श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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वस्तुतः श्रीगुरुदेव श्रीकृष्णचैतन्यके दास होनेपर भी शिष्यको अपनी अप्राकृत दृष्टिसे उनको श्रीगौरसुन्दरका प्रकाशविशेष ही जानना चाहिये। परन्तु श्रीकृष्णके नित्य सेव्य-सेवकभावसे रहित होकर गुरुदेव किसी अंशमें श्रीव्रजेन्द्रनन्दनके साथ लीलावैचित्र्यमें भिन्न नहीं हैं, ऐसा भी नहीं मानना है। निर्विशेषवादियोंके मतानुसार अप्राकृत अनुभूति (जगत्) में स्वगत-सजातीय-विजातीय जैसी कोई विशेषता नहीं है। उनके इस विचारका अनुगमन करके कोई भी भक्तिमान् वैष्णवाचार्य ऐसा कदापि नहीं कहते हैं कि गुरु और श्रीकृष्णमें किसी भी प्रकारसे भेद नहीं है, अपितु वे सदा अचिन्त्यभेदाभेद-तत्त्वका ही उपदेश करते हैं। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने गुरुदेवके सम्बन्धमें कहा है— “मुकुन्दप्रेष्ठत्वे गुरुवरं स्मर” अर्थात् “गुरुवरको मुकुन्दप्रियके रूपमें स्मरण करो।” श्रीजीव गोस्वामीने भक्ति सन्दर्भ (संख्या २१६) में लिखा है—“शुद्धभक्ताः श्रीगुरोः श्रीशिवस्य च भगवता सह अभेददृष्टिं तत् प्रियतम-त्वेनैव मन्यन्ते।” अर्थात् “कोई-कोई शुद्धभक्त श्रीगुरु और श्रीशिवमें भगवान्से अभेददृष्टि रखते हुए, उन्हें भगवान्का प्रिय ही मानते हैं।” श्रीजीव गोस्वामीके अनुगत श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुर श्रीगुरुदेव स्तोत्रमें कहते हैं—“साक्षाद्धरित्वेन समस्तशास्त्रैरुक्तस्तथा भाव्यत एव सद्भिः। किन्तु प्रभोर्यः प्रिय एव तस्य वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम्॥” अर्थात् “समस्त शास्त्रोंमें ही शिष्यकी दृष्टिमें गुरुदेवको साक्षात् ‘हरि’ के रूपमें वर्णन किया गया है और साधुलोग गुरुदेवको ऐसा ही मानते हैं, किन्तु जो सर्वदा प्रकाशस्वरूप होकर श्रीकृष्णचैतन्यदेवके प्रिय-सेवक हैं, उन श्रीगुरुदेवके चरणकमलोंकी मैं, गुरुका नित्यदास, वन्दना करता हूँ।” गौड़ीय वैष्णवमात्र ही आश्रय-विग्रह श्रीगुरुदेवको ‘तदीय’ जानकर गुरुदेवका ध्यान करते हैं और समस्त प्राचीन उपासना-पद्धतियों और शुद्धभजन-गीतोंमें श्रीगुरुदेवको श्रीमती राधिकाकी प्रियसखी अथवा श्रीनित्यानन्दप्रभुका स्वरूप-प्रकाश कहकर निर्देश किया गया है॥४६॥ (२) शिक्षागुरु तत्त्व; उनके दो रूप (क) चैत्यगुरु, (ख) महन्तगुरु :— शिक्षागुरुके त' जानि कृष्णेर स्वरूप। अन्तर्यामी, भक्तश्रेष्ठ,-एइ दुइ रूप॥४७॥ अनुवाद—शिक्षागुरुको श्रीकृष्णका स्वरूप ही समझना चाहिये। वे अन्तर्यामी परमात्मा (चैत्यगुरु) और भक्तोंमें श्रेष्ठ भक्त (महान्तगुरु), इन दो रूपोंमें प्रकाशित होते हैं॥४७॥ अनुभाष्य—जो हरिभजनकी शिक्षा देते हैं, वे शिक्षा गुरु हैं। भजनहीन दुराचारी व्यक्ति कभी भी गुरु अथवा आचार्य नहीं हो सकते हैं। शिक्षा-प्रदाता दो प्रकारके होते हैं, भजनानन्दी महान्तगुरु और भजन अनुकूल विवेक प्रदान करनेवाले चैत्यगुरु। साध्य और साधनके भेदसे भजन-शिक्षामें भी भेद होता है। श्रीकृष्ण-प्रदाता श्रीगुरुदेव, शिष्यका सम्बन्ध-ज्ञान समृद्धकर उसके हृदयमें अपनी सेवा-अनुभूतियोंको प्रकाशित करते हैं। शिष्य दीक्षागुरुका अनुग्रह (मन्त्रदीक्षा) प्राप्तकर शिक्षागुरुसे भली-भाँति विष्णुसेवाकी जो शिक्षा प्राप्त करते हैं, उसीको ‘अभिधेय’ कहते हैं। आश्रय-विग्रह-शिक्षागुरु अभिधेय-विग्रह हैं, इसलिये वे आश्रय-विग्रह सम्बन्ध-ज्ञानप्रदाता दीक्षागुरुसे पृथक् नहीं हैं। दोनों ही श्रीगुरुदेव हैं। उनके प्रति छोटे-बड़ेके भावको हृदयमें धारण करना अथवा प्रदर्शन करना अपराध है। श्रीकृष्णके ‘रूप’ और ‘स्वरूप’
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