भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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१/५१-५२ ] है, उससे युक्त प्रेमभक्तिरूप और उस रहस्यके अङ्ग श्रवणादिरूप साधनभक्तियोग सम्बन्धज्ञानके सहित, ये तीनों बातें तुम्हारे ना पूछनेपर भी मैं कृपापूर्वक कह रहा हूँ, जिन्हें मैंने किसी अन्यको नहीं कहा है, तुम इन्हें ग्रहण करो॥५१॥ अमृताणुकणिका-भगवान्को जाननेके लिये ज्ञान, योगादि अनेक उपाय हैं, किन्तु इन उपायोंसे उन्हें सम्पूर्ण रूपसे नहीं जाना जा सकता। ज्ञानमार्गमें जो भगवान्के तत्त्वको जाननेका प्रयास करते हैं, वे उनके स्वरूपको सम्यक् रूपसे नहीं जान पाते, उन्हें केवल उनकी अङ्गकान्तिका सन्धानमात्र होता है। योगमार्गमें जो भगवान्का अनुसन्धान करते हैं, उनके द्वारा भगवान्के एक अंश-स्वरूपका ही सन्धानमात्र होता है। उनके स्वरूपको एकमात्र भक्तिके द्वारा ही जाना जा सकता है। बहुत कम लोग ही उनके स्वरूपको जान सकते हैं। इसलिये श्रीभगवान् ब्रह्माजीसे कह रहे हैं कि जो तत्त्व मैं प्रकाश करूँगा, वह परमगुह्य है। उस तत्त्वको तुम सुनकर स्मरण रख सकते हो, परन्तु स्वयं उसको अनुभव नहीं कर सकोगे। अन्तर्यामी रूपसे मेरे द्वारा चित्तमें अनुभव कराये बिना कोई भी मेरे तत्त्वको अनुभव नहीं कर सकता। मैं ही तुम्हारे चित्तमें अपने द्वारा कहे गये तत्त्व-ज्ञानको अनुभव करा रहा हूँ, तुम उसे ग्रहण करो। प्रेमभक्तिके बिना मेरे तत्त्व-ज्ञानका अनुभव नहीं हो सकता, मेरे स्वरूपकी पूर्ण उपलब्धि नहीं होती, इसलिये प्रेमभक्ति ही मेरे तत्त्वज्ञानका रहस्य है। जिसमें प्रेमभक्ति है, मेरी कृपासे एकमात्र वही व्यक्ति ही मेरे स्वरूपको अनुभव कर सकता है। मेरे तत्त्वज्ञानकी उपलब्धिकी कारणभूत प्रेमभक्ति प्राप्त करनेके लिये जो सभी उपाय सहायक हैं, वे भी मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। श्रवण-कीर्त्तनादि साधन-भक्तिके अनुष्ठानके द्वारा ही प्रेमभक्ति प्राप्त होती है। इसलिये साधन-भक्तिको तत्त्वज्ञानकी रहस्यरूपी प्रेमभक्तिका अङ्ग कहा गया है॥५१॥ श्रीमद्भागवत (२/९/३१)— यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः। तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ॥ ५२ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ५२ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरा स्वरूप, मेरा लक्षण, मेरा रूप, गुण और लीलाएँ जिस प्रकार हैं, उन सबका तत्त्वविज्ञान मेरी कृपासे तुम्हें प्राप्त हो॥ ५२ ॥ अनुभाष्य-यावान् (यत् प्रमाणकारः, यादृशस्थौल्याकार्श्यदैर्घ्यतुङ्गता- वृत्तताद्यौचित्यसंनिवेशविशिष्टावयवः स्वरूपतो यत्परिमाणकः), अहं यथाभावः (सत्ता यस्येति यल्लक्षणः) अहं यद्रूपगुणकर्मकः (यानि रूपाणि श्यामत्व-चतुर्भुजत्व-द्विभुजत्व-गौरत्व-कृष्णत्व-रामत्व-नृसिंहत्वादीनि, ये गुणाः भक्तवात्सल्याद्याः, यानि कर्माणि लक्ष्मीपरिग्रह-गोवर्द्धनोद्धरणादीनि यस्य सः) तथैव (तेन सर्वेण प्रकारेणैव) तत्त्वविज्ञानं (यथार्थानुभवः) मदनुग्रहात् ते (तव) अस्तु। [साधनभक्ति-प्रेमभक्त्योर्वृद्धितारतम्येनैव मद्रूप-गुण-लीला-माधुर्यानुभवतारतम्ये मत्स्वरूपादधिकतम-माधुर्यं परम-दुर्लभं कृष्णस्वरूपं मां व्रजभूमौ त्वं साक्षादनुभविष्यसि। एतेन चतुःश्लोक्यर्थस्य निर्विशेषपरत्वं स्वयमेव परास्तम्।]। श्लोक-भावानुवाद-जिस परिमाणमें मेरा आकार (स्वरूप) है अर्थात् मैं जैसी स्थूलता, कृशता, दीर्घता, उच्चता, गोलाकारादिके यथोचित सन्निवेशके द्वारा जिन अङ्गोंसे युक्त हूँ, मेरे जो लक्षण हैं, जो श्याम-चतुर्भुज-द्विभुज-गौर-कृष्ण-राम-नृसिंहादि मेरे रूप हैं, जो भक्तवात्सल्यादि पहला अध्याय | १९