श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 63, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअसत् अर्थात् कारण, इन दोनोंसे अतीत, जो ब्रह्म है, वह भी मुझसे पृथक् अन्य वस्तु नहीं है। प्रलयके समय विश्व-प्रपञ्चमें वैचित्र्य-हीनताके कारण निर्विशेष अचित्-मिश्रातीत चिन्मात्र रूपमें तथा वैकुण्ठमें चित्-विलासमय सविशेष भगवत्-रूपमें मैं ही विद्यमान था। सृष्टिके बाद भी मैं ही दोनों रूपोंमें रहूँगा, अर्थात् वैकुण्ठमें षडैश्वर्यपूर्ण सच्चिदानन्द-विग्रहके रूपमें और प्रापञ्चिक ब्रह्माण्डमें अन्तर्यामीके रूपमें। मुझसे अतिरिक्त अन्य (पृथक् सत्ताशील) वस्तु नहीं है। प्रलयके बाद भी जो अवशिष्ट रहता है, वह भी मैं ही हूँ। [कालसे अपरिवर्तनशील अनवरत श्रीकृष्णका नित्यलीलाविग्रह समस्तकालमें प्रकटित रहता है, यह अर्थ है]॥५३॥ श्रीमद्भागवत (२/९/३३)- ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तमः ॥५४॥ अनुवाद-वास्तव प्रयोजन तत्त्वके अतिरिक्त जो कुछ भी प्रतीत होता है अथवा सत्तायुक्त होनेपर भी मेरे अधिष्ठानमें जिसकी प्रतीति नहीं है, उसे ही मेरी माया समझो॥५४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पिछले श्लोकमें परमतत्त्वके स्वरूप-ज्ञानका निर्णय किया गया। किन्तु स्वरूपसे भिन्न तत्त्वका ज्ञान स्वरूपतत्त्वके ज्ञानको जब तक दृढ़ नहीं करता, तब तक वह विज्ञान नहीं होता। स्वरूपतत्त्वसे भिन्न तत्त्वका नाम 'माया' है। उसी मायातत्त्वका ज्ञान इस श्लोकमें वर्णन किया गया है। स्वरूपतत्त्व ही 'अर्थ' अर्थात् यथार्थ तत्त्व है। उस तत्त्वके बाहर जो प्रतीत होता है और उस स्वरूप-तत्त्वमें जिसकी प्रतीति नहीं है, उसीको ही आत्मतत्त्वके मायावैभव रूपमें जानना होगा। इस तत्त्वको समझना सहज नहीं है, इसलिये यहाँ दो प्रादेशिक उदाहरण दिये जा रहे हैं। स्वरूपतत्त्वको सूर्यके समान मानो। सूर्यसे भिन्न तत्त्व दो रूपोंमें प्रतीत होता है-एक रूप 'आभास' और दूसरा रूप 'तमः'। जब सूर्यकी प्रतिच्छवि जलसे किसी दूसरे स्थानमें पड़ती है, तो उसको 'आभास' कहा जाता है। सूर्यका प्रभाव जिस स्थानमें दिखलायी नहीं देता, उसको 'तमः' अथवा 'अन्धकार' कहा जाता है। चित्-जगत् भगवत्स्वरूपकी किरणस्वरूप है। उसके समान ही दिखायी देनेवाला आभासरूप मायावैभव है; यही आभासका उदाहरण है। चित्-तत्त्वसे बहुत दूर अन्धकार जो मायावैभव है; वही दूसरा उदाहरण है। तात्पर्य यह है कि आत्मतत्त्व और मायातत्त्वका परस्पर दो प्रकारका सम्बन्ध है; पहला सम्बन्ध इस प्रकार है-आत्मस्वरूपके अतिरिक्त जो भी अन्य स्वरूप प्रकाशित होता है, वह 'माया' है और आत्मस्वरूपसे बहुत दूर अनात्म अज्ञान भी माया है॥५४॥ अनुभाष्य-अर्थं (परमार्थभूतं मां) ऋते (बिना) यत् प्रतीयेत (मत्प्रतीतौ तत्प्रतीत्यभावात् मत्तो बहिरेव यस्य प्रतीतिरित्यर्थः), यच्चात्मनि न प्रतीयेत (यस्य च मदाश्रयत्वं बिना स्वतः प्रतीतिर्नास्तीत्यर्थः), तत् (तथालक्षणं वस्तु) आत्मनो (मम परमेश्वरस्य) यथाभासः (आभासो ज्योतिर्बिम्बस्य स्वीय-प्रकाशाद्व्यवहितप्रदेशे कथञ्चिदुच्छलितप्रतिच्छवि-विशेषः, स यथा तस्माद्वहिरेव प्रतीयते, न च तं बिना तस्य प्रतीतिस्तथा सा) यथा तमः ('तमःशब्देन तमःप्रायं वर्णशाबल्यमुच्यते' तद् यथा तन्मूलज्योतिष्सदपि तदाश्रयत्वं बिना न सम्भवति तद्वदियं) मायां (जीवमाया-गुणमायेति द्व्यात्मिकां मायाख्याशक्तिं) विद्यात् (जानीयात्)। श्लोक-भावानुवाद-मुझ परमार्थके बिना मेरी प्रतीतिमें जिस वस्तुकी प्रतीतिका अभाव है अर्थात् मेरे बाहरमें ही जिसकी प्रतीति है और मेरे आश्रयके बिना जिसकी स्वतः प्रतीति भी