भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ १/५६-५७ सर्वदा सर्वत्र स्यात् (इति)। [स्वर्गापवर्गप्रेम्सु मध्ये आत्मनः श्रेयः किमिति प्रश्ने-प्रेमा तु स्वस्यैवान्वय-व्यतिरेकाभ्यां सिद्ध्यति, स्वर्गापवर्गौ ताभ्यां तावत् न सिद्धतः। यथा-जिज्ञास्येषु मध्ये एतावदेव जिज्ञास्यं, किं तत्? अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां योगायोगाभ्यां सम्भोग-विप्रलम्भाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वब्रह्माण्डवर्त्तिनि श्रीवृन्दावनादौ दास-सखि-गुरु-प्रेयसीषु सर्वदा नित्यमेव महाप्रलय-समयेऽपीति दास्य-सख्य-वात्सल्य-शृङ्गाररसानां आस्वादनं व्यञ्जितम्]। श्लोक-भावानुवाद-अपने श्रेयके साधन हेतु मुझ भगवान्‌को यथार्थ अनुभव करनेके अभिलाषी व्यक्तियोंके लिये जो श्रीगुरुचरणोंमें शिक्षणीय है, वह क्या है? वह एक अद्वितीय वस्तु होकर जो विधि-निषेध क्रमसे सदा सर्वत्र विद्यमान है। [तत्त्वजिज्ञासु पुरुष स्वर्ग, अपवर्ग और भगवत्-प्रेम, इन श्रेयोंने किसकी जिज्ञासा करेंगे? भगवत्-प्रेम तो स्वयं ही अन्वय और व्यतिरेक भावसे सिद्ध होता है, किन्तु इनमें स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) स्वयं कभी भी उस प्रकारसे सिद्ध नहीं हो सकते। जैसे जिज्ञासाओंमें यही जिज्ञासा करो कि वह क्या है? अन्वय-व्यतिरेक रूपमें अर्थात् योग और अयोग क्रमसे अथवा सम्भोग और विप्रलम्भ भावसे जो 'सर्वत्र' है, अर्थात् समस्त ब्रह्माण्डोंके अन्तर्गत श्रीवृन्दावनादिमें दास, सखा, गुरु (माता-पिता) और प्रेयसियोंमें जो 'सर्वदा' अर्थात् नित्य ही तथा यहाँ तक कि महाप्रलयकालमें भी विद्यमान रहता है (इसके द्वारा दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गाररसका आस्वादन सूचित होता है)]॥५६॥ श्रीकृष्णकर्णामृत (१)- चिन्तामणिर्जयति सोमगिरिर्गुरुर्मे- शिक्षागुरुश्च भगवान् शिखिपिच्छमौलिः। यत्पादकल्पतरुपल्लवशेखरेषु लीलास्वयम्वररसं लभते जयश्रीः॥५७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चिन्तामणिस্বরূপ सोमगिरि नामक जो मेरे गुरु हैं, वे जययुक्त हों। मेरे शिक्षागुरु मयूरपुच्छधारी भगवान् भी जययुक्त हों। उनके कल्पवृक्षरूप चरणकमलोंके पल्लवरूप नखोंके अग्रभागकी शोभासे आकृष्ट होकर जयश्री अर्थात् श्रीमती राधिका स्वयंवरसे उत्पन्न सुखका आस्वादन करती हैं॥५७॥ अनुभाष्य-'श्रीवल्लभ-दिग्विजय' ग्रन्थमें द्राविड़ त्रिदण्डि संन्यासी श्रीबिल्वमङ्गल ठाकुरका आविर्भावकाल अष्टम शताब्दी शकमें बतलाया गया है। बिल्वमङ्गलजीका द्वारकाधीश-विग्रहके प्रतिष्ठाता राजविष्णुस्वामीके प्रधान शिष्यके रूपमें उल्लेख किया गया है। बिल्वमङ्गलजीके शिष्य देवमङ्गल आदि हैं। बिल्वमङ्गलजीने सात सौ वर्षतक वृन्दावनमें ब्रह्मकुण्डके तटपर भजन किया था। वल्लभभट्टके साथ भेंट होनेके बाद उनके श्रीविग्रहकी पूजाका भार हरि-ब्रह्मचारीके ऊपर दे दिया गया। शङ्कर-सम्प्रदायकी द्वारका मठ तालिकामें भी चित्सुखाचार्य (कल्यब्द २७१५) बिल्वमङ्गलजीका नाम पाया जाता है। लीलाशुक श्रीबिल्वमङ्गल ठाकुरजीने अप्राकृत वृन्दावनकी लीलामें प्रवेशकी लालसासे श्रीकृष्णकर्णामृत-गीतके प्रारम्भमें तीन प्रकारके गुरुवर्गकी जयका उल्लेख किया है। २४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत