श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १/५४-५५
नहीं है, वैसे लक्षणवाली वस्तु मुझ परमेश्वरका 'आभास' है। 'आभास' कहनेसे ज्योतिर्बिम्बके अपने प्रकाशसे दूरवर्ती प्रदेशमें उच्छलित जो एक प्रकारकी प्रतिच्छवि है, उसका ही बोध होता है। वह आभास जिस प्रकार ज्योतिर्बिम्बके बाहर ही प्रतीत होता है और ज्योतिर्बिम्बके बिना उसकी प्रतीति नहीं है, जीवमाया भी उसी प्रकार है। यहाँ 'तमः' शब्दके द्वारा पूर्वकथित तमःप्राय वर्णशाबल्य (अर्थात् वर्ण-वैचित्र्य) कथित हुआ है। जिस प्रकार मूल ज्योतिर्मय पदार्थमें अवस्थान ना करनेपर भी मूल ज्योतिर्वस्तुके आश्रयके बिना तमः की स्वतः सम्भावना नहीं है, उसी प्रकार परमार्थभूत भगवान्के अतिरिक्त तमोस्थानीय गुणमायाकी भी स्वतः प्रतीति नहीं है। जीवमाया और गुणमाया, इन दो प्रकारकी माया नामक शक्ति जानो॥५४॥
श्रीमद्भागवत (२/९/३४)- यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु। प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्॥५५॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस प्रकार समस्त महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) बृहद् और क्षुद्र (ब्रह्मासे एक चींटीतक) सभी जीवोंके भीतर प्रविष्ट (संलग्न) होकर भी अप्रविष्ट रूपमें (बाहर) स्वतन्त्र विद्यमान होते हैं, उसी प्रकार मैं भूतमय (भौतिक) जगत्में सभी जीवोंमें सत्त्वाश्रयरूप परमात्माके रूपमें प्रविष्ट होनेपर भी पृथक् भगवत् स्वरूपमें नित्य विराजमान होता हूँ और भक्तोंका एकमात्र प्रेमास्पद (प्रेमका विषय) हूँ। तात्पर्य यह है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, ये सभी महाभूत पाँच रूपोंमें होकर जैसे इस स्थूल-जगत्को प्रकाश करते हुए उसके उपकरण रूपमें उसके भीतर रहनेपर भी महाभूत अवस्थामें स्वतन्त्र हैं, इसी प्रकार चिन्मय परमेश्वर अपनी जड़शक्ति और जीवशक्तिके द्वारा जगत्की सृष्टि करके एकांशमें जगत्में सर्वव्यापी होकर रहनेपर भी युगपत् अर्थात् एक ही समयमें अपने चिद्धाममें पूर्ण चिन्मय-विग्रहरूपमें भी नित्य विराजमान रहते हैं। और चित्-विग्रहके किरण-परमाणुस्वरूप जीव शुद्ध-प्रेममार्गमें उनके विमल-प्रेमका आस्वादन करते हैं-यही रहस्य है॥५५॥ अनुभाष्य-यथा महान्ति भूतानि (आकाशादीनि) उच्चावचेषु भूतेषु (देवमनुष्यतिर्यगादिषु) अप्रविष्टानि (बहिःस्थितान्यपि) अनुप्रविष्टानि (अन्तःस्थितानि भान्ति), तथा [लोकातीत-वैकुण्ठ-स्थितत्वेन अप्रविष्टोऽपि] अहं तेषु (तत्तद्गुणविख्यातेषु) नतेषु (प्रणत-जनेषु) प्रविष्टो (हृदि स्थितः) [अहं भामि अन्तकरणेषु दर्शनं दातुम्; तथा अप्रविष्टः बहिः स्थितश्च तेषां नयनेषु स्वसौन्दर्यमर्पयितुं, नासासु स्वसौरभ्यं प्रवेशयितुं, तैः सहोक्तिप्रत्युक्तौ कुर्वन् तेषां कर्णेषु स्वसौस्वर्यामृतं पूरयितुं, स्पर्शनालिङ्गनादि-दानैस्तेषामङ्गेषु स्वीयसौकुमार्य-माधुर्यादिकं चानुभावयितुमिति तेषु गुणातीत-भक्तेषु अन्तर्बहिर्मया त्यक्तु प्रेम-भक्तिर्नाम-रहस्यमिति सूचितम्]। श्लोक-भावानुवाद-जिस प्रकार पञ्चमहाभूतादि देवता-मनुष्य-तिर्यगादिके बाहर स्थित होकर भी उनके भीतरमें अवस्थित होकर प्रकाशमान हैं, वैसे लोकातीत वैकुण्ठमें अवस्थित होनेके कारण अप्रविष्ट रहकर भी मैं (अपने-अपने गुणोंसे विख्यात) उन शरणागत भक्तोंके हृदयमें स्थित हूँ। [प्रणत भक्तोंके अन्तःकरणमें दर्शन प्रदान करनेके लिये ही मैं उनमें प्रविष्ट रहता
२२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत