श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १/५२-५३ गुण हैं, लक्ष्मीका पाणिग्रहण, गोवर्धनधारणादि जो लीलाएँ हैं, वे सभी प्रकारसे मेरी कृपासे तुम्हें यथार्थरूपमें अनुभव हों। [साधनभक्ति और प्रेमाभक्तिकी वृद्धिके तारतम्यसे मेरे इन रूप-गुण-लीलाके माधुर्यकी अनुभूतिमें तारतम्य उत्पन्न होता है। मेरे इस चतुर्भुजरूपसे भी अधिकतम-माधुर्यकी विशेषतासे युक्त परम-दुर्लभ कृष्ण-स्वरूपका तुम ब्रजभूमिमें साक्षात् अनुभव करोगे। जो लोग चतुःश्लोकके द्वारा केवल निर्विशेष स्वरूपकी व्याख्या करते हैं, उनकी भक्तिहीन इतर व्याख्या स्वयं ही परास्त हुई है]॥५२॥ श्रीमद्भागवत (२/९/३२)— अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत् सदसत्परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥५३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इस जगत्की सृष्टिके पूर्व केवल मैं ही था। सत्, असत् और अनिर्वचनीय निर्विशेष ब्रह्म तक कुछ भी मुझसे पृथक् रूपसे नहीं था। सृष्टि होनेके बाद इस सम्पूर्ण-स्वरूपमें मैं ही हूँ और सृष्टिकी प्रलय होनेके बाद भी एकमात्र मैं ही अवशिष्ट रहूँगा॥५३॥ अनुभाष्य-अहं (अहं-शब्देन तद्वक्ता मूर्त्त एवोच्यते, न तु निर्विशेषं ब्रह्म, तद्विषयत्वात्; आत्मज्ञानत्वात् पर्यकत्वे तु तत्त्वमसीतिवत् त्वमेवासीरित्येव वक्तु मनोहर-श्रीविग्रहोऽहम्) एव अग्रे (सृष्टेः पूर्वं महाप्रलयकालेऽपि) आसम्; अन्यत् न (न किञ्चित् आसीत्, “वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः”, “एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः” इत्यादि-श्रुतिभ्यः। वैकुण्ठतत्पार्षदादीनामपि तदुपाङ्गत्वादहंपदेनैव ग्रहणं-राजाऽसौ प्रयातीतिवत्); सदसत्परं (सत् कार्यं असत् कारणं तयोः परं) यत् (यद्ब्रह्म) तत् अन्यत् न (तन्न मत्तोऽन्यत्; यद्वा, तदानीं प्रपञ्चे विशेषाभावात् निर्विशेषचिन्मात्राकारेण, वैकुण्ठे तु सविशेषभगवद्रूपेण); पश्चात् (सृष्टेरनन्तरमपि) अहम् (एवास्मि, वैकुण्ठे तु भगवदाद्याकारेण, प्रपञ्चेषु अन्तर्याम्याकारेण); यदेतत् (विश्वं) तदप्यहमेवास्मि (मदनन्यत्वान्मदात्मकमेव) [तथा प्रलये] योऽवशिष्येत सोऽहमेवास्मि। [कालाव्यवच्छिन्न-नित्यलीलाविग्रहस्य श्रीकृष्णस्य सर्वकाले प्रकटतास्तीत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद-[‘अहं’ शब्दके द्वारा बतलाया जा रहा है कि श्लोकके वक्ता (श्रीभगवान्) मूर्त्तिविग्रह हैं, निर्विशेष ब्रह्म नहीं हैं। इसका कारण यह है कि आत्मज्ञानके तात्पर्यके विषयमें ‘तत्त्वमसि’-इस वेदवाक्यमें जिस प्रकार ‘तुम ही हो’ अर्थात् तुम्हारी पृथक् मूर्त्तिमत्ता है-यह कहना उपयुक्त है, उसी प्रकार श्रीभगवान्का स्वतन्त्र विग्रहवान् होना निश्चित है।] (अब हे ब्रह्मन्!) इस समय तुम्हारे निकट मैं परम मनोहर श्रीविग्रहविशिष्ट रूपमें प्रादुर्भूत हुआ हूँ। यह रूप सृष्टिसे पहले अर्थात् महाप्रलयकालमें भी वर्तमान था तथा कोई और नहीं था। [जैसा कि श्रुतियोंमें भी वर्णन है-“इस विश्वसृष्टिके पूर्व श्रीवासुदेव ही थे, ब्रह्मा अथवा शङ्कर कोई नहीं थे”, “एकमात्र श्रीनारायण ही थे, ब्रह्मा अथवा ईशान कोई भी नहीं थे।” “यह राजा जा रहा है”-ऐसा कहनेपर जिस प्रकार राजवेश पहनकर राजदण्ड, राजछत्र, सेना, मन्त्रियों और सेवकोंके साथ ही राजाका गमन समझा जाता है, उसी प्रकार ‘अहं’ पदके द्वारा श्रीभगवान्के वैकुण्ठादि धाम और उनके पार्षदादिको भी भगवान्के उपाङ्गके रूपमें ग्रहण करना होगा तथा उनकी भी स्थिति भगवान्के समान नित्य ही समझनी होगी।] सत् अर्थात् कार्य, २० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत