श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 60, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १/४९-५१ अनुभाष्य-भगवान्से ही समस्त उत्पत्ति और प्रवृत्ति होती है, यह भली-भाँति जानते हुए जो निश्चल (अटल) भक्तियोगमें अवस्थित भजनशील पण्डितजन श्रीकृष्णमें अपने चित्त और प्राणको समर्पण करके परस्पर हृदयगत भावोंका आदान-प्रदान एवं श्रीहरिके विषयमें चर्चा करके श्रीकृष्णको प्रसन्नता एवं आनन्द प्रदान करते हैं और उन्हीं कथाओंमें रमण करते हैं, उनके सम्बन्धमें श्रीकृष्ण अर्जुनको यह श्लोक कह रहे हैं- तेषां सततयुक्तानां (नित्यमेव मत्सेवायोगाकाङ्क्षिणां) प्रीतिपूर्वकं (आदरेण) भजतां (त्यक्तान्याभिलाषकर्मज्ञानानां हरिसेवारतानां) तं बुद्धियोगं ददामि (तेषां हृद्वृत्तिषु अहमेव उद्भावयामि) येन ते मां उपयान्ति (लभन्ते)। (स बुद्धियोगः स्वतोऽन्यस्माच्च कुतश्चिदप्यधिगन्तुमशक्यः, किन्तु मदेकदेयस्तदेकग्राह्य इति भावः)। श्लोक-भावानुवाद-अन्य अभिलाषाओं और कर्म एवं ज्ञानके मार्गका त्यागकर नित्य ही मेरी सेवाके द्वारा मुझसे युक्त होनेकी आकाङ्क्षावाले आदरसहित मेरे भजन (सेवा) में रत भक्तोंके हृदयमें मैं ही ऐसी वृत्तिको उत्पन्न करता हूँ, जिसके द्वारा वे मुझे प्राप्त करते हैं। (वह बुद्धियोग अपने-आप अथवा अन्य किसीके द्वारा कभी भी नहीं प्राप्त होता है, किन्तु केवल मेरे द्वारा दिये जानेपर ही ग्रहण किया जा सकता है-यह भाव है)॥४९॥ यथा भगवान् ब्रह्मणे स्वयमुपदिश्यानुभावितवान्॥५०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान्ने स्वयं ब्रह्माको इस प्रकार उपदेशके द्वारा यह अनुभव करवाया था॥५०॥ श्रीमद्भागवत (२/९/३०)- ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञान-समन्वितम्। सरहस्यं तदङ्गञ्च गृहाण गदितं मया॥५१॥ अनुवाद-श्रीभगवान्ने ब्रह्माजीसे कहा-“हे ब्रह्मन्! मेरे स्वरूपकी उपलब्धिरूप विज्ञान और रहस्यमयी प्रेमाभक्तिके साथ शब्द-शास्त्रोंका प्रतिपाद्य मेरा अत्यन्त गोपनीय ज्ञान तथा उस प्रेमाभक्तिके अङ्ग-साधनभक्तिको मैं बतला रहा हूँ, तुम इसे ग्रहण करो॥”५१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विज्ञानसे युक्त रहस्य और उसके अङ्गयुक्त मेरा अत्यन्त गोपनीय ज्ञान तुम्हें कृपा करके मैं कह रहा हूँ, उसे तुम ग्रहण करो॥५१॥ अनुभाष्य-सृष्टि करनेके लिये इच्छा करके ब्रह्माजी अत्यधिक चिन्ता करने लगे। ‘तप’ इस दैववाणीका श्रवणकर निष्कपट तपस्यामें प्रवृत्त होकर ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुको प्रसन्न करके वैकुण्ठके दर्शन किये। ब्रह्माजीके (सृष्टिकर्त्ताके) अहङ्कारसे शून्य होकर तत्त्वजिज्ञासु होनेपर भगवान्ने ये छह श्लोक उनको सुनाये- मे (मम भगवतः) ज्ञानं परमगुह्यं (निर्विशेषब्रह्मज्ञानादेरपि श्रेष्ठतमं) विज्ञान-समन्वितं (न केवलं मद्रूपस्य ज्ञानं एव तुभ्यं ददामि, अपि तु कार्ष्णकृष्णविज्ञानेनानुभवेन युक्तं) सरहस्यं (तत्रापि रहस्यं यत् किमप्यस्ति, तेनापि सहितं प्रेमभक्तिरूपं) तदङ्गञ्च (तस्य रहस्यस्य अङ्गं श्रवणादिभक्तिरूपं साधनभक्तियोगं सम्बन्धज्ञानस्य सहायं) मया गदितं (त्वया अपृष्ठमपि एतत् त्रयं कृपयैव मया, न त्वन्येन कथितं सत्) गृहाण। श्लोक-भावानुवाद-मुझ भगवान्का, निर्विशेष ब्रह्मज्ञानसे भी श्रेष्ठतम, ना केवल अपने रूपका ही ज्ञान मैं दे रहा हूँ, अपितु सम्पूर्ण कृष्णविज्ञानके अनुभवसे युक्त जो कुछ भी वह रहस्य १८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत