भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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१/४७-४९ ] में भाषागत वैषम्य नहीं है [अर्थात् रूप और स्वरूप भिन्न शब्द होनेपर भी श्रीकृष्णके रूप और स्वरूपमें असमानता नहीं है]। दीक्षागुरु श्रीसनातन गोस्वामी श्रीमदनमोहनके चरणकमलोंको देनेवाले हैं। व्रजमें प्रवेशके अनाधिकारी भगवान्को भूले हुए मायाबद्ध जीवोंको वे भगवत्-चरणकमलोंकी सर्वस्व अनुभूति प्रदान करते हैं। शिक्षागुरु श्रीरूप गोस्वामी श्रीगोविन्ददेव और उनके प्रियजनोंकी चरणसेवाका अधिकार प्रदान करते हैं॥४७॥ श्रीमद्भागवत (११/२९/६)- नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश ब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुदः स्मरन्तः। योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्व- न्नाचार्य-चैत्त्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति॥४८॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे ईश (भगवान्)! ब्रह्माके समान आयु-प्राप्त कवि (विद्वान) भी आपकी स्मृतिजनित आनन्दके द्वारा आपके प्रति कृतज्ञता स्वीकार करनेमें समर्थ नहीं हो पाते, क्योंकि आप अपार कृपावशतः देहधारी जीवके समस्त अशुभोंके नाश और स्वगति प्रकाश करनेके लिये बाहरसे आचार्यरूपमें एवं भीतरसे अन्तर्यामीरूपमें अवस्थित हैं॥४८॥ अनुभाष्य-योगशास्त्रको विस्तारपूर्वक श्रवण करनेके उपरान्त उद्धवजी योगके पथको बहुत प्रयासयुक्त जानकर संक्षेपमें भगवान्से भक्तियोगके विषयमें जाननेके लिये उनको कह रहे हैं- हे ईश, तव कृतं (त्वत्कृतमुपकारं) स्मरन्तः (चिन्तयन्तः) ऋद्धमुदः (वर्धितपरमानन्दाः) कवयः (विवेकिनः) ब्रह्मायुषापि (ब्रह्मातुल्यमायुः प्राप्य भजन्तोऽपि) अपचितिं (प्रत्युपकारं आनृण्यं) नैव उपयन्ति (प्राप्नुवन्ति)। [यतः] यः (भवान्) बहिः आचार्यवपुषा (मन्त्रगुरुरूपेण शिक्षागुरुरूपेण वा) अन्तश्चैत्त्यवपुषा (अन्तर्यामीरूपेण) तनुभृतां (शरीरधारिणां जीवानां) अशुभं (कृष्णेतर विषयाभिनिवेशं) विधुन्वन् (निरस्यन्) स्वगतिं (आत्मस्वरूपं पार्षदत्वलक्षणां गतिं) व्यनक्ति (प्रकाशयति)। श्लोक-भावानुवाद-हे ईश, आपके द्वारा किये गये उपकारोंका स्मरण करके परमानन्दमें विभोर बुद्धिमान् लोग ब्रह्मातुल्य आयु प्राप्तकर भजन करते हुए भी आपके ऋणका शोधन नहीं कर सकते, क्योंकि आप बाहरसे मन्त्रगुरु (दीक्षागुरु) और शिक्षागुरुरूपमें एवं अन्तर्यामीरूपसे चैत्यगुरुरूपमें देहधारी जीवोंके श्रीकृष्णसेवाके अतिरिक्त अन्य विषयोंमें अभिनिवेशका नाश करके उनके भगवत्पार्षदरूप आत्मस्वरूपको प्रकाश करते हैं॥४८॥ श्रीमद्भगवद्गीता (१०/१०)- तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥४९॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नित्य भक्तियोगके द्वारा जो लोग प्रीतिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, मैं उनको शुद्धज्ञानजनित विमल-प्रेमयोग दान करता हूँ। वे लोग उस ज्ञानके द्वारा मेरे परमानन्द धामको प्राप्त करते हैं॥४९॥ पहला अध्याय | १७