भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 737, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 737

सोलहवाँ अध्याय सोलहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें महाप्रभुकी कैशोरलीला वर्णित है। अध्यापन, पण्डित-विजय, जाह्नवी (गङ्गा) में जलक्रीड़ा, धन एकत्रित करनेके लिये बङ्गदेशमें (वर्तमान बाङ्गलादेशमें) जाना, वहाँपर विद्या-विचार और नाम-सङ्कीर्तन, तपन मिश्रसे भेंट और उनको साध्य-साधनका उपदेश तथा उन्हें वाराणसी जानेका आदेश देना आदि लीलाएँ इस अध्यायमें वर्णित हैं। महाप्रभुके बङ्ग-विजयके समय लक्ष्मीदेवीका सर्पके काटे जानेके छलसे वैकुण्ठ-गमन हुआ। महाप्रभुने स्वदेशमें लौटकर शचीदेवीको तत्त्वज्ञानके द्वारा शान्त किया और बादमें विष्णुप्रियासे विवाह किया। महाप्रभुने दिग्विजयी केशवकाश्मीरके साथ वार्तालाप किया और उसके द्वारा रचित गङ्गा-माहात्म्य-श्लोकोंमेंसे एक श्लोकपर विचार करके उसमें पाँच अलङ्कार गुण और पाँच अलङ्कार दोष दिखाकर उसके गर्वको चूर्ण किया। दिग्विजयी कविने रात्रिमें सरस्वती देवीसे महाप्रभुके तत्त्वको जाना और अगले दिन प्रातःकाल उनके शरणागत हुआ। (अमृतप्रवाह भाष्य) सदा कृपारत श्रीगौरहरि :— कृपासुधा-सरिद्यस्य विश्वमाप्लावयन्त्यपि। नीचगैव सदा भाति तं चैतन्यप्रभुं भजे ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनकी कृपा-सुधा-सरिता विश्वको आप्लावित करनेपर भी सदैव निम्नगामिनी रूपमें प्रकाशित हो रही है, उन्हीं श्रीचैतन्य महाप्रभुका मैं भजन करता हूँ॥1॥ अनुभाष्य—यस्य (चैतन्यदेवस्य) कृपा-सुधा-सरित् (कृपामृत-नदी) विश्वं (संसारं) आप्लावयन्ती (निमज्जयन्ती) अपि, सदा नीचगा (निम्नगामिनी-ऐश्वर्यविहीनेषु अकिञ्चनेषु दीनजनेषु करुणामयी एव) भाति (प्रकाशते), तं चैतन्यप्रभुम् [अहं] भजे। श्लोक भावानुवाद—जिनकी कृपामृत-नदी समस्त विश्वको निमज्जित करके भी अकिञ्चन दीन-हीन लोगोंके प्रति सदा करुणामयी रूपमें प्रकाशित होती है, उन श्रीचैतन्य महाप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य, जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीचैतन्यदेवकी जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥ 2 ॥ लक्ष्मी-सरस्वतीके द्वारा पूजित श्रीगौरहरि :— जीयात् कैशोर-चैतन्यो मूर्त्तिमत्या गृहाश्रमात्। लक्ष्म्यार्च्चितोऽथ वाग्देव्या दिशांजायिजयच्छलात् ॥ 3 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥3॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गृहमें विराजमान मूर्तिमती लक्ष्मीदेवीके द्वारा अर्चित और दिग्विजयीको जय करनेके छलसे सरस्वतीदेवीके द्वारा अर्चित कैशोर-श्रीचैतन्यदेव जययुक्त हों॥3॥ अनुभाष्य—गृहाश्रमात् (गृहगमनात् वा गृहाश्रमं प्राप्य) मूर्तिमत्या (शरीरधारिण्या) लक्ष्म्या अर्च्चितः (सेवितः), अथ दिशांजायिजयच्छलात् (दिग्विजयी-केशवकाश्मीराख्य-विबुधस्य जयव्यपदेशात्) वाग्देव्या (सरस्वत्या) अर्च्चितः (पूजितः) कैशोरचैतन्यः (किशोर-वयसि स्थितः चैतन्यः) जीयात्। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥3॥ कैशोर-लीला :— एइ त' कैशोर-लीला-सूत्र-अनुबन्ध। शिष्यगण पड़ाइते करिला आरम्भ॥4॥