श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 731, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें15/22-24 ] लीलाएँ करते हैं। वे किस उद्देश्यसे ऐसी लीलाएँ करते हैं, कोई इसे नहीं समझ सकता॥ 22 ॥ मिश्रका अप्रकट होना :- कतदिन रहि' मिश्र गेला परलोक। माता-पुत्र दुँहार बाड़िल हृदि शोक॥ 23 ॥ अनुवाद-कुछ दिनोंके बाद श्रीजगन्नाथ मिश्र परलोक सिधार गये। उनके विरहमें माता और पुत्र दोनोंके हृदयका शोक दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा॥ 23 ॥ अनुभाष्य-(चैःभाः आदिखण्ड, आठवाँ अध्याय)- “हेनमते कतदिन थाकि' मिश्रवर। अन्तर्धान हैल नित्यसिद्ध कलेवर॥ 109 ॥ मिश्रेर विजये प्रभु कान्दिला विस्तर। दशरथ-विजये ये हेन रघुवर॥ 110 ॥ दुःख बड़-ए सकल, विस्तार करिते। दुःख हय, अतएव कहिलुँ संक्षेपे॥ 112 ॥” “इस प्रकार श्रीजगन्नाथ मिश्र कुछ दिन इस अनित्य संसारमें रहकर अपने नित्यसिद्ध शरीरके साथ अन्तर्धान हो गये। उनके अप्रकट होनेपर महाप्रभु बहुत रोये, जैसे दशरथ महाराजके अप्रकट होनेपर श्रीरघुवीरने विलाप किया था। यह बहुत करुण कथा है, इसे विस्तारसे कहनेपर बहुत दुःख होता है, इसलिये मैंने संक्षेपमें इसका वर्णन किया है॥” 23 ॥ महाप्रभुका पितृ-श्राद्ध :- बन्धु-बान्धव आसि' दुँहा प्रबोधिल। पितृक्रिया विधिमते ईश्वर करिल॥ 24 ॥ अनुवाद-बन्धु-बान्धवोंने आकर दोनोंको सान्त्वना दी। भगवान् श्रीगौरहरिने स्वयं शास्त्रविधिके अनुसार अपने पिताका क्रिया-कर्म किया॥ 24 ॥ अमृतानुकणिका-हःभःविः (9/294) में वैष्णवश्राद्धकी विधि दी गयी है- “प्राप्ते श्राद्धदिनेऽपि प्रागन्नं भगवतेऽर्पयेत्। तच्छेषेणैव कुर्वीत श्राद्धं भागवतो नरः॥” “भगवत् परायण मनुष्य श्राद्धके दिन पहले श्रीभगवान्को अन्न निवेदन करके उक्त अन्नके द्वारा श्राद्धका अनुष्ठान करें।” विष्णुधर्ममें भगवद्-वाक्य- “प्राणेभ्यो जुहुयादन्नं मन्निवेदितमुत्तमम्। तृप्यन्ति सर्वदा प्राणा मन्निवेदितभक्षणात्॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रदेयं मन्निवेदितम्। ममापि हृदयस्थस्य पितृणाञ्च विशेषतः॥” “मेरे उद्देश्यसे निवेदित उत्कृष्ट अन्नकी आहुति प्राणसमूहमें प्रदान करें। मेरे उद्देश्यसे निवेदित वस्तु भक्षणके द्वारा प्राणादि वायु सर्वदा परितृप्त होते हैं। इसलिये यत्नपूर्वक सबके हृदयमें अवस्थित परमात्मस्वरूप मुझको विशेषतः पितृपुरुषोंको मेरे उद्देश्यसे निवेदित अन्न प्रदान करें।” “भक्ष्यं भोज्यञ्च यत्किञ्चिदनिवेद्याग्रभोक्तरि। न देयं पितृदेवेभ्यः प्रायश्चिती यतो भवेत्॥” “अग्रभोक्ता श्रीभगवान्को भक्ष्य भोज्य सामग्री अर्पण न करके पितृगणको निवेदन न करे, क्योंकि अनिवेदित वस्तु प्रदान करनेसे प्रायश्चित करना पड़ता है।” स्कन्द पुराणमें श्रीमार्कण्डेय-भगीरथ संवादमें- “यस्तु विद्याविनिर्मुक्तं मूर्खं मत्वा तु वैष्णवम्। वेदविद्व्योऽददाद्विप्रः श्राद्धां तद्राक्षसं भवेत्॥ सिक्थमात्रन्तु यद्भुङ्क्ते जलं गण्डूषमात्रकम्। तदन्नं मेरुणा तुल्यं तज्जलं सागरोपमम्॥” “जो विप्र, विद्यारहित वैष्णवको मूर्ख मानकर वेदज्ञोंको श्राद्धपात्र प्रदान करते हैं, वह राक्षस श्राद्ध होता है। श्राद्धमें यदि वैष्णव, एक ग्रास अन्न भोजन और चुल्लु भर जल पान करते हैं, तब वह अन्न मेरुतुल्य एवं वह जल सागरतुल्य होता है।” दूसरोंको निवेदित की हुई वस्तु उच्छिष्ट कही गयी है। इसलिये किसी प्रकारसे ही उक्त सामग्री श्रीभगवान्को समर्पण न करें। जैसे नारदपुराणमें लिखित है- “पितृशेषन्तु यो दद्याद्धरये परमात्मने। रेतोदाः पितरस्तस्य भवन्ति क्लेशभागिनः॥” “जो मानव पितृपुरुषका उच्छिष्ट परमात्माको अर्पण पन्द्रहवाँ अध्याय | 195