श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१/५५-५६ ] हूँ। और उनके नेत्रोंको अपना सौन्दर्य दिखलानेके लिये, उनकी नासिकामें अपने अङ्गोंकी सुगन्ध सुँघानेके लिये, उनके साथ वार्तालाप करते-करते उनके कानोंमें अपनी मधुर स्वररूपी अमृतकी लहरी उड़ेलनेके लिये, स्पर्श और आलिङ्गनादिके दानके द्वारा उनके अङ्गोंमें अपनी सुकुमारता और माधुर्य आदिका अनुभव करानेके लिये मैं अप्रविष्ट अर्थात् बाहरमें अवस्थानकर क्रीड़ा करता हूँ। मैं उन गुणातीत भक्तोंका परित्याग करनेमें असमर्थ हूँ, इसलिये उन भक्तोंके भीतर और बाहरमें परमासक्ति सहित मेरा नित्य विलास होता है। उन भक्तोंके जिस प्रकारके भावोंके द्वारा मैं वशीभूत होता हूँ, वे प्रेमाभक्ति नामक भाव ही रहस्य हैं॥५५॥ श्रीमद्भागवत (२/९/३५) — एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनात्मनः। अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा॥५६॥ अनुवाद—आत्मतत्त्वके जिज्ञासु व्यक्ति मेरे स्वरूपतत्त्वका अन्वय-व्यतिरेक क्रमसे अथवा विधि-निषेधके द्वारा विचार करके जो वस्तु सर्वत्र और सर्वदा नित्य है, उस विषयमें ही परिप्रश्न करेंगे॥५६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो आत्मतत्त्व जिज्ञासु हैं, वे लोग अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा इस विषयमें विचार करते हुए जो वस्तु सर्वत्र और सर्वदा नित्य है, उसीका ही अनुसन्धान करेंगे। तात्पर्य यह है कि प्रेम-रहस्य जिस उपायसे साधित होता है, उसका नाम साधन-भक्ति है। तत्त्वजिज्ञासु पुरुष सद्गुरु चरणाश्रय करके उनसे अन्वय-व्यतिरेक अर्थात् विधि-निषेधकी शिक्षा ग्रहण करते हुए तत्त्वानुशीलन करते-करते तत्त्वज्ञान प्राप्त करेंगे॥५६॥ श्रीमद्भागवतमें महाप्रभु श्रीचैतन्यदेवका मत सम्पूर्णरूपमें है। भागवत ग्रन्थमें अठारह हजार श्लोक हैं, उन सभी श्लोकोंमें जो कुछ भी है, उसका मूल ये चार श्लोक हैं। ‘अहमेव’ श्लोकमें भगवत्-तत्त्व, भगवत्-स्वरूप, उनके गुण और लीला संक्षेपमें वर्णित है। ‘ऋतेऽर्थं’ श्लोकमें भगवत्-स्वरूपतत्त्वसे पृथक्-रूपमें प्रतीत होनेवाले मायातत्त्व और उस मायातत्त्वके सम्बन्धजनित मायाशक्तिके वशमें होने योग्य जीवतत्त्व और जीवके भोगके योग्य जड़तत्त्वका विचार है। इन दो श्लोकोंके द्वारा सम्बन्धज्ञानको सम्पूर्णरूपसे जाना जा सकता है। ‘यथा महान्ति’ श्लोकमें जीव और जड़से भगवत्-तत्त्वका अचिन्त्यभेदाभेद होनेपर भी भगवान्का नित्यस्वरूपमें पृथक् अवस्थान और जीवका उनके चरणोंका आश्रय करके महाप्रेमम्पत्ति-लाभरूप परम प्रयोजन कहा गया है। ‘एतावदेव’ श्लोकमें उस परम प्रयोजनको प्राप्त करनेका एकमात्र उपाय साधनभक्तिको बतलाया गया है। साधनभक्तिके अन्तर्गत लक्ष्य प्राप्ति करानेवाली सभी विधियोंको अनुकूलभावमें ‘अन्वय’ कहा गया है। लक्ष्यप्राप्तिमें बाधकरूप प्रातिकूल्यजनक सभी क्रियायोंकी निषेधमें परिगणना करके ‘व्यतिरेक’ शब्दका प्रयोग किया गया है। साधनतत्त्वका नाम ‘अभिधेय’ है अर्थात् शास्त्रकी अभिधावृत्तिसे जो उपदेश प्राप्त होता है, उसे अभिधेय कहते हैं॥५३-५६॥ अनुभाष्य—आत्मनः (मम भगवतः) तत्त्वजिज्ञासुना (स्वस्य श्रेयःसाधने यथार्थ्यमनुभवितुमिच्छुना) एतावदेव जिज्ञास्यं (श्रीगुरुचरणेभ्यः शिक्षणीयम्) [किं तत्] यत् (एकमेव वस्तु) अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां (विधि-निषेधाभ्यां) पहला अध्याय | २३