भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ 15/24-28 करते हैं, उनके पितृगण रेत पान करके क्लेशके भागी होते हैं।” और भी विशेष विधि यह है कि श्राद्ध तिथि एकादशीके (अथवा उपवास यदि द्वादशीके दिन हो, तब उस) दिन उपस्थित होनेपर उस उपवासवाले दिन श्राद्ध न करके पारणके दिन श्राद्ध करना चाहिये। हःभःविः बारहवें अध्यायमें एकादशी नियमोंके प्रसङ्गमें ऐसा वर्णित है। जैसे पद्मपुराणके पुष्कर खण्डमें लिखा है— “एकादश्यां यदा राम श्राद्धं नैमित्तिकं भवेत्। तद्दिने तु परित्यज्य द्वादश्यां श्राद्धमाचरेत्॥” “हे राम! एकादशीमें नैमित्तिक श्राद्ध उपस्थित होनेपर उस दिनको छोड़कर द्वादशीमें श्राद्ध करना चाहिये।” पद्मपुराणके उत्तरखण्डमें लिखा है— “एकादश्यान्तु प्राप्तायां मातापित्रोर्मृतेऽहनि। द्वादश्यां तत् प्रदातव्यं नोपवासदिने क्वचित्। गर्हितान्नं न चाश्नन्ति पितरश्च दिवौकसः॥” “माता-पिताके मृत्यु-दिनमें एकादशी उपस्थित होनेपर द्वादशीमें श्राद्ध करना चाहिये। उपवासके दिन कदापि श्राद्ध न करे, क्योंकि देवता एवं पितृगण निन्दितान्न भोजन नहीं करते हैं।” स्कन्द-पुराणमें भी कहा है— “एकादशी यदा नित्या श्राद्धं नैमित्तिकं भवेत्। उपवासं तदा कुर्याद्द्वादश्यां श्राद्धमाचरेत्॥” “नित्य स्वरूपिणी एकादशीमें नैमित्तिक श्राद्ध समागत होनेपर एकादशीमें उपवासी रहकर द्वादशीमें श्राद्ध करना चाहिये।” ब्रह्मवैवर्त पुराणमें कहा है— “ये कुर्वन्ति महीपाल श्राद्धं त्वेकादशीदिने। त्रयस्ते नरकं यान्ति दाता भोक्ता प्रेतकः॥” “हे राजन्! एकादशीके दिनमें श्राद्ध करनेसे दाता, भोक्ता एवं प्रेत—तीनोंकी नरकमें गति होती है॥” 24॥ गृहस्थ-लीलाकी इच्छा :— कत दिन प्रभु चित्ते करिला चिन्तन। गृहस्थ हइलाम, एबे चाहि गृहधर्म ॥ 25 ॥ गृहिणीसे ही गृह :— गृहिणी बिना गृहधर्म ना हय शोभन। एत चिन्ति' विवाह करिते हैल मन ॥ 26 ॥ अनुवाद—कुछ समय व्यतीत होनेपर महाप्रभुने चिन्तन किया कि अब घरका दायित्व मुझपर आ गया है, इसलिये मुझे गृहस्थ धर्मका पालन करना चाहिये। महाप्रभुने विचार किया कि गृहणीके बिना गृहस्थ धर्म शोभा नहीं देता, इसलिये उन्होंने विवाह करनेका मनमें निश्चय किया॥ 25-26 ॥ उद्वाह-तत्त्व (7)— न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते। तया हि सहितः सर्वान् पुरुषार्थान् समश्नुते ॥ 27 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ 27 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गृहको 'गृह' नहीं कहते, गृहिणीको 'गृह' कहते हैं, गृहिणीके साथ समस्त पुरुषार्थोंको भोग करूँगा॥ 27 ॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये पञ्चदश परिच्छेद। पन्द्रहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य—गृहम् (आवासमन्दिरं) गृहं न, इति आहुः। गृहिणी (गृहाधिष्ठात्री सहधर्मिणी) एव गृहम् उच्यते। तया (गृहिण्या) सहितः (मिलितः सन्) [मानवः] सर्वान् पुरुषार्थान् (धर्मार्थकाममोक्षादीन् चतुर्वर्गान्) समश्नुते (प्राप्नोति)। श्लोक भावानुवाद—केवल घरको ही गृह नहीं कहा जाता, गृहणी (सहधर्मिणी) को ही गृह कहा जाता है। पुरुष गृहणीके साथ मिलकर ही समस्त पुरुषार्थों (धर्म-अर्थ-काम-मोक्षादि चतुवर्ग) को भोग कर सकता है। महाभारत शान्तिपर्व 144/6 श्लोक द्रष्टव्य है॥ 27 ॥ लक्ष्मीदेवीके साथ साक्षात्कार :— दैवे एकदिन प्रभु पड़िया आसिते। वल्लभाचार्येर कन्या देखे गङ्गा-पथे ॥ 28 ॥ 196 | श्रीचैतन्यचरितामृत