भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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16/21-25 ] प्रभु-पादपद्म लक्ष्मी धरिया हृदय। ध्याने गङ्गातीरे देवी करिला विजय॥105॥" “महाप्रभुकी विरहमें लक्ष्मी देवी अत्यन्त दुःखी थीं, परन्तु यह बात वे किसीसे नहीं कहती थीं। वे निरन्तर शचीमाताकी सेवा करती थीं, परन्तु महाप्रभुकी विरहमें उन्होंने भोजन करना छोड़ दिया था, वे नाम मात्रको अन्न ग्रहण करती थीं। महाप्रभुकी विरहमें हृदयमें बड़ी दुःखी थीं और अकेले रात्रि भर रोती रहती थीं, उनके चित्तको क्षण भर भी सुख नहीं मिलता था। वे महाप्रभुके विरहको सहन नहीं कर पा रही थीं और उनके पास जानेकी इच्छा करने लगीं, इसलिये अपनी छाया-देहको पृथ्वीपर छोड़कर वे अलक्षित रूपसे महाप्रभुके पास चली गयीं। लक्ष्मीदेवीने महाप्रभुके चरणोंको अपने हृदयमें धारण करते हुए गङ्गाके तटपर स्वधामकी ओर विजय (यात्रा) की॥” 21॥ अन्तर्यामी महाप्रभुका स्वदेश लौटना :- अन्तरे जानिला प्रभु, याते अन्तर्यामी। देशेर आइला प्रभु शची-दुःख जानि'॥22॥ अनुवाद-महाप्रभु अन्तर्यामी हैं, इसलिये वे सब कुछ जान गये और शचीमाताके दुःखको समझकर वे नवद्वीप लौट आये॥22॥ महाप्रभुके मुखसे तत्त्वज्ञान-श्रवण करके शचीमाताका दुःख कम होना :- घरे आइला प्रभु बहु लञा धन-जन। तत्त्व कहि' कैल शचीर दुःख विमोचन॥23॥ अनुवाद-महाप्रभु बहुत धन और शिष्य लेकर अपने घर लौटे। उन्होंने शचीमाताको तत्त्व सिद्धान्त समझाकर उनके दुःखका निवारण किया॥23॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'तत्त्व कहि' के स्थानपर किसी अन्य पाठमें 'तत्त्वजाले' देखा जाता है। “के कस्य पति-पुत्राद्याः” अर्थात् 'कौन किसका पति, कौन किसका पुत्र, कौन किसकी पत्नी' इस प्रकार तत्त्वज्ञानरूप जालका विस्तार करके शचीमाताके दुःखका विमोचन किया॥23॥ महाप्रभुका विद्या-विलास :- शिष्यगण लञा पुनः विद्यार विलास। विद्या-बले सबा जिनि' औद्धत्य प्रकाश॥24॥ अनुवाद-नवद्वीपमें आकर महाप्रभु पुनः शिष्योंको विद्या अध्ययन कराने लगे। विद्याके बलपर महाप्रभु सभीको पराजित करके अभिमानको प्रकट करने लगे॥24॥ राजपण्डित सनातनकी पुत्री श्रीविष्णुप्रियाके साथ विवाह तथा केशव काश्मीरीकी पराजय :- तबे विष्णुप्रिया-ठाकुराणीर परिणय। तबे त' करिल प्रभु दिग्विजयी जय॥25॥ अनुवाद-कुछ समयके बाद उन्होंने श्रीविष्णुप्रिया ठाकुराणीके साथ विवाह किया। इसके बाद उन्होंने दिग्विजयीको पराजित किया॥25॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दिग्विजयी' - काश्मीर देशके एक 'केशव-मिश्र' नामक एक पण्डित। महाप्रभुसे शिक्षित होनेके बाद उन्होंने श्रीनिम्बादित्य सम्प्रदायमें आचार्य पद प्राप्त किया और उन्होंने वेदान्त-पारिजातादि भाष्योंकी टिप्पणी लिखी॥25॥ अनुभाष्य- 'दिग्विजयी'-काश्मीर देशके 'केशव' नामक पण्डित। ये उस समय भारतवर्षके विभिन्न स्थानोंपर अपनी प्रतिभाके द्वारा पण्डितोंको जय करनेके उद्देश्यसे भ्रमण करते-करते अन्तमें गौड़देशमें नवद्वीपमें पधारे। श्रीगौरसुन्दरसे पराजित होनेके बाद इन्होंने श्रीमन्महाप्रभुके तत्त्वको जानकर भगवद्-भजनके उद्देश्यसे निम्बार्क -सम्प्रदायमें प्रवेश किया। इन्होंने निम्बार्कके द्वारा रचित वेदान्त-दर्शनके 'पारिजात'-भाष्यके टीकाकार श्रीनिवासाचार्यके 'वेदान्त-कौस्तुभ' टीकाकी 'कौस्तुभप्रभा' नामक टिप्पणीकी रचना की। भक्ति-रत्नाकरकी बारहवीं तरङ्गमें-“श्रीनिम्बादित्यकी शिष्य परम्परा- सोलहवाँ अध्याय | 205