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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

१/४६ ] श्रीमद्भागवत (११/१७/२७)— आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्। न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः॥ ४६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान् श्रीकृष्णने उद्धवसे कहा—“हे उद्धव! गुरुदेवको मेरा स्वरूप जानो। गुरुमें सामान्य नरबुद्धि रखकर असूया अर्थात् उनका अनादर कभी नहीं करना चाहिये। गुरु सर्वदेवमय हैं॥” ४६॥ अनुभाष्य—वर्णाश्रम धर्मका पालन करनेवाले और इनके अतिरिक्त अन्य लोगोंके श्रीकृष्णभक्ति-लक्षणरूप स्वधर्मके विषयमें श्रवण करनेके पश्चात् उद्धवजीने उस भक्तिके अनुष्ठानके विषयमें भगवान् श्रीकृष्णसे प्रश्न किया। तब भगवान् श्रीकृष्णने वर्णोंके स्वभाव वर्णन करते हुए ब्रह्मचारियोंके गुरुकुलवासके प्रसङ्गमें गुरुके प्रति व्यवहारके विषयमें कहा— आचार्यं (गुरुं) मां (मदीयप्रेष्ठं) विजानीयात्। कर्हिचित् (कदापि) न अवमन्येत (यत्र कुत्र कारणोदयेऽपि न गर्हयेत्)। [यतः] गुरुः सर्वदेवमयः, [तं] मर्त्यबुद्ध्या (औपाधिक-जड़-देशकाल-पात्रावच्छिन्नधिया) न असूयेत (निज-प्राकृतजाड्येन मत्सरो भूत्वा आत्मसमं न भावयेत्)। श्लोक-भावानुवाद—गुरुको मेरा अति प्रिय मानो। (अपनी प्राकृत इन्द्रियोंके द्वारा उनके बाह्य आचरणको देखकर) जब कभी कोई कारण भी उदय हो, कदापि उनकी निन्दा मत करना, क्योंकि गुरुमें सभी देवताओंका वास है। अपनी स्वाभाविक जड़बुद्धिसे ईर्ष्यालु होकर उन्हें अपने समान जड़ देश-काल-पात्रकी उपाधिके अधीन नहीं समझना चाहिये। मनुसंहिता (२/१४०)— “उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद्विजः। सकल्पं सरहस्यञ्च तमाचार्यं प्रचक्षते॥” अर्थात् “जो शिष्यका उपनयन (जनेऊ संस्कार) कराकर दूसरा जन्म देता है और उसे वेदकी शिक्षा देता है, उस व्यवहारिक तथा गूढ़ रहस्यपरक शिक्षा प्रदाताको आचार्य कहा जाता है।” वायुपुराण— “आचिनोति यः शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि। स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन कीर्त्तितः॥” अर्थात् “जो शिष्यके व्यवहारमें शास्त्रोंके अर्थको स्थापित करता है और स्वयं भी उसका आचरण करता है, वह आचार्य है।” श्रीभगवान् ही आचार्यरूपमें शिष्योंके निकट प्रकाशित होते हैं। आचार्यके आचरणमें हरिसेवाके अतिरिक्त दूसरा कोई कार्य नहीं है। वे साक्षात् आश्रय-विग्रह हैं। यदि कोई हरिसेवाविमुख होकर अपनेको आचार्य होनेका अभिमान करता है, तो उसके इस सुदुराचारको कोई भी सदाचारके रूपमें ग्रहण नहीं करता। आचार्यका अनन्य (ऐकान्तिक) भजन ही उनका भगवत्-प्रकाश होनेका परिचय है। भोगोंसे असन्तुष्ट होकर इन्द्रिय-सुखपरायण लोग आचार्यके सुष्ठु (दोषरहित) आचरणसे भी ईर्ष्या करते हैं। आचार्यदेव सेव्य-भगवान्के अभिन्न अङ्ग हैं, इसलिये उनके प्रति विद्वेष-भावका पोषण करनेवाले जीव भगवान् और उनके परिकरोंकी कृपासे वञ्चित होकर दुर्गति को प्राप्त होते हैं। पहला अध्याय | १५

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वस्तुतः श्रीगुरुदेव श्रीकृष्णचैतन्यके दास होनेपर भी शिष्यको अपनी अप्राकृत दृष्टिसे उनको श्रीगौरसुन्दरका प्रकाशविशेष ही जानना चाहिये। परन्तु श्रीकृष्णके नित्य सेव्य-सेवकभावसे रहित होकर गुरुदेव किसी अंशमें श्रीव्रजेन्द्रनन्दनके साथ लीलावैचित्र्यमें भिन्न नहीं हैं, ऐसा भी नहीं मानना है। निर्विशेषवादियोंके मतानुसार अप्राकृत अनुभूति (जगत्) में स्वगत-सजातीय-विजातीय जैसी कोई विशेषता नहीं है। उनके इस विचारका अनुगमन करके कोई भी भक्तिमान् वैष्णवाचार्य ऐसा कदापि नहीं कहते हैं कि गुरु और श्रीकृष्णमें किसी भी प्रकारसे भेद नहीं है, अपितु वे सदा अचिन्त्यभेदाभेद-तत्त्वका ही उपदेश करते हैं। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने गुरुदेवके सम्बन्धमें कहा है— “मुकुन्दप्रेष्ठत्वे गुरुवरं स्मर” अर्थात् “गुरुवरको मुकुन्दप्रियके रूपमें स्मरण करो।” श्रीजीव गोस्वामीने भक्ति सन्दर्भ (संख्या २१६) में लिखा है—“शुद्धभक्ताः श्रीगुरोः श्रीशिवस्य च भगवता सह अभेददृष्टिं तत् प्रियतम-त्वेनैव मन्यन्ते।” अर्थात् “कोई-कोई शुद्धभक्त श्रीगुरु और श्रीशिवमें भगवान्‌से अभेददृष्टि रखते हुए, उन्हें भगवान्‌का प्रिय ही मानते हैं।” श्रीजीव गोस्वामीके अनुगत श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुर श्रीगुरुदेव स्तोत्रमें कहते हैं—“साक्षाद्धरित्वेन समस्तशास्त्रैरुक्तस्तथा भाव्यत एव सद्भिः। किन्तु प्रभोर्यः प्रिय एव तस्य वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम्॥” अर्थात् “समस्त शास्त्रोंमें ही शिष्यकी दृष्टिमें गुरुदेवको साक्षात् ‘हरि’ के रूपमें वर्णन किया गया है और साधुलोग गुरुदेवको ऐसा ही मानते हैं, किन्तु जो सर्वदा प्रकाशस्वरूप होकर श्रीकृष्णचैतन्यदेवके प्रिय-सेवक हैं, उन श्रीगुरुदेवके चरणकमलोंकी मैं, गुरुका नित्यदास, वन्दना करता हूँ।” गौड़ीय वैष्णवमात्र ही आश्रय-विग्रह श्रीगुरुदेवको ‘तदीय’ जानकर गुरुदेवका ध्यान करते हैं और समस्त प्राचीन उपासना-पद्धतियों और शुद्धभजन-गीतोंमें श्रीगुरुदेवको श्रीमती राधिकाकी प्रियसखी अथवा श्रीनित्यानन्दप्रभुका स्वरूप-प्रकाश कहकर निर्देश किया गया है॥४६॥ (२) शिक्षागुरु तत्त्व; उनके दो रूप (क) चैत्यगुरु, (ख) महन्तगुरु :— शिक्षागुरुके त' जानि कृष्णेर स्वरूप। अन्तर्यामी, भक्तश्रेष्ठ,-एइ दुइ रूप॥४७॥ अनुवाद—शिक्षागुरुको श्रीकृष्णका स्वरूप ही समझना चाहिये। वे अन्तर्यामी परमात्मा (चैत्यगुरु) और भक्तोंमें श्रेष्ठ भक्त (महान्तगुरु), इन दो रूपोंमें प्रकाशित होते हैं॥४७॥ अनुभाष्य—जो हरिभजनकी शिक्षा देते हैं, वे शिक्षा गुरु हैं। भजनहीन दुराचारी व्यक्ति कभी भी गुरु अथवा आचार्य नहीं हो सकते हैं। शिक्षा-प्रदाता दो प्रकारके होते हैं, भजनानन्दी महान्तगुरु और भजन अनुकूल विवेक प्रदान करनेवाले चैत्यगुरु। साध्य और साधनके भेदसे भजन-शिक्षामें भी भेद होता है। श्रीकृष्ण-प्रदाता श्रीगुरुदेव, शिष्यका सम्बन्ध-ज्ञान समृद्धकर उसके हृदयमें अपनी सेवा-अनुभूतियोंको प्रकाशित करते हैं। शिष्य दीक्षागुरुका अनुग्रह (मन्त्रदीक्षा) प्राप्तकर शिक्षागुरुसे भली-भाँति विष्णुसेवाकी जो शिक्षा प्राप्त करते हैं, उसीको ‘अभिधेय’ कहते हैं। आश्रय-विग्रह-शिक्षागुरु अभिधेय-विग्रह हैं, इसलिये वे आश्रय-विग्रह सम्बन्ध-ज्ञानप्रदाता दीक्षागुरुसे पृथक् नहीं हैं। दोनों ही श्रीगुरुदेव हैं। उनके प्रति छोटे-बड़ेके भावको हृदयमें धारण करना अथवा प्रदर्शन करना अपराध है। श्रीकृष्णके ‘रूप’ और ‘स्वरूप’

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१/४७-४९ ] में भाषागत वैषम्य नहीं है [अर्थात् रूप और स्वरूप भिन्न शब्द होनेपर भी श्रीकृष्णके रूप और स्वरूपमें असमानता नहीं है]। दीक्षागुरु श्रीसनातन गोस्वामी श्रीमदनमोहनके चरणकमलोंको देनेवाले हैं। व्रजमें प्रवेशके अनाधिकारी भगवान्को भूले हुए मायाबद्ध जीवोंको वे भगवत्-चरणकमलोंकी सर्वस्व अनुभूति प्रदान करते हैं। शिक्षागुरु श्रीरूप गोस्वामी श्रीगोविन्ददेव और उनके प्रियजनोंकी चरणसेवाका अधिकार प्रदान करते हैं॥४७॥ श्रीमद्भागवत (११/२९/६)- नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश ब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुदः स्मरन्तः। योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्व- न्नाचार्य-चैत्त्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति॥४८॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे ईश (भगवान्)! ब्रह्माके समान आयु-प्राप्त कवि (विद्वान) भी आपकी स्मृतिजनित आनन्दके द्वारा आपके प्रति कृतज्ञता स्वीकार करनेमें समर्थ नहीं हो पाते, क्योंकि आप अपार कृपावशतः देहधारी जीवके समस्त अशुभोंके नाश और स्वगति प्रकाश करनेके लिये बाहरसे आचार्यरूपमें एवं भीतरसे अन्तर्यामीरूपमें अवस्थित हैं॥४८॥ अनुभाष्य-योगशास्त्रको विस्तारपूर्वक श्रवण करनेके उपरान्त उद्धवजी योगके पथको बहुत प्रयासयुक्त जानकर संक्षेपमें भगवान्से भक्तियोगके विषयमें जाननेके लिये उनको कह रहे हैं- हे ईश, तव कृतं (त्वत्कृतमुपकारं) स्मरन्तः (चिन्तयन्तः) ऋद्धमुदः (वर्धितपरमानन्दाः) कवयः (विवेकिनः) ब्रह्मायुषापि (ब्रह्मातुल्यमायुः प्राप्य भजन्तोऽपि) अपचितिं (प्रत्युपकारं आनृण्यं) नैव उपयन्ति (प्राप्नुवन्ति)। [यतः] यः (भवान्) बहिः आचार्यवपुषा (मन्त्रगुरुरूपेण शिक्षागुरुरूपेण वा) अन्तश्चैत्त्यवपुषा (अन्तर्यामीरूपेण) तनुभृतां (शरीरधारिणां जीवानां) अशुभं (कृष्णेतर विषयाभिनिवेशं) विधुन्वन् (निरस्यन्) स्वगतिं (आत्मस्वरूपं पार्षदत्वलक्षणां गतिं) व्यनक्ति (प्रकाशयति)। श्लोक-भावानुवाद-हे ईश, आपके द्वारा किये गये उपकारोंका स्मरण करके परमानन्दमें विभोर बुद्धिमान् लोग ब्रह्मातुल्य आयु प्राप्तकर भजन करते हुए भी आपके ऋणका शोधन नहीं कर सकते, क्योंकि आप बाहरसे मन्त्रगुरु (दीक्षागुरु) और शिक्षागुरुरूपमें एवं अन्तर्यामीरूपसे चैत्यगुरुरूपमें देहधारी जीवोंके श्रीकृष्णसेवाके अतिरिक्त अन्य विषयोंमें अभिनिवेशका नाश करके उनके भगवत्पार्षदरूप आत्मस्वरूपको प्रकाश करते हैं॥४८॥ श्रीमद्भगवद्गीता (१०/१०)- तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥४९॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नित्य भक्तियोगके द्वारा जो लोग प्रीतिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, मैं उनको शुद्धज्ञानजनित विमल-प्रेमयोग दान करता हूँ। वे लोग उस ज्ञानके द्वारा मेरे परमानन्द धामको प्राप्त करते हैं॥४९॥ पहला अध्याय | १७

[ १/४९-५१ अनुभाष्य-भगवान्से ही समस्त उत्पत्ति और प्रवृत्ति होती है, यह भली-भाँति जानते हुए जो निश्चल (अटल) भक्तियोगमें अवस्थित भजनशील पण्डितजन श्रीकृष्णमें अपने चित्त और प्राणको समर्पण करके परस्पर हृदयगत भावोंका आदान-प्रदान एवं श्रीहरिके विषयमें चर्चा करके श्रीकृष्णको प्रसन्नता एवं आनन्द प्रदान करते हैं और उन्हीं कथाओंमें रमण करते हैं, उनके सम्बन्धमें श्रीकृष्ण अर्जुनको यह श्लोक कह रहे हैं- तेषां सततयुक्तानां (नित्यमेव मत्सेवायोगाकाङ्क्षिणां) प्रीतिपूर्वकं (आदरेण) भजतां (त्यक्तान्याभिलाषकर्मज्ञानानां हरिसेवारतानां) तं बुद्धियोगं ददामि (तेषां हृद्वृत्तिषु अहमेव उद्भावयामि) येन ते मां उपयान्ति (लभन्ते)। (स बुद्धियोगः स्वतोऽन्यस्माच्च कुतश्चिदप्यधिगन्तुमशक्यः, किन्तु मदेकदेयस्तदेकग्राह्य इति भावः)। श्लोक-भावानुवाद-अन्य अभिलाषाओं और कर्म एवं ज्ञानके मार्गका त्यागकर नित्य ही मेरी सेवाके द्वारा मुझसे युक्त होनेकी आकाङ्क्षावाले आदरसहित मेरे भजन (सेवा) में रत भक्तोंके हृदयमें मैं ही ऐसी वृत्तिको उत्पन्न करता हूँ, जिसके द्वारा वे मुझे प्राप्त करते हैं। (वह बुद्धियोग अपने-आप अथवा अन्य किसीके द्वारा कभी भी नहीं प्राप्त होता है, किन्तु केवल मेरे द्वारा दिये जानेपर ही ग्रहण किया जा सकता है-यह भाव है)॥४९॥ यथा भगवान् ब्रह्मणे स्वयमुपदिश्यानुभावितवान्॥५०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान्ने स्वयं ब्रह्माको इस प्रकार उपदेशके द्वारा यह अनुभव करवाया था॥५०॥ श्रीमद्भागवत (२/९/३०)- ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञान-समन्वितम्। सरहस्यं तदङ्गञ्च गृहाण गदितं मया॥५१॥ अनुवाद-श्रीभगवान्ने ब्रह्माजीसे कहा-“हे ब्रह्मन्! मेरे स्वरूपकी उपलब्धिरूप विज्ञान और रहस्यमयी प्रेमाभक्तिके साथ शब्द-शास्त्रोंका प्रतिपाद्य मेरा अत्यन्त गोपनीय ज्ञान तथा उस प्रेमाभक्तिके अङ्ग-साधनभक्तिको मैं बतला रहा हूँ, तुम इसे ग्रहण करो॥”५१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विज्ञानसे युक्त रहस्य और उसके अङ्गयुक्त मेरा अत्यन्त गोपनीय ज्ञान तुम्हें कृपा करके मैं कह रहा हूँ, उसे तुम ग्रहण करो॥५१॥ अनुभाष्य-सृष्टि करनेके लिये इच्छा करके ब्रह्माजी अत्यधिक चिन्ता करने लगे। ‘तप’ इस दैववाणीका श्रवणकर निष्कपट तपस्यामें प्रवृत्त होकर ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुको प्रसन्न करके वैकुण्ठके दर्शन किये। ब्रह्माजीके (सृष्टिकर्त्ताके) अहङ्कारसे शून्य होकर तत्त्वजिज्ञासु होनेपर भगवान्ने ये छह श्लोक उनको सुनाये- मे (मम भगवतः) ज्ञानं परमगुह्यं (निर्विशेषब्रह्मज्ञानादेरपि श्रेष्ठतमं) विज्ञान-समन्वितं (न केवलं मद्रूपस्य ज्ञानं एव तुभ्यं ददामि, अपि तु कार्ष्णकृष्णविज्ञानेनानुभवेन युक्तं) सरहस्यं (तत्रापि रहस्यं यत् किमप्यस्ति, तेनापि सहितं प्रेमभक्तिरूपं) तदङ्गञ्च (तस्य रहस्यस्य अङ्गं श्रवणादिभक्तिरूपं साधनभक्तियोगं सम्बन्धज्ञानस्य सहायं) मया गदितं (त्वया अपृष्ठमपि एतत् त्रयं कृपयैव मया, न त्वन्येन कथितं सत्) गृहाण। श्लोक-भावानुवाद-मुझ भगवान्का, निर्विशेष ब्रह्मज्ञानसे भी श्रेष्ठतम, ना केवल अपने रूपका ही ज्ञान मैं दे रहा हूँ, अपितु सम्पूर्ण कृष्णविज्ञानके अनुभवसे युक्त जो कुछ भी वह रहस्य १८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

१/५१-५२ ] है, उससे युक्त प्रेमभक्तिरूप और उस रहस्यके अङ्ग श्रवणादिरूप साधनभक्तियोग सम्बन्धज्ञानके सहित, ये तीनों बातें तुम्हारे ना पूछनेपर भी मैं कृपापूर्वक कह रहा हूँ, जिन्हें मैंने किसी अन्यको नहीं कहा है, तुम इन्हें ग्रहण करो॥५१॥ अमृताणुकणिका-भगवान्को जाननेके लिये ज्ञान, योगादि अनेक उपाय हैं, किन्तु इन उपायोंसे उन्हें सम्पूर्ण रूपसे नहीं जाना जा सकता। ज्ञानमार्गमें जो भगवान्के तत्त्वको जाननेका प्रयास करते हैं, वे उनके स्वरूपको सम्यक् रूपसे नहीं जान पाते, उन्हें केवल उनकी अङ्गकान्तिका सन्धानमात्र होता है। योगमार्गमें जो भगवान्का अनुसन्धान करते हैं, उनके द्वारा भगवान्के एक अंश-स्वरूपका ही सन्धानमात्र होता है। उनके स्वरूपको एकमात्र भक्तिके द्वारा ही जाना जा सकता है। बहुत कम लोग ही उनके स्वरूपको जान सकते हैं। इसलिये श्रीभगवान् ब्रह्माजीसे कह रहे हैं कि जो तत्त्व मैं प्रकाश करूँगा, वह परमगुह्य है। उस तत्त्वको तुम सुनकर स्मरण रख सकते हो, परन्तु स्वयं उसको अनुभव नहीं कर सकोगे। अन्तर्यामी रूपसे मेरे द्वारा चित्तमें अनुभव कराये बिना कोई भी मेरे तत्त्वको अनुभव नहीं कर सकता। मैं ही तुम्हारे चित्तमें अपने द्वारा कहे गये तत्त्व-ज्ञानको अनुभव करा रहा हूँ, तुम उसे ग्रहण करो। प्रेमभक्तिके बिना मेरे तत्त्व-ज्ञानका अनुभव नहीं हो सकता, मेरे स्वरूपकी पूर्ण उपलब्धि नहीं होती, इसलिये प्रेमभक्ति ही मेरे तत्त्वज्ञानका रहस्य है। जिसमें प्रेमभक्ति है, मेरी कृपासे एकमात्र वही व्यक्ति ही मेरे स्वरूपको अनुभव कर सकता है। मेरे तत्त्वज्ञानकी उपलब्धिकी कारणभूत प्रेमभक्ति प्राप्त करनेके लिये जो सभी उपाय सहायक हैं, वे भी मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। श्रवण-कीर्त्तनादि साधन-भक्तिके अनुष्ठानके द्वारा ही प्रेमभक्ति प्राप्त होती है। इसलिये साधन-भक्तिको तत्त्वज्ञानकी रहस्यरूपी प्रेमभक्तिका अङ्ग कहा गया है॥५१॥ श्रीमद्भागवत (२/९/३१)— यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः। तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ॥ ५२ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ५२ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरा स्वरूप, मेरा लक्षण, मेरा रूप, गुण और लीलाएँ जिस प्रकार हैं, उन सबका तत्त्वविज्ञान मेरी कृपासे तुम्हें प्राप्त हो॥ ५२ ॥ अनुभाष्य-यावान् (यत् प्रमाणकारः, यादृशस्थौल्याकार्श्यदैर्घ्यतुङ्गता- वृत्तताद्यौचित्यसंनिवेशविशिष्टावयवः स्वरूपतो यत्परिमाणकः), अहं यथाभावः (सत्ता यस्येति यल्लक्षणः) अहं यद्रूपगुणकर्मकः (यानि रूपाणि श्यामत्व-चतुर्भुजत्व-द्विभुजत्व-गौरत्व-कृष्णत्व-रामत्व-नृसिंहत्वादीनि, ये गुणाः भक्तवात्सल्याद्याः, यानि कर्माणि लक्ष्मीपरिग्रह-गोवर्द्धनोद्धरणादीनि यस्य सः) तथैव (तेन सर्वेण प्रकारेणैव) तत्त्वविज्ञानं (यथार्थानुभवः) मदनुग्रहात् ते (तव) अस्तु। [साधनभक्ति-प्रेमभक्त्योर्वृद्धितारतम्येनैव मद्रूप-गुण-लीला-माधुर्यानुभवतारतम्ये मत्स्वरूपादधिकतम-माधुर्यं परम-दुर्लभं कृष्णस्वरूपं मां व्रजभूमौ त्वं साक्षादनुभविष्यसि। एतेन चतुःश्लोक्यर्थस्य निर्विशेषपरत्वं स्वयमेव परास्तम्।]। श्लोक-भावानुवाद-जिस परिमाणमें मेरा आकार (स्वरूप) है अर्थात् मैं जैसी स्थूलता, कृशता, दीर्घता, उच्चता, गोलाकारादिके यथोचित सन्निवेशके द्वारा जिन अङ्गोंसे युक्त हूँ, मेरे जो लक्षण हैं, जो श्याम-चतुर्भुज-द्विभुज-गौर-कृष्ण-राम-नृसिंहादि मेरे रूप हैं, जो भक्तवात्सल्यादि पहला अध्याय | १९

[ १/५२-५३ गुण हैं, लक्ष्मीका पाणिग्रहण, गोवर्धनधारणादि जो लीलाएँ हैं, वे सभी प्रकारसे मेरी कृपासे तुम्हें यथार्थरूपमें अनुभव हों। [साधनभक्ति और प्रेमाभक्तिकी वृद्धिके तारतम्यसे मेरे इन रूप-गुण-लीलाके माधुर्यकी अनुभूतिमें तारतम्य उत्पन्न होता है। मेरे इस चतुर्भुजरूपसे भी अधिकतम-माधुर्यकी विशेषतासे युक्त परम-दुर्लभ कृष्ण-स्वरूपका तुम ब्रजभूमिमें साक्षात् अनुभव करोगे। जो लोग चतुःश्लोकके द्वारा केवल निर्विशेष स्वरूपकी व्याख्या करते हैं, उनकी भक्तिहीन इतर व्याख्या स्वयं ही परास्त हुई है]॥५२॥ श्रीमद्भागवत (२/९/३२)— अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत् सदसत्परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥५३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इस जगत्की सृष्टिके पूर्व केवल मैं ही था। सत्, असत् और अनिर्वचनीय निर्विशेष ब्रह्म तक कुछ भी मुझसे पृथक् रूपसे नहीं था। सृष्टि होनेके बाद इस सम्पूर्ण-स्वरूपमें मैं ही हूँ और सृष्टिकी प्रलय होनेके बाद भी एकमात्र मैं ही अवशिष्ट रहूँगा॥५३॥ अनुभाष्य-अहं (अहं-शब्देन तद्वक्ता मूर्त्त एवोच्यते, न तु निर्विशेषं ब्रह्म, तद्विषयत्वात्; आत्मज्ञानत्वात् पर्यकत्वे तु तत्त्वमसीतिवत् त्वमेवासीरित्येव वक्तु मनोहर-श्रीविग्रहोऽहम्) एव अग्रे (सृष्टेः पूर्वं महाप्रलयकालेऽपि) आसम्; अन्यत् न (न किञ्चित् आसीत्, “वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः”, “एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः” इत्यादि-श्रुतिभ्यः। वैकुण्ठतत्पार्षदादीनामपि तदुपाङ्गत्वादहंपदेनैव ग्रहणं-राजाऽसौ प्रयातीतिवत्); सदसत्परं (सत् कार्यं असत् कारणं तयोः परं) यत् (यद्ब्रह्म) तत् अन्यत् न (तन्न मत्तोऽन्यत्; यद्वा, तदानीं प्रपञ्चे विशेषाभावात् निर्विशेषचिन्मात्राकारेण, वैकुण्ठे तु सविशेषभगवद्रूपेण); पश्चात् (सृष्टेरनन्तरमपि) अहम् (एवास्मि, वैकुण्ठे तु भगवदाद्याकारेण, प्रपञ्चेषु अन्तर्याम्याकारेण); यदेतत् (विश्वं) तदप्यहमेवास्मि (मदनन्यत्वान्मदात्मकमेव) [तथा प्रलये] योऽवशिष्येत सोऽहमेवास्मि। [कालाव्यवच्छिन्न-नित्यलीलाविग्रहस्य श्रीकृष्णस्य सर्वकाले प्रकटतास्तीत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद-[‘अहं’ शब्दके द्वारा बतलाया जा रहा है कि श्लोकके वक्ता (श्रीभगवान्) मूर्त्तिविग्रह हैं, निर्विशेष ब्रह्म नहीं हैं। इसका कारण यह है कि आत्मज्ञानके तात्पर्यके विषयमें ‘तत्त्वमसि’-इस वेदवाक्यमें जिस प्रकार ‘तुम ही हो’ अर्थात् तुम्हारी पृथक् मूर्त्तिमत्ता है-यह कहना उपयुक्त है, उसी प्रकार श्रीभगवान्का स्वतन्त्र विग्रहवान् होना निश्चित है।] (अब हे ब्रह्मन्!) इस समय तुम्हारे निकट मैं परम मनोहर श्रीविग्रहविशिष्ट रूपमें प्रादुर्भूत हुआ हूँ। यह रूप सृष्टिसे पहले अर्थात् महाप्रलयकालमें भी वर्तमान था तथा कोई और नहीं था। [जैसा कि श्रुतियोंमें भी वर्णन है-“इस विश्वसृष्टिके पूर्व श्रीवासुदेव ही थे, ब्रह्मा अथवा शङ्कर कोई नहीं थे”, “एकमात्र श्रीनारायण ही थे, ब्रह्मा अथवा ईशान कोई भी नहीं थे।” “यह राजा जा रहा है”-ऐसा कहनेपर जिस प्रकार राजवेश पहनकर राजदण्ड, राजछत्र, सेना, मन्त्रियों और सेवकोंके साथ ही राजाका गमन समझा जाता है, उसी प्रकार ‘अहं’ पदके द्वारा श्रीभगवान्के वैकुण्ठादि धाम और उनके पार्षदादिको भी भगवान्के उपाङ्गके रूपमें ग्रहण करना होगा तथा उनकी भी स्थिति भगवान्के समान नित्य ही समझनी होगी।] सत् अर्थात् कार्य, २० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

असत् अर्थात् कारण, इन दोनोंसे अतीत, जो ब्रह्म है, वह भी मुझसे पृथक् अन्य वस्तु नहीं है। प्रलयके समय विश्व-प्रपञ्चमें वैचित्र्य-हीनताके कारण निर्विशेष अचित्-मिश्रातीत चिन्मात्र रूपमें तथा वैकुण्ठमें चित्-विलासमय सविशेष भगवत्-रूपमें मैं ही विद्यमान था। सृष्टिके बाद भी मैं ही दोनों रूपोंमें रहूँगा, अर्थात् वैकुण्ठमें षडैश्वर्यपूर्ण सच्चिदानन्द-विग्रहके रूपमें और प्रापञ्चिक ब्रह्माण्डमें अन्तर्यामीके रूपमें। मुझसे अतिरिक्त अन्य (पृथक् सत्ताशील) वस्तु नहीं है। प्रलयके बाद भी जो अवशिष्ट रहता है, वह भी मैं ही हूँ। [कालसे अपरिवर्तनशील अनवरत श्रीकृष्णका नित्यलीलाविग्रह समस्तकालमें प्रकटित रहता है, यह अर्थ है]॥५३॥ श्रीमद्भागवत (२/९/३३)- ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तमः ॥५४॥ अनुवाद-वास्तव प्रयोजन तत्त्वके अतिरिक्त जो कुछ भी प्रतीत होता है अथवा सत्तायुक्त होनेपर भी मेरे अधिष्ठानमें जिसकी प्रतीति नहीं है, उसे ही मेरी माया समझो॥५४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पिछले श्लोकमें परमतत्त्वके स्वरूप-ज्ञानका निर्णय किया गया। किन्तु स्वरूपसे भिन्न तत्त्वका ज्ञान स्वरूपतत्त्वके ज्ञानको जब तक दृढ़ नहीं करता, तब तक वह विज्ञान नहीं होता। स्वरूपतत्त्वसे भिन्न तत्त्वका नाम 'माया' है। उसी मायातत्त्वका ज्ञान इस श्लोकमें वर्णन किया गया है। स्वरूपतत्त्व ही 'अर्थ' अर्थात् यथार्थ तत्त्व है। उस तत्त्वके बाहर जो प्रतीत होता है और उस स्वरूप-तत्त्वमें जिसकी प्रतीति नहीं है, उसीको ही आत्मतत्त्वके मायावैभव रूपमें जानना होगा। इस तत्त्वको समझना सहज नहीं है, इसलिये यहाँ दो प्रादेशिक उदाहरण दिये जा रहे हैं। स्वरूपतत्त्वको सूर्यके समान मानो। सूर्यसे भिन्न तत्त्व दो रूपोंमें प्रतीत होता है-एक रूप 'आभास' और दूसरा रूप 'तमः'। जब सूर्यकी प्रतिच्छवि जलसे किसी दूसरे स्थानमें पड़ती है, तो उसको 'आभास' कहा जाता है। सूर्यका प्रभाव जिस स्थानमें दिखलायी नहीं देता, उसको 'तमः' अथवा 'अन्धकार' कहा जाता है। चित्-जगत् भगवत्स्वरूपकी किरणस्वरूप है। उसके समान ही दिखायी देनेवाला आभासरूप मायावैभव है; यही आभासका उदाहरण है। चित्-तत्त्वसे बहुत दूर अन्धकार जो मायावैभव है; वही दूसरा उदाहरण है। तात्पर्य यह है कि आत्मतत्त्व और मायातत्त्वका परस्पर दो प्रकारका सम्बन्ध है; पहला सम्बन्ध इस प्रकार है-आत्मस्वरूपके अतिरिक्त जो भी अन्य स्वरूप प्रकाशित होता है, वह 'माया' है और आत्मस्वरूपसे बहुत दूर अनात्म अज्ञान भी माया है॥५४॥ अनुभाष्य-अर्थं (परमार्थभूतं मां) ऋते (बिना) यत् प्रतीयेत (मत्प्रतीतौ तत्प्रतीत्यभावात् मत्तो बहिरेव यस्य प्रतीतिरित्यर्थः), यच्चात्मनि न प्रतीयेत (यस्य च मदाश्रयत्वं बिना स्वतः प्रतीतिर्नास्तीत्यर्थः), तत् (तथालक्षणं वस्तु) आत्मनो (मम परमेश्वरस्य) यथाभासः (आभासो ज्योतिर्बिम्बस्य स्वीय-प्रकाशाद्व्यवहितप्रदेशे कथञ्चिदुच्छलितप्रतिच्छवि-विशेषः, स यथा तस्माद्वहिरेव प्रतीयते, न च तं बिना तस्य प्रतीतिस्तथा सा) यथा तमः ('तमःशब्देन तमःप्रायं वर्णशाबल्यमुच्यते' तद् यथा तन्मूलज्योतिष्सदपि तदाश्रयत्वं बिना न सम्भवति तद्वदियं) मायां (जीवमाया-गुणमायेति द्व्यात्मिकां मायाख्याशक्तिं) विद्यात् (जानीयात्)। श्लोक-भावानुवाद-मुझ परमार्थके बिना मेरी प्रतीतिमें जिस वस्तुकी प्रतीतिका अभाव है अर्थात् मेरे बाहरमें ही जिसकी प्रतीति है और मेरे आश्रयके बिना जिसकी स्वतः प्रतीति भी

[ १/५४-५५

नहीं है, वैसे लक्षणवाली वस्तु मुझ परमेश्वरका 'आभास' है। 'आभास' कहनेसे ज्योतिर्बिम्बके अपने प्रकाशसे दूरवर्ती प्रदेशमें उच्छलित जो एक प्रकारकी प्रतिच्छवि है, उसका ही बोध होता है। वह आभास जिस प्रकार ज्योतिर्बिम्बके बाहर ही प्रतीत होता है और ज्योतिर्बिम्बके बिना उसकी प्रतीति नहीं है, जीवमाया भी उसी प्रकार है। यहाँ 'तमः' शब्दके द्वारा पूर्वकथित तमःप्राय वर्णशाबल्य (अर्थात् वर्ण-वैचित्र्य) कथित हुआ है। जिस प्रकार मूल ज्योतिर्मय पदार्थमें अवस्थान ना करनेपर भी मूल ज्योतिर्वस्तुके आश्रयके बिना तमः की स्वतः सम्भावना नहीं है, उसी प्रकार परमार्थभूत भगवान्के अतिरिक्त तमोस्थानीय गुणमायाकी भी स्वतः प्रतीति नहीं है। जीवमाया और गुणमाया, इन दो प्रकारकी माया नामक शक्ति जानो॥५४॥

श्रीमद्भागवत (२/९/३४)- यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु। प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्॥५५॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस प्रकार समस्त महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) बृहद् और क्षुद्र (ब्रह्मासे एक चींटीतक) सभी जीवोंके भीतर प्रविष्ट (संलग्न) होकर भी अप्रविष्ट रूपमें (बाहर) स्वतन्त्र विद्यमान होते हैं, उसी प्रकार मैं भूतमय (भौतिक) जगत्में सभी जीवोंमें सत्त्वाश्रयरूप परमात्माके रूपमें प्रविष्ट होनेपर भी पृथक् भगवत् स्वरूपमें नित्य विराजमान होता हूँ और भक्तोंका एकमात्र प्रेमास्पद (प्रेमका विषय) हूँ। तात्पर्य यह है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, ये सभी महाभूत पाँच रूपोंमें होकर जैसे इस स्थूल-जगत्‌को प्रकाश करते हुए उसके उपकरण रूपमें उसके भीतर रहनेपर भी महाभूत अवस्थामें स्वतन्त्र हैं, इसी प्रकार चिन्मय परमेश्वर अपनी जड़शक्ति और जीवशक्तिके द्वारा जगत्की सृष्टि करके एकांशमें जगत्में सर्वव्यापी होकर रहनेपर भी युगपत् अर्थात् एक ही समयमें अपने चिद्धाममें पूर्ण चिन्मय-विग्रहरूपमें भी नित्य विराजमान रहते हैं। और चित्-विग्रहके किरण-परमाणुस्वरूप जीव शुद्ध-प्रेममार्गमें उनके विमल-प्रेमका आस्वादन करते हैं-यही रहस्य है॥५५॥ अनुभाष्य-यथा महान्ति भूतानि (आकाशादीनि) उच्चावचेषु भूतेषु (देवमनुष्यतिर्यगादिषु) अप्रविष्टानि (बहिःस्थितान्यपि) अनुप्रविष्टानि (अन्तःस्थितानि भान्ति), तथा [लोकातीत-वैकुण्ठ-स्थितत्वेन अप्रविष्टोऽपि] अहं तेषु (तत्तद्गुणविख्यातेषु) नतेषु (प्रणत-जनेषु) प्रविष्टो (हृदि स्थितः) [अहं भामि अन्तकरणेषु दर्शनं दातुम्; तथा अप्रविष्टः बहिः स्थितश्च तेषां नयनेषु स्वसौन्दर्यमर्पयितुं, नासासु स्वसौरभ्यं प्रवेशयितुं, तैः सहोक्तिप्रत्युक्तौ कुर्वन् तेषां कर्णेषु स्वसौस्वर्यामृतं पूरयितुं, स्पर्शनालिङ्गनादि-दानैस्तेषामङ्गेषु स्वीयसौकुमार्य-माधुर्यादिकं चानुभावयितुमिति तेषु गुणातीत-भक्तेषु अन्तर्बहिर्मया त्यक्तु प्रेम-भक्तिर्नाम-रहस्यमिति सूचितम्]। श्लोक-भावानुवाद-जिस प्रकार पञ्चमहाभूतादि देवता-मनुष्य-तिर्यगादिके बाहर स्थित होकर भी उनके भीतरमें अवस्थित होकर प्रकाशमान हैं, वैसे लोकातीत वैकुण्ठमें अवस्थित होनेके कारण अप्रविष्ट रहकर भी मैं (अपने-अपने गुणोंसे विख्यात) उन शरणागत भक्तोंके हृदयमें स्थित हूँ। [प्रणत भक्तोंके अन्तःकरणमें दर्शन प्रदान करनेके लिये ही मैं उनमें प्रविष्ट रहता

२२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

१/५५-५६ ] हूँ। और उनके नेत्रोंको अपना सौन्दर्य दिखलानेके लिये, उनकी नासिकामें अपने अङ्गोंकी सुगन्ध सुँघानेके लिये, उनके साथ वार्तालाप करते-करते उनके कानोंमें अपनी मधुर स्वररूपी अमृतकी लहरी उड़ेलनेके लिये, स्पर्श और आलिङ्गनादिके दानके द्वारा उनके अङ्गोंमें अपनी सुकुमारता और माधुर्य आदिका अनुभव करानेके लिये मैं अप्रविष्ट अर्थात् बाहरमें अवस्थानकर क्रीड़ा करता हूँ। मैं उन गुणातीत भक्तोंका परित्याग करनेमें असमर्थ हूँ, इसलिये उन भक्तोंके भीतर और बाहरमें परमासक्ति सहित मेरा नित्य विलास होता है। उन भक्तोंके जिस प्रकारके भावोंके द्वारा मैं वशीभूत होता हूँ, वे प्रेमाभक्ति नामक भाव ही रहस्य हैं॥५५॥ श्रीमद्भागवत (२/९/३५) — एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनात्मनः। अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा॥५६॥ अनुवाद—आत्मतत्त्वके जिज्ञासु व्यक्ति मेरे स्वरूपतत्त्वका अन्वय-व्यतिरेक क्रमसे अथवा विधि-निषेधके द्वारा विचार करके जो वस्तु सर्वत्र और सर्वदा नित्य है, उस विषयमें ही परिप्रश्न करेंगे॥५६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो आत्मतत्त्व जिज्ञासु हैं, वे लोग अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा इस विषयमें विचार करते हुए जो वस्तु सर्वत्र और सर्वदा नित्य है, उसीका ही अनुसन्धान करेंगे। तात्पर्य यह है कि प्रेम-रहस्य जिस उपायसे साधित होता है, उसका नाम साधन-भक्ति है। तत्त्वजिज्ञासु पुरुष सद्गुरु चरणाश्रय करके उनसे अन्वय-व्यतिरेक अर्थात् विधि-निषेधकी शिक्षा ग्रहण करते हुए तत्त्वानुशीलन करते-करते तत्त्वज्ञान प्राप्त करेंगे॥५६॥ श्रीमद्भागवतमें महाप्रभु श्रीचैतन्यदेवका मत सम्पूर्णरूपमें है। भागवत ग्रन्थमें अठारह हजार श्लोक हैं, उन सभी श्लोकोंमें जो कुछ भी है, उसका मूल ये चार श्लोक हैं। ‘अहमेव’ श्लोकमें भगवत्-तत्त्व, भगवत्-स्वरूप, उनके गुण और लीला संक्षेपमें वर्णित है। ‘ऋतेऽर्थं’ श्लोकमें भगवत्-स्वरूपतत्त्वसे पृथक्-रूपमें प्रतीत होनेवाले मायातत्त्व और उस मायातत्त्वके सम्बन्धजनित मायाशक्तिके वशमें होने योग्य जीवतत्त्व और जीवके भोगके योग्य जड़तत्त्वका विचार है। इन दो श्लोकोंके द्वारा सम्बन्धज्ञानको सम्पूर्णरूपसे जाना जा सकता है। ‘यथा महान्ति’ श्लोकमें जीव और जड़से भगवत्-तत्त्वका अचिन्त्यभेदाभेद होनेपर भी भगवान्‌का नित्यस्वरूपमें पृथक् अवस्थान और जीवका उनके चरणोंका आश्रय करके महाप्रेमम्पत्ति-लाभरूप परम प्रयोजन कहा गया है। ‘एतावदेव’ श्लोकमें उस परम प्रयोजनको प्राप्त करनेका एकमात्र उपाय साधनभक्तिको बतलाया गया है। साधनभक्तिके अन्तर्गत लक्ष्य प्राप्ति करानेवाली सभी विधियोंको अनुकूलभावमें ‘अन्वय’ कहा गया है। लक्ष्यप्राप्तिमें बाधकरूप प्रातिकूल्यजनक सभी क्रियायोंकी निषेधमें परिगणना करके ‘व्यतिरेक’ शब्दका प्रयोग किया गया है। साधनतत्त्वका नाम ‘अभिधेय’ है अर्थात् शास्त्रकी अभिधावृत्तिसे जो उपदेश प्राप्त होता है, उसे अभिधेय कहते हैं॥५३-५६॥ अनुभाष्य—आत्मनः (मम भगवतः) तत्त्वजिज्ञासुना (स्वस्य श्रेयःसाधने यथार्थ्यमनुभवितुमिच्छुना) एतावदेव जिज्ञास्यं (श्रीगुरुचरणेभ्यः शिक्षणीयम्) [किं तत्] यत् (एकमेव वस्तु) अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां (विधि-निषेधाभ्यां) पहला अध्याय | २३

[ १/५६-५७ सर्वदा सर्वत्र स्यात् (इति)। [स्वर्गापवर्गप्रेम्सु मध्ये आत्मनः श्रेयः किमिति प्रश्ने-प्रेमा तु स्वस्यैवान्वय-व्यतिरेकाभ्यां सिद्ध्यति, स्वर्गापवर्गौ ताभ्यां तावत् न सिद्धतः। यथा-जिज्ञास्येषु मध्ये एतावदेव जिज्ञास्यं, किं तत्? अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां योगायोगाभ्यां सम्भोग-विप्रलम्भाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वब्रह्माण्डवर्त्तिनि श्रीवृन्दावनादौ दास-सखि-गुरु-प्रेयसीषु सर्वदा नित्यमेव महाप्रलय-समयेऽपीति दास्य-सख्य-वात्सल्य-शृङ्गाररसानां आस्वादनं व्यञ्जितम्]। श्लोक-भावानुवाद-अपने श्रेयके साधन हेतु मुझ भगवान्‌को यथार्थ अनुभव करनेके अभिलाषी व्यक्तियोंके लिये जो श्रीगुरुचरणोंमें शिक्षणीय है, वह क्या है? वह एक अद्वितीय वस्तु होकर जो विधि-निषेध क्रमसे सदा सर्वत्र विद्यमान है। [तत्त्वजिज्ञासु पुरुष स्वर्ग, अपवर्ग और भगवत्-प्रेम, इन श्रेयोंने किसकी जिज्ञासा करेंगे? भगवत्-प्रेम तो स्वयं ही अन्वय और व्यतिरेक भावसे सिद्ध होता है, किन्तु इनमें स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) स्वयं कभी भी उस प्रकारसे सिद्ध नहीं हो सकते। जैसे जिज्ञासाओंमें यही जिज्ञासा करो कि वह क्या है? अन्वय-व्यतिरेक रूपमें अर्थात् योग और अयोग क्रमसे अथवा सम्भोग और विप्रलम्भ भावसे जो 'सर्वत्र' है, अर्थात् समस्त ब्रह्माण्डोंके अन्तर्गत श्रीवृन्दावनादिमें दास, सखा, गुरु (माता-पिता) और प्रेयसियोंमें जो 'सर्वदा' अर्थात् नित्य ही तथा यहाँ तक कि महाप्रलयकालमें भी विद्यमान रहता है (इसके द्वारा दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गाररसका आस्वादन सूचित होता है)]॥५६॥ श्रीकृष्णकर्णामृत (१)- चिन्तामणिर्जयति सोमगिरिर्गुरुर्मे- शिक्षागुरुश्च भगवान् शिखिपिच्छमौलिः। यत्पादकल्पतरुपल्लवशेखरेषु लीलास्वयम्वररसं लभते जयश्रीः॥५७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चिन्तामणिस্বরূপ सोमगिरि नामक जो मेरे गुरु हैं, वे जययुक्त हों। मेरे शिक्षागुरु मयूरपुच्छधारी भगवान् भी जययुक्त हों। उनके कल्पवृक्षरूप चरणकमलोंके पल्लवरूप नखोंके अग्रभागकी शोभासे आकृष्ट होकर जयश्री अर्थात् श्रीमती राधिका स्वयंवरसे उत्पन्न सुखका आस्वादन करती हैं॥५७॥ अनुभाष्य-'श्रीवल्लभ-दिग्विजय' ग्रन्थमें द्राविड़ त्रिदण्डि संन्यासी श्रीबिल्वमङ्गल ठाकुरका आविर्भावकाल अष्टम शताब्दी शकमें बतलाया गया है। बिल्वमङ्गलजीका द्वारकाधीश-विग्रहके प्रतिष्ठाता राजविष्णुस्वामीके प्रधान शिष्यके रूपमें उल्लेख किया गया है। बिल्वमङ्गलजीके शिष्य देवमङ्गल आदि हैं। बिल्वमङ्गलजीने सात सौ वर्षतक वृन्दावनमें ब्रह्मकुण्डके तटपर भजन किया था। वल्लभभट्टके साथ भेंट होनेके बाद उनके श्रीविग्रहकी पूजाका भार हरि-ब्रह्मचारीके ऊपर दे दिया गया। शङ्कर-सम्प्रदायकी द्वारका मठ तालिकामें भी चित्सुखाचार्य (कल्यब्द २७१५) बिल्वमङ्गलजीका नाम पाया जाता है। लीलाशुक श्रीबिल्वमङ्गल ठाकुरजीने अप्राकृत वृन्दावनकी लीलामें प्रवेशकी लालसासे श्रीकृष्णकर्णामृत-गीतके प्रारम्भमें तीन प्रकारके गुरुवर्गकी जयका उल्लेख किया है। २४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

१/५७-५८ ]

मे (मम) गुरुः (वर्त्मप्रदर्शक-श्रवणगुरुः) चिन्तामणिः जयति। [मन्त्रगुरुः] सोमगिरिः जयति। [चैत्त्यः] शिक्षागुरुः शिखिपिञ्छमौलिः (शिखिपिञ्छैरेव मौलिः शिरोभूषणं यस्य सः) भगवान् (वृन्दावनचन्द्रो) जयति। यत्पादकल्पतरु-पल्लवशेखरेषु (यस्य भगवतः पादौ एव कल्पतरुपल्लवौ तयो शेखरेषु पदनखाग्रेषु) जयश्रीः (जया चासौ श्रियश्चेति महालक्ष्मीः वृन्दावनेश्वरीत्यर्थः) लीलास्वयम्वररसं (लीलया गाढानुरागेण यः स्वयम्वरस्तरसं सुखं) लभते। श्लोक-भावानुवाद—मेरे पथप्रदर्शक और श्रवणगुरु चिन्तामणिकी जय हो। मेरे मन्त्रगुरु सोमगिरिकी जय हो। मोरपंख जिनके सिरका भूषण है, मेरे शिक्षागुरु वे भगवान् वृन्दावनचन्द्र श्रीकृष्ण जययुक्त हों, जिनके कल्पवृक्षकी भाँति चरणकमलोंके पल्लवस्वरूप नखके अग्रभागसे श्री अर्थात् महालक्ष्मीको भी जय करनेवाली वृन्दावनेश्वरी श्रीमती राधिका गाढ़ अनुरागके कारण लीलारसका सुख लाभ करती हैं॥५७॥ अमृतानुकणिका—श्रीकृष्णने ही कृपा करके बिल्वमङ्गलके चित्तमें इस प्रकार उपायोंकी स्फूर्ति करायी, जिनका अवलम्बन करके उन्होंने श्रीकृष्णके सौन्दर्य-माधुर्यादि अनुभव करनेकी योग्यता प्राप्त की। और पुनः श्रीकृष्णने ही कृपा करके उनके हृदयमें अपने सौन्दर्य-माधुर्यादिकी स्फूर्ति कराकर उसका अनुभव कराया। इस प्रकार श्रीकृष्ण ही अनुभव-विषयमें उनके शिक्षागुरु हुए॥५७॥ शिक्षागुरुके रूपमें दया :- जीवे साक्षात् नाहि ताते गुरु चैत्यरूपे। शिक्षागुरु हय कृष्ण महान्तस्वरूपे॥५८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अन्तर्यामी गुरु चैत्यरूपमें अर्थात् चित्तमें अवस्थित होते हैं, इसलिये उनका सामने साक्षात्कार नहीं हो पाता। इसलिये श्रीकृष्ण महान्त अर्थात् श्रेष्ठ भक्तके रूपमें शिक्षागुरु होते हैं॥५८॥ अनुभाष्य—बद्धजीवका श्रीकृष्णके साथ साक्षात्कार नहीं होता है। इसलिये श्रीकृष्ण जीवोंके चित्तमें श्रीकृष्णभक्तिका विवेक उदित कराकर चैत्यशिक्षागुरु और महान्तस्वरूप होकर शिक्षागुरु होते हैं॥५८॥ अमृतानुकणिका—अब महान्तरूप शिक्षागुरुकी प्रयोजनीयताके विषयमें कह रहे हैं। मायाबद्ध जीवका मन नाना प्रकारकी दुर्वासनाओंसे परिपूर्ण है। भौतिक सुखभोगमें ही मत्त जीवकी श्रीकृष्णोन्मुखता स्वतः अथवा अपने समान ही लोगोंके सिखलानेसे जाग्रत नहीं होती, श्रीप्रह्लाद वचन (भाः ७/५/३०)—“मतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वा मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम्।” भक्ति प्रतिपादक शास्त्रोंके प्रमाणोंसे महान्त गुरु संसार-सुखकी तुच्छता और भगवत्-सेवाकी परम लोभनीयता दिखलाते हैं। और भी भगवत्-लीला-कथादि सुनाकर जीवको इतना आनन्दित करते हैं, जिससे उसके हृदयकी दुर्वासना क्रमशः क्षीण होती जाती है। जीव तब यह विचार करता है कि जिनकी लीला-कथा ही इतनी मधुर है, तब उनकी लीला कितनी मधुर होगी? और उस लीलामें साक्षात् रूपसे जो श्रीभगवान्की सेवा करते हैं, उनके द्वारा अनुभूत आनन्द

पहला अध्याय | २५

[ १/५८-५९ क्या अपूर्व होगा? महापुरुषोंकी कृपाशक्तिसे और लीला-कथाके माहात्म्यसे जीवकी बहिर्मुखता दूर हो जाती है तथा जीव क्रमशः भक्ति पथपर अग्रसर होता है॥५८॥ साधुसङ्गकी कर्त्तव्यता; साधु-गुरुका धर्म, लक्षण और स्वभाव :- श्रीमद्भागवत (११/२६/२६)— ततो दुःसङ्गमुत्सृज्य सत्सु सज्जेत बुद्धिमान्। सन्त एवास्य छिन्दन्ति मनोव्यासङ्गमुक्तिभिः ॥ ५९ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इसलिये दुःसङ्गका परित्याग करके बुद्धिमान व्यक्ति सत्सङ्ग करेंगे। साधुजन साधु-उपदेशोंके द्वारा उनके समस्त भक्ति-प्रतिकूल वासनाबन्धनको काट देंगे॥५९॥ अनुभाष्य—जब उर्वशी पुरूरवाका सङ्ग त्याग करके चली गयी, तब पुरूरवाने शोकमें अधीर होकर वर्षोंतक अनुताप किया। तत्पश्चात् जब उनका विवेक उदित हुआ, तब उन्होंने असत्सङ्गके परिणामको समझा। श्रीभगवान् उद्धवजीके निकट इस उपाख्यानको वर्णन कर रहे हैं- ततः दुःसङ्गं (योषित्सङ्गं योषित्सङ्गिसङ्गं च) [दूरे] उत्सृज्य (विहाय) बुद्धिमान् (सदसद्विवेकी) सत्सु (विरक्तेषु हरिजनेषु) सज्जेत (हरिजनसङ्गं सर्वात्मना कुर्यात्)। [यतः] सन्तः (साधवः) अस्य (विषयाभिनिविष्टस्य) मनोव्यासङ्गं (विरुद्धामासक्तिम्) उक्तिभिः (सदुपदेशैः) छिन्दन्ति (नाशं कुर्वन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—सत्-असत्को जाननेवाले विवेकी जनोंको स्त्रीसङ्ग और स्त्रीसङ्गीके सङ्गका दूरसे ही त्यागकर संसारसे विरक्त भक्तजनोंका सभी प्रकारसे सदा सङ्ग करना चाहिये। वे साधु विषयोंमें अभिनिवेशवाले व्यक्तिकी भगवत्-विरुद्धासक्तिका अपने सदुपदेशोंसे नाश करते हैं॥५९॥ अमृतानुकणिका—महाप्रभुने 'दुःसङ्ग' का अर्थ इस प्रकार किया है (मध्य २४/९४)— “'दुःसङ्ग' कहिये—'कैतव', आत्मवञ्चना'। कृष्ण, कृष्णभक्ति बिना अन्य कामना॥” अर्थात् “छलयुक्त आत्मवञ्चक 'दुःसङ्ग' है। श्रीकृष्ण-कामना और श्रीकृष्णभक्ति-कामनाके अतिरिक्त अन्य कोई भी कामनाका सङ्ग भी 'दुःसङ्ग' है।” असत् लोगों अथवा असत् वस्तुओंका कुछ समयके लिये शरीरके द्वारा त्याग किया जा सकता है, परन्तु मनको उनसे दूर रखना अति कठिन है; मन पुनः उन असत् वस्तुओंकी ओर धावित होता है। असत् प्राकृत वस्तुओंके साथ अनादिकालसे सम्बन्धके कारण प्राकृत भोग्य वस्तुओंके साथ ही मनका घनिष्ठ सम्बन्ध हो गया है। उर्वशीके द्वारा त्याग किये जानेपर पुरुरवा भोगकामनासे उसके वशीभूत होकर अत्यन्त दुःखी हो गये। विवेक जाग्रत होनेपर उस भोगधर्मको त्यागकर जैसे उनका मङ्गल हुआ था, उसी प्रकार सभी बुद्धिमान् व्यक्ति ही नित्य-मङ्गलप्रद उपदेश देनेवाले साधु व्यक्तियोंके सङ्गके प्रभावसे चिरकालके संस्कारोंके द्वारा पुष्ट मनोधर्मरूप भोगपिपासाको उन साधु वाक्योंके प्रभावसे काटनेमें समर्थ होते हैं। साधु उपदेशों और भगवत्-लीला-कथाके द्वारा तथा सर्वोपरि अपनी कृपाके द्वारा इन्द्रिय-भोगवासना २६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

१/५९-६० ]

दूर कर सकते हैं। इस श्लोककी टीकामें श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती लिखते हैं—'पुण्यकर्म, तीर्थसेवा, देवसेवा और यहाँ तक कि शास्त्रज्ञानादिमें भी इस प्रकार विषयासक्ति दूर करनेका सामर्थ्य नहीं है।' इसलिये बाहरसे दुःसङ्ग त्यागकर साथ-ही-साथ भक्त-सङ्ग एकान्त आवश्यक है, अन्यथा दुर्वासनारूप दुःसङ्ग हृदयमें ही रहेगा। इसलिये कहा गया है कि दुःसङ्ग त्यागकर सत्सङ्ग करो। जो दुःसङ्गका त्यागकर सत्सङ्ग करते हैं, वे ही बुद्धिमान् हैं और जो ऐसा नहीं करते हैं, वे बुद्धिहीन हैं। जो साधु पुरुष ऐसा हितोपदेश करते हैं, वे ही शिक्षागुरु हैं, इसे प्रमाणित करनेके लिये ही यह श्लोक उद्धृत हुआ है॥५९॥ साधुसङ्गमें हरिकथा श्रवणका फल,—श्रद्धा, भाव और प्रेमोदय :— श्रीमद्भागवत (३/२५/२५)— सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः। तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥६०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साधुसङ्गमें हृदय और कानोंको रसपूर्ण लगनेवाली मेरी बलवती कथाओंकी आलोचना होती है। उन-उन कथाओंको श्रवण करते-करते अतिशीघ्र अपवर्ग पथस्वरूप मुझमें पहले श्रद्धा, तत्पश्चात् रति और अन्तमें प्रेमभक्ति उदित होती है॥६०॥ अनुभाष्य—देवहूतिने जब अपने पुत्र कपिलदेवसे अपने कल्याणकी जिज्ञासा की, तो उसके उत्तरमें श्रीकपिलदेवने कहा— सतां (हरिजनानां) प्रसङ्गात् (प्रकृष्टात् सङ्गात्) मम वीर्यसंविदः (वीर्यस्य सम्यग्वेदनं यासु ताः) हृत्कर्णरसायनाः (हृत्कर्णयोः रसायनाः श्रोत्रमनोऽभिरामाः सुखदाः) कथा भवन्ति। तज्जोषणात् (तासां जोषणात् सेवनात्) अपवर्गवर्त्मनि (अपवर्गोऽविद्यानिवृत्तिः एव वर्त्म यस्मिन् तस्मिन् हरौ) [प्रथमं] श्रद्धा [ततः] रतिः (भावः, ततः) भक्तिः (प्रेमा) आशु (शीघ्रं) अनुक्रमिष्यति (अनुक्रमेण भविष्यति)। [प्रथमं श्रद्धा, ततः सत्सङ्गः, सङ्गात् तत्कथाश्रवणे तत्सेवनप्रवृत्तिः भजनक्रिया, ततः प्रकृष्टात् सङ्गात् अनर्थनिवर्त्तिकाः कथाः, ततस्ता एव कथा निष्ठा-मुत्पादयन्त्यो मन्माहात्म्यवेदनं यतस्तथाभूता भवन्ति, ततो रुचि-मुत्पादयन्त्यो हृत्कर्णरसायना भवन्ति। तासां कथानां जोषणात् प्रीत्यास्वादनात् भगवति श्रद्धा आसक्तिर्भावः प्रेमा अनुक्रमिष्यति]। श्लोक-भावानुवाद—हरिजनोंके प्रकृष्टरूपसे सत्सङ्गमें मेरे वीर्यका सम्पूर्ण ज्ञान करानेवाली, हृदय और कानोंको रसीली लगनेवाली अर्थात् श्रवणमें मनोहर और सुख देनेवाली कथाएँ होती हैं। उनके सेवनसे अविद्याकी निवृत्ति हो जाती है और श्रोता मेरी प्राप्तिके मार्गपर चल पड़ता है। पहले श्रद्धा, तब भाव और उसके बाद शीघ्र ही प्रेमका क्रमशः उदय होता है। [पहले श्रद्धा होनेपर सत्सङ्ग होता है। सत्सङ्गमें भगवत्-कथा श्रवणकर भजनक्रिया प्रारम्भ होती है। निरन्तर साधुसङ्गसे अनर्थ निवृत्तिका क्रम आता है, तब उस कथासे निष्ठाका जन्म होता है, जिससे मेरे माहात्म्यका यथार्थ ज्ञान साधकको होता है। निष्ठापूर्वक मेरी कथाओंका सेवन करनेसे उनमें रुचि उत्पन्न हो जाती है, तब वे कथाएँ कानों और हृदयको रसपूर्ण लगने लगती हैं। इन कथाओंका प्रीतिपूर्वक आस्वादन करनेसे क्रमशः श्रद्धासे आसक्ति, आसक्तिसे भाव और भावसे प्रेमका आविर्भाव होता है]॥६०॥

पहला अध्याय | २७

[ १/६१-६२ ईशभक्तका तत्त्व और प्रकार-भेद :- ईश्वरस्वरूप भक्त—ताँर अधिष्ठान। भक्तेर हृदये कृष्णेर सतत विश्राम ॥६१॥ अनुवाद—जो भक्त निरन्तर कृष्णभजनमें निमज्जित रहते हैं, वे ईश्वरस्वरूप कहे जाते हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण सदा उनके हृदयमें विश्राम अर्थात् सुखपूर्वक वास करते हैं ॥६१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ईश्वरके सच्चिदानन्दस्वरूपमें जिनकी भक्ति है, उनमें ही अर्थात् उनका हृदय ही श्रीकृष्णका वास स्थान है॥६१॥ अनुभाष्य—ईश्वर ही एकमात्र अद्वितीय वस्तु हैं। वही ईश्वर सर्वशक्तिमान् हैं। भक्त उनके शक्तिजातीय स्वरूप हैं, शक्तिमान्-जातीय वस्तु नहीं हैं। श्रीकृष्णसे सम्बन्धित सेवावृत्ति भजनशील-भक्तमें अवस्थित है, इसलिये भक्तरूपी आधारमें श्रीकृष्णकी स्थिति है॥६१॥ अमृतानुकणिका—भक्तका हृदय श्रीकृष्णके विश्रामस्थलके तुल्य है। भक्तके प्रेमके वशीभूत होकर श्रीकृष्ण सदा केवल आनन्दके उपभोग और आनन्द प्रदान करनेके लिये भक्तके हृदयमें अवस्थान करते हैं। वे भक्तके प्रेम-रसका आस्वादन करके आनन्द उपभोग करते हैं और अपने सौन्दर्य-माधुर्य आदिका आस्वादन कराके भक्तको आनन्द प्रदान करते हैं। किसी समय और किसी प्रकारके उद्वेगकी छाया भी उस स्थानको स्पर्श नहीं कर सकती, क्योंकि भक्त कभी भी अपने दुःख-दैन्यकी बात भगवान्को नहीं बतलाते ॥६१॥ श्रीमद्भागवत (९/४/६८)— साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्। मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥६२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साधुजन मेरा हृदय और मैं ही साधुजनोंका हृदय हूँ। वे लोग मेरे अतिरिक्त अन्य किसीको भी नहीं जानते हैं; मैं भी उनके अतिरिक्त किसी अन्यको अपना नहीं मानता हूँ॥६२॥ अनुभाष्य—परम भागवत अम्बरीष महाराजके चरणोंमें दुर्वासा ऋषिके द्वारा अपराध किये जानेपर जब विष्णुचक्र दुर्वासा ऋषिके प्राण संहार करनेके लिये उद्यत हुए, तब वे सभी देवताओंसे सहायताके लिये प्रार्थना करने लगे। अन्तमें भगवान् श्रीविष्णुने दुर्वासा ऋषिको अम्बरीष महाराजके श्रीचरणोंमें क्षमा-भिक्षा करनेके लिये उपदेश देते हुए वास्तवमें इस श्लोकके माध्यमसे भागवत-साधुओंका परम महत्व दिखलाया— साधवः मह्यं (मम) हृदयं (प्राणतुल्याः), साधूनां तु अहं हृदयम्। ते (साधवः) मदन्यत् (मत्तः अन्यत्) न जानन्ति, अहम् (अपि) तेभ्यः (सकाशात्) मनाक् (ईषत्) अन्यत् न [जानामि, भक्तानामहमेव सर्वात्मना सदा चिन्तनीयः, ममापि मदनुशीलनैकपराः सर्वात्मनाश्रितपदा भक्ताः सदा ध्येयाः]। श्लोक-भावानुवाद—साधु मेरे प्राणोंके समान हैं और साधुओंका हृदय मैं हूँ। मेरे अतिरिक्त वे किसी अन्यको नहीं जानते हैं, मैं भी निकटसे किञ्चित् अन्य किसीको नहीं जानता हूँ [अर्थात् भक्तोंके द्वारा मैं ही सम्पूर्णरूपसे सतत् चिन्तनीय हूँ और मैं भी अपने सभी प्रकारसे मुझपर आश्रित ऐकान्तिक भजन करनेवाले भक्तोंका सदा ध्यान करता हूँ] ॥६२॥ २८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

१/६३-६७ ] श्रीमद्भागवत (१/१३/१०)— भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं प्रभो। तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता॥६३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आपके जैसे भागवतजन स्वयं तीर्थस्वरूप हैं। आपलोग अपने अन्तःस्थित भगवान्‌की पवित्रताके बलसे पापियोंके पापोंसे मलिन सभी तीर्थोंको पवित्र करते हैं॥६३॥ अनुभाष्य—विदुरजीके विभिन्न तीर्थ-स्थानोंमें भ्रमण करनेके बाद हस्तिनापुर लौटनेपर युधिष्ठिर महाराजने इस श्लोकके द्वारा उनका अभिवादन किया था— हे प्रभो ! भवादृशाः तीर्थभूताः भागवताः (सन्तः) स्वान्तःस्थेन (स्वस्य अन्तःस्थितेन) गदाभृता (भगवता विष्णुना) तीर्थानि (मलिनजनसम्पर्केन अतीर्थानि सन्ति पुनः) तीर्थीकुर्वन्ति (महातीर्थीकुर्वन्ति) [भवताञ्च तीर्थाटनं तीर्थानामेव भाग्येन]। श्लोक-भावानुवाद—आपके समान तीर्थस्वरूप सन्त अपने हृदयमें स्थित भगवान् विष्णुके प्रभावसे पापियोंके सम्पर्कसे क्षीण-प्रभाव तीर्थोंको पुनः महातीर्थ बना देते हैं। [वस्तुतः आप लोगोंका तीर्थोंमें आगमन तीर्थोंका ही सौभाग्य है] ॥६३॥ सेइ भक्तगण हय द्विविध प्रकार। पार्षदगण एक, साधकगण आर॥६४॥ अनुवाद—भगवद्भक्त—पार्षद और साधक भेदसे दो प्रकारके होते हैं॥६४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्त दो प्रकारके होते हैं—भगवत्पार्षद और साधक। भगवत्पार्षदगण सिद्धसेवक मण्डलीके अन्तर्गत होते हैं। उनमेंसे कोई-कोई ऐश्वर्यपरायण होकर परव्योममें अवस्थान करते हैं, कोई-कोई माधुर्यपर होकर श्रीवृन्दावनमें श्रीकृष्णकी सेवामें अनुरक्त होते हैं। जो भक्त सेवासिद्धि प्राप्त करनेके लिये वैधी अथवा रागानुगा साधन-भक्तिका अवलम्बन करते हैं, उनको साधक कहा जाता है॥६४॥ ईशावतारके प्रकार :— ईश्वरेर अवतार ए तिन प्रकार। अंश-अवतार, आर गुण-अवतार॥६५॥ शक्त्यावेश-अवतार—तृतीय एमत। अंश-अवतार—पुरुष-मत्स्यादिक यत॥६६॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव—तिन गुणावतारे गणि। शक्त्यावेशावतार पृथु, व्यासमुनि॥६७॥ अनुवाद—भगवान्‌के अवतार तीन प्रकारके होते हैं—अंशावतार, गुणावतार और शक्त्यावेशावतार। पुरुषके रूपमें श्रीराम, वामनादि और अन्य रूपोंमें मत्स्यादि सब अंशावतार हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव—ये तीन गुणावतार हैं तथा पृथु, व्यासमुनि आदि शक्त्यावेश अवतार हैं॥६५-६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अंशावतार श्रीविष्णुके साक्षात् अवतार हैं अर्थात् ये अवतार मायाधीश हैं। सत्त्व, रजः और तमः, इन तीन गुणोंसे प्रतिभात भगवत्-अवतार गुणावतार हैं। जिन सभी पहला अध्याय | २९

[ १/६५-७० श्रेष्ठ जीवोंमें श्रीकृष्णकी किसी विशेष शक्तिका आवेश होता है, उन्हें शक्त्यावेश अवतार कहा जाता है॥ ६५॥ अनुभाष्य—'ईश्वरेर' अर्थात् स्वयंरूप भगवान् श्रीकृष्ण। विस्तृत विवरणके लिये लघुभागवतामृतके पूर्वखण्डमें उपास्य और अवतार प्रसङ्ग तथा श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला बीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य हैं॥ ६५-६७॥ भगवत् प्रकाशका लीलाभेद :— दुइरूपे हय भगवानेर प्रकाश। एके त' प्रकाश हय, आरे त' विलास॥६८॥ अनुवाद—भगवान् स्वयंको दो रूपोंमें प्रकट करते हैं, एक प्रकाश और दूसरे विलासरूपमें॥ ६८॥ अनुभाष्य—'भगवानेर' अर्थात् स्वयंरूपका। मध्यलीला बीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ ६८॥ अमृतानुकणिका—यहाँ पारिभाषिक अर्थमें 'प्रकाश' शब्दका व्यवहार नहीं हुआ है, क्योंकि 'प्रकाश और विलास' नामसे इसी प्रकाशके जो दो भेदोंका उल्लेख किया गया है, उनमें 'विलास' में पारिभाषिक प्रकाशका लक्षण नहीं है। भगवान् दो रूपोंमें स्वयंको प्रकट (प्रकाश) करते हैं; उनमें एक रूपका नाम प्रकाश और दूसरे रूपका नाम विलास है॥ ६८॥ ईशप्रकाश :— एकइ विग्रह यदि हय बहुरूप। आकारे त' भेद नाहि, एकइ स्वरूप॥ ६९॥ महिषी-विवाहे यैछे, यैछे कैल रास। इहाके कहिये कृष्णेर 'मुख्य प्रकाश'॥ ७०॥ अनुवाद—एक ही विग्रह (भगवान् श्रीकृष्ण) यदि अनेक रूप धारण करें, जिनमें आकार और स्वरूपमें कोई भेद नहीं हो, तो उन्हें श्रीकृष्णका 'मुख्य प्रकाश' कहा जाता है। जैसे द्वारकाकी महिषियोंके साथ विवाहमें और असंख्य गोपियोंके साथ रासमें श्रीकृष्णने अनेक रूप धारण किये॥ ६९-७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान्‌का प्रकाश दो प्रकारका होता है, जिन्हें 'प्रकाश' और 'विलास' कहा जाता है। द्वारकामें महिषियोंके साथ विवाहमें और श्रीवृन्दावनमें रासलीलामें श्रीकृष्णने एक साथ अनेक रूपोंका प्रकाश किया था, जिनमें कोई आकार भेद नहीं था। एक ही विग्रह अनेक रूप हुए थे। इसे ही श्रीकृष्णका 'मुख्य प्रकाश' कहते हैं॥ ६८-७०॥ अनुभाष्य—“प्रकाशस्तु न भेदेषु गण्यते स हि नो पृथक्” अर्थात् 'प्रकाश' की किसी भी प्रकारसे भेदमें गणना नहीं होती, क्योंकि वह किसी प्रकार भी स्व-स्वरूपसे पृथक् नहीं है (लघुभागवतामृत, पूर्वखण्ड)। “एक वपु बहुरूप यैछे हैल रासे॥” अर्थात् रासलीलामें एक श्रीकृष्णने अनेक रूप धारण किये। “महिषी विवाहे हैल बहुविध मूर्त्ति। 'प्राभवविलास' एइ शास्त्र-परिसिद्धि॥” जब श्रीकृष्णने द्वारकामें सोलह हजार एक सौ आठ महिषियोंसे विवाह किया, तो उन्होंने उतने ही रूप बनाये; शास्त्रमें इन रूपोंको 'प्राभवविलास' कहते हैं (मध्यलीला, बीसवाँ अध्याय)॥ ६९-७०॥ ३० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

अमृतानुक्रमणिका—'मुख्य प्रकाश' अर्थात् मुख्य आविर्भाव अथवा मुख्य अभिव्यक्ति। पयार संख्या ६८में जिस अर्थमें प्रकाश-शब्दका प्रयोग हुआ है, इस पयारमें भी वही अर्थ है। यह मुख्य प्रकाश अथवा मुख्य आविर्भाव ही पारिभाषिक 'प्रकाश'-रूप है; स्वयंरूपसे इसका किसी प्रकार रूप पार्थक्य नहीं है, इसलिये इसको मुख्य प्रकाश (आविर्भाव) कहा गया है॥६९-७०॥ श्रीमद्भागवत (१०/३३/३-५)— रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपीमण्डलमण्डितः। योगेश्वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः॥७१॥ प्रविष्टेन गृहीतानां कण्ठे स्वनिकटं स्त्रियः। यं मन्येरन्नभवत्तावद्विमानशतसङ्कुलम्॥७२॥ दिवौकसां सदाराणामत्यौत्सुक्याभृतात्मनाम्। ततो दुन्दुभयो नेदुर्नियेतुः पुष्पवृष्टयः॥७३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७१-७३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-योगेश्वर श्रीकृष्ण अपनी अचिन्त्यशक्तिके बलसे दो-दो गोपियोंके बीच एक-एक मूर्ति प्रकाशितकर गोपीमण्डलमें शोभायमान होकर रासोत्सवमें प्रवृत्त हुए। उनके इस प्रकार गोपीमण्डलमें प्रविष्ट होनेसे प्रत्येक गोपीको ऐसा अनुभव हुआ कि श्रीकृष्ण अपनी भुजाओंको उसके गलेमें डालकर उसका ही आलिङ्गन कर रहे हैं। उसी समय रासके दर्शनकी उत्सुकतावश देवतागण अपनी-अपनी पत्नियोंके साथ विमानोंमें सवार होकर आये और शत-शत विमान आकाशमार्गमें दिखने लगे। उसके बाद आकाशमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और पुष्पवृष्टि होने लगी॥७१-७३॥ अनुभाष्य-तासां (मण्डलरूपेण अवस्थितानां) द्वयोर्द्वयोर्मध्ये (एकैकरूपेण) प्रविष्टेन यं (श्रीकृष्णं) स्वनिकटं (स्वनिकटस्थं) (मामेव आश्लिष्टवान् इति) मन्येरन्, [तेन] योगेश्वरेण कृष्णेन कण्ठे गृहीतानां (उभयतः आलिङ्गितानां) गोपीमण्डल-मण्डितः (गोपीमण्डलैः शोभमानः) रासोत्सवः संप्रवृत्त। तावत् (तत्क्षणमेव) अत्यौत्सुक्यभृतात्मनां (दर्शनौत्सुक्येन अतिव्याकुलमनसां) सदाराणां (सस्त्रीकाणां) दिवौकसां (देवानां) विमानशतसङ्कुलं (विमानशतैः सङ्कुलं व्याप्तं सङ्कीर्णं) [नभः] अभवत् (बभूव)। ततो दुन्दुभयः नेदुः, पुष्पवृष्टयः निपेतुः। श्लोक-भावानुवाद-मण्डलाकारमें स्थित गोपियोंके मध्य श्रीकृष्ण एक-एक रूपसे प्रविष्ट हुए। श्रीकृष्णके निकट स्थित प्रत्येक गोपीने ऐसा सोचा कि श्रीकृष्ण मेरा ही आलिङ्गन कर रहे हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण गोपियोंको आलिङ्गनबद्ध करके गोपियोंके मध्य सुशोभित होकर रासोत्सवमें प्रवृत्त हुए। उसी क्षण ही दर्शनकी उत्सुकतासे अति व्याकुल मनवाले पत्नियों सहित देवताओंके आनेसे उनके सैकड़ों विमानोंकी भीड़ आकाशमें हो गयी। तब आकाशमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और पुष्पवृष्टि होने लगी॥७१-७३॥ श्रीमद्भागवत (१०/६९/२)— चित्रं बतैतदेकेन वपुषा युगपत् पृथक्। गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय एक उदावहत्॥७४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७४॥

[ १/७४-७७ अमृतप्रवाह भाष्य—आश्चर्यका विषय यह है कि एक ही श्रीकृष्णने एक-एक स्वरूपमें प्रत्येक घरमें एक साथ सोलह हजार स्त्रियोंके साथ विवाह किया॥७४॥ अनुभाष्य—बत (अहो) एतत् चित्रम्। एकः (कृष्णः) एकेन वपुषा युगपत् पृथग्गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं (षोडश-सहस्रं) स्त्रियः (महिषीः) उदावहत् (उपयेमे)। श्लोक-भावानुवाद—अहो! यह आश्चर्य है। एक ही श्रीकृष्णने एक-एक रूपसे, एक साथ सोलह हजार महिषियोंके साथ विवाह किया॥७४॥ लघुभागवतामृत, पूर्वखण्डमें आवेषकथनमें (१/२१) :- अनेकत्र प्रकटता रूपस्यैकस्य यैकदा। सर्वथा तत्स्वरूपैव स प्रकाश इतीर्यते॥७५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक ही रूपमें एक ही साथ अनेक अभिन्न प्रकाशोंको 'प्रकाश' कहते हैं ॥७५॥ अनुभाष्य—एकदा (एकस्मिन् काले) एकस्य रूपस्य या अनेकत्र प्रकटता, सर्वथा तत्स्वरूपा (आकृत्या गुणैर्लीलाभिश्चैकस्वरूपा) एव स प्रकाश इतीर्यते। श्लोक-भावानुवाद—एक ही समयमें एक रूप, जो अनेक स्थानोंमें प्रकट होते हैं और उनके रूप-गुण-लीला एक स्वरूप ही होते हैं, तो उन्हें 'प्रकाश' कहते हैं॥७५॥ ईशविलास :- एकइ विग्रह यदि आकारे हय आन। अनेक प्रकाश हय, 'विलास' तार नाम॥७६॥ अनुवाद—जब भगवान्‌के द्वारा प्रकाशित विग्रह उनसे भिन्न आकारवाले होते हैं, तो वे 'विलास-विग्रह' कहलाते हैं॥७६॥ अमृतानुकणिका—प्रकाशके समान विलास भी एक ही विभुरूपके अविर्भाव विशेष हैं, तो भी उनमें यह पार्थक्य है कि प्रकाशमें अङ्ग-सन्निवेश, रूप, गुणादि मूल स्वरूपके तुल्य होता है, किन्तु विलासमें आकृति और रूपादि मूल स्वरूपसे भिन्न होता है तथा शक्ति आदि भी मूल स्वरूपसे कुछ कम होती है॥७६॥ लघुभागवतामृतमें तदेकात्मरूपकथन (१/१५)— स्वरूपमन्याकारं यत्तस्य भाति विलासतः। प्रायेणात्मसमं शक्त्या स विलासो निगद्यते॥७७॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णकी अचिन्त्य शक्तिविलाससे जब उनका स्वरूप प्रायः अपने ही समान अन्य रूपमें प्रकाशित होता है, तो उसे 'विलास' कहा जाता है॥७७॥ अनुभाष्य—तस्य (मूलरूपस्य) यत् स्वरूपं अन्याकारं (विलक्षणाङ्गसन्निवेशं), विलासतः (लीला-विशेषात्) प्रायेण (कैश्चिद्गुणैरूपाधिकं) आत्मसमं (निजमूलरूपतुल्यं) शक्त्या भाति, स विलासः निगद्यते। ३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

१/७७-८१ ]

श्लोक-भावानुवाद-जब मूलरूपके विलक्षण अङ्गोंके सन्निवेशवाला, अपने मूलरूपके समान शक्तिसम्पन्न और विशेष लीलामें कुछ गुणों एवं रूपमें अधिक भी हो, तो उसे ‘विलास’ कहते हैं॥७७॥ यैछे बलदेव, परव्योमे नारायण। यैछे वासुदेव प्रद्युम्नादि सङ्कर्षण॥७८॥ अनुवाद-जैसे [वृन्दावन और द्वारकामें] श्रीबलदेव प्रभु, वैकुण्ठमें श्रीनारायण और चतुर्व्यूह [श्रीवासुदेव, श्रीसङ्कर्षण, श्रीप्रद्युम्न और श्रीअनिरुद्धादि] भगवान् श्रीकृष्णकी विलासमूर्ति हैं॥७८॥ अनुभाष्य-श्रीबलदेव श्रीकृष्णके स्वयं प्रकाश हैं और श्रीनारायण उनके प्राभवविलास हैं॥७८॥ ईशशक्ति :- ईश्वरेर शक्ति हय त्रिविध प्रकार। एक लक्ष्मीगण, पुरे महिषीगण आर॥७९॥ व्रजे गोपीगण आर सबाते प्रधान। व्रजेन्द्रनन्दन यां'ते स्वयं भगवान्॥८०॥ अनुवाद-ईश्वरकी शक्तियाँ तीन प्रकारकी हैं-वैकुण्ठमें लक्ष्मियाँ, द्वारकामें महिषियाँ और व्रजमें गोपियाँ। व्रजकी गोपियाँ ही इनमें सबसे श्रेष्ठ हैं, क्योंकि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं॥७९-८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘यद्यपि आमार गुरु’ (संख्या ४४) से लेकर ‘साधकगण आर’ (संख्या ६४) तक-गुरु और भक्त, इन दो तत्त्वोंका विचार हुआ है। ‘ईश्वरेर अवतार’ (संख्या ६५) से लेकर ‘पृथु व्यासमुनि’ (संख्या ६७) तक-भगवान् और भगवत्-अवतारका विचार हुआ है। ‘दुईरूपे हय’ (संख्या ६८) से ‘प्रद्युम्नादि-सङ्कर्षण’ (संख्या ७८) तक-उनके ‘प्रकाश’ और ‘विलास’ का विचार हुआ है। उसके बाद ‘ईश्वरेर शक्ति हय’ (संख्या ७९) से ‘स्वयं भगवान्’ (संख्या ८०) तक उनकी शक्तिका विचार किया गया॥४४-८०॥ स्वयंरूप कृष्णेर कायव्यूह-ताँर सम। भक्त सहिते हय ताँहार आवरण॥८१॥ अनुवाद-स्वयंरूप श्रीकृष्णके कायव्यूह उनके ही समान हैं। वे भक्तोंसे सदा परिवेष्टित रहते हैं, इसलिये भक्त उनका आवरण हैं॥८१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘स्वयंरूप’, ‘तदेकात्म’ आदि भागवतामृतके श्लोकोंके विचारसे द्विभुज श्रीकृष्ण ही स्वयंरूप हैं। उनके कायव्यूह उनके समान हैं। कायव्यूहका अर्थ होता है, अपनी कायाका विस्तार। उसी स्वरूपके निकट जो भक्त होते हैं, वे ही उनका आवरण हैं। आवरण और वेष्टित (आवृत)-तत्त्वका एक साथ विचार करनेसे पूर्वोक्त छह तत्त्वोंका एकत्व ही निर्धारित होता है। इस प्रकारका निर्धारण केवल अचिन्त्य-भेदाभेदतत्त्व-विचारसे ही सिद्ध होता है॥८१॥

पहला अध्याय | ३३

[ १/८२-८६

भक्त आदि क्रमे कैल सबार वन्दन। ए-सबार वन्दन सर्वशुमेर कारण॥८२॥ अनुवाद—(अब तक) मैंने भगवान्‌के भक्त, शक्ति, अवतार, प्रकाशादिकी क्रमानुसार वन्दना की है। इन सबकी वन्दना समस्त शुभोंका कारण है॥८२॥ प्रथम श्लोके सामान्य मङ्गलाचरण। द्वितीय श्लोकेते करि विशेष वन्दन॥८३॥ अनुवाद—प्रथम श्लोकमें सामान्य-मङ्गलाचरण किया है और द्वितीय श्लोकमें विशेष वन्दना की है॥८३॥ प्रथम चौदह श्लोकोंमेंसे द्वितीय श्लोककी व्याख्या :— वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्दौ सहोदितौ। गौड़ोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ शन्दौ तमोनुदौ॥८४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उदयाचलरूप गौड़देशमें युगपत् सूर्य-चन्द्र-स्वरूप आश्चर्यजनक रूपमें उदित, मङ्गलदाता, जीवोंके अन्धकारविनाशी श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्दकी मैं वन्दना करता हूँ॥८४॥ अनुभाष्य—गौड़ोदये (गौड़देशः एव उदयाचलः तस्मिन्) सहोदितौ (एककाले उदयं प्राप्तौ) पुष्पवन्तौ (युगपत् दिवाकरनिशाकरौ, अतः) चित्रौ (आश्चर्यौ) शन्दौ (कल्याणप्रदौ) तमोनुदौ (अन्धकारविनाशकौ) श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्दौ [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—गौड़देशके उदयाचलपर एक साथ सूर्य एवं चन्द्ररूपमें आश्चर्यजनक रूपसे जगत्‌का कल्याण तथा अन्धकारका विनाशके लिये उदित हुए श्रीकृष्णचैतन्य एवं श्रीनित्यानन्द प्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥८४॥ सूर्य-चन्द्रके साथ दोनों भाइयोंकी उपमाकी सार्थकता :— व्रजे ये विहरे पूर्वे कृष्ण-बलराम। कोटीसूर्यचन्द्र जिनि दोंहार निजधाम॥८५॥ ‘गौड़ोदये पुष्पवन्तौ’ :— सेइ दुइ जगतेरे हइये सदय। गौड़देशे पूर्व-शैले करिल उदय॥८६॥ अनुवाद—जो श्रीकृष्ण-बलराम पहले व्रजमें विचरण करते थे और जिनकी अङ्गकान्ति करोड़ों सूर्य एवं चन्द्रमाओंको पराभूत करती है, वही दोनों जगत्‌के प्रति कृपालु होकर गौड़देशके उदयाचल (पूर्वी क्षितिज) पर उदित हुए हैं॥८५-८६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘निजधाम’—ज्योति (प्रकाश), ‘पूर्वशैले’—गौड़रूप उदयाचलमें गङ्गाके पूर्वतटपर॥८५-८६॥ अमृताणुकणिका—दोनोंकी अङ्गकान्ति करोड़ों सूर्योंकी ज्योतिसे भी उज्ज्वल और करोड़ों

३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत