भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 733, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 733

15/28–33 ] अनुवाद—दैवयोगसे एक दिन जब महाप्रभु पढ़कर आ रहे थे, तब उन्होंने श्रीवल्लभाचार्यकी कन्या 'लक्ष्मीदेवी' को गङ्गाकी ओर जाते देखा॥ 28॥ अमृतानुक्रमणिका—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (श्लोक 45-46) में— “श्रीजानकी रुक्मिणी च लक्ष्मीनाम्नी च तत्सुता। चैतन्यचरिते व्यक्ता लक्ष्मीनाम्नी च सा यथा॥ 45॥ सा वल्लभाचार्यसुता चलन्ती स्नातुं सखीभिः सुरदीर्घिकायाम्। लक्ष्मीरनेनैव कृतावतारा प्रभोर्ययौ लोचनवर्त्म तत्र॥” 46॥ “श्रीजानकी और श्रीरुक्मिणी एक साथ मिलकर श्रीवल्लभाचार्यकी पुत्री श्रीलक्ष्मी अर्थात् लक्ष्मीप्रियादेवी हुई हैं। इन्हीं श्रीलक्ष्मीप्रियाके विषयमें श्रीचैतन्यचरित महाकाव्यके तृतीय सर्गके सातवें श्लोकमें कहा गया है कि श्रीवल्लभाचार्यकी कन्या श्रीलक्ष्मीप्रियादेवी, जो स्वयं लक्ष्मीका अवतार हैं, जिस समय वे सखियोंके साथ गङ्गा-स्नानके लिये जा रही थीं, तभी अकस्मात् श्रीमन् महाप्रभुकी दृष्टि उन पर पड़ी॥” 28॥ वनमाली पण्डितके द्वारा घटकका कार्य सम्पादन करना :— पूर्वासिद्ध भाव दुँहार उदय करिला। दैवे वनमाली घटक शची-स्थाने आइला॥ 29॥ अनुवाद—एक दूसरेको देखकर दोनोंका पूर्वासिद्ध [नित्य] भाव उदित हो गया। दैवयोगसे वनमाली नामक घटक (विवाहका सम्बन्ध करवानेवाला) शचीमाताके पास आया॥ 29॥ अनुभाष्य—'वनमाली घटक'—एक नवद्वीपवासी ब्राह्मण। इन्होंने महाप्रभुके विवाहमें घटकका कार्य किया। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 49वाँ श्लोक)— “विश्वामित्रोऽपि घटकः श्रीरामोद्वाहकर्मणि। रुक्मिण्या प्रेषितो विप्रो यस्य श्रीकृष्णवं प्रति। तावयं वनमाली यत्कर्मणाचार्यतां गतः॥ 49॥” “श्रीरामचन्द्रके विवाहमें घटक अर्थात् विवाहके संयोजकका कार्य करनेवाले विश्वामित्र और श्रीरुक्मिणीदेवीके द्वारा श्रीकृष्णके निकट भेजे गये ब्राह्मण—इन दोनोंने मिलकर वनमाली नामसे जन्म लेकर कर्मके द्वारा अर्थात् घटकका कार्य करने हेतु आचार्यत्वको प्राप्त किया है॥” 29॥ सम्बन्ध और लक्ष्मीदेवीके साथ महाप्रभुका विवाह :— शचीर इङ्गिते सम्बन्ध करिल घटन। लक्ष्मीरे विवाह कैल शचीर नन्दन॥ 30॥ अनुवाद—शचीमाताकी सम्मति पाकर घटकने महाप्रभु और लक्ष्मीदेवीका सम्बन्ध करवा दिया। इस प्रकार शचीनन्दनने लक्ष्मीदेवीके साथ विवाह किया॥ 30॥ चैतन्यभागवतमें पौगण्डलीलाका विस्तारसे वर्णन :— विस्तारिया वर्णिला ताहा वृन्दावन-दास। एइ त' पौगण्ड-लीलार सूत्र-प्रकाश॥ 31॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावनदासने इस लीलाका विस्तारसे वर्णन किया है। यहाँ तक महाप्रभुकी पौगण्ड लीलाका मैंने सूत्ररूपमें वर्णन किया है॥ 31॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है। चैःभाः आदिखण्ड, आठवें अध्यायमें उपनयन और माताको स्वर्ण-दान अधिक विस्तृत रूपमें वर्णित किया गया है॥ 31॥ इति अनुभाष्ये पञ्चदश परिच्छेद। पन्द्रहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। पौगण्ड-लीलाय लीला बहुत प्रकार। वृन्दावन-दास इहा करियाछेन विस्तार॥ 32॥ अतएव दिङमात्र इहाँ देखाइल। चैतन्यमङ्गले सर्वलोके ख्याति हैल॥ 33॥ अनुवाद—महाप्रभुकी पौगण्ड-लीलाएँ अनेक हैं, पन्द्रहवाँ अध्याय | 197

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