श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १/५८-५९ क्या अपूर्व होगा? महापुरुषोंकी कृपाशक्तिसे और लीला-कथाके माहात्म्यसे जीवकी बहिर्मुखता दूर हो जाती है तथा जीव क्रमशः भक्ति पथपर अग्रसर होता है॥५८॥ साधुसङ्गकी कर्त्तव्यता; साधु-गुरुका धर्म, लक्षण और स्वभाव :- श्रीमद्भागवत (११/२६/२६)— ततो दुःसङ्गमुत्सृज्य सत्सु सज्जेत बुद्धिमान्। सन्त एवास्य छिन्दन्ति मनोव्यासङ्गमुक्तिभिः ॥ ५९ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इसलिये दुःसङ्गका परित्याग करके बुद्धिमान व्यक्ति सत्सङ्ग करेंगे। साधुजन साधु-उपदेशोंके द्वारा उनके समस्त भक्ति-प्रतिकूल वासनाबन्धनको काट देंगे॥५९॥ अनुभाष्य—जब उर्वशी पुरूरवाका सङ्ग त्याग करके चली गयी, तब पुरूरवाने शोकमें अधीर होकर वर्षोंतक अनुताप किया। तत्पश्चात् जब उनका विवेक उदित हुआ, तब उन्होंने असत्सङ्गके परिणामको समझा। श्रीभगवान् उद्धवजीके निकट इस उपाख्यानको वर्णन कर रहे हैं- ततः दुःसङ्गं (योषित्सङ्गं योषित्सङ्गिसङ्गं च) [दूरे] उत्सृज्य (विहाय) बुद्धिमान् (सदसद्विवेकी) सत्सु (विरक्तेषु हरिजनेषु) सज्जेत (हरिजनसङ्गं सर्वात्मना कुर्यात्)। [यतः] सन्तः (साधवः) अस्य (विषयाभिनिविष्टस्य) मनोव्यासङ्गं (विरुद्धामासक्तिम्) उक्तिभिः (सदुपदेशैः) छिन्दन्ति (नाशं कुर्वन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—सत्-असत्को जाननेवाले विवेकी जनोंको स्त्रीसङ्ग और स्त्रीसङ्गीके सङ्गका दूरसे ही त्यागकर संसारसे विरक्त भक्तजनोंका सभी प्रकारसे सदा सङ्ग करना चाहिये। वे साधु विषयोंमें अभिनिवेशवाले व्यक्तिकी भगवत्-विरुद्धासक्तिका अपने सदुपदेशोंसे नाश करते हैं॥५९॥ अमृतानुकणिका—महाप्रभुने 'दुःसङ्ग' का अर्थ इस प्रकार किया है (मध्य २४/९४)— “'दुःसङ्ग' कहिये—'कैतव', आत्मवञ्चना'। कृष्ण, कृष्णभक्ति बिना अन्य कामना॥” अर्थात् “छलयुक्त आत्मवञ्चक 'दुःसङ्ग' है। श्रीकृष्ण-कामना और श्रीकृष्णभक्ति-कामनाके अतिरिक्त अन्य कोई भी कामनाका सङ्ग भी 'दुःसङ्ग' है।” असत् लोगों अथवा असत् वस्तुओंका कुछ समयके लिये शरीरके द्वारा त्याग किया जा सकता है, परन्तु मनको उनसे दूर रखना अति कठिन है; मन पुनः उन असत् वस्तुओंकी ओर धावित होता है। असत् प्राकृत वस्तुओंके साथ अनादिकालसे सम्बन्धके कारण प्राकृत भोग्य वस्तुओंके साथ ही मनका घनिष्ठ सम्बन्ध हो गया है। उर्वशीके द्वारा त्याग किये जानेपर पुरुरवा भोगकामनासे उसके वशीभूत होकर अत्यन्त दुःखी हो गये। विवेक जाग्रत होनेपर उस भोगधर्मको त्यागकर जैसे उनका मङ्गल हुआ था, उसी प्रकार सभी बुद्धिमान् व्यक्ति ही नित्य-मङ्गलप्रद उपदेश देनेवाले साधु व्यक्तियोंके सङ्गके प्रभावसे चिरकालके संस्कारोंके द्वारा पुष्ट मनोधर्मरूप भोगपिपासाको उन साधु वाक्योंके प्रभावसे काटनेमें समर्थ होते हैं। साधु उपदेशों और भगवत्-लीला-कथाके द्वारा तथा सर्वोपरि अपनी कृपाके द्वारा इन्द्रिय-भोगवासना २६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत