श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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मे (मम) गुरुः (वर्त्मप्रदर्शक-श्रवणगुरुः) चिन्तामणिः जयति। [मन्त्रगुरुः] सोमगिरिः जयति। [चैत्त्यः] शिक्षागुरुः शिखिपिञ्छमौलिः (शिखिपिञ्छैरेव मौलिः शिरोभूषणं यस्य सः) भगवान् (वृन्दावनचन्द्रो) जयति। यत्पादकल्पतरु-पल्लवशेखरेषु (यस्य भगवतः पादौ एव कल्पतरुपल्लवौ तयो शेखरेषु पदनखाग्रेषु) जयश्रीः (जया चासौ श्रियश्चेति महालक्ष्मीः वृन्दावनेश्वरीत्यर्थः) लीलास्वयम्वररसं (लीलया गाढानुरागेण यः स्वयम्वरस्तरसं सुखं) लभते। श्लोक-भावानुवाद—मेरे पथप्रदर्शक और श्रवणगुरु चिन्तामणिकी जय हो। मेरे मन्त्रगुरु सोमगिरिकी जय हो। मोरपंख जिनके सिरका भूषण है, मेरे शिक्षागुरु वे भगवान् वृन्दावनचन्द्र श्रीकृष्ण जययुक्त हों, जिनके कल्पवृक्षकी भाँति चरणकमलोंके पल्लवस्वरूप नखके अग्रभागसे श्री अर्थात् महालक्ष्मीको भी जय करनेवाली वृन्दावनेश्वरी श्रीमती राधिका गाढ़ अनुरागके कारण लीलारसका सुख लाभ करती हैं॥५७॥ अमृतानुकणिका—श्रीकृष्णने ही कृपा करके बिल्वमङ्गलके चित्तमें इस प्रकार उपायोंकी स्फूर्ति करायी, जिनका अवलम्बन करके उन्होंने श्रीकृष्णके सौन्दर्य-माधुर्यादि अनुभव करनेकी योग्यता प्राप्त की। और पुनः श्रीकृष्णने ही कृपा करके उनके हृदयमें अपने सौन्दर्य-माधुर्यादिकी स्फूर्ति कराकर उसका अनुभव कराया। इस प्रकार श्रीकृष्ण ही अनुभव-विषयमें उनके शिक्षागुरु हुए॥५७॥ शिक्षागुरुके रूपमें दया :- जीवे साक्षात् नाहि ताते गुरु चैत्यरूपे। शिक्षागुरु हय कृष्ण महान्तस्वरूपे॥५८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अन्तर्यामी गुरु चैत्यरूपमें अर्थात् चित्तमें अवस्थित होते हैं, इसलिये उनका सामने साक्षात्कार नहीं हो पाता। इसलिये श्रीकृष्ण महान्त अर्थात् श्रेष्ठ भक्तके रूपमें शिक्षागुरु होते हैं॥५८॥ अनुभाष्य—बद्धजीवका श्रीकृष्णके साथ साक्षात्कार नहीं होता है। इसलिये श्रीकृष्ण जीवोंके चित्तमें श्रीकृष्णभक्तिका विवेक उदित कराकर चैत्यशिक्षागुरु और महान्तस्वरूप होकर शिक्षागुरु होते हैं॥५८॥ अमृतानुकणिका—अब महान्तरूप शिक्षागुरुकी प्रयोजनीयताके विषयमें कह रहे हैं। मायाबद्ध जीवका मन नाना प्रकारकी दुर्वासनाओंसे परिपूर्ण है। भौतिक सुखभोगमें ही मत्त जीवकी श्रीकृष्णोन्मुखता स्वतः अथवा अपने समान ही लोगोंके सिखलानेसे जाग्रत नहीं होती, श्रीप्रह्लाद वचन (भाः ७/५/३०)—“मतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वा मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम्।” भक्ति प्रतिपादक शास्त्रोंके प्रमाणोंसे महान्त गुरु संसार-सुखकी तुच्छता और भगवत्-सेवाकी परम लोभनीयता दिखलाते हैं। और भी भगवत्-लीला-कथादि सुनाकर जीवको इतना आनन्दित करते हैं, जिससे उसके हृदयकी दुर्वासना क्रमशः क्षीण होती जाती है। जीव तब यह विचार करता है कि जिनकी लीला-कथा ही इतनी मधुर है, तब उनकी लीला कितनी मधुर होगी? और उस लीलामें साक्षात् रूपसे जो श्रीभगवान्की सेवा करते हैं, उनके द्वारा अनुभूत आनन्द
पहला अध्याय | २५