श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
भक्तिरस-रसिक भक्तोंको ही यहाँ भागवत कहा गया है। ऐसे भक्तोंके सङ्गके प्रभावसे ही हृदयमें भक्तिका बीज अङ्कुरित होता है। कर्मी और ज्ञानी आदि लोग भी आनुषङ्गिक भावसे भक्तिका अनुष्ठान करते हैं, किन्तु वे भक्तिको परम-पुरुषार्थ नहीं मानते। भक्तिका आस्वादन उनके लिये लोभनीय नहीं हैं और भक्ति उनके हृदयमें रसरूपमें परिणत नहीं हो पाती, इसलिये वे भक्तिरसपात्र नहीं हैं। इसलिये इस पयारमें 'भागवत' शब्द कर्मी-ज्ञानी आदि लोगोंके लिये अभिप्रेत नहीं है॥९९-१००॥ एक अद्भुत समकाले दोँहार प्रकाश। आर अद्भुत-चित्तगुहार तमः करे नाश॥१०१॥ अनुवाद-सूर्य और चन्द्ररूपी श्रीगौर और श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनों एक ही साथ प्रकट हुए हैं, यह एक आश्चर्य है और दूसरी अद्भुत बात यह है कि वे हृदयकी गहराइयोंमें छिपे अज्ञानरूपी अन्धकारका भी नाश करते हैं॥१०१॥ एइ चन्द्र सूर्य दुइ परम सदय। जगतेर भाग्ये गौड़े करिल उदय॥१०२॥ अनुवाद-ये दोनों चन्द्र और सूर्य, अत्यन्त दयामय हैं और जगत्वासियोंके सौभाग्यवश गौड़देशमें उदित हुए हैं॥१०२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'जगतेर भाग्ये' अर्थात् उन्हीं दो भाइयोंके द्वारा प्रचारित प्रेमधर्म क्रमशः इस जगत्में सर्वत्र व्याप्त होगा, यही इस जगत्का भाग्य है। 'गौड़े'-मल्लदह जिलाके अन्तर्गत प्राचीन गौड़नगरसे सेनवंशीय राजा अपना राजसिंहासन श्रीनवद्वीपमण्डलमें ले आये थे, इसलिये श्रीनवद्वीपमण्डलको गौड़भूमि कहा जाता है। उसी गौड़में गङ्गाके पूर्वतटमें श्रीमन्महाप्रभुने जन्म ग्रहण किया था और श्रीनित्यानन्द प्रभु वहाँ आकर मिलित होकर उदित हुए थे॥१०२॥ सेइ दुइ प्रभुर करि चरण-वन्दन। याँहा हइते विघ्ननाश, अभीष्टपूरण॥१०३॥ अनुवाद-इन दोनों प्रभुओंके श्रीचरणोंकी मैं वन्दना करता हूँ, जो समस्त विघ्नोंका नाश और मनोभीष्टको पूर्ण करनेवाले हैं॥१०३॥ एइ दुइ श्लोके कैल मङ्गल-वन्दन। तृतीय श्लोकेर अर्थ शुन सर्वजन॥१०४॥ अनुवाद-इन दो श्लोकोंके द्वारा मैंने मङ्गलकारी वन्दना की। अब सब लोग कृपापूर्वक तृतीय श्लोकका अर्थ श्रवण करें॥१०४॥ वक्तव्य-बाहुल्य, ग्रन्थ-विस्तारेर डरे। विस्तारे ना वर्णि, सारार्थ कहि अल्पाक्षरे॥१०५॥ अनुवाद-वर्णन करने योग्य बहुत कुछ होनेपर भी ग्रन्थ-विस्तारके भयसे मैं विस्तृत वर्णन नहीं करके संक्षेपमें केवल सारार्थ ही प्रस्तुत कर रहा हूँ॥१०५॥
[ १/१०६-१०९ अनादिकालसे व्यवहारसिद्ध प्राचीन स्वशास्त्रकी उक्ति :- “मितञ्च सारञ्च वचो हि वाग्मिता” इति ॥१०६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अल्प शब्दोंमें सारवाक्यकी उक्तिको ‘वाग्मिता’ कहा जाता है॥१०६॥ अनुभाष्य—मितञ्च (प्रजल्परहितं प्रयोजनमात्रं) सारञ्च (उद्देशकं) वचः हि वाग्मिता (वाक्पटुता)। श्लोक-भावानुवाद—प्रजल्परहित केवल प्रयोजनको लक्ष्य करनेवाले सार वचनको ही वाक्पटुता कहते हैं॥१०६॥ शुनिले खण्डिबे चित्तेर अज्ञानादि दोष। कृष्णे गाढ़ प्रेम हबे, पाइबे सन्तोष॥१०७॥ अनुवाद—इसको (श्रद्धापूर्वक) श्रवण करनेसे हृदयकी अज्ञानता आदि समस्त दोष नष्ट हो जायेंगे और श्रीकृष्णमें गाढ़ प्रेम होगा तथा हृदयको शान्ति मिलेगी॥१०७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—“कृष्णे गाढ़ प्रेम हबे” के स्थानपर किसी-किसी अन्य संस्करणमें “सर्वतत्त्व ज्ञान हइबे” पाया जाता है॥१०७॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये प्रथम परिच्छेद। पहले अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य—महाभारतके उद्योगपर्वमें ४३/१६ श्लोकमें बारह प्रकारके दोषोंका और विष्णुपुराणमें अठारह प्रकारके दोषोंका उल्लेख किया गया। स्वरूपकी दुर्ज्ञेयताके कारण ये पाँच प्रकारके अज्ञान हैं— (१) अज्ञान—जड़शरीरमें ‘मैं’ की बुद्धि; (२) विपर्यास—जड़वस्तुओंके भोक्ताका अभिमान; (३) भेद—द्वितीयाभिनिवेश (श्रीकृष्णसेवाको त्यागकर देह सम्बन्धी कार्योंमें अभिनिवेश); (४) भय और विरूप ग्रहण तथा (५) शोक॥१०७॥ इति अनुभाष्ये प्रथम परिच्छेद। पहले अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। अमृतानुकणिका—विष्णुयामलमें अठारह दोषोंका वर्णन इस प्रकार है—(१) मोह, (२) तन्द्रा, (३) भ्रम, (४) रुक्षरसता अर्थात् प्रेम-सम्बन्धके बिना भी राग, (५) उत्कट-काम (दुःखप्रद लौकिक काम), (६) चञ्चलता, (७) मद, (८) मात्सर्य (दूसरोंका उत्कर्ष सहन करनेमें अक्षमता), (९) हिंसा, (१०) खेद, (११) परिश्रम, (१२) असत्य बोलना, (१३) क्रोध, (१४) प्रबल आकाङ्क्षा, (१५) आशङ्का, (१६) विश्वविभ्रम अर्थात् विश्वपालनेच्छा-आवेश, (१७) विषमता और (१८) पराक्षेपा॥१०७॥ ग्रन्थमें वर्णनीय विषय :- श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत-महत्त्व। ताँर भक्त-भक्ति-नाम-प्रेम-रसतत्त्व॥१०८॥ भिन्न भिन्न लिखियाछि करिया विचार। शुनिले जानिबे सब वस्तुतत्त्वसार॥१०९॥ ४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
१/१०८-११० ] अनुवाद-मैं श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्यकी महिमा और उनके भक्तों, भगवद्भक्ति, भगवन्नाम, प्रेम एवं रसतत्त्वका पृथक्-पृथक् विचारपूर्वक वर्णन करूँगा, जिसे श्रवण करनेसे समस्त वस्तुतत्त्वके सारका ज्ञान हो जायेगा ॥ १०८-१०९ ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ ११० ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिषण्डे गुर्वादि-वन्दन-मङ्गलाचरणं नाम प्रथमः परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ ११० ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिषण्डमें गुरु आदिका वन्दन-मङ्गलाचरण नामक पहले अध्यायका अनुवाद समाप्त। पहला अध्याय | ४१
नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिना- मात्मास्यधीशाखिललोकसाक्षी। नारायणोऽङ्गं नरभू-जलायना- त्तच्चापि सत्यं न तवैव माया॥
दूसरा अध्याय दूसरे अध्यायका कथासार— इस दूसरे अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभुका श्रीकृष्णके साथ एकत्व प्रकाशित करते हुए ब्रह्मको उनकी अङ्गज्योति और परमात्माको उनका अंश प्रमाणित किया है। श्रीकृष्णको पुरुषावतारोंका और समस्त जीवोंका परम आश्रय प्रमाणित करके उनका मूल नारायण होना स्थापित करते हुए श्रीकृष्णके स्वरूप और उनकी तीन प्रकारकी शक्तियोंके ज्ञानको जाननेकी आवश्यकतापर बल दिया गया है। श्रीकृष्णके स्वरूपके प्राभव-वैभव भेदसे दो प्रकारके प्रकाश, अंश-शक्त्यावेश भेदसे दो प्रकारके अवतार और बाल्य-पौगण्ड अवस्था भेदसे दो प्रकारादि लीलाओंका वर्णनकर किशोरस्वरूप श्रीकृष्ण स्वयं अवतारी हैं, यह सिद्धान्त स्थापित किया गया है। चित्शक्तिका वैभव वैकुण्ठादि लोक, मायाशक्तिका वैभव अनन्त ब्रह्माण्ड और जीवशक्तिका वैभव अनन्त जीव हैं, यह भी दिखलाया गया है। श्रीकृष्णचैतन्य ही सर्वकारणोंके कारण, सभीके आदि (मूल) और स्वयं अनादि नित्य-सच्चिदानन्द विग्रह साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र हैं, यह स्थिर किया है। भक्तिमें दृढ़ता लानेके लिये सभी भक्तोंको श्रीकृष्णका स्वरूपज्ञान, उनकी तीन शक्तियोंका ज्ञान और विलासज्ञानरूप सम्बन्धज्ञान होना आवश्यक है, यह भी सिद्ध किया गया है। (अमृतप्रवाह भाष्य) भक्तिसिद्धान्त-विचारसे श्रीगौरवन्दना :— श्रीचैतन्यप्रभुं वन्दे बालोऽपि यदनुग्रहात्। तरेत्रानामतग्राहव्याप्तं सिद्धान्तसागरम्॥ १॥ अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य— जिनकी कृपासे अज्ञ व्यक्ति भी नाना प्रकारके मतवादरूपी मगरमच्छादिसे परिपूर्ण सिद्धान्त-समुद्रको अनायास ही पार कर जाता है, उन श्रीचैतन्य महाप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १॥ अनुभाष्य— यदनुग्रहात् (यस्य कृपया) बालोऽपि (अनभिज्ञोऽर्भकोऽपि) नानामतग्राहव्याप्तं (औलूक्यजिन-बुद्ध- जैमिनि-पतञ्जलि-गौतम-कणाद-कपिल-शङ्कर-दत्तात्रेय-कथित-मिथो-विवदमान-नक्रमकर-प्रतिम-जड़स्वार्थ- सङ्कुल-मतवादपूर्णं) सिद्धान्तसागरं (विचारसमुद्रं) तरेत् (तेषां सङ्कीर्णमतवादानि तृणीकृत्य अमलं कृष्णचरणं जानाति) [तं] श्रीचैतन्यप्रभुं [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद— जिनकी कृपासे अनभिज्ञ बालक भी (औलूक्य और जैन दर्शन एवं बुद्ध-जैमिनि-पतञ्जलि-गौतम-कणाद-कपिल-शङ्कराचार्य-दत्तात्रेयके द्वारा प्रचारित परस्पर विरोधी, जड़स्वार्थसे व्याप्त मतरूपी) मगरमच्छोंसे परिपूर्ण विचारसमुद्रसे तर जाता है अर्थात् उनके विभिन्न मतोंको तुच्छ मानकर अमल श्रीकृष्णके चरणोंको जीवनका लक्ष्य जान जाता है, उन श्रीचैतन्यप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १॥
[ २/२-४ श्रीकृष्णकीर्त्तनके लिये श्रीचैतन्यकी दया भिक्षा :- कृष्णोत्कीर्त्तन-गान-नर्त्तनकला-पाथोजनि-भ्राजिता सद्भक्तावलि-हंस-चक्र-मधुपश्रेणी-विहारास्पदम्। कर्णानन्दि-कलध्वनिर्वहतु मे जिह्वा-मरुप्राङ्गणे श्रीचैतन्यदयानिधे तव लसल्लीलासुधास्वर्धुनी ॥ २ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे दयाके समुद्र श्रीचैतन्यदेव! श्रीकृष्ण विषयक उच्च स्वरसे कीर्त्तन-गीत-नृत्यादि कमलोंसे सुशोभित और हंस-चक्रवाक-भ्रमररूपी सभी साधुभक्तोंका विहार-स्थान एवं सभीके कानोंको आनन्द प्रदान करनेवाले जलस्रोतकी भाँति मधुर कलकल ध्वनिरूप आपकी देदीप्यमान् लीलामृत-भागीरथी मेरी मरुस्थलरूपी जिह्वापर निरन्तर बहती रहे॥२॥ अनुभाष्य-हे दयानिधे श्रीचैतन्य! कृष्णोत्कीर्त्तनगाननर्त्तन-कलापाथोजनि-भ्राजिता (कृष्णस्य नामरूपगुण- लीलादीनां उत्कीर्त्तनम् उच्चैर्भाषणं गानं नर्त्तनञ्च तद्रूपाः कलाः ता एव पाथोजनीनि पद्मानि तैर्भ्राजिता शोभिता) सद्भक्तावलि-हंसचक्र-मधुपश्रेणीविहारास्पदं (हंसचक्रवाक-भ्रमरश्रेणीभेदप्रतिमानां भाव-भेदावस्थितानां सद्भक्तावलीनां शुद्धभक्तवृन्दानां विहारास्पदं विलासक्षेत्रं, यस्यां लीलायां शुद्धभक्तवृन्दानां परमामोदो भवतीति भावः) कर्णानन्दिकलध्वनिः (कर्णानन्दी भक्तानां कर्णरसायनः कलध्वनिः हंसचक्रवाक-भ्रमरोपम-हरिजनैः गीत-हरिलीला-प्रवाहाणामस्फुटमधुरनिनादः) [एवम्भूता] तव लसल्लीलासुधास्वर्धुनी (लसती दीव्यती गौरलीलारूपामृतमयी स्वर्धुनी स्वर्गङ्गा मन्दाकिनी) मे (मम) जिह्वामरु-प्राङ्गणे (गौरलीलारसास्वादवञ्चिते रसवर्जिते जिह्वारूपे नीवृति) वहतु। श्लोक-भावानुवाद-हे दयाके भण्डार श्रीचैतन्य! श्रीकृष्णका उच्च स्वरसे नाम-रूप-गुण- लीलादिका कीर्त्तन-गान-नर्तन कलारूपी कमलोंसे सुशोभित, हंस-चक्रवाक-भ्रमरादि विविध प्राणियोंके समान भिन्न-भिन्न भावोंवाले शुद्धभक्तोंका विलासक्षेत्र अर्थात् आपकी जिस लीलामें शुद्धभक्तोंको परमानन्द प्राप्त होता है अथवा हंस-चक्रवाक-भ्रमर सदृश हरिजनोंके द्वारा गान की गयी हरिलीला जलप्रवाहकी मधुर कलकल ध्वनिके समान भक्तोंके लिये कर्णरसायन अर्थात् उनके कानोंको आनन्द प्रदान करनेवाली है, इस प्रकारकी उपरोक्त तीन विशेषणोंसे शोभित गौरलीलारूप अमृतमयी मन्दाकिनी मेरी (गौरलीलाके रसास्वादनसे वञ्चित) मरुभूमि सदृश जिह्वारूपी राज्यमें बहती रहे॥२॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥३॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव की जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥३॥ प्रथम चौदह श्लोकोंमेंसे तीसरे श्लोककी व्याख्या; वस्तु निर्देश :- तृतीय श्लोकेर अर्थ करि विवरण। वस्तु-निर्देशरूप मङ्गलाचरण॥४॥ अनुवाद-अब मैं तृतीय श्लोककी व्याख्या कर रहा हूँ जिसके द्वारा वस्तु-निर्देश (ग्रन्थके प्रतिपाद्य विषय) के रूपमें मङ्गलाचरण किया गया है॥४॥ ४४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
२/५ ] यदद्वैतं ब्रह्मोपनिषदि तदप्यस्य तनुभा य आत्मान्तर्यामी पुरुष इति सोऽस्यांशविभवः। षडैश्वर्यैः पूर्णो य इह भगवान् स स्वयमयं न चैतन्यात् कृष्णाज्जगति परतत्त्वं परमिह॥५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उपनिषदोंमें जिनको अद्वैत ब्रह्म कहा जाता है, वे मेरे प्रभुकी अङ्गकान्ति हैं। जिनको योगशास्त्रोंमें अन्तर्यामी पुरुष या परमात्मा कहते हैं, वे मेरे प्रभुके अंशस्वरूप हैं। जिनको ब्रह्म और परमात्माका आश्रय एवं अंशिस्वरूप षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् कहा जाता है, मेरे प्रभु वे स्वयं-भगवान् हैं। इसलिये श्रीकृष्णचैतन्यकी अपेक्षा जगत्में और कोई परतत्त्व नहीं है॥५॥ अनुभाष्य—उपनिषदि (ब्रह्मविद्याभिधान-सर्वोन्नत-वेदशाखाविशेषे, उप-नि-पूर्वकस्य विशरणगत्यवसादनाथर्स्य षद्लृधातोः क्विप् प्रत्ययान्तस्येदं—तत्र, उप उपगम्य गुरूपदेशाल्लब्धेति यावत्। उपस्थितत्वाद्व्रह्मविद्यां निश्चयेन तन्निष्ठतया ये दृष्टानुश्रविक-विषय-वितृष्णाः सन्तः तेषां संसारबीजस्य सद् विशरणकर्त्री शिथिलयित्री अवसादयित्री विनाशयित्री ब्रह्मगमयित्रीति तत्र) यद् अद्वैतं (द्वितीयरहितं) ब्रह्म [अभिधीयते] तदपि अस्य (गौरकृष्णस्य) तनुभा (अप्राकृतदेहस्य कान्तिः); यः आत्मा (परमात्मा सर्वजीवादि-नियन्ता) अन्तर्यामी पुरुषः सोऽस्य अंशविभवः (ऐश्वर्यस्यान्यतमः विभुत्वविशेषः); इह (अस्मिन् तत्त्वविचारे) यः षडैश्वर्यैः (षड्भिः समग्रैश्वर्यवीर्ययशःश्रीज्ञानवैराग्यैः ऐश्वर्यैः प्रभुत्वैः) पूर्णः (अपेक्षाशून्यः परिपूर्णः) सः अयं श्रीकृष्णचैतन्यः स्वयं भगवान्; इह (जगति तत्त्वविचारे कलौ वा) चैतन्यात् कृष्णात् (कृष्ण-चैतन्यात्) परं (अन्यत्) परतत्त्वं (श्रेष्ठाश्रयः) न (नास्तीत्यर्थः)। [ज्ञानशास्त्रप्रयोजनं ब्रह्मवस्तु, तथा योगशास्त्रलक्ष्यः परमात्मा भगवता सह तत्त्वसाम्येऽपि अधिकारोचित-दृष्टिभेदेन भगवद्विग्रहस्य चित्-प्रभांशरूपपुटद्वयमात्रम्, न तु सम्पूर्ण-सविशेष-शक्तिमत् स्वयं वस्तु यथा भगवान्]। श्लोक-भावानुवाद—उपनिषद् (ब्रह्मविद्या नामक सर्वोत्तम विद्या विशेष)—इसकी व्युत्पत्ति उप और नि उपसर्गपूर्वक विशरण (शिथिल), गति, अवसाद (विनाश) अर्थपरक षद्लृ धातुके अन्तमें क्विप् प्रत्यय लगानेसे हुई है। इस व्युत्पत्तिमें 'उप' शब्दका अर्थ है—गुरुके निकट जाकर उनसे उपदेश प्राप्त करना। गुरुके निकट उपस्थित होनेसे ब्रह्मविद्याको निश्चयपूर्वक अर्थात् निष्ठापूर्वक जाना जाता है। दृष्टानुश्रविक—दृष्ट अर्थात् इन्द्रियोंके द्वारा गोचर तथा आनुश्रविक अर्थात् अनुभव करनेवाले—जो इन दोनों प्रकारकी विषयतृष्णासे वैराग्य प्राप्त करना चाहते हैं, उपनिषद् उनके संसार बीजका सद्विशरण अर्थात् उसे शिथिल करनेवाली, अवसाद अर्थात् विनाश करनेवाली, गति अर्थात् ब्रह्मको प्राप्त करवाने वाली ब्रह्मविद्या है। जिसे अद्वैत ब्रह्म कहते हैं, वह भी श्रीगौरकृष्णकी अप्राकृत देहकी कान्ति है; जो सब जीवोंके नियन्ता परमात्मा हैं, वे उनके ऐश्वर्यके एक अंश सर्वव्यापकता गुणसे युक्त अंश विशेष हैं; इस तत्त्वविचारमें छह प्रकारके ऐश्वर्यों अर्थात् समस्त वैभव, बल, यश, सौन्दर्य, ज्ञान और वैराग्यसे स्वयं परिपूर्ण (किसी अन्यकी अपेक्षा ना रखते हुए) वे यही श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं-भगवान् हैं अर्थात् इस जगत्में तत्त्व विचारसे अथवा कलिकालमें श्रीकृष्णचैतन्यसे श्रेष्ठ अन्य कोई आश्रय नहीं है (यह अर्थ है) [ज्ञानशास्त्रोंका प्रयोजन ब्रह्म है, योगशास्त्रोंका प्रयोजन परमात्मा है। तत्त्वकी दृष्टिसे यद्यपि ब्रह्म और परमात्माका भगवान्से साम्य है, तथापि अधिकारकी दृष्टिसे वे क्रमशः दूसरा अध्याय | ४५
[ २/५ भगवत्-विग्रहकी अङ्गकान्ति और अंशरूप दो प्रकाशमात्र हैं। वे सम्पूर्ण-सविशेष-शक्तिमान् स्वयं वस्तु अर्थात् भगवान् नहीं हैं]। इस श्लोकके साथ श्रील जीवगोस्वामीकृत तत्त्वसन्दर्भमें संख्या आठमें प्रदत्त श्लोक विचारणीय है— “यस्य ब्रह्मेति संज्ञां क्वचिदपि निगमे याति चिन्मात्रसत्ताप्यंशो यस्यांशकैः स्वैर्विभवति वशयन्नेव मायां पुमांश्च। एकं यस्यैव रूपं विलसति परमव्योम्नि नारायणाख्यं, स श्रीकृष्णो विधत्ते स्वयमिह भगवान् प्रेम तत्पाद-भाजाम्॥” अर्थात् “जिनकी चिन्मात्र-सत्ताको वेद किसी-किसी स्थानपर 'ब्रह्म' नामसे वर्णन करते हैं, जिनके एक अंश माया-नियन्ता 'पुरुष' अपने अंश (लीलावतार और गुणावतार) रूपोंमें वैभव प्रकाश करते हैं और जिनके एक रूप 'श्रीनारायण' नामसे परव्योममें विलास करते हैं, वे स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण अपने चरणकमलोंका भजन करनेवाले भक्तोंको प्रेम प्रदान करें।” सच्चिदानन्द भगवान्के सर्वदा आनन्दप्रद दर्शनसे वञ्चित रहकर जो उन चिन्मयलीलायुक्त तत्त्ववस्तुकी केवल सम्वित्-वृत्तिका अवलम्बन करते हैं, उन्हें ब्रह्मका ही दर्शन होता है और जो केवल उनकी सत्-चित्वृत्तिका अवलम्बन करते हैं, वे परमात्माका ही दर्शन करते हैं। इसलिये सच्चिदानन्द लीलावियह भगवान्की चिन्मय अङ्गकी ज्योति ही चित्-विलासहीन-निराकार -मायारहित ब्रह्म और उनके ऐश्वर्यकी अंश विभूति ही परमात्मा हैं॥५॥ अमृताणुकणिका—परम-सम्बन्ध निर्णयमें अखिल-रसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण और उनकी ही औदार्य-मूर्ति श्रीचैतन्य निर्णीत हुए हैं। श्रीकृष्णके अतिरिक्त ब्रह्म, परमात्मा और किम्वा भगवान्के अन्य किसी भी अवतारमें समस्त रसोंका एकत्र युगपत् समावेश नहीं देखा जाता। श्रीचैतन्यदेव और श्रीकृष्ण एक ही अभिन्न वस्तु हैं और वे ही परतत्त्व हैं। इस जगत्में आरोह अथवा अधिरोह पथसे क्रमसे श्रेष्ठताके विचारसे ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्की अनुभूतिका पार्थक्य लक्षित होता है। बहिरङ्गा शक्तिके रहित-विचारसे अर्थात् नेति-नेति विचारसे 'ब्रह्म', तटस्थाशक्तिके सहित-विचारसे अर्थात् जीवोंके अन्तर्यामी विचारसे 'परमात्मा' और अन्तरङ्गा अथवा स्वरूपशक्तिके सहित-विचारसे वैकुण्ठविग्रह अधोक्षज 'भगवान्'का ज्ञान होता है। 'ब्रह्म'- ब्रह्ममें परब्रह्मका क्लीवत्व और निर्विशेष भाव मात्र प्रकाशित है। केवल क्लीव अथवा स्त्री (शक्ति)की उपासनासे मानवताका चरम विकास और आकाङ्क्षा परितृप्त नहीं होती। जहाँ अप्राकृत पुरुष और अप्राकृत प्रकृति एक साथ अर्थात् जहाँ चित्-लीला-युगलकी सेवा है, वहीं मानवका धर्म पूर्ण है। क्लीवत्व (ब्रह्म) सायुज्य लाभको 'मानवका परम धर्म' ना कहकर उसे चेतनताकी बन्धन-योग्य-वृत्ति अथवा चेतनताकी आत्महत्याका आराध्य धर्म कहा जा सकता है। ब्रह्म और जीवमें चेतनताके गुणका साम्य है, इसलिये श्रुतिमें “अहं ब्रह्मास्मि" मन्त्रका तात्पर्य यह है कि समजातीय ना होनेपर उपासना सुष्ठु रूपसे नहीं हो सकती। इसलिये स्मृति-शास्त्रमें देखा जाता है- “नादेवो देवमर्चयेत्" अर्थात् जो देवता नहीं हैं अर्थात् जिनमें देवताओंके समान गुण नहीं हैं, वे देवताओंकी अर्चना नहीं कर पाते। इसलिये मानवके परमधर्ममें भी परम मानव ही उपास्य हैं। वे- 'गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम्'। वे ही 'भगवान् गूढ़ः कपटमानुषः'। वे ही अन्य श्रुति मन्त्रके 'रसो वै सः' अर्थात् रसस्वरूप हैं। क्लीवत्वमें कभी ४६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
२/५ ]
भी रस नहीं है। पुरुषोत्तममें ही रस है और वह प्राकृत रस नहीं है, अप्राकृत रस-परम रस है। जिसके विषयमें गीता (२/५९) में कहा गया है— “रसवर्जं रसोऽपस्य परं दृष्ट्वा निवर्त्तते॥” “परम रस प्राप्त करके क्षुद्र प्राकृत रससमूह विलुप्त हो जाते हैं।” ‘परमात्मा’—वे परम रसस्वरूप भगवत्-वस्तुका आंशिक प्रकाश हैं; वे जीवान्तर्यामी तत्त्व मात्र हैं। व्यष्टि अथवा समष्टि अन्तर्यामीके मध्य मानवताके चरम विकासकी सभी आकाङ्क्षाएँ तृप्त नहीं हो सकती। ‘भगवान्’—चतुर्भुज नारायणके चार हाथ हैं, परन्तु वे तुरीय वस्तुका सन्धान देनेपर भी मानवके परम धर्मकी समस्त विश्रम्भ सेवाकी चमत्कारिता प्रकाश नहीं कर सकते। अर्द्ध-मानव और अर्द्ध-सिंह जो नित्य वैकुण्ठ-अवतीर्ण नृसिंह-मूर्ति प्रकाश करते हैं, उनकी लीलाके द्वारा वैकुण्ठ वस्तुका अचिन्त्य शक्तित्व प्रकाशित होनेपर भी उनके द्वारा भी मानव धर्मके पूर्णतम विकासकी बात नहीं देखी जाती। तत्पश्चात् जब क्षुद्र (बौने) मानवरूपमें वामनदेवने आत्मप्रकाश करके तीन पग भूमिकी भिक्षा माँगी, तब बलिने अतिमर्त्य लीलापुरुषोत्तमको अनुग्रह प्रार्थी क्षुद्र मानव ही समझा। परन्तु वामनदेवने अपना त्रिविक्रमरूप प्रकाशकर उसका समस्त राज्य मापकर अपनी त्रिपाद विभूतिका प्रकाश मात्र किया। तथाकथित सभ्यताके अभिमानमें क्षत्रिय-धर्मका अपव्यवहार करके सनातन ब्रह्मण्य-धर्म विष्णुभक्तिको विनाश करनेकी चेष्टा उदित होनेपर असभ्य-मानवरूपी श्रीपरशुरामादि भगवत्-आवेशावतार प्रकाशित होते हैं। इसके द्वारा सनातन धर्मकी कथञ्चित् प्रतिष्ठा होनेपर भी मानवके परम धर्मकी आकाङ्क्षा पूर्ण नहीं होती है। असभ्य नरावस्थाके बाद आदर्श सभ्य मानव और आदर्श क्षत्रिय-राजरूपी भगवान् श्रीरामचन्द्रने अवतीर्ण होकर मानवके नैतिक धर्मकी अकाङ्क्षाकी तृप्ति की। परन्तु मानवके परम नैतिक धर्मका अर्थात् स्वराट् लीलापुरुषोत्तमका अथवा निरङ्कुश स्वेच्छाचारिताका सुसमन्वय जिस आदर्शमें पूर्णतमरूपमें अभिव्यक्त होता है, वह उस समय प्रकाशित नहीं हुआ। मानव-चरित्रकी समग्रता जिन मानवरूपी स्वराट् लीलापुरुषोत्तमके चरित्रमें सम्यक् रूपसे प्रकाशित होती है, वे अप्राकृतिक परमतत्त्व अखिलरसामृतमूर्ति मनुष्यलिङ्ग परब्रह्म व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही मानवके परमधर्मका विषय होकर नित्य विराजित हैं। परममुक्त आत्माकी सर्वाङ्गीण सेवावृत्तिका अभिसार दर्शन करके जो परमपुरुष आत्म-प्रकाश करते हैं, वे सर्वकारण-कारण द्विभुज मुरलीधर, श्रीराधानाथ श्यामसुन्दर हैं। वे जिस प्रकार परम विषय हैं, उनकी परमा शक्ति भी उसी प्रकार ही परम आश्रय हैं। “देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता। सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः सम्मोहिनी परा॥” (बृहद्गौतमीयतन्त्र) “परदेवता राधिका देवी ‘साक्षात् कृष्णमयी’, ‘सर्वलक्ष्मीमयी’, ‘सर्वकान्ति’, ‘कृष्णसम्मोहिनी’ और ‘पराशक्ति’ कही गयी हैं।” वे परम विषय और परम आश्रय लीलास्वादनके लिये एक होकर भी दो रूप प्रकाश करते हैं और फिर दोनों मिलित होकर श्रीकृष्णचैतन्य रूप प्रकाश करते हैं॥५॥
दूसरा अध्याय | ४७
[ २/६-९ तत्त्ववस्तुका विचार :- ब्रह्म, आत्मा, भगवान्-अनुवाद तिन। अङ्गप्रभा, अंश, स्वरूप-तिन विधेय-चिह्न॥६॥ अनुवाद आगे, पाछे विधेय स्थापन। सेइ अर्थ कहि, शुन शास्त्रविवरण॥७॥ श्रीकृष्ण और श्रीचैतन्यतत्त्व :- स्वयं भगवान् कृष्ण, विष्णु-परतत्त्व। पूर्णज्ञान पूर्णानन्द परम महत्त्व॥८॥ 'नन्दसुत' बलि' याँरे भागवते गाइ। सेइ कृष्ण अवतीर्ण चैतन्यगोसाञि॥९॥ अनुवाद-ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्-ये तीन 'अनुवाद' हैं। अङ्गकान्ति, अंश और स्वरूप-ये तीन 'विधेय' के चिह्न हैं। पहले 'अनुवाद' और बादमें 'विधेय' की स्थापना करते हुए मैं उनके शास्त्र-सम्मत अर्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ। समस्त ज्ञानसे परिपूर्ण, अखिल आनन्दमूर्ति और सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय-वस्तु स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही विष्णुत्तत्त्वमें परतत्त्व हैं। जिनको श्रीमद्भागवतमें 'नन्दनन्दन' कहा गया है, वही श्रीकृष्ण श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं॥६-९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अलङ्कार शास्त्रके अनुसार पहले 'अनुवाद' (ज्ञात विषय) कहनेके बाद 'विधेय' (अज्ञात विषय) कहा जाता है। वेदादि शास्त्रोंमें स्थान-स्थानपर ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्, इन तीन विषयोंका उल्लेख रहनेके कारण वे भली-भाँति ज्ञात तत्त्व हैं; इसलिये इनको 'अनुवाद' के रूपमें जानना होगा। श्रीकृष्ण-चैतन्यकी अङ्गकान्ति जो ब्रह्म, अंश जो परमात्मा और स्वरूप जो स्वयं-भगवान् हैं-यह विषय अभीतक ज्ञात नहीं है। इसलिये इन तीन अनुवादोंको सबसे पहले कहकर शास्त्रोंके अर्थका विचार करते हुए विधेयका निर्णय करेंगे। शास्त्र-सिद्धान्त यह कि विष्णुत्तत्त्वमें परतत्त्व स्वयं भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र हैं। श्रीमद्भागवतमें नन्दसुत (नन्दनन्दन) कहकर जिनका गुणगान सुना जाता है, वे ही श्रीकृष्ण-चैतन्य रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। इसलिये श्रीकृष्ण और श्रीचैतन्य सम्पूर्ण रूपसे अभिन्न हैं, यह मैं विचारपूर्वक उल्लेख करूँगा। ब्रह्म, परमात्मा और स्वयं भगवान् कहनेसे उसी परतत्त्व-वस्तुके तीन प्रकाशोंको ही लक्षित किया जाता है, इसलिये मैं ऐसा कह सकता हूँ कि ये तीनों श्रीचैतन्यके प्रकाश-विशेष हैं॥६-९॥ अमृताणुकणिका-श्रीकृष्ण स्वयंसिद्ध भगवान् भी हैं और वे नन्दसुत भी हैं। श्रुतियाँ उन्हें रस स्वरूप कहती हैं-“रसो वै सः”। रस शब्दके दो अर्थ होते हैं-आस्वाद्य 'रस' और रस-आस्वादक 'रसिक'। वे रस-रूपमें आस्वाद्य हैं और रसिक-रूपमें वे आस्वादक हैं। वे लीलारसका आस्वादन करते हैं, श्रुति भी उनको लीला-पुरुषोत्तम कहती हैं-“कृष्णोवै परमं दैवतम्” (गोपालतापनी)। दिव् धातुका अर्थ क्रीड़ा अथवा लीला है। अनादि कालसे वे लीला पुरुषोत्तम हैं। किन्तु लीला अथवा क्रीड़ा अकेले नहीं हो सकती, उसके लिये लीलाके ४८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
२/६-१० ]
सङ्गियोंकी आवश्यकता है। श्रीकृष्ण अनादिकालसे ही लीलारसका आस्वादन कर रहे हैं, इसलिये यह सहजमें ही समझा जा सकता है कि उनके लीलासङ्गी और लीला-परिकर अनादिकालसे ही उनके साथ हैं। श्रीकृष्ण पूर्ण, अन्य-निरपेक्ष और आत्माराम हैं, परन्तु उनके लीलाके परिकर श्रीकृष्णसे स्वतन्त्र नहीं हैं। वे उनके अंश अथवा शक्ति हैं। अनादिकालसे श्रीकृष्णने अंश अथवा शक्तिसे लीला-परिकर-रूपमें स्वयंको प्रकट किया हुआ है। श्रीकृष्ण दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन चार भावोंके परिकरोंके साथ चार भावोंके रसका आस्वादन करते हैं। वात्सल्य रसके आस्वादनके लिये पिता-माताका प्रयोजन है, इसलिये श्रीकृष्णकी शक्ति ही अनादिकालसे पिता-माता (नन्द और यशोदा) के रूपमें एक-एक स्वरूपमें विराजित हैं। स्वरूपतः नन्द-यशोदासे श्रीकृष्णका जन्म नहीं हुआ है। तो भी प्रेमके प्रभावसे श्रीकृष्ण ये मानते हैं कि नन्द-यशोदा ही उनके पिता-माता हैं और वे श्रीकृष्णका अपना पुत्र मानते हैं। इसलिये श्रीकृष्णको नन्दसुत अथवा यशोदासुत कहा जाता है॥६-९॥
ब्रह्म, परमात्मा और भगवत् विचार :- प्रकाशविशेषे तेंह धरे तिन नाम। ब्रह्म, परमात्मा आर स्वयं भगवान्॥१०॥
अनुवाद—(श्रीकृष्ण अथवा श्रीचैतन्य महाप्रभुके) ये प्रकाश-विशेष ब्रह्म, परमात्मा और स्वयं-भगवान्, इन तीन नामोंसे जाने जाते हैं॥१०॥
**अनुभाष्य—**श्रील जीवगोस्वामी श्रीभगवत्सन्दर्भ (संख्या-३) में लिखते हैं— “तथा चैवं वैशिष्ट्ये प्राप्ते पूर्णाविर्भावत्वेनाखण्ड-तत्त्वरूपोऽसौ भगवान्। ब्रह्म तु स्फुटमप्रकटित-वैशिष्ट्याकारत्वेन तस्यैवासम्यगाविर्भावः। ‘संभर्त्तेति तथा भर्त्ता भकारोऽर्थद्वयान्वितः। नेता गमयिता स्रष्टा गकारार्थस्तथा मुने॥ वसन्ति तत्र भूतानि भूतात्मन्यखिलात्मनि। स च भूतेष्वशेषेषु वकारार्थस्ततोऽव्ययः॥ ज्ञानशक्ति-बलैश्वर्य-वीर्यतेजांस्य-शेषतः। भगवच्छब्दवाच्यानि विना हेयैर्गुणादिभिः॥’ संभर्त्ता स्वभक्तानां पोषकः। भर्त्ता धारकः स्थापकः। नेता स्वभक्तिफलस्य प्रेम्णः प्रापकः। गमयिता स्वलोक-प्रापकः। स्रष्टा स्वभक्तेषु तत्तद्गुणस्योद्गमयिता।” (संख्या-४)में— “स्वयमहेतुः स्वरूपशक्त्यैकविलासस्यत्वेन तत्रोदासीनमपि प्रकृतिजीवप्रवर्त्तकावस्थ-परमात्मापरपर्याय-स्वांशलक्षण-पुरुषद्वारा यदस्य सर्गस्थित्यादिहेतुर्भवति तद्भगवद्रूपं विद्धि। ××येन हेतुकर्ता आत्मांशभूत-जीव-प्रवेशनद्वारा सञ्जीवितानि सन्ति, देहादीनि तदुपलक्षणानि प्रधानादि-सर्वाण्येव तत्त्वानि येनैव प्रेरितायैव चरन्ति स्व-स्व-कार्ये प्रवर्त्तन्ते, तत्परमात्मरूपं विद्धि। जीवस्य आत्मत्वं तदपेक्षया तस्य परमत्वं इत्यतः परमात्मशब्देन तत्सहयोगी स एव व्यज्यते। यदेव तत्तत्त्वं स्वप्नादौ अन्वयेन स्थितं, यच्च तद्वहिः शुद्धायां जीवाख्यशक्तौ तथा स्थितं, चकारात् ततः परत्रापि व्यतिरेकेण स्थितं स्वयमवशिष्टं तद्ब्रह्मरूपं विद्धि।”
अर्थात् “सभी शक्तियोंसे समन्वित पूर्ण आविर्भावके कारण भगवान् अखण्ड-तत्त्वरूप हैं। और ब्रह्ममें उस प्रकार विशेष आकार (रूप-गुण-लीला) प्रकाशित नहीं होनेके कारण ब्रह्म भगवान्का आंशिक आविर्भाव मात्र हैं। हे मुनिवर! भगवत्-शब्दके प्रथम अक्षर ‘भ’ के दो अर्थ हैं—संभर्त्ता और भर्त्ता। ‘ग’ के अर्थ नेता, गमयिता और स्रष्टा हैं। प्राणीगण भूतात्मा (परमात्मा) में वास करते हैं और वे अविनाशीपुरुष (परमात्मा) भी सभी प्राणियोंके भीतर वास करते हैं—यह ‘व’ अक्षरका अर्थ है। हेय मायिक गुणोंसे रहित तथा सम्पूर्ण ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेजको धारण करनेवाले भगवान् कहलाते हैं। ‘संभर्त्ता’ शब्दका अर्थ
दूसरा अध्याय | ४९
[ २/१०-११ है—अपने भक्तोंके पालनकर्त्ता। 'भर्त्ता' का अर्थ है धारक या स्थापक। 'नेता' शब्दका अर्थ है अपनी भक्तिके फल प्रेमको प्रदान करनेवाले। 'गमयिता' का अर्थ है अपना धाम प्रदान करनेवाले। 'स्रष्टा' शब्दका अर्थ—अपने भक्तोंमें उपरोक्त वर्णित गुणोंके सृष्टिकर्त्ता। जो स्वयं कारणरहित हैं, एकमात्र स्वरूपशक्तिके द्वारा लीलाविलासमें रत हैं, संसारसे सम्पूर्ण उदासीन होनेपर भी प्रकृति और जीवके प्रवर्तकरूपमें अपने स्वांश पुरुषके द्वारा संसारके जन्म, स्थिति आदिके मूल कारण हैं, उन्हीं तत्त्वको ही भगवत्-तत्त्व जानना होगा। जो जगत्के कारणरूप कर्त्ता हैं, जगत्में अपने अंश अर्थात् चित्कण जीवोंको प्रवेश करवाकर जगत्को सञ्जीवित करते हैं और देहादि-उपलक्षण एवं प्रधानादि तत्त्व जिनके द्वारा प्रेरित होकर अपनी-अपनी स्थितिमें रहकर कार्यमें प्रवृत्त होते हैं, उन्हें परमात्मा जानना होगा। जीव भी स्वरूपतः आत्मा है, परन्तु जीवसे अधिक श्रेष्ठ होनेके कारण वे परम-आत्मा कहलाते हैं। वे जीवके नित्य सहयोगीके रूपमें प्रकाशित होते हैं। जो तत्त्व स्वप्न, जाग्रत और सुषुप्ति (गाढ़निद्रा)—इन तीनों अवस्थाओंमें अन्वयरूपमें स्थित रहता है और जो अपनेसे भिन्न स्वरूप शुद्ध जीव-नामक शक्तिमें भी अन्वयरूपसे अवस्थान करता है और समाधि अवस्थामें जो विशेषणरहित-निर्विशेष अर्थात् चिन्मय-सत्तामात्रसे प्रकाशित होता है, उसको ही ब्रह्म जानना होगा॥"१०॥ श्रीमद्भागवत (१/२/११)— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥११॥ अनुवाद—जो अद्वयज्ञान अर्थात् एक अद्वितीय वास्तव वस्तु है, उसीको तत्त्वज्ञानीजन परमार्थ कहते हैं। वही तत्त्ववस्तु ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—इन तीनों नामोंसे जानी जाती है॥११॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तत्त्वको जाननेवाले विज्ञगण अद्वयज्ञानको तत्त्व कहते हैं। उसी अद्वयज्ञानकी प्रथम प्रतीति ब्रह्म, द्वितीय प्रतीति परमात्मा और तृतीय प्रतीति भगवान् हैं॥११॥ अनुभाष्य—शौनकादि ऋषियोंने शुकदेवजीके शिष्य सूत गोस्वामीजीसे छह प्रश्न किये थे। 'शास्त्रका सारतत्त्व क्या है?' इस द्वितीय प्रश्नके उत्तरमें सूत गोस्वामीजीने यह श्लोक कहा— तत्त्वविदः (तत्त्वज्ञाः) तत् [एव] तत्त्वम् अद्वयं ज्ञानं (चिदेकरूपं) वदन्ति। यत् [अद्वयज्ञानं क्वचित्] ब्रह्म इति, [क्वचित्] परमात्मा इति, [क्वचित्] भगवान् इति च शब्द्यते (अभिधीयते; अयमर्थः—केवलज्ञानवृत्त्या अद्वयज्ञानरूपं ब्रह्म, सच्चिद्वृत्त्या अद्वयज्ञानरूपः परमात्मा, सच्चिदानन्दवृत्त्या तदद्वयज्ञानरूपो भगवान्)। श्लोक-भावानुवाद—तत्त्वको भली-भाँति जाननेवाले उस तत्त्वको अद्वयज्ञान (अद्वितीय चित्-रूप) कहते हैं। (उस अद्वय ज्ञानको शास्त्र कहीं) ब्रह्म, (कहीं) परमात्मा, (और कहीं) भगवान् नामसे कहते हैं। [इसका अर्थ है कि उस अद्वयज्ञानकी केवल ज्ञान-वृत्तिसे ब्रह्मरूपमें, सत्-चित्-वृत्तिसे परमात्मारूपमें और सच्चिदानन्द-वृत्तिसे भगवान्रूपमें प्रतीति होती है।] भगवद्भक्त व्रजेन्द्रनन्दनको ही अद्वयज्ञानविग्रहके रूपमें जानते हैं। वे श्रीकृष्णके नाम, रूप, गुण और लीलाको श्रीकृष्णसे भिन्न नहीं मानते हैं, यही अद्वयज्ञानका तात्पर्य है। अद्वयज्ञानके अभावमें ही अभक्त लोग विष्णुविग्रहमें प्राकृत बुद्धि रखकर श्रीकृष्णको उनके अप्राकृत नाम, रूप, गुण और लीलासे पृथक् मानते हैं। श्रीकृष्णेतर अविष्णु-वस्तुमें अद्वयज्ञानका अभाव है। ५० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
२/११ ] इसलिये श्रीकृष्णेतर वस्तु [जीवात्मा] माया अथवा अज्ञानके द्वारा श्रीकृष्णसे अर्थात् अद्वयज्ञानसे स्वतन्त्र होकर मायाके वशीभूत होनेकी योग्यता प्राप्तकर मायाके वशीभूत अथवा द्वैतज्ञानके अधीन होती है। श्रीकृष्णके समस्त प्रकाश और विलास विग्रहोंमें द्वितीयज्ञान (उनके नाम-रूप-गुण-लीला और उनमें भेद) नहीं है, इसलिये विष्णुतत्त्व होनेके कारण वे मायाधीश हैं। योगीलोग अद्वयज्ञान-विग्रह परमात्माके साथ शुद्धात्माके अविमिश्र (आत्माकी परमात्मासे स्वतन्त्र सत्ता रखते हुए) केवलयोगको ही द्वितीयज्ञानरहित अवस्था जानते हैं। ज्ञानीलोग स्वगत-सजातीय-विजातीयभेदहीन निर्विशेष ज्ञानको ही अद्वयज्ञान ब्रह्म जानते हैं। (भाष्यकारकृत भागवतके इस श्लोकका गौड़ीय-भाष्य द्रष्टव्य है।) ॥ ११ ॥ अमृताणुकणिका—'ज्ञान'—जो केवलमात्र चित्, जिसमें अचित् (जड़) किञ्चित् मात्र भी नहीं है, वही ज्ञान-वस्तु, सच्चिदानन्द वस्तु है। 'अद्वय'-द्वितीय-शून्य, भेद-शून्य। भेद तीन प्रकारके हैं—सजातीय भेद, विजातीय भेद और स्वगत भेद। एक जातिमें एकसे अधिक वस्तु रहनेपर सजातीय अर्थात् समान-जातीय भेद सम्भव है। जैसे मनुष्य अनेक हैं, वे सभी मनुष्य जातिके हैं, परन्तु उनके नाम और रूपादि पृथक् होते हैं। इसलिये समान जाति होनेपर भी उनमें सजातीय भेद है। इसी प्रकार एकसे अधिक चित् वस्तु होनेपर सजातीय भेदकी सम्भावना है। किन्तु वस्तुतः एकसे अधिक चित् वस्तु रहनेपर भी यदि अन्यान्य सभी चित् वस्तुएँ एक मूल चित् वस्तुकी अंश हों, तो उनमें सजातीय भेद नहीं होगा, क्योंकि यदि एकसे अधिक स्वयंसिद्ध चित् वस्तुएँ होतीं, तभी ज्ञानका सजातीय भेद सम्भव था। सजातीयभेदशून्य ज्ञान वह वस्तु है, जिसके तुल्य स्वयंसिद्ध अन्य कोई भी चित् वस्तु नहीं है; अन्य चित् वस्तुएँ होनेपर भी उनमेंसे कोई भी स्वयं सिद्ध नहीं है, प्रत्येककी निज सत्ता उस अद्वयज्ञानकी अपेक्षा रखती है। भिन्न जातीय वस्तु ही विजातीय भेद है—जैसे पशु और मनुष्यमें विजातीय भेद है। ज्ञान अथवा चित् वस्तुमें विजातीय वस्तु क्या है? ज्ञान चित्-जातीय वस्तु है और जो चित् नहीं है, प्राकृत अथवा जड़ है, वही ज्ञानके विपरीत वस्तु है। यह विजातीय वस्तु यदि स्वयंसिद्ध नहीं हो और अपनी सत्ताके लिये ज्ञानकी अपेक्षा रखे, तब इस विजातीय वस्तुका भी ज्ञानके साथ विजातीय भेद नहीं होगा, क्योंकि यह विजातीय वस्तु स्वयं सिद्ध नहीं हैं। यदि यह विजातीय वस्तु स्वयं सिद्ध हो और ज्ञानकी कोई अपेक्षा नहीं रखती हो, तब उसका ज्ञानसे विजातीय भेद होगा। ज्ञान वस्तुमें कभी भी स्वगतभेद नहीं होता है। स्वगत शब्दका अर्थ है—अपने मध्य। जिस वस्तुमें एकसे अधिक उपादान हैं, उपादान भेदसे उसमें ही स्वगतभेद होता है। जैसे दीवारमें ईंट, सीमेंट, रेत, बालू आदि होते हैं, ये सब उपादान परस्पर विभिन्न हैं, इसलिये दीवारमें स्वगत भेद है। परस्पर मिलानेपर उनके परिमाणके अनुसार दीवारके विभिन्न अंशोंमें शक्तिकी क्रिया भी विभिन्न रूपोंमें अभिव्यक्त होगी। शक्ति क्रियाकी इस प्रकारकी विभिन्न अभिव्यक्ति भी स्वगत भेद है अर्थात् विभिन्न परिमाणमें सीमेंट, रेत, बालूके मिश्रणसे शक्तिकी क्रिया अलग-अलग स्थानोंमें विभिन्न परिमाणसे दिखायी देगी। ज्ञान वस्तुमें इस प्रकार स्वगत भेद नहीं रहता है, क्योंकि ज्ञान चित् स्वरूप है और चित्के अतिरिक्त उसमें कोई मिश्रण नहीं है। दूसरा अध्याय | ५१
[ २/११-१३ उपादान भेद नहीं रहनेपर जिस किसी भी अंशमें कोई भी शक्ति अभिव्यक्त हो सकती है। बद्धजीवकी देह जड़ (अचित्) है, किन्तु जीव स्वरूपतः चित् वस्तु है। इसलिये बद्धजीवमें देह और देहीका स्वगत भेद है। किन्तु ज्ञान वस्तुमें इस प्रकार कोई भी देह-देहीका भेद नहीं होता। बद्धजीवकी जड़ देहमें भी पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश-ये पाँच उपादान हैं। नेत्र, कर्ण आदि इन्द्रियोंमें इन पाँच वस्तुओंके तारतम्यके अनुसार इन इन्द्रियोंके योगसे प्रकाशित शक्तिका भी तारतम्य होता हैं। जैसे चक्षुके द्वारा केवल देखा जा सकता है, किन्तु सुना नहीं जा सकता। कानके द्वारा केवल सुना जा सकता है, किन्तु देखा नहीं जा सकता। यह सब भी स्वगत-भेदका फल है। चिदेकरूप ज्ञान-वस्तुमें विभिन्न उपादान नहीं होनेपर यह जातीय पार्थक्य नहीं हो सकता। ज्ञान-वस्तुका प्रत्येक अंश अन्य प्रत्येक अंशका कार्य कर सकता है, इसलिये ब्रह्मसंहितामें कहा गया है-“अङ्गानि यस्य सकलेन्द्रियवृत्तिमन्ति” अर्थात् “जिस श्रीविग्रहके सारे अङ्ग अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय अन्य समस्त इन्द्रियोंके कार्य कर सकती है”। जिस ज्ञानमें इस प्रकार स्वयंसिद्ध सजातीय, स्वयंसिद्ध विजातीय और स्वगत भेद नहीं है, उसको ही अद्वयज्ञान कहा जाता है। तत्त्ववेत्ता पण्डित इसी अद्वयज्ञान-वस्तुको तत्त्व अथवा परमार्थभूत वस्तु कहते हैं। श्रीकृष्ण ही यह अद्वयज्ञान-वस्तु हैं-“अद्वयज्ञान तत्त्ववस्तु कृष्णेर स्वरूप।” (आदि २/६५) ॥११॥ (१) ब्रह्म-विचार :- ताँहार अङ्गेर शुद्ध किरण-मण्डल। उपनिषद् कहे ताँरे ब्रह्म-सुनिर्मल ॥१२॥ अनुवाद-उन अद्वयज्ञान तत्त्वके अङ्गोंकी ज्योतिको उपनिषद् सुनिर्मल ब्रह्म कहते हैं ॥१२॥ अनुभाष्य-मुण्डकोपनिषद्के द्वितीयमुण्डक, द्वितीयखण्डके मन्त्र ९-११में कहा गया है- “हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम्। तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः॥ न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं, नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्नि। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति। ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्।” अर्थात् “आत्माके तत्त्वको जाननेवाले लोग जिन्हें परब्रह्मके रूपमें जानते हैं, वे स्वर्ण-ज्योतिसे आलोकित आनन्दमय चिन्मयधाममें और जीवोंके हृदयोंमें वास करनेवाले हैं। वे निर्गुण, अखण्ड, सर्वथा दोषरहित और सभी ज्योतिर्मय वस्तुओंके भी ज्योतिस्वरूप हैं। उनको चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, विद्युतादि भी प्रकाशित नहीं कर सकते, तो अग्निका कहना ही क्या? उनका अनुसरण करके ही सूर्य आदि सभी उनसे प्रकाशको प्राप्त करते हैं, उनके प्रकाशसे ही यह समस्त जगत् प्रकाशित होता है। सामने, पीछे, दायें, बायें, ऊपर और नीचे यह जो विश्व विस्तृत हुआ है, वह समस्त ही उसी अमृतस्वरूप शाश्वत ब्रह्मात्मक है। अतएव ब्रह्म ही श्रेष्ठतम तत्त्व है।” ॥१२॥ चर्मचक्षे देखे यैछे सूर्य निर्विशेष। ज्ञानमार्गे लइते नारे ताँहार विशेष ॥१३॥ ५२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
२/१३-१७ ] अनुवाद—जिस प्रकार इन भौतिक चक्षुओंसे देखनेपर सूर्य एक विशिष्ट-स्वरूपरहित प्रकाशमान वस्तु ही प्रतीत होता है, उसी प्रकार ज्ञानमार्गका आश्रय लेकर श्रीकृष्णके विशिष्ट स्वरूपको नहीं जाना जा सकता॥१३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस लक्षणके द्वारा किसी वस्तुका परिचय प्राप्त होता है, उसको विशेष कहा जाता है। उस लक्षणसे रहित होना ही निर्विशेष है॥१३॥ ब्रह्मसंहिता (५/४०)— यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्डकोटि- कोटीष्वशेषवसुधादिविभूतिभिन्नम्। तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तमशेषभूतम् गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥१४॥ अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥१४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंमें समस्त पृथ्वी आदि ऐश्वर्योंके द्वारा पृथक्कृत, निष्कल, अनन्त, असीम ब्रह्म जिनकी प्रभासे उत्पन्न हुए हैं, उन्हीं आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥१४॥ अनुभाष्य—श्रीब्रह्माजीके द्वारा श्रीगोविन्दके तत्त्व और माहात्म्यका स्तवरूपमें गान ब्रह्मसंहिता नामक ग्रन्थके पञ्चम अध्यायमें लिखा है— जगदण्डकोटि-कोटिषु (असंख्यब्रह्माण्डेषु) अशेष-वसुधादि-विभूतिभिन्नम् (अनन्तब्रह्माण्डादिभिराकाराभि- विभूतिभिर्भिन्नं लब्धपार्थक्यं) [यत्] निष्कलं (निरंशम् अखण्डं परिपूर्णं) अनन्तं (खण्डज्ञानातीतं) अशेषभूतं (सीमारहितं) तद्ब्रह्म प्रभवतः (प्रभाव-विशिष्टस्य) यस्य (गोविन्दस्य) प्रभा (अङ्गकान्तिः) तम् आदिपुरुषं गोविन्दं अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद—असंख्य ब्रह्माण्ड और उन अनन्त ब्रह्माण्डोंमें पृथ्वी आदि विभिन्नाकार विभूतियोंसे पृथक् अखण्ड-परिपूर्ण-सीमारहित विशिष्ट प्रभाववाले ब्रह्म जिन श्रीगोविन्दकी अङ्गकान्तिमात्र हैं, उन आदिपुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥१४॥ कोटि कोटि ब्रह्माण्डे ये ब्रह्मेर विभूति। सेइ ब्रह्म गोविन्देर हय अङ्गकान्ति॥१५॥ सेइ गोविन्द भजि आमि, तँहो मोर पति। ताँहार प्रसादे मोर हय सृष्टिशक्ति॥१६॥ अनुवाद—करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड जिन ब्रह्मकी विभूति (ऐश्वर्य) हैं, वे ब्रह्म श्रीगोविन्दके अङ्गकी कान्ति हैं। मैं (ब्रह्मा) उन श्रीगोविन्दका भजन करता हूँ, वही मेरे स्वामी हैं और उन्हींसे मैं जगत्की सृष्टि करनेकी शक्ति ग्रहण करता हूँ॥१५-१६॥ श्रीमद्भागवत (११/६/४७)— वातवसना य ऋषयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिनः। ब्रह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ताः संन्यासिनोऽमला॥१७॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१७॥ दूसरा अध्याय | ५३
[ २/१७-१९ अमृतप्रवाह भाष्य-दिगम्बर (निर्वस्त्र), श्रमशील, उर्द्धरेता मुनिगण, शान्त और निर्मल संन्यासी; ये सभी ब्रह्मधामको प्राप्त करते हैं॥१७॥ अनुभाष्य-यह जानकर कि श्रीकृष्ण अतिशीघ्र अन्तर्धान हो जायेंगे, उद्धवजी उनके श्रीचरणोंमें प्रार्थना करते हुए कहने लगे कि भक्तोंके लिये उनके चरणोंकी प्राप्ति अत्यन्त सहज है, परन्तु अनेक कष्ट उठाकर तपस्या करनेवाले संन्यासियोंको परिश्रमसे प्राप्त उस साधनके फलस्वरूप केवलमात्र ब्रह्मलोककी ही प्राप्ति होती है। वातवसनाः (दिगम्बराः वसनहीनाः) श्रमणाः (शरीरकर्षणकारिणः भिक्षवः) उर्द्धमन्थिनः (उर्द्धरेतसः) शान्ताः (ब्रह्मनिष्ठैकधियः) अमलाः (विषयमलवर्जिताः संन्यासिनः) ते ब्रह्माख्यं (निर्विशेषरूपं) धाम यान्ति (प्राप्नुवन्ति)। श्लोक-भावानुवाद-दिगम्बर अर्थात् निर्वस्त्र रहने वाले, शरीरको कष्ट देकर तपस्या करनेवाले भिक्षु, उर्द्धरेता, ब्रह्ममें निष्ठ ऐकान्तिक बुद्धिवाले और विषयभोगरूपी मलरहित संन्यासी; वे सब निर्विशेष ब्रह्मधामको प्राप्त करते हैं॥१७॥ (२) परमात्म-विचार :- आत्मान्तर्यामी याँरे योगशास्त्रे कय। सेह गोविन्देर अंश विभूति ये हय॥१८॥ अनुवाद-जिनको योगशास्त्रमें आत्मा-अन्तर्यामी कहा गया है, वे श्रीगोविन्दकी अंश विभूति हैं॥१८॥ अनुभाष्य-भगवान् चित्-विलासमय विग्रह हैं। वे तुरीय विग्रह (परब्रह्म) होनेके कारण देवीधाम (माया जगत्) के किसी भी कार्यमें स्वयं आसक्त ना होकर पुरुषावतारके द्वारा 'प्रधान' और जीवके नियन्ता हैं। तीन प्रकारके पुरुषावतारोंको तत्त्वसे जान लेनेपर जीव चौबीस मायिक-तत्त्वोंसे बने स्थूल-सूक्ष्म शरीरके बन्धनसे मुक्त होते हैं। प्रत्येक जीवके अन्तर्यामी रूपमें क्षीरोदकशायी महाविष्णु, ब्रह्माण्डके समष्टि-जीवोंके अन्तर्यामी रूपमें गर्भोदकशायी महाविष्णु और समस्त ब्रह्माण्डोंके स्रष्टा कारणोदशायी अन्तर्यामी महाविष्णु, ये तीनों पुरुषावतार देवीधामके सृष्टिकर्त्तारूपमें आंशिक कार्योंके ही नियन्ता हैं। चौबीस मायिकतत्त्वोंका अतिक्रम करके परमात्मासे योगका विधान योगशास्त्रोंमें वर्णित है। इसलिये अन्तर्यामी पुरुष परमात्मा, श्रीगोविन्दकी अंश-विभूति मात्र हैं॥१८॥ अनन्त स्फटिके यैछे एक सूर्य भासे। तैछे जीवे गोविन्देर अंश प्रकाशे॥१९॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जैसे अनन्त स्फटिक खण्डोंमें एक ही सूर्य प्रकाशवान् होकर पृथक्-पृथक् रूपमें दिखायी देते हैं, उसी प्रकार असंख्य जीवोंमें श्रीगोविन्दके अंश परमात्मा प्रकाश पाते हैं॥१९॥ अनुभाष्य-एक ही सूर्य जिस प्रकार अपने स्थानमें अवस्थित होकर अनन्त स्फटिक खण्डोंमें अनन्तमूर्तिके रूपमें प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार एकमात्र श्रीगोविन्द गोलोक-वृन्दावनमें नित्य प्रकट रहकर अनन्त जीवोंके हृदयमें जीवोंके सेव्यपुरुष अन्तर्यामी परमात्माके रूपमें ५४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
२/१९-२० ]
प्रकाशित होते हैं। “द्वा सुपर्णा सयुजा” आदि तीन मन्त्रोंमें एक वृक्षमें सेव्य-सेवकके रूपमें अवस्थित जीवात्मा और परमात्मारूपी दो पक्षियोंके विषयमें उल्लेख है। परमात्मा जीवात्माको कर्मफल भोग कराते हैं, किन्तु उसके समान फलके भोक्ता नहीं होते। जब जीव स्वयंको कर्मफलके भोक्ता माननेका अभिमान त्यागकर सेव्य-परमात्माकी महिमाको समझ पाता है, तब वह निर्दोष होकर परम समता वैकुण्ठधामको प्राप्त करता है॥१९॥ अमृतानुकणिका—श्रीगोविन्दके अंश परमात्मा एक वस्तु हैं, वे दो नहीं हैं, किन्तु जीव अनन्त हैं। एक ही सूर्य जैसे अनन्त स्फटिक खण्डोंमें प्रत्येकमें प्रतिबिम्बरूपमें प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार एक ही परमात्मा अनन्त कोटि जीवोंमें व्यष्टिजीव-अन्तर्यामी रूपमें प्रकाशित होते हैं। यहाँपर एक ही वस्तुका भिन्न-भिन्न स्थानोंमें प्रकाशत्वांश ही दृष्टान्तके द्वारा प्रयोज्य है; सम्पूर्ण रूपसे दृष्टान्तकी प्रयोजनीयता नहीं है। अनन्त स्फटिक खण्डोंमें सूर्यका प्रतिबिम्ब प्रकाशित होता है, प्रतिबिम्ब वास्तविक वस्तु नहीं है। किन्तु जीवके हृदयमें परमात्मा प्रतिबिम्ब रूपमें प्रकाशित नहीं होते—वास्तविक रूपमें ही प्रकाशित होते हैं। वे अपनी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे एक होकर भी अनन्त कोटि जीवोंके प्रत्येकके हृदयमें भिन्न-भिन्न मूर्तिके रूपमें अवस्थान करते हैं। परमात्माका प्रतिबिम्ब सम्भवपर नहीं है, क्योंकि परमात्मा अपरिछिन्न विभु वस्तु हैं। परिछिन्न (ढकी अथवा सीमित) वस्तुका ही प्रतिबिम्ब सम्भव है, विभु वस्तुका प्रतिबिम्ब सम्भव नहीं हैं। देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग आदि अनन्त प्रकारके अनन्त जीव हैं। सृष्टि लीलाके अनुरोधसे एक ही परमात्मा इन समस्त जीवोंके प्रत्येकके भीतर अन्तर्यामीके रूपमें विराजमान हैं। इसे देखकर कोई-कोई आशङ्का कर सकते हैं कि विभिन्न जीवोंके अन्तर्यामी परमात्मा भी विभिन्न हैं। इसी आशङ्काको दूर करनेके लिये इस पयारमें कहा गया है—परमात्मा एक ही वस्तु हैं, अनेक नहीं। अपने कर्मफलोंसे जीव मायिक देहका आश्रय करता है, किन्तु जीवकी देहमें परमात्माकी अवस्थिति उनके कर्मफलके कारण नहीं, अपितु उनकी लीलामात्र ही है। परमात्माका कोई कर्म नहीं है, वे मायातीत हैं। जीवकी देहके साथ परमात्माका कोई सम्बन्ध भी नहीं है। वे निर्लिप्त भावसे जीवके अन्तर्यामीरूपमें जीवकी देहमें अवस्थित होते हैं॥१९॥ श्रीमद्भगवद्गीता (१०/४२)— अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥२०॥ अनुवाद—अथवा हे अर्जुन! इस पृथक्-पृथक् उपदिष्ट ज्ञानसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? तुम मात्र इतना ही जानो कि मैं अपने एकांशसे इस समस्त जगत्को धारणकर अवस्थित हूँ॥२०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे अर्जुन! मैं अधिक क्या कहूँ? मैं अपने एक अंश परमात्मारूपसे सम्पूर्ण जगत्में प्रविष्ट होकर अवस्थित हूँ॥२०॥ अनुभाष्य—भगवान् अर्जुनको विभिन्न प्रकारसे अपनी विभूतियोंके सम्बन्धमें बतलाकर अब संक्षेपमें उसका अर्थ प्रकाश कर रहे हैं—
दूसरा अध्याय | ५५
[ २/२०-२१ अथवा हे अर्जुन, बहुना (बाहुल्येन पृथक् पृथगुपदिश्यमानेन) ज्ञातेन किं [तव प्रयोजनम्—अलमित्यर्थः]। इदं (चिदचिदात्मकं) कृत्स्नं (समग्रं) जगत् एकांशेन (प्रकृत्याद्यन्तर्यामिना पुरुषाख्येन अंशेन) विष्टभ्य (अधिष्ठानत्वात् विधृत्य अधिष्ठातृत्वादधिष्ठाय, नियन्तृत्वात्रियम्य व्यापकत्वात् व्याप्य) अहं (भगवान्) स्थितः। श्लोक-भावानुवाद—अथवा हे अर्जुन, पृथक्-पृथक् बहुत उपदेशोंसे ज्ञानका तुम्हारा क्या प्रयोजन है? चित् और अचित्रूप समस्त जगत्में प्रकृतिके अन्तर्यामी रूपमें पुरुष नामक एक अंशसे (अधिष्ठानको विशेष भावसे धारणकर, अधिष्ठाता होनेके कारण अधिष्ठित होकर, नियन्ताके रूपमें इसे अधीनकर, व्यापकत्वके रूपमें व्याप्त होकर) मैं (भगवान्) स्थित हूँ॥२०॥ श्रीमद्भागवत (१/९/४२)— तमिममहमजं शरीरभाजां हृदि हृदि धिष्ठितमात्मकल्पितानाम्। प्रतिदृशमिव नैकधार्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः ॥ २१ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भीष्म बोले—“हे कृष्ण! एक ही सूर्य जिस प्रकार प्रत्येक आँखसे देखनेसे पृथक्-पृथक् वस्तु जैसे जाना जाता है, उसी प्रकार आपके एक अंशरूप परमात्माका प्रत्येक जीवके हृदयमें स्थित होनेसे उनका पृथक्-पृथक् तत्त्वरूपमें अनुमान होता है। किन्तु जब जीव स्वयंको आपका मानता है अर्थात् स्वयंको आपके दासके रूपमें जानता है, तब उसे वह भेदभ्रम नहीं रहता। मैंने भी परमात्माको आपका अंश जानकर उसी प्रकार भेदभ्रमसे मुक्त होकर आपके अजन्मा स्वरूपका ज्ञान प्राप्त किया है।”॥२१॥ अनुभाष्य—युधिष्ठिर जब भीष्मसे धर्मके विषयमें प्रश्न करनेकी इच्छासे उनके निकट गये, तो श्रीकृष्णने भी अर्जुनके रथमें बैठकर उनका अनुगमन किया। अन्यान्य देवर्षि-ब्रह्मर्षिगण भी भीष्मके दर्शनके लिये वहाँ उपस्थित थे। युधिष्ठिरके कुछ प्रश्नोंके उत्तर देनेके बाद भीष्मने अपना निर्याणकाल उपस्थित होनेपर सामने उपस्थित श्रीकृष्णकी अनेक श्लोकोंमें स्तव-स्तुति की; उन श्लोकोंमेंसे यह एक श्लोक है— [नानादेशावस्थितानां प्राणिनां] प्रतिदृशं (अवलोकनं प्रति) [यथा] एकं अर्कं इव नैकधा (अधिष्ठानभेदात् अनेकधा दृष्टं) [तथा] आत्मकल्पितानां (आत्मना स्वयमेव कल्पितानां) शरीरभाजां हृदि हृदि (प्रतिहृदयं) धिष्ठितम् (अधिष्ठितं) तम् इमं अजं (श्रीकृष्णं) विधूतभेदमोहः (विधूतो दूरीकृतो भेदरूपो मोहः भगवतः नामरूपगुणलीलाभेदरूपः भगवद्विग्रहस्य प्रकाशविलासमुर्तिभेदेन व्यापकत्व-संभावनाजनित-नानात्वप्रतीतिलक्षणः मोहः यस्य तथाभूतः) अहं समधिगतः (सम्यगधिगतः प्राप्तः अस्मि)। श्लोक-भावानुवाद—अलग-अलग स्थानोंमें स्थित प्राणियोंको जिस प्रकार एक ही सूर्य उनकी स्थितिके अनुसार अलग-अलग दिखलायी देता है, उसी प्रकार प्रत्येक देहधारीके हृदयमें स्थित आप वे परमात्मा पृथक्-पृथक् प्रतीत होते हैं। परन्तु अजन्मा आप (भगवान् श्रीकृष्ण) के नाम-रूप-गुण-लीलामें भेदरूप अथवा आपके विग्रहका उनके प्रकाश और विलासमूर्तियोंसे भेदरूप अथवा आपके सर्वव्यापक होनेसे नाना प्रकारकी प्रतीतिरूप मोहको दूर करके, मैं पूर्णरूपसे आपके शरणागत हुआ हूँ॥२१॥ ५६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
२/२२ ] (३) भगवद्विचार :- सेइत' गोविन्द साक्षाच्चैतन्य गोसाञि। जीव निस्तारिते ऐछे दयालु आर नाइ॥ २२॥ अनुवाद—वे श्रीगोविन्द ही साक्षात् श्रीचैतन्य महाप्रभु हैं, जीवोंका उद्धारके लिये उनके समान दयालु और कोई नहीं है॥ २२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यहाँपर साक्षात् शब्दके प्रयोगके द्वारा ग्रन्थकार यह सिद्धान्त प्रकाश कर रहे हैं कि श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं श्रीगोविन्द ही हैं अर्थात् श्रीगोविन्दके कोई प्रकाश अथवा विलास विग्रह नहीं हैं॥ २२॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्य महाप्रभु स्वयं श्रीगोविन्द ही हैं, इस बातके शास्त्रोंसे कुछ प्रमाण यहाँ उद्धृत किये जा रहे हैं। चैतन्योपनिषद्में कहा है— “गौरः सर्वात्मा महापुरुषो महात्मा महायोगी त्रिगुणातीतः सत्त्वरूपो भक्तिं लोके काश्यतीति।” अर्थात् “सर्वान्तर्यामी, महापुरुष महात्मा, महायोगी, त्रिगुणातीत, शुद्धसत्त्वस्वरूप श्रीगोविन्द गौर रूपमें अवतीर्ण होकर जीवोंमें भक्तिका प्रकाश करेंगे।” श्वेताश्वतर (६/७)— “तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमञ्च दैवतम्। पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम्॥” अर्थात् “भक्तजन कहते हैं कि हम उन समस्त ब्रह्माण्डोंके नायक देवको जानते हैं जो शङ्कर, ब्रह्मादि ईश्वरोंके महेश्वर अर्थात् नियन्ता हैं, देवताओंके भी परम पूज्य देवता हैं, प्रजापतियोंके भी प्रजापति हैं और प्रकृतिसे परे हैं।” और श्वेताश्वतर (३/१२)— “महान् प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैषः प्रवर्त्तकः। सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः॥” अर्थात् “सर्वान्तर्यामी श्रीमन्महाप्रभुजी ही सुनिर्मल अपनी भक्तिरूपी मणिकी प्राप्तिके लिये अपनी अहैतुकी कृपासे प्राणी मात्रको प्रवृत्त करनेवाले हैं।” (मुण्डक ३/१/३)— “यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्। तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति॥” अर्थात् “जिस समय जीव ईश्वरका दर्शन करता है, तब वह विद्वान् पुण्य और पापोंको छोड़कर प्रकृतिसे बने इस देह और प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित होकर परम समता (मित्रता) को प्राप्त होता है। उस परमात्माका वर्ण सुवर्णके समान मनोहर है, वे सर्वान्तर्यामी प्रभु जगत्के कर्त्ता और ब्रह्माजीके भी जनक हैं।” श्रीमद्भागवत (११/५/३३-३४)— “ध्येयं सदा परिभवघ्नमभीष्टदोहं तीर्थास्पदं शिवविरिञ्चिनुतं शरण्यम्। भृत्यार्त्तिहं प्रणतपाल भवाब्धिपोतं वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्॥ त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मीं धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम्। मायामृगं दयितयेप्सितमन्वधावत् वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्॥” इति। अर्थात् “हे शरणागतजनोंके पालक! हे परम पुरुषोत्तम महाप्रभो! निरन्तर ध्यानयोग्य, श्रीकृष्णप्रेमप्रदाता, श्रीगौर-क्षेत्र-ब्रजमण्डलादि तीर्थोंके आश्रयस्वरूप, शिवावतार श्रीअद्वैताचार्य और ब्रह्मावतार श्रीहरिदास ठाकुरके द्वारा स्तुत्य, निजसेवक कुष्ठरोगी विप्रके आर्त्तिनाशक, दूसरा अध्याय | ५७
[ २/२२-२४ सार्वभौम-प्रतापरुद्रादिको मुक्तिकामी-भुक्तिकामीरूप भवसागरसे उत्तीर्ण (पार) करनेवाले जलपोत स्वरूप, आपके श्रीचरणकमलोंकी मैं वन्दना करता हूँ। ब्राह्मणका वचन (शाप) था कि तुम्हारा गृहस्थ सुख सब नष्ट हो जाय। उस वचनकी रक्षाके लिये प्राणोंसे भी दुस्त्यज, देवताओंके द्वारा भी अभिलषित राज्य और विष्णुप्रियारूप लक्ष्मीको भी त्यागकर जो (श्रीचैतन्य महाप्रभु) वनमें चले गये। वनमें कलत्र, पुत्र, धनादि रूप मायाको ढूँढनेवाले मृग अर्थात् संसारमें आसक्त लोगोंके पीछे (उनके कल्याणके लिये) दौड़ गये। अतिशय दयालु, अपने आलिङ्गनके छलसे संसाररूपी समुद्रमें गिरे जनको प्रेमरूपी समुद्रमें निमज्जित करनेमें समर्थ महाप्रभुके चरणोंकी मैं वन्दना करता हूँ।” श्रीमद्भागवत (७/९/३८) प्रह्लाद वचन— “इत्थं नृतिर्यगृषिदेवझषावतारैर्लोकान् विभावयसि हंसि जगत्प्रतीपान्। धर्मं महापुरुष पासि युगानुवृत्तं छन्नः कलौ यदभवस्त्रियुगोऽथ स त्वम्॥” अर्थात् “हे पुरुषोत्तम! इस प्रकार आप मनुष्य, पशु, पक्षी, ऋषि, देवता और मत्स्यादि अवतार लेकर लोकोंका पालन और विश्व-द्रोहियोंका संहार करते हैं। इन अवतारोंके द्वारा आप प्रत्येक युगमें युगानुरूप धर्मकी रक्षा करते हैं, परन्तु कलियुगमें तो आप छिपकर गूप्तरूपसे अवतार धारण करते हैं। अतः आपका एक नाम “त्रियुग' भी है।” यहाँपर गुप्त अवतारसे श्रीकृष्णचैतन्य अवतारका बोध होता है। कृष्णयामलमें— “पुण्यक्षेत्रे नवद्वीपे भविष्यामि शचीसुतः” अर्थात् “भविष्यमें मैं पुण्यक्षेत्र नवद्वीपमें शचीनन्दनके रूपमें आऊँगा।” ब्रह्मयामलमें— “अथवाहं धराधाम्नि भूत्वा मद्भक्तरूपधृक्। मायायां च भविष्यामि कलौ सङ्कीर्तनागमे॥” अर्थात् “कलिकालमें सङ्कीर्तनके आरम्भके समय मैं भूतपर अपने प्रिय भक्तोंका-सा वेष बनाकर श्रीमायापुरमें अवतीर्ण होऊँगा।” वायुपुराणमें— “कलौ सङ्कीर्तनारम्भे भविष्यामि शचीसुतः। स्वर्णद्युतिं समास्थाय नवद्वीपे जनाश्रये॥” अर्थात् “कलिकालमें सङ्कीर्तनको आरम्भ करनेके लिये नवद्वीप नामक पुरीमें सुवर्ण कान्ति ग्रहणकर शचीपुत्ररूपमें प्रकट होऊँगा।” अनन्त-संहितामें— “य एव भगवान् कृष्णो राधिकाप्राणवल्लभः। सृष्ट्यादौ स जगन्नाथो गौर आसीन्महेश्वरि॥” अर्थात् श्रीशङ्करजी पार्वतीसे बोले—“हे महेश्वरी! सृष्टिके आदिमें जिन प्रभुका नाम श्रीजगन्नाथ था और जो द्वापरमें श्रीराधिकाप्राणवल्लभ स्वयं भगवान् श्रीकृष्णचन्द्ररूपमें अवतीर्ण हुए थे, वे ही पुराण पुरुषोत्तम प्रभु प्रेमलक्षणा भक्ति प्रदान करनेके लिये गौराङ्गरूपमें अवतरित होंगे।” आदि। यहाँपर इसी ग्रन्थ (चैतन्यचरितामृत) में उद्धृत प्रमाणोंका समावेश करनेसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा, इसलिये उन्हें यहाँ नहीं दिया जा रहा है॥ २२॥ परव्योमपति नारायण ही सभी शास्त्रोंमें वर्णित :- परव्योमेते कैसे नारायण नाम। षडैश्वर्यपूर्ण लक्ष्मीकान्त भगवान् ॥ २३॥ वेद, भागवत, उपनिषद्, आगम। 'पूर्णतत्त्व' याँरे कहे, नाहि याँर सम ॥ २४॥ ५८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत