श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १/१०६-१०९ अनादिकालसे व्यवहारसिद्ध प्राचीन स्वशास्त्रकी उक्ति :- “मितञ्च सारञ्च वचो हि वाग्मिता” इति ॥१०६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अल्प शब्दोंमें सारवाक्यकी उक्तिको ‘वाग्मिता’ कहा जाता है॥१०६॥ अनुभाष्य—मितञ्च (प्रजल्परहितं प्रयोजनमात्रं) सारञ्च (उद्देशकं) वचः हि वाग्मिता (वाक्पटुता)। श्लोक-भावानुवाद—प्रजल्परहित केवल प्रयोजनको लक्ष्य करनेवाले सार वचनको ही वाक्पटुता कहते हैं॥१०६॥ शुनिले खण्डिबे चित्तेर अज्ञानादि दोष। कृष्णे गाढ़ प्रेम हबे, पाइबे सन्तोष॥१०७॥ अनुवाद—इसको (श्रद्धापूर्वक) श्रवण करनेसे हृदयकी अज्ञानता आदि समस्त दोष नष्ट हो जायेंगे और श्रीकृष्णमें गाढ़ प्रेम होगा तथा हृदयको शान्ति मिलेगी॥१०७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—“कृष्णे गाढ़ प्रेम हबे” के स्थानपर किसी-किसी अन्य संस्करणमें “सर्वतत्त्व ज्ञान हइबे” पाया जाता है॥१०७॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये प्रथम परिच्छेद। पहले अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य—महाभारतके उद्योगपर्वमें ४३/१६ श्लोकमें बारह प्रकारके दोषोंका और विष्णुपुराणमें अठारह प्रकारके दोषोंका उल्लेख किया गया। स्वरूपकी दुर्ज्ञेयताके कारण ये पाँच प्रकारके अज्ञान हैं— (१) अज्ञान—जड़शरीरमें ‘मैं’ की बुद्धि; (२) विपर्यास—जड़वस्तुओंके भोक्ताका अभिमान; (३) भेद—द्वितीयाभिनिवेश (श्रीकृष्णसेवाको त्यागकर देह सम्बन्धी कार्योंमें अभिनिवेश); (४) भय और विरूप ग्रहण तथा (५) शोक॥१०७॥ इति अनुभाष्ये प्रथम परिच्छेद। पहले अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। अमृतानुकणिका—विष्णुयामलमें अठारह दोषोंका वर्णन इस प्रकार है—(१) मोह, (२) तन्द्रा, (३) भ्रम, (४) रुक्षरसता अर्थात् प्रेम-सम्बन्धके बिना भी राग, (५) उत्कट-काम (दुःखप्रद लौकिक काम), (६) चञ्चलता, (७) मद, (८) मात्सर्य (दूसरोंका उत्कर्ष सहन करनेमें अक्षमता), (९) हिंसा, (१०) खेद, (११) परिश्रम, (१२) असत्य बोलना, (१३) क्रोध, (१४) प्रबल आकाङ्क्षा, (१५) आशङ्का, (१६) विश्वविभ्रम अर्थात् विश्वपालनेच्छा-आवेश, (१७) विषमता और (१८) पराक्षेपा॥१०७॥ ग्रन्थमें वर्णनीय विषय :- श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत-महत्त्व। ताँर भक्त-भक्ति-नाम-प्रेम-रसतत्त्व॥१०८॥ भिन्न भिन्न लिखियाछि करिया विचार। शुनिले जानिबे सब वस्तुतत्त्वसार॥१०९॥ ४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत