैं॥१०१॥ एइ चन्द्र सूर्य दुइ परम सदय। जगतेर भाग्ये गौड़े करिल उदय॥१०२॥ अनुवाद-ये दोनों चन्द्र और सूर्य, अत्यन्त दयामय हैं और जगत्वासियोंके सौभाग्यवश गौड़देशमें उदित हुए हैं॥१०२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'जगतेर भाग्ये' अर्थात् उन्हीं दो भाइयोंके द्वारा प्रचारित प्रेमधर्म क्रमशः इस जगत्में सर्वत्र व्याप्त होगा, यही इस जगत्का भाग्य है। 'गौड़े'-मल्लदह जिलाके अन्तर्गत प्राचीन गौड़नगरसे सेनवंशीय राजा अपना राजसिंहासन श्रीनवद्वीपमण्डलमें ले आये थे, इसलिये श्रीनवद्वीपमण्डलको गौड़भूमि कहा जाता है। उसी गौड़में गङ्गाके पूर्वतटमें श्रीमन्महाप्रभुने जन्म ग्रहण किया था और श्रीनित्यानन्द प्रभु वहाँ आकर मिलित होकर उदित हुए थे॥१०२॥ सेइ दुइ प्रभुर करि चरण-वन्दन। याँहा हइते विघ्ननाश, अभीष्टपूरण॥१०३॥ अनुवाद-इन दोनों प्रभुओंके श्रीचरणोंकी मैं वन्दना करता हूँ, जो समस्त विघ्नोंका नाश और मनोभीष्टको पूर्ण करनेवाले हैं॥१०३॥ एइ दुइ श्लोके कैल मङ्गल-वन्दन। तृतीय श्लोकेर अर्थ शुन सर्वजन॥१०४॥ अनुवाद-इन दो श्लोकोंके द्वारा मैंने मङ्गलकारी वन्दना की। अब सब लोग कृपापूर्वक तृतीय श्लोकका अर्थ श्रवण करें॥१०४॥ वक्तव्य-बाहुल्य, ग्रन्थ-विस्तारेर डरे। विस्तारे ना वर्णि, सारार्थ कहि अल्पाक्षरे॥१०५॥ अनुवाद-वर्णन करने योग्य बहुत कुछ होनेपर भी ग्रन्थ-विस्तारके भयसे मैं विस्तृत वर्णन नहीं करके संक्षेपमें केवल सारार्थ ही प्रस्तुत कर रहा हूँ॥१०५॥