भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 739

16/11–15 ] “एवं पुष्पिताया वाचा व्याक्षिप्तमनसां नृणाम्। मानिनाञ्चातिलुब्धानां मद्दार्त्तापि न रोचते॥ 34 ॥ शब्दब्रह्म-सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम्। अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत् ॥ 36 ॥ ” “कर्म और ज्ञानकाण्डके पोषक शास्त्रोंको जीविका बनानेवाले वक्ता मधुपुष्पित (मनोहर) वाक्योंके द्वारा निष्काम-भगवद्भक्ति-विरोधी तथा मात्सर्य और [स्वर्गादि] फलभोग-तात्पर्यमय कथा करते हैं। उनके वाक्योंको श्रवण अथवा पाठ करके अनभिज्ञ सरलमति कोमल श्रद्धावाले व्यक्ति जीवके नित्यसाधन और नित्यसाध्य श्रीकृष्णभक्ति और श्रीकृष्णप्रेमकी परम महिमा तथा सौन्दर्यको नहीं समझ पाते। जिसके फलस्वरूप वे अनादि बहिर्मुखतासे बँधे व्यक्ति बहुत सरलतासे कर्मी और ज्ञानीके आनुगत्यको स्वीकार कर लेते हैं। इस प्रकार वे लोग जीवोंके निर्मत्सर परम-हितैषी शुद्ध कृष्णभक्तोंकी कृपा प्राप्त करनेसे वञ्चित हो जाते हैं। इसलिये ऐसे व्यक्ति भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके अभावमें एकमात्र नित्य कल्याणके मार्ग शुद्ध-भक्तिसे अत्यधिक दूर जाकर अन्तमें केवल दुर्गति तथा दुर्दशाकी चरम सीमाको प्राप्त करते हैं। जिस समय श्रीगौरसुन्दरने वाराणसी धाममें श्रीसनातन गोस्वामी प्रभुके प्रश्नके उत्तरमें साध्य-साधन तत्त्वको बतलाया था, उस समय वहाँपर तपन मिश्र भी उपस्थित थे और उसे श्रवण करके उनको निज संशयकी मीमांसा (गम्भीर आलोचना) प्राप्त हुई थी। अनेक शास्त्रों और अनेक गुरुब्रुवोंके (अयोग्य गुरुओंके) आनुगत्यको स्वीकार करनेवाले अबोध जीवोंके मङ्गल हेतु महाप्रभुने अपने भक्त तपनमिश्रके चरित्रसे (इस संशयकी मीमांसाके द्वारा) शिक्षा प्रदानकी है॥ 11 ॥ स्वप्नमें एक ब्राह्मणके द्वारा उनको निमाइ पण्डितसे तत्त्व जिज्ञासा करनेका उपदेश :– स्वप्ने एक विप्र कहे,–“शुनह तपन। निमाञिपण्डित-स्थाने करह गमन ॥ 12 ॥ तेंहो तोमार साध्य-साधन करिबे निश्चय। साक्षात् ईश्वर तेंहो,–नाहिक संशय ॥ ” 13 ॥ अनुवाद—[एक दिन] स्वप्नमें एक ब्राह्मणने कहा,–“तपन! सुनो, तुम निमाइ पण्डितके पास जाओ। वे तुम्हारे लिये साध्य-साधन तत्त्वको निश्चित रूपमें बतलायेंगे। वे साक्षात् ईश्वर हैं, इसमें कोई भी संशय नहीं है॥” 12–13 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शास्त्र अनेक हैं। इन-इन शास्त्रोंमें जिसको 'साध्य' और जिसको 'साधन' कहकर निर्देश किया गया है, वे भिन्न-भिन्न दिखायी देते हैं। बहुत शास्त्र पढ़नेपर, कौन-सा साध्य श्रेष्ठ है और कौन-सा साधन श्रेष्ठ है—यह स्थिर नहीं कर पानेके कारण चित्त भ्रमित हो जाता है। तपनमिश्रके चित्तमें इस प्रकारका भ्रम होनेपर उन्हें निमाइ-पण्डितके निकट जाकर उनसे साध्य-साधन निश्चित कर लेनेके लिये स्वप्नमें आदेश प्राप्त हुआ। उस स्वप्नमें यह भी कहा था कि 'निमाइ-पण्डित साक्षात् ईश्वर हैं, इस बातमें कोई संशय नहीं करना।' ॥ 11–13 ॥ महाप्रभुको स्वप्नका वृत्तान्त सुनाना :– स्वप्न देखि' मिश्र आसि' प्रभुर चरणे। स्वप्नेर वृत्तान्त सब कैल निवेदने ॥ 14 ॥ अनुवाद—स्वप्न देखनेके बाद तपन मिश्रने महाप्रभुके पास आकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया और उन्होंने स्वप्नमें जो देखा था, उसे महाप्रभुसे कहा॥ 14 ॥ महाप्रभुका हरिनामको ही साध्य-साधनके रूपमें बतलाना :– प्रभु तुष्ट हञा साध्य-साधन कहिल। 'नाम-सङ्कीर्त्तन कर',–उपदेश कैल ॥ 15 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने प्रसन्न होकर उन्हें साध्य-साधन तत्त्वके विषयमें बतलाया और उन्हें नाम-सङ्कीर्तन करनेका उपदेश दिया॥ 15 ॥ सोलहवाँ अध्याय | 203