श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 740, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 16/15-21 अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने कहा, - "अभेद ब्रह्मज्ञान और स्वर्गादि भुक्ति - ये जीवके लिये साध्यवस्तु नहीं हैं; श्रीकृष्णप्रेम ही जीवके लिये एकमात्र साध्यवस्तु है। कर्म और ज्ञान, - ये उक्त साध्यवस्तुके प्राप्तिके साधन अथवा उपाय नहीं हैं। शुद्ध श्रीकृष्णनामाश्रय ग्रहण करके भक्ति ही साध्यवस्तु प्राप्त करनेका एकमात्र उपाय है॥" 15 ॥ उनको काशी जानेका आदेश :- ताँर इच्छा, - "प्रभुसङ्गे नवद्वीपे बसि'।" प्रभु आज्ञा दिल, - "तुमि याओ वाराणसी ॥ 16 ॥ ताँहा आमा-सङ्गे तोमार हवे दरशन।" आज्ञा पाञा मिश्र कैल काशीते गमन ॥ 17 ॥ भविष्यमें काशीमें महाप्रभु-सेवाका सौभाग्य और श्रीसनातनके प्रश्नोंसे महाप्रभुके श्रीमुखसे साध्य-साधन- तत्त्वकी पूर्ण मीमांसा श्रवण करनेका सौभाग्य :- प्रभुर अनन्त-लीला बुझिते ना पारि। स्वसङ्ग छाड़ाञा केने पाठान काशीपुरी ॥ 18 ॥ अनुवाद-तब तपन मिश्रने इच्छा प्रकाश की, - "मैं आपके साथ नवद्वीपमें वास करना चाहता हूँ।" परन्तु महाप्रभुने उन्हें आज्ञा दी, - "तुम वाराणसी जाओ। वहींपर ही तुम्हें मेरे दर्शन होंगे।" महाप्रभुकी आज्ञा पाकर तपन मिश्रने काशीके लिये प्रस्थान किया। महाप्रभुकी लीलाएँ अनन्त हैं, उन्हें कौन समझ सकता है? अपना सङ्ग छुड़ाकर उन्हें काशी नगरीमें क्यों भेज दिया ? ॥ 16-18 ॥ पूर्वी बंगालके सभी निवासियोंका मङ्गल :- एइ मत बङ्गेर लोकेर कैल सबार हित। 'नाम' दिया भक्त कैल, पड़ाञा पण्डित ॥ 19 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने पूर्वबङ्गालके लोगोंको 'नाम' प्रदान करके श्रीकृष्णभक्त और शास्त्र-विद्या दानकर उन्हें पण्डित बनाकर उनका कल्याण किया॥ 19॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'नाम दिया' अर्थात् "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥" - इस कृष्णनामको प्रदानकर बङ्गवासियोंको भक्त बनाया और शास्त्र पढ़ाकर अनेक लोगोंको पण्डित बना दिया ॥ 19 ॥ एइ मत बङ्गे प्रभु करे नाना लीला। एथा नवद्वीपे लक्ष्मी विरहे दुःखी हैला ॥ 20 ॥ महाप्रभुके विच्छेदरूपी कालसर्पके डँसनेसे लक्ष्मीदेवी अप्रकट :- प्रभुर विरह-सर्प लक्ष्मीरें दंशिल। विरह-सर्प-विषे ताँर परलोक हैल ॥ 21 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु जब पूर्व बङ्गालमें अनेक लीलाएँ कर रहे थे, तब इधर नवद्वीपमें श्रीलक्ष्मीप्रिया देवी उनके विरहमें अत्यन्त दुःखी हो रही थीं। महाप्रभुके विरहरूपी सर्पने श्रीलक्ष्मीप्रिया देवीको डँस लिया। विरहरूपी सर्पके विषसे वे परलोक सिधार गयीं ॥ 20-21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुके विच्छेदके क्लेशने सर्पका रूप धारणकर लक्ष्मीप्रिया देवीको डँस लिया और उन्होंने परलोक अर्थात् सर्वश्रेष्ठ लोकरूप अपने वैकुण्ठधाममें गमन किया ॥ 21 ॥ अमृतानुकणिका-चैःभाः आदिखण्ड चौदह अध्यायमें इसका वर्णन इस प्रकार है- “एथा नवद्वीपे लक्ष्मी प्रभुर विरहे। अन्तरे दुःखिता देवी कारे नाहि कहे ॥ 99 ॥ निरवधि करे देवी आडर सेवन। प्रभु गियाछेन हैते नाहिक भोजन ॥ 100 ॥ नामे से अन्नमात्र परिग्रह करे। ईश्वर-विच्छेदे बड़ दुःखिता अन्तरे ॥ 101 ॥ एकेश्वर सर्वरात्रि करेन क्रन्दन। चित्ते स्वास्थ्य लक्ष्मी ना पायेन कोन क्षण ॥ 102 ॥ ईश्वर-विच्छेदे लक्ष्मी ना पारे सहिते। इच्छा करिलेन प्रभुर समीपे याइते ॥ 103 ॥ निज-प्रतिकृति-देह थुइ' पृथिवीते। चलिलेन प्रभु-पाशे अति अलक्षिते ॥ 104 ॥ 204 | श्रीचैतन्यचरितामृत