श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 738, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 16/4-11 अनुवाद-अब महाप्रभुकी कैशोरलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन कर रहे हैं। महाप्रभुने अब शिष्योंको पढ़ाना आरम्भ किया॥4॥ अनुभाष्य-'कैशोर'- ग्यारह वर्षसे पन्द्रह वर्ष तककी अवस्थाको किशोर कहते हैं, उसी अवस्थाके अनुरूप ही महाप्रभु भावान्वित हैं॥4॥ निमाइके अध्यापनसे सभी विस्मित :- शत शत शिष्यसङ्गे सदा अध्यापन। व्याख्या शुनि' सर्वलोकेर चमकित मन॥5॥ अनुवाद-सैकड़ों शिष्य आकर महाप्रभुसे शिक्षा प्राप्त करने लगे। महाप्रभुकी व्याख्याको सुनकर सभी चकित रह जाते ॥5॥ निमाइसे पराजित होनेपर भी पण्डितोंमें सन्तोष :- सर्वशास्त्रे सर्व पण्डित पाय पराजय। विनयभङ्गीते कारो दुःख नाहि हय ॥6॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥6॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभु पण्डितोंको सभी शास्त्रोंमें पराजित कर देते, परन्तु उनके विनीतभावके कौशलसे उन पण्डितोंको दुःख नहीं होता था॥6॥ विविध औद्धत्य करे शिष्यगण-सङ्गे। जाह्नवीते जलकेलि करे नाना रङ्गे॥7॥ अनुवाद-शिष्योंके साथ महाप्रभु अनेक प्रकारकी चञ्चलता करते और गङ्गामें अनेक प्रकारसे जलक्रीड़ा करते॥7॥ पूर्व बङ्गालमें गमन और नामसङ्कीर्तन-प्रवर्त्तन :- कत दिने कैल प्रभु बङ्गेते गमन। याँहा याय, ताँहा लओयाय नाम-सङ्कीर्त्तन ॥8॥ महाप्रभुके पाण्डित्यकी ख्याति सुनकर अनेक छात्रोंके द्वारा अध्ययन :- विद्यार प्रभाव देखि' चमत्कार चित्ते। शत शत पड़ुया आसि लागिला पड़िते॥9॥ अनुवाद-कुछ दिनोंके बाद महाप्रभु पूर्वी बङ्गाल गये। वे जहाँ भी जाते, वहाँपर लोगोंसे नाम-सङ्कीर्तन कराते। महाप्रभुकी विद्याके प्रभावको देखकर सभीका चित्त चमत्कृत हो जाता और वहाँ भी सैकड़ों छात्र उनके निकट आकर पढ़ने लगे॥8-9॥ महाप्रभुके साथ तपन मिश्रका साक्षात्कार और साध्य-साधन-तत्त्व-जिज्ञासा :- सेइ देशे विप्र, नाम-मिश्र तपन। निश्चय करिते नारे साध्य-साधन ॥10॥ अनेक शास्त्रोंमें अनेक मुनियोंके नाना-मतोंसे बुद्धि-विभ्रम :- बहुशास्त्रे बहुवाक्ये चित्ते भ्रम हय। साध्य-साधन श्रेष्ठ ना हय निश्चय ॥11॥ अनुवाद-उस देशमें तपन मिश्र नामक एक ब्राह्मण रहते थे। अनेक शास्त्रोंका अध्ययन करके भी वे साध्य-साधन तत्त्वके विषयमें निश्चय नहीं कर पा रहे थे। बहुत शास्त्रोंके अनेक प्रकारके वाक्योंके द्वारा उनके चित्तमें और भी भ्रम होता। इसलिये वे श्रेष्ठ साध्य-साधन क्या है, इसका निर्णय नहीं कर पा रहे थे॥10-11॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'साध्य-साधन'-साधनके द्वारा जो साधित (प्राप्त) होता है, उसका नाम 'साध्य' है। जिस उपायके अवलम्बनसे साध्यवस्तुकी प्राप्ति होती है, उसका नाम 'साधन' है॥10॥ अनुभाष्य-(भाः 7/13/8)- “न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान् नैवाभ्यासेद् बहून्। न व्याख्यामुपयुञ्जीत नारम्भानारभेत् क्वचित्॥” “अपने चरम कल्याणकी कामनावाले (भगवद्भजनके इच्छुक) को बहुत ग्रन्थोंका कलाभ्यास और शास्त्र व्याख्याके द्वारा जीविका उपार्जन करनेवाला नहीं बनना चाहिये, उसे सर्वप्रथम ऐसे प्रलोभनका परित्याग करना चाहिये।” भक्तिरसामृतसिन्धु पूर्व, द्वितीय लहरी-(भाः 11/21/34,36)- 202 | श्रीचैतन्यचरितामृत