श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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दूर कर सकते हैं। इस श्लोककी टीकामें श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती लिखते हैं—'पुण्यकर्म, तीर्थसेवा, देवसेवा और यहाँ तक कि शास्त्रज्ञानादिमें भी इस प्रकार विषयासक्ति दूर करनेका सामर्थ्य नहीं है।' इसलिये बाहरसे दुःसङ्ग त्यागकर साथ-ही-साथ भक्त-सङ्ग एकान्त आवश्यक है, अन्यथा दुर्वासनारूप दुःसङ्ग हृदयमें ही रहेगा। इसलिये कहा गया है कि दुःसङ्ग त्यागकर सत्सङ्ग करो। जो दुःसङ्गका त्यागकर सत्सङ्ग करते हैं, वे ही बुद्धिमान् हैं और जो ऐसा नहीं करते हैं, वे बुद्धिहीन हैं। जो साधु पुरुष ऐसा हितोपदेश करते हैं, वे ही शिक्षागुरु हैं, इसे प्रमाणित करनेके लिये ही यह श्लोक उद्धृत हुआ है॥५९॥ साधुसङ्गमें हरिकथा श्रवणका फल,—श्रद्धा, भाव और प्रेमोदय :— श्रीमद्भागवत (३/२५/२५)— सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः। तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥६०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साधुसङ्गमें हृदय और कानोंको रसपूर्ण लगनेवाली मेरी बलवती कथाओंकी आलोचना होती है। उन-उन कथाओंको श्रवण करते-करते अतिशीघ्र अपवर्ग पथस्वरूप मुझमें पहले श्रद्धा, तत्पश्चात् रति और अन्तमें प्रेमभक्ति उदित होती है॥६०॥ अनुभाष्य—देवहूतिने जब अपने पुत्र कपिलदेवसे अपने कल्याणकी जिज्ञासा की, तो उसके उत्तरमें श्रीकपिलदेवने कहा— सतां (हरिजनानां) प्रसङ्गात् (प्रकृष्टात् सङ्गात्) मम वीर्यसंविदः (वीर्यस्य सम्यग्वेदनं यासु ताः) हृत्कर्णरसायनाः (हृत्कर्णयोः रसायनाः श्रोत्रमनोऽभिरामाः सुखदाः) कथा भवन्ति। तज्जोषणात् (तासां जोषणात् सेवनात्) अपवर्गवर्त्मनि (अपवर्गोऽविद्यानिवृत्तिः एव वर्त्म यस्मिन् तस्मिन् हरौ) [प्रथमं] श्रद्धा [ततः] रतिः (भावः, ततः) भक्तिः (प्रेमा) आशु (शीघ्रं) अनुक्रमिष्यति (अनुक्रमेण भविष्यति)। [प्रथमं श्रद्धा, ततः सत्सङ्गः, सङ्गात् तत्कथाश्रवणे तत्सेवनप्रवृत्तिः भजनक्रिया, ततः प्रकृष्टात् सङ्गात् अनर्थनिवर्त्तिकाः कथाः, ततस्ता एव कथा निष्ठा-मुत्पादयन्त्यो मन्माहात्म्यवेदनं यतस्तथाभूता भवन्ति, ततो रुचि-मुत्पादयन्त्यो हृत्कर्णरसायना भवन्ति। तासां कथानां जोषणात् प्रीत्यास्वादनात् भगवति श्रद्धा आसक्तिर्भावः प्रेमा अनुक्रमिष्यति]। श्लोक-भावानुवाद—हरिजनोंके प्रकृष्टरूपसे सत्सङ्गमें मेरे वीर्यका सम्पूर्ण ज्ञान करानेवाली, हृदय और कानोंको रसीली लगनेवाली अर्थात् श्रवणमें मनोहर और सुख देनेवाली कथाएँ होती हैं। उनके सेवनसे अविद्याकी निवृत्ति हो जाती है और श्रोता मेरी प्राप्तिके मार्गपर चल पड़ता है। पहले श्रद्धा, तब भाव और उसके बाद शीघ्र ही प्रेमका क्रमशः उदय होता है। [पहले श्रद्धा होनेपर सत्सङ्ग होता है। सत्सङ्गमें भगवत्-कथा श्रवणकर भजनक्रिया प्रारम्भ होती है। निरन्तर साधुसङ्गसे अनर्थ निवृत्तिका क्रम आता है, तब उस कथासे निष्ठाका जन्म होता है, जिससे मेरे माहात्म्यका यथार्थ ज्ञान साधकको होता है। निष्ठापूर्वक मेरी कथाओंका सेवन करनेसे उनमें रुचि उत्पन्न हो जाती है, तब वे कथाएँ कानों और हृदयको रसपूर्ण लगने लगती हैं। इन कथाओंका प्रीतिपूर्वक आस्वादन करनेसे क्रमशः श्रद्धासे आसक्ति, आसक्तिसे भाव और भावसे प्रेमका आविर्भाव होता है]॥६०॥
पहला अध्याय | २७