भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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१/४६ ] श्रीमद्भागवत (११/१७/२७)— आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्। न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः॥ ४६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान् श्रीकृष्णने उद्धवसे कहा—“हे उद्धव! गुरुदेवको मेरा स्वरूप जानो। गुरुमें सामान्य नरबुद्धि रखकर असूया अर्थात् उनका अनादर कभी नहीं करना चाहिये। गुरु सर्वदेवमय हैं॥” ४६॥ अनुभाष्य—वर्णाश्रम धर्मका पालन करनेवाले और इनके अतिरिक्त अन्य लोगोंके श्रीकृष्णभक्ति-लक्षणरूप स्वधर्मके विषयमें श्रवण करनेके पश्चात् उद्धवजीने उस भक्तिके अनुष्ठानके विषयमें भगवान् श्रीकृष्णसे प्रश्न किया। तब भगवान् श्रीकृष्णने वर्णोंके स्वभाव वर्णन करते हुए ब्रह्मचारियोंके गुरुकुलवासके प्रसङ्गमें गुरुके प्रति व्यवहारके विषयमें कहा— आचार्यं (गुरुं) मां (मदीयप्रेष्ठं) विजानीयात्। कर्हिचित् (कदापि) न अवमन्येत (यत्र कुत्र कारणोदयेऽपि न गर्हयेत्)। [यतः] गुरुः सर्वदेवमयः, [तं] मर्त्यबुद्ध्या (औपाधिक-जड़-देशकाल-पात्रावच्छिन्नधिया) न असूयेत (निज-प्राकृतजाड्येन मत्सरो भूत्वा आत्मसमं न भावयेत्)। श्लोक-भावानुवाद—गुरुको मेरा अति प्रिय मानो। (अपनी प्राकृत इन्द्रियोंके द्वारा उनके बाह्य आचरणको देखकर) जब कभी कोई कारण भी उदय हो, कदापि उनकी निन्दा मत करना, क्योंकि गुरुमें सभी देवताओंका वास है। अपनी स्वाभाविक जड़बुद्धिसे ईर्ष्यालु होकर उन्हें अपने समान जड़ देश-काल-पात्रकी उपाधिके अधीन नहीं समझना चाहिये। मनुसंहिता (२/१४०)— “उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद्विजः। सकल्पं सरहस्यञ्च तमाचार्यं प्रचक्षते॥” अर्थात् “जो शिष्यका उपनयन (जनेऊ संस्कार) कराकर दूसरा जन्म देता है और उसे वेदकी शिक्षा देता है, उस व्यवहारिक तथा गूढ़ रहस्यपरक शिक्षा प्रदाताको आचार्य कहा जाता है।” वायुपुराण— “आचिनोति यः शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि। स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन कीर्त्तितः॥” अर्थात् “जो शिष्यके व्यवहारमें शास्त्रोंके अर्थको स्थापित करता है और स्वयं भी उसका आचरण करता है, वह आचार्य है।” श्रीभगवान् ही आचार्यरूपमें शिष्योंके निकट प्रकाशित होते हैं। आचार्यके आचरणमें हरिसेवाके अतिरिक्त दूसरा कोई कार्य नहीं है। वे साक्षात् आश्रय-विग्रह हैं। यदि कोई हरिसेवाविमुख होकर अपनेको आचार्य होनेका अभिमान करता है, तो उसके इस सुदुराचारको कोई भी सदाचारके रूपमें ग्रहण नहीं करता। आचार्यका अनन्य (ऐकान्तिक) भजन ही उनका भगवत्-प्रकाश होनेका परिचय है। भोगोंसे असन्तुष्ट होकर इन्द्रिय-सुखपरायण लोग आचार्यके सुष्ठु (दोषरहित) आचरणसे भी ईर्ष्या करते हैं। आचार्यदेव सेव्य-भगवान्के अभिन्न अङ्ग हैं, इसलिये उनके प्रति विद्वेष-भावका पोषण करनेवाले जीव भगवान् और उनके परिकरोंकी कृपासे वञ्चित होकर दुर्गति को प्राप्त होते हैं। पहला अध्याय | १५