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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

16/11–15 ] “एवं पुष्पिताया वाचा व्याक्षिप्तमनसां नृणाम्। मानिनाञ्चातिलुब्धानां मद्दार्त्तापि न रोचते॥ 34 ॥ शब्दब्रह्म-सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम्। अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत् ॥ 36 ॥ ” “कर्म और ज्ञानकाण्डके पोषक शास्त्रोंको जीविका बनानेवाले वक्ता मधुपुष्पित (मनोहर) वाक्योंके द्वारा निष्काम-भगवद्भक्ति-विरोधी तथा मात्सर्य और [स्वर्गादि] फलभोग-तात्पर्यमय कथा करते हैं। उनके वाक्योंको श्रवण अथवा पाठ करके अनभिज्ञ सरलमति कोमल श्रद्धावाले व्यक्ति जीवके नित्यसाधन और नित्यसाध्य श्रीकृष्णभक्ति और श्रीकृष्णप्रेमकी परम महिमा तथा सौन्दर्यको नहीं समझ पाते। जिसके फलस्वरूप वे अनादि बहिर्मुखतासे बँधे व्यक्ति बहुत सरलतासे कर्मी और ज्ञानीके आनुगत्यको स्वीकार कर लेते हैं। इस प्रकार वे लोग जीवोंके निर्मत्सर परम-हितैषी शुद्ध कृष्णभक्तोंकी कृपा प्राप्त करनेसे वञ्चित हो जाते हैं। इसलिये ऐसे व्यक्ति भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके अभावमें एकमात्र नित्य कल्याणके मार्ग शुद्ध-भक्तिसे अत्यधिक दूर जाकर अन्तमें केवल दुर्गति तथा दुर्दशाकी चरम सीमाको प्राप्त करते हैं। जिस समय श्रीगौरसुन्दरने वाराणसी धाममें श्रीसनातन गोस्वामी प्रभुके प्रश्नके उत्तरमें साध्य-साधन तत्त्वको बतलाया था, उस समय वहाँपर तपन मिश्र भी उपस्थित थे और उसे श्रवण करके उनको निज संशयकी मीमांसा (गम्भीर आलोचना) प्राप्त हुई थी। अनेक शास्त्रों और अनेक गुरुब्रुवोंके (अयोग्य गुरुओंके) आनुगत्यको स्वीकार करनेवाले अबोध जीवोंके मङ्गल हेतु महाप्रभुने अपने भक्त तपनमिश्रके चरित्रसे (इस संशयकी मीमांसाके द्वारा) शिक्षा प्रदानकी है॥ 11 ॥ स्वप्नमें एक ब्राह्मणके द्वारा उनको निमाइ पण्डितसे तत्त्व जिज्ञासा करनेका उपदेश :– स्वप्ने एक विप्र कहे,–“शुनह तपन। निमाञिपण्डित-स्थाने करह गमन ॥ 12 ॥ तेंहो तोमार साध्य-साधन करिबे निश्चय। साक्षात् ईश्वर तेंहो,–नाहिक संशय ॥ ” 13 ॥ अनुवाद—[एक दिन] स्वप्नमें एक ब्राह्मणने कहा,–“तपन! सुनो, तुम निमाइ पण्डितके पास जाओ। वे तुम्हारे लिये साध्य-साधन तत्त्वको निश्चित रूपमें बतलायेंगे। वे साक्षात् ईश्वर हैं, इसमें कोई भी संशय नहीं है॥” 12–13 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शास्त्र अनेक हैं। इन-इन शास्त्रोंमें जिसको 'साध्य' और जिसको 'साधन' कहकर निर्देश किया गया है, वे भिन्न-भिन्न दिखायी देते हैं। बहुत शास्त्र पढ़नेपर, कौन-सा साध्य श्रेष्ठ है और कौन-सा साधन श्रेष्ठ है—यह स्थिर नहीं कर पानेके कारण चित्त भ्रमित हो जाता है। तपनमिश्रके चित्तमें इस प्रकारका भ्रम होनेपर उन्हें निमाइ-पण्डितके निकट जाकर उनसे साध्य-साधन निश्चित कर लेनेके लिये स्वप्नमें आदेश प्राप्त हुआ। उस स्वप्नमें यह भी कहा था कि 'निमाइ-पण्डित साक्षात् ईश्वर हैं, इस बातमें कोई संशय नहीं करना।' ॥ 11–13 ॥ महाप्रभुको स्वप्नका वृत्तान्त सुनाना :– स्वप्न देखि' मिश्र आसि' प्रभुर चरणे। स्वप्नेर वृत्तान्त सब कैल निवेदने ॥ 14 ॥ अनुवाद—स्वप्न देखनेके बाद तपन मिश्रने महाप्रभुके पास आकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया और उन्होंने स्वप्नमें जो देखा था, उसे महाप्रभुसे कहा॥ 14 ॥ महाप्रभुका हरिनामको ही साध्य-साधनके रूपमें बतलाना :– प्रभु तुष्ट हञा साध्य-साधन कहिल। 'नाम-सङ्कीर्त्तन कर',–उपदेश कैल ॥ 15 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने प्रसन्न होकर उन्हें साध्य-साधन तत्त्वके विषयमें बतलाया और उन्हें नाम-सङ्कीर्तन करनेका उपदेश दिया॥ 15 ॥ सोलहवाँ अध्याय | 203

[ 16/15-21 अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने कहा, - "अभेद ब्रह्मज्ञान और स्वर्गादि भुक्ति - ये जीवके लिये साध्यवस्तु नहीं हैं; श्रीकृष्णप्रेम ही जीवके लिये एकमात्र साध्यवस्तु है। कर्म और ज्ञान, - ये उक्त साध्यवस्तुके प्राप्तिके साधन अथवा उपाय नहीं हैं। शुद्ध श्रीकृष्णनामाश्रय ग्रहण करके भक्ति ही साध्यवस्तु प्राप्त करनेका एकमात्र उपाय है॥" 15 ॥ उनको काशी जानेका आदेश :- ताँर इच्छा, - "प्रभुसङ्गे नवद्वीपे बसि'।" प्रभु आज्ञा दिल, - "तुमि याओ वाराणसी ॥ 16 ॥ ताँहा आमा-सङ्गे तोमार हवे दरशन।" आज्ञा पाञा मिश्र कैल काशीते गमन ॥ 17 ॥ भविष्यमें काशीमें महाप्रभु-सेवाका सौभाग्य और श्रीसनातनके प्रश्नोंसे महाप्रभुके श्रीमुखसे साध्य-साधन- तत्त्वकी पूर्ण मीमांसा श्रवण करनेका सौभाग्य :- प्रभुर अनन्त-लीला बुझिते ना पारि। स्वसङ्ग छाड़ाञा केने पाठान काशीपुरी ॥ 18 ॥ अनुवाद-तब तपन मिश्रने इच्छा प्रकाश की, - "मैं आपके साथ नवद्वीपमें वास करना चाहता हूँ।" परन्तु महाप्रभुने उन्हें आज्ञा दी, - "तुम वाराणसी जाओ। वहींपर ही तुम्हें मेरे दर्शन होंगे।" महाप्रभुकी आज्ञा पाकर तपन मिश्रने काशीके लिये प्रस्थान किया। महाप्रभुकी लीलाएँ अनन्त हैं, उन्हें कौन समझ सकता है? अपना सङ्ग छुड़ाकर उन्हें काशी नगरीमें क्यों भेज दिया ? ॥ 16-18 ॥ पूर्वी बंगालके सभी निवासियोंका मङ्गल :- एइ मत बङ्गेर लोकेर कैल सबार हित। 'नाम' दिया भक्त कैल, पड़ाञा पण्डित ॥ 19 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने पूर्वबङ्गालके लोगोंको 'नाम' प्रदान करके श्रीकृष्णभक्त और शास्त्र-विद्या दानकर उन्हें पण्डित बनाकर उनका कल्याण किया॥ 19॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'नाम दिया' अर्थात् "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥" - इस कृष्णनामको प्रदानकर बङ्गवासियोंको भक्त बनाया और शास्त्र पढ़ाकर अनेक लोगोंको पण्डित बना दिया ॥ 19 ॥ एइ मत बङ्गे प्रभु करे नाना लीला। एथा नवद्वीपे लक्ष्मी विरहे दुःखी हैला ॥ 20 ॥ महाप्रभुके विच्छेदरूपी कालसर्पके डँसनेसे लक्ष्मीदेवी अप्रकट :- प्रभुर विरह-सर्प लक्ष्मीरें दंशिल। विरह-सर्प-विषे ताँर परलोक हैल ॥ 21 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु जब पूर्व बङ्गालमें अनेक लीलाएँ कर रहे थे, तब इधर नवद्वीपमें श्रीलक्ष्मीप्रिया देवी उनके विरहमें अत्यन्त दुःखी हो रही थीं। महाप्रभुके विरहरूपी सर्पने श्रीलक्ष्मीप्रिया देवीको डँस लिया। विरहरूपी सर्पके विषसे वे परलोक सिधार गयीं ॥ 20-21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुके विच्छेदके क्लेशने सर्पका रूप धारणकर लक्ष्मीप्रिया देवीको डँस लिया और उन्होंने परलोक अर्थात् सर्वश्रेष्ठ लोकरूप अपने वैकुण्ठधाममें गमन किया ॥ 21 ॥ अमृतानुकणिका-चैःभाः आदिखण्ड चौदह अध्यायमें इसका वर्णन इस प्रकार है- “एथा नवद्वीपे लक्ष्मी प्रभुर विरहे। अन्तरे दुःखिता देवी कारे नाहि कहे ॥ 99 ॥ निरवधि करे देवी आडर सेवन। प्रभु गियाछेन हैते नाहिक भोजन ॥ 100 ॥ नामे से अन्नमात्र परिग्रह करे। ईश्वर-विच्छेदे बड़ दुःखिता अन्तरे ॥ 101 ॥ एकेश्वर सर्वरात्रि करेन क्रन्दन। चित्ते स्वास्थ्य लक्ष्मी ना पायेन कोन क्षण ॥ 102 ॥ ईश्वर-विच्छेदे लक्ष्मी ना पारे सहिते। इच्छा करिलेन प्रभुर समीपे याइते ॥ 103 ॥ निज-प्रतिकृति-देह थुइ' पृथिवीते। चलिलेन प्रभु-पाशे अति अलक्षिते ॥ 104 ॥ 204 | श्रीचैतन्यचरितामृत

16/21-25 ] प्रभु-पादपद्म लक्ष्मी धरिया हृदय। ध्याने गङ्गातीरे देवी करिला विजय॥105॥" “महाप्रभुकी विरहमें लक्ष्मी देवी अत्यन्त दुःखी थीं, परन्तु यह बात वे किसीसे नहीं कहती थीं। वे निरन्तर शचीमाताकी सेवा करती थीं, परन्तु महाप्रभुकी विरहमें उन्होंने भोजन करना छोड़ दिया था, वे नाम मात्रको अन्न ग्रहण करती थीं। महाप्रभुकी विरहमें हृदयमें बड़ी दुःखी थीं और अकेले रात्रि भर रोती रहती थीं, उनके चित्तको क्षण भर भी सुख नहीं मिलता था। वे महाप्रभुके विरहको सहन नहीं कर पा रही थीं और उनके पास जानेकी इच्छा करने लगीं, इसलिये अपनी छाया-देहको पृथ्वीपर छोड़कर वे अलक्षित रूपसे महाप्रभुके पास चली गयीं। लक्ष्मीदेवीने महाप्रभुके चरणोंको अपने हृदयमें धारण करते हुए गङ्गाके तटपर स्वधामकी ओर विजय (यात्रा) की॥” 21॥ अन्तर्यामी महाप्रभुका स्वदेश लौटना :- अन्तरे जानिला प्रभु, याते अन्तर्यामी। देशेर आइला प्रभु शची-दुःख जानि'॥22॥ अनुवाद-महाप्रभु अन्तर्यामी हैं, इसलिये वे सब कुछ जान गये और शचीमाताके दुःखको समझकर वे नवद्वीप लौट आये॥22॥ महाप्रभुके मुखसे तत्त्वज्ञान-श्रवण करके शचीमाताका दुःख कम होना :- घरे आइला प्रभु बहु लञा धन-जन। तत्त्व कहि' कैल शचीर दुःख विमोचन॥23॥ अनुवाद-महाप्रभु बहुत धन और शिष्य लेकर अपने घर लौटे। उन्होंने शचीमाताको तत्त्व सिद्धान्त समझाकर उनके दुःखका निवारण किया॥23॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'तत्त्व कहि' के स्थानपर किसी अन्य पाठमें 'तत्त्वजाले' देखा जाता है। “के कस्य पति-पुत्राद्याः” अर्थात् 'कौन किसका पति, कौन किसका पुत्र, कौन किसकी पत्नी' इस प्रकार तत्त्वज्ञानरूप जालका विस्तार करके शचीमाताके दुःखका विमोचन किया॥23॥ महाप्रभुका विद्या-विलास :- शिष्यगण लञा पुनः विद्यार विलास। विद्या-बले सबा जिनि' औद्धत्य प्रकाश॥24॥ अनुवाद-नवद्वीपमें आकर महाप्रभु पुनः शिष्योंको विद्या अध्ययन कराने लगे। विद्याके बलपर महाप्रभु सभीको पराजित करके अभिमानको प्रकट करने लगे॥24॥ राजपण्डित सनातनकी पुत्री श्रीविष्णुप्रियाके साथ विवाह तथा केशव काश्मीरीकी पराजय :- तबे विष्णुप्रिया-ठाकुराणीर परिणय। तबे त' करिल प्रभु दिग्विजयी जय॥25॥ अनुवाद-कुछ समयके बाद उन्होंने श्रीविष्णुप्रिया ठाकुराणीके साथ विवाह किया। इसके बाद उन्होंने दिग्विजयीको पराजित किया॥25॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दिग्विजयी' - काश्मीर देशके एक 'केशव-मिश्र' नामक एक पण्डित। महाप्रभुसे शिक्षित होनेके बाद उन्होंने श्रीनिम्बादित्य सम्प्रदायमें आचार्य पद प्राप्त किया और उन्होंने वेदान्त-पारिजातादि भाष्योंकी टिप्पणी लिखी॥25॥ अनुभाष्य- 'दिग्विजयी'-काश्मीर देशके 'केशव' नामक पण्डित। ये उस समय भारतवर्षके विभिन्न स्थानोंपर अपनी प्रतिभाके द्वारा पण्डितोंको जय करनेके उद्देश्यसे भ्रमण करते-करते अन्तमें गौड़देशमें नवद्वीपमें पधारे। श्रीगौरसुन्दरसे पराजित होनेके बाद इन्होंने श्रीमन्महाप्रभुके तत्त्वको जानकर भगवद्-भजनके उद्देश्यसे निम्बार्क -सम्प्रदायमें प्रवेश किया। इन्होंने निम्बार्कके द्वारा रचित वेदान्त-दर्शनके 'पारिजात'-भाष्यके टीकाकार श्रीनिवासाचार्यके 'वेदान्त-कौस्तुभ' टीकाकी 'कौस्तुभप्रभा' नामक टिप्पणीकी रचना की। भक्ति-रत्नाकरकी बारहवीं तरङ्गमें-“श्रीनिम्बादित्यकी शिष्य परम्परा- सोलहवाँ अध्याय | 205

[ 16/25-30 (1) श्रीनिवासाचार्य, (2) विश्वाचार्य, (3) पुरुषोत्तम, (4) विलास, (5) स्वरूप, (6) माधव, (7) बलभद्र, (8) पद्म, (9) श्याम, (10) गोपाल, (11) कृपा, (12) देवाचार्य, (13) सुन्दरभट्ट, (14) पद्मनाभ, (15) उपेन्द्र, (16) रामचन्द्र, (17) वामन, (18) कृष्ण, (19) पद्माकर, (20) श्रवण, (21) भुरि, (22) माधव, (23) श्याम, (24) गोपाल, (25) बलभद्र, (26) गोपीनाथ, (27) केशव, (28) गोकुल, (29) केशव काश्मीरी।” इसी भक्तिरत्नाकरमें— “सरस्वती-देवीरे करिया मन्त्र जप। हैल सर्व विद्यास्फूर्ति बाड़िल प्रताप॥ सर्वदिशा जय करि' 'दिग्विजयी' ख्याति। काश्मीर-देशस्थ अति शिष्ट विप्रजाति॥ सर्व त्याग करि' प्रभु-आज्ञाय चलिला। ॰ ॰ वर्णिलाभोग 'लघुकेशव' नामाते॥” “सरस्वती देवीका मन्त्र जप करनेपर इनको सभी विद्याओंकी स्फूर्ति हुई और इनका प्रताप बहुत बढ़ गया। सभी दिशाओंके विद्वानोंको पराजित करनेके कारण इनकी 'दिग्विजयी' नामसे ख्याति हो गयी। ये काश्मीर-देशके बहुत कुलीन ब्राह्मण थे। महाप्रभुकी आज्ञासे ये अपना अभिमानादि सब कुछ त्यागकर चल दिये। इनकी लीला 'लघुकेशव' के नामसे वर्णनकी गयी है।” वैष्णव-मञ्जूषा (प्रथम संख्या) द्रष्टव्य है॥25॥ अमृतानुकणिका—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (श्लोक 47-48) में— “श्रीसनातनमिश्रोऽयं पुरा सत्राजितो नृपः। विष्णुप्रिया जगन्माता यत् कन्या भू-स्वरूपिणी॥47॥” “पूर्वकालके सत्राजित राजा अब श्रीसनातन मिश्र हैं तथा भू-शक्ति स्वरूपिणी जगत् माता श्रीविष्णुप्रियादेवी इन्हींकी कन्या हैं। (इसका तात्पर्य यह है कि सत्राजितकी कन्या श्रीसत्यभामा ही श्रीविष्णुप्रियादेवी हैं)।” “उक्ता प्रसङ्गात् कलिना श्रीचैतन्यविधूदये। “भुवोऽंशरूपामपरांश्च विष्णुप्रियेति वित्तां परिणीय कान्ताम्।” इत्यादि॥48॥ “श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकके प्रथम अङ्कके सैंतीसवें श्लोकमें कलिने प्रसङ्गवशतः कहा है कि देवादेव श्रीशचीनन्दनने अपनी एक अन्य शक्ति भू-देवीकी अंशरूपिणी श्रीविष्णुप्रिया-देवीके साथ विवाह किया इत्यादि॥”25॥ श्रीवृन्दावनदास ठाकुरको सम्मान-प्रदान :— वृन्दावन-दास इहा करियाछेन विस्तार। स्फुट नाहि करे दोष-गुणेर विचार॥26॥ केशव-काश्मीरीका श्लोकके दोष-गुण विचार :— सेइ अंश कहि, ताँरे करि' नमस्कार। या शुनि' दिग्विजयी कैल आपना धिक्कार॥27॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने इस लीलाका विस्तारसे वर्णन किया है, परन्तु (दिग्विजयीके द्वारा कहे गये श्लोक) के दोष और गुणोंका स्पष्टरूपसे विचार नहीं किया। इसलिये मैं श्रीवृन्दावनदास ठाकुरको नमस्कार करके उसी अंशको कह रहा हूँ, जिसे सुनकर दिग्विजयीने अपनेको धिक्कार दिया था॥26-27॥ दिग्विजयी-पराजय-वृत्तान्त; दिग्विजयीका आगमन :— ज्योत्स्नावती रात्रि, प्रभु शिष्यगण सङ्गे। बसियाछेन गङ्गातीरे विद्यार प्रसङ्गे॥28॥ हेनकाले दिग्विजयी ताहाँइ आइला। गङ्गार वन्दन करि' प्रभुरे मिलिला॥29॥ महाप्रभुका मान-प्रदान धर्म :— बसाइला तारे प्रभु आदर करिया। दिग्विजयी कहे मने अवज्ञा करिया॥30॥ अनुवाद—एक दिन चाँदनी रात्रिके समय महाप्रभु अपने शिष्योंको गङ्गाके तटपर बैठकर पढ़ा रहे थे। तभी दिग्विजयी वहाँपर आये और पहले गङ्गाकी वन्दना करके फिर महाप्रभुसे मिले। महाप्रभुने उन्हें आदरपूर्वक बैठाया। मन-ही-मन महाप्रभुका अनादर करते हुए दिग्विजयी कहने लगे॥28-30॥ 206 | श्रीचैतन्यचरितामृत

16/31–39 ] अभिमानके कारण दिग्विजयीके द्वारा महाप्रभुका अनादर :— “व्याकरण पड़ाह, निमाञि पण्डित—तोमार नाम। बाल्यशास्त्रे लोके तोमार कहे गुणग्राम ॥31॥ अनुवाद—“मैं समझता हूँ कि तुम व्याकरण पढ़ाते हो और तुम्हारा नाम ‘निमाइ पण्डित’ है। लोग तुम्हारे बाल्यशास्त्र (व्याकरण) के अध्यापनकी प्रशंसा करते हैं॥31॥ अनुभाष्य—‘बाल्यशास्त्र’—व्याकरण; क्योंकि सभी शास्त्रोंके अध्ययनसे पहले भाषाको जाननेके लिये व्याकरण-शास्त्रके अध्ययनका नियम ही प्रचलित है॥31॥ व्याकरण-मध्ये, जानि, पड़ाह कलाप। शुनिलुँ फाँकिते तोमार शिष्येर संलाप ॥”32॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥32॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तुम ‘कलाप’-नामक व्याकरण पढ़ाते हो, ऐसा मैंने तुम्हारे शिष्योंका व्याकरणकी फाँकिमें अर्थात् जटिल प्रश्नके विषयमें संलाप अर्थात् विशेष प्रकारका जो आलाप होता है, वह सुना है॥”32॥ महाप्रभुकी दैन्योक्ति और गङ्गाका स्तव करनेके लिये अनुरोध :— प्रभु कहे,—“व्याकरण पड़ाइ—अभिमान करि। शिष्येते ना बुझे, आमि बुझाइते नारि॥33॥ काँहा तुमि सर्वशास्त्रे कवित्वे प्रवीण। काहाँ आमि सबे शिशु—पड़ुआ नवीन ॥34॥ तोमार कवित्व किछु शुनिते हय मन। कृपा करि’ कर यदि गङ्गार वर्णन ॥”35॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं तो केवल अभिमान करता हूँ कि मैं व्याकरण पढ़ाता हूँ। किन्तु न तो मेरे शिष्य ही मेरी बात समझते हैं और न ही मैं उनको समझा सकता हूँ। कहाँ आप, जो सभी शास्त्रोंमें और विशेषतः कविता रचनामें प्रवीण हैं और कहाँ हम, जो अभी बालक और नवीन छात्र हैं। आपकी कविताको सुननेकी मनमें उत्कण्ठा हो रही है। आपकी कृपा होगी यदि आप गङ्गाकी महिमाका कुछ वर्णन करें॥”33-35॥ दिग्विजयीका सौ श्लोकोंके द्वारा गङ्गाका स्तव-वर्णन :— शुनिया ब्राह्मण गर्वे वर्णिते लागिला। घटी एके शत श्लोक गङ्गार वर्णिला ॥36॥ अनुवाद—यह सुनकर वे दिग्विजयी ब्राह्मण गर्वित होकर गङ्गाकी महिमाका वर्णन करने लगे। एक घण्टेमें ही उन्होंने गङ्गाका वर्णन एक सौ श्लोकोंमें किया॥36॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘घटि एके’ अर्थात् एक घण्टेके भीतर॥36॥ महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा और मान-प्रदान :— शुनिया कहिल प्रभु बहुत सत्कार। “तोमा-सम पृथिवीते कवि नाहि आर॥37॥ तोमार कविता-श्लोक बुझिते कार शक्ति। तुमि भाल जान अर्थ किव्वा सरस्वती॥38॥ स्तवमेंसे एक श्लोककी व्याख्या करनेका अनुरोध :— एक श्लोकेर अर्थ यदि कर निज-मुखे। शुनि’ सब लोक तबे पाय बड़सुखे॥”39॥ अनुवाद—श्लोकोंको सुनकर महाप्रभुने उनका सम्मान करते हुए कहा,—“पृथ्वीपर आपके समान और कोई कवि नहीं है। आपकी कविताके श्लोकोंका अर्थ समझनेकी शक्ति किसमें है? उनके अर्थोंको आप ही अच्छी प्रकारसे जानते है अथवा सरस्वतीदेवी ही जानती हैं। यदि आप एक श्लोककी व्याख्या स्वयं अपने मुखसे कर दें, तो उसे सुनकर सब लोगोंको बहुत आनन्द होगा॥”37-39॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘करिल सत्कार’—सम्मान किया। ‘किंवा’—अथवा॥37-38॥ सोलहवाँ अध्याय | 207

[ 16/40-46 अलौकिक श्रुतिधर महाप्रभुके द्वारा सौ श्लोकोंमेंसे एक श्लोकका दोहराना :— तबे दिग्विजयी व्याख्यार श्लोक पुछिल। शत-श्लोकेर एक श्लोक प्रभु त' पड़िल ॥ ४० ॥ अनुवाद—तब दिग्विजयी पण्डितने पूछा कि किस श्लोककी व्याख्या सुनना चाहते हो। महाप्रभुने उन सौ श्लोकोंमेंसे एक श्लोक सुनाया ॥ ४० ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—दिग्विजयीने पूछा कि कौनसे श्लोककी व्याख्या करनी होगी ? ॥ ४० ॥ केशव-काश्मीरीका गङ्गा-माहात्म्य-श्लोक :— दिग्विजयि-वाक्य— महत्त्वं गङ्गायाः सततमिदमाभाति नितरां यदेषा श्रीविष्णोश्चरणकमलोत्पत्तिसुभगा। द्वितीय-श्रीलक्ष्मीखिव सुरनरैरर्च्यचरणा भवानीभर्तुर्या शिरसि विभवत्यद्भुतगुणा ॥ ४१ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ४१ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इन गङ्गादेवीका महत्व सर्वदा दैदीप्यमान है, क्योंकि ये अति सौभाग्यवती हैं। ये श्रीविष्णुके चरणकमलोंसे उत्पन्न हुई हैं और लक्ष्मीदेवीके द्वितीय स्वरूपके समान देवताओं तथा मनुष्योंके द्वारा इनके चरणोंकी पूजा होती है। ये अद्भुत गुणवती हैं और भवानीके पति महादेवके मस्तकपर विराजमान हैं ॥ ४१ ॥ अनुभाष्य—गङ्गायाः इदं महत्त्वं सतत (नित्यं) नितरां (निःसंशयेन) आभाति (प्रकाशते); यत् (यस्मात्) एषा (गङ्गा) श्रीविष्णोश्चरणकमलोत्पत्तिसुभगा (श्रीविष्णोश्चरणकमलयोः भगवत्पादपद्मयोः उत्पत्तिः सृष्टिः, तया सुशोभनं भगं ऐश्वर्यं यस्याः सा) द्वितीय-श्रीलक्ष्मीखिव (सौन्दर्यशालिनी द्वितीयकमला इव) सुरनरैः (देवमानवाद्यैः) अर्च्यचरणाः (सेवितपदाः) भवानीभर्तुः (भवान्याः भर्त्ता स्वामी तस्य गिरिशस्य भवस्येत्यर्थः) शिरसि (मस्तके) या (गङ्गा) विभवति; [अतः इयम्] अद्भुतगुणा (चमत्कारगुणशालिनी)। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ४१ ॥ “एइ श्लोकेर अर्थ कर”—प्रभु यदि कहिल। विस्मित हञा दिग्विजयी प्रभुके पुछिल ॥ ४२ ॥ महाप्रभुकी स्मृतिशक्तिको देखकर दिग्विजयीका विस्मय और जिज्ञासा :— झंझावात-प्राय आमि श्लोक पड़िल। तार मध्ये श्लोक तुमि कैछे कण्ठे कैल ॥ ४३ ॥ अनुवाद—जब महाप्रभुने कहा,—“इस श्लोकका अर्थ कहिये”, यह सुनकर दिग्विजयीने विस्मित होकर उनसे पूछा—'प्रायः आँधीके समान मैंने श्लोकोंको पढ़ा था, उनमेंसे इस श्लोकको तुमने कैसे कण्ठस्थ कर लिया ?' ॥ ४२-४३ ॥ महाप्रभुका सविनय उत्तर :— प्रभु कहे,—“देवेर वरे तुमि—'कविवर'। ऐछे देवेर वरे केह हय 'श्रुतिधर' ॥” ४४ ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“देवताओंके वरसे जैसे आप 'कवि-श्रेष्ठ' हैं, वैसे ही देवताओंके वरसे कोई 'श्रुतिधर' (सुनकर ही स्मरण कर लेने वाला) भी होता है॥” ४४ ॥ दिग्विजयीकी व्याख्या :— श्लोकेर अर्थ कैल विप्र पाइया सन्तोष। प्रभु कहे,—“कह श्लोकेर किवा गुण-दोष ॥” ४५ ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी बातसे सन्तुष्ट होकर दिग्विजयी ब्राह्मणने श्लोककी व्याख्या की। महाप्रभुने कहा,—“आप इस श्लोकमें कौनसे गुण और दोष हैं, यह बतलाइये ॥” ४५ ॥ महाप्रभुके अनुरोधसे अपने श्लोकके निर्दोष होनेका निर्देश और गुण-वर्णन :— विप्र कहे,—“श्लोके नाहि दोषेर प्रकाश। उपमालङ्कार गुण, किछु अनुप्रास ॥” ४६ ॥ अनुवाद—दिग्विजयी ब्राह्मणने कहा,—“इस श्लोकमें कोई भी दोष नहीं है। इसमें उपमा-अलङ्कार और कुछ 208 | श्रीचैतन्यचरितामृत

16/46-54 ] अनुप्रास (एक समान ध्वनियों, अक्षरों या वर्णोंकी पुनरावृत्ति) हैं, जो इस श्लोकके गुण हैं॥" 46॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'उपमालङ्कार' - उपमा देकर आलङ्कारिक गुणोंका प्रकाश करना। 'अनुप्रास' - श्लोकके अन्तिम चरणमें अनेक बार 'भ' वर्ण और उसके समान ध्वनिवाले वर्णोंका बहुत बार प्रयोग करके जो शब्द-चातुर्य दिखलाया है, वह ॥ 46 ॥ महाप्रभु और कविकी उक्ति एवं प्रत्युक्ति :- प्रभु कहेन, - "कहि, यदि ना करह रोष। कह तोमार श्लोके किंवा आछे दोष ॥ 47 ॥ महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा और कविताके गुण-दोष विचारके लिये अनुरोध :- प्रतिभार वाक्य तोमार, देवता सन्तोषे। भालमते विचारिले जानि गुण-दोषे ॥ 48 ॥ ताते भाल करि' श्लोक करह विचार।" कवि कहे, - "ये कहिले सेइ वेदसार ॥ 49 ॥ दिग्विजयीके द्वारा महाप्रभुको काव्यरसमें अनभिज्ञ समझकर उपहास :- वैयाकरण तुमि, नाहि पड़ अलङ्कार। तुमि कि जानिबे एइ कवित्वेर सार ॥" 50 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "यदि आप बुरा न मानें, तो आपके इस श्लोकमें क्या दोष हैं, उसे कहूँगा। आपकी काव्यकी प्रतिभासे देवता भी आपसे सन्तुष्ट हैं, परन्तु भली-भाँति विचार करनेपर इसके गुण और दोष जाने जा सकते हैं। इसलिये आप भली-भाँति इस श्लोकका विचार कीजिये।" कविने कहा, - "मैंने जो कुछ कहा है, वही वेदोंका सार है। तुम तो केवल व्याकरण जानते हो, तुमने अलङ्कार नहीं पढ़ा है। तुम इस कविताके सारको कैसे समझ सकते हो ?" ॥ 47-50 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नये-नये प्रकारसे वाक्य-विन्यास करनेकी जो बुद्धि-शक्ति है, उसको 'प्रतिभा' कहते हैं। आपने इस श्लोकमें उस बुद्धिका परिचय देकर देवताओंको भी सन्तुष्ट कर दिया है; अर्थात् इस काव्यमें आपकी प्रचुर प्रतिभा-शक्ति है। किन्तु अच्छी तरह विचार करनेसे इसके गुण और दोषोंको देखा जा सकता है॥ 48 ॥ तुम वैयाकरण अथवा व्याकरणविद् अर्थात् (केवलमात्र) बालविद्यामें विशारद हो, इसलिये अलङ्कारादि शास्त्रका विचार करनेमें असमर्थ हो ॥ 50 ॥ महाप्रभुकी उक्ति :- प्रभु कहेन, - "अतएव पूछिये तोमारे। विचारिया गुण-दोष बुझाह आमारे ॥ 51 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "इसलिये तो मैं आपसे पूछ रहा हूँ कि विचार करके श्लोकके गुण और दोष मुझे समझायें ॥ 51 ॥ नाहि पड़ि अलङ्कार, करियाछि श्रवण। ताते एइ श्लोके देखि बहु दोष-गुण ॥" 52 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 52 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- [यह सत्य है कि] मैंने अलङ्कार नहीं पढ़े हैं, किन्तु पण्डितोंके मुखसे श्रवण किया है। उसीके आधारपर इस श्लोकमें अनेक दोष-गुण देखता हूँ॥ 52 ॥ कविके अनुरोधपर महाप्रभुके द्वारा श्लोकके गुण-दोष विचार :- कवि कहे, - "कह देखि, कोन् गुण-दोष।" प्रभु कहेन, - "कहि, शुन, ना करिह रोष ॥ 53 ॥ पाँच दोष और पाँच गुण :- पञ्च दोष एइ श्लोके पञ्च अलङ्कार। क्रमे आमि कहि, शुन, करह विचार ॥ 54 ॥ अनुवाद-कविने कहा, - "तो कहो मैं देखूँ इसमें कौनसे गुण और दोष हैं।" महाप्रभुने कहा, - "आप सोरहवाँ अध्याय | 209

[ 16/53–65 क्रोध नहीं कीजियेगा, मैं जो कहने जा रहा हूँ, उसे कृपा सुनिये। इस श्लोकमें पाँच दोष हैं और पाँच अलङ्कार (गुण) हैं। मैं क्रमशः इनका वर्णन कर रहा हूँ, आप सुनकर विचार कीजिये ॥ 53–54 ॥ श्लोकके पाँच दोष; प्रथम दोषकी व्याख्या :— ‘अविमृष्ट-विधेयांश’—दुइ ठाञि चिह्न। ‘विरुद्धमति’, ‘भग्नक्रम’, ‘पुनरात्त’,—दोष तिन ॥ 55 ॥ अनुवाद—‘अविमृष्ट-विधेयांश’ दोष दो स्थानोंपर है। ‘विरुद्धमति’, ‘भग्नक्रम’, ‘पुनरात्त’, ये तीन अन्य दोष हैं ॥ 55 ॥ ‘गङ्गार महत्त्व’—श्लोके मूल ‘विधेय’। इदं-शब्दे ‘अनुवाद’—पाछे अविधेय ॥ 56 ॥ ‘विधेय’ आगे कहि’ पाछे कहिला ‘अनुवाद’। एइ लागि’ श्लोकेर अर्थ करियाछे बाध ॥ 57 ॥ अनुवाद—‘गङ्गाका महत्व’, श्लोकमें मूल ‘विधेय’ है (क्योंकि यह अभी ज्ञात नहीं है)। ‘इदं’ अर्थात् ‘यह’ शब्द ज्ञात वस्तुका द्योतक है, इसलिये ‘अनुवाद’ है, जिसको विधेयके बाद कहा गया है। ‘विधेय’ पहले कहकर बादमें ‘अनुवाद’ कहा गया है, इसलिये इस श्लोकके वास्तविक अर्थको समझनेमें बाधा होती है ॥ 56–57 ॥ एकादशी-तत्त्वसे उद्धृत न्याय :— अनुवादमनुक्त्वा तु न विधेयमुदीरयेत्। न ह्यलब्धास्पदं किञ्चित् कुत्रचित् प्रतिष्ठिति ॥ 58 ॥ अनुवाद—किसी वाक्यमें अनुवाद (ज्ञात वस्तु) को न कहकर विधेय (अज्ञात वस्तु) को पहले नहीं कहना चाहिये, क्योंकि ऐसा करनेसे उस वाक्यका कोई आधार नहीं होता और उसकी कहीं भी अल्प प्रतिष्ठा भी नहीं होती ॥ 58 ॥ अनुभाष्य—चैःचः आदिलाीला 2/74 संख्या द्रष्टव्य है ॥ 58 ॥ दूसरे दोषकी व्याख्या :— ‘द्वितीय श्रीलक्ष्मी’ इहाँ ‘द्वितीयत्व’ विधेय। समासे गौण हैल, शब्दार्थ गेल क्षय ॥ 59 ॥ ‘द्वितीय’ शब्द—विधेय, ताहा पड़िल समासे। ‘लक्ष्मीरे समता’ अर्थ करिल विनाशे ॥ 60 ॥ ‘अविमृष्ट-विधेयांश’—एइ दोष नाम। आर एक दोष आगे, शुन सावधान ॥ 61 ॥ अनुवाद—‘द्वितीय श्रीलक्ष्मी’—यहाँपर ‘द्वितीयत्व’ विधेय है। (द्वितीय और श्रीलक्ष्मी) इन शब्दोंका समास करनेसे इसका अर्थ गौण होनेसे प्रयोजनीय अर्थ नष्ट हो गया है। ‘द्वितीय’ शब्द विधेय (अज्ञात) है, इसका ‘श्रीलक्ष्मी’के साथ समास (संयुक्त शब्द) करनेसे जो ‘लक्ष्मीके समान’ अर्थ आप प्रकाश करना चाहते थे, वह अर्थ नष्ट हो गया है। इस दोषका नाम ‘अविमृष्ट-विधेयांश’ है। आगे और भी एक दोष है, सावधान होकर उसे सुनिये ॥ 59–61 ॥ तीसरे दोषकी व्याख्या :— ‘भवानीभर्तुः’—शब्द दिले पाइया सन्तोष। ‘विरुद्धमति’—कृत नाम एइ महादोष ॥ 62 ॥ भवानी-शब्दे कहे महादेवेर गृहिणी। ताँर भर्त्ता कहिले द्वितीय भर्त्ता जानि ॥ 63 ॥ ‘शिवपत्नीर भर्त्ता’—इहा शुनिते विरुद्ध। ‘विरुद्धमति’—शब्द शास्त्रे कभु नहे शुद्ध ॥ 64 ॥ इसका एक अन्य दृष्टान्त :— ‘ब्राह्मण-पत्नीर भर्त्ता—हस्ते देह दान’। शब्द शुनिलेइ हय द्वितीय-भर्त्ता ज्ञान ॥ 65 ॥ अनुवाद—‘भवानीभर्तुः’ शब्दका प्रयोग करके आप बहुत सन्तुष्ट हुए हैं, परन्तु इसमें ‘विरुद्धमति’-कृत नामक एक महादोष है। भवानी शब्द कहनेसे महादेव (भव) की पत्नीको समझा जाता है, उनका पति (महादेवकी पत्नीका पति) कहनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि उनका कोई दूसरा पति भी है। ‘शिवकी पत्नीका 210 | श्रीचैतन्यचरितामृत

16/62-74 ] पति', इस उक्तिको सुननेपर इसमें विरोधी अर्थका भान होता है, इसलिये 'विरुद्धमति' शब्द शास्त्रमें कभी शुद्ध नहीं माना गया है। 'ब्राह्मणकी पत्नीके पतिके हाथमें दान दो', ऐसा सुननेसे ही उनका कोई दूसरा पति है, ऐसा ज्ञान होता है॥62-65॥ चौथे दोषकी व्याख्या :- 'विभवति' क्रियार वाक्य-साङ्ग, पुनः विशेषण। 'अद्भुतगुणा'-एइ पुनराय दूषण॥66॥ पाँचवें दोषकी व्याख्या :- तिन पादे अनुप्रास देखि अनुपम। एक पादे नाहि, एइ दोष 'भग्नक्रम'॥67॥ पाँच दोषोंके कारण श्लोककी महिमामें हानि :- यद्यपि एइ श्लोके आछे पञ्च अलङ्कार। एइ पञ्चदोषे श्लोक कैल छारखार॥68॥ अनुवाद-'विभवति' क्रियापर वाक्य सम्पूर्ण होता है, किन्तु पुनः विशेषण 'अद्भुतगुणा' का प्रयोग करना पुनरात्त दोष है। श्लोकके तीन पादोंमें-प्रथम पादमें 'त'कार, तृतीय पादमें 'र'कार और चतुर्थ पादमें 'भ'कार, ये अनुपम अनुप्रास देखता हूँ, किन्तु द्वितीय पादमें अनुप्रास नहीं है, यह 'भग्नक्रम' दोष है। यद्यपि इस श्लोकमें पाँच अलङ्कार हैं, तथापि इन पाँच दोषोंने श्लोकको नष्ट कर दिया है॥66-68॥ दश अलङ्कारे यदि एक श्लोक हय। एक दोषे सब अलङ्कार हय क्षय॥69॥ उपमा :- सुन्दर शरीर यैछे भूषणे भूषित। एक श्वेतकुष्ठे यैछे करये विगीत॥70॥ अनुवाद-एक श्लोकमें यदि दस अलङ्कार भी हों, तो भी केवलमात्र एक दोषके कारण सभी अलङ्कार नष्ट हो जाते हैं। भूषणोंसे भूषित सुन्दर शरीरमें जैसे एक श्वेतकुष्ठका दाग पूरे शरीरको निन्दित कर देता है॥70॥ अनुभाष्य-'विगीत'-निन्दित॥70॥ भरतमुनि-वाक्य :- रसालङ्कारवत् काव्यं दोषयुक्त चेद्विभूषितम्। स्याद्वपुः सुन्दरमपि श्वित्रेणैकेन दुर्भगम्॥71॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥71॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विभूषित सुन्दर शरीर कुष्ठयुक्त होनेपर जिस प्रकार निन्दनीय होता है, रसालङ्कारयुक्त काव्य भी दोषयुक्त होनेपर वैसे ही निन्दित होता है॥71॥ अनुभाष्य-विभूषितं (समलङ्कृतं) सुन्दरं (मनोहरम्) अपि वपुः (शरीरं) यथा एकेन श्वित्रेण (श्वेताख्यकुष्ठरोगेण) दुर्भगं (श्री-रहितं मलिनं) स्यात्, तथा रसालङ्कारवत् (रसः शृङ्गारादिः अलङ्कारः अनुप्रासोपमादिः, ताभ्यां युक्तं) काव्यं (रसात्मकं वाक्यं) चेत् (यदि) दोषयुक्तं भवति, तथा दुर्भगं (श्रीहीनं) ज्ञेयम्। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥71॥ श्लोकके पाँच गुण :- पञ्च अलङ्कारेरे एबे शुनह विचार। दुइ शब्दालङ्कार, तिन अर्थ-अलङ्कार॥72॥ अनुवाद-अब आप इन पाँच अलङ्कारोंका विचार सुनिये, इसमें दो शब्दालङ्कार और तीन अर्थालङ्कार हैं॥72॥ पहला और दूसरा गुण-दोनों ही शब्दालङ्कार :- शब्दालङ्कारे-तिनपदे आछे अनुप्रास। 'श्रीलक्ष्मी'-शब्दे 'पुनरुक्तवदाभास'॥73॥ अनुवाद-तीन पदोंमें जो अनुप्रास हैं और 'श्रीलक्ष्मी' शब्दमें जो 'पुनरुक्तवदाभास' है, ये दो शब्दालङ्कार हैं॥73॥ प्रथम-चरणे पञ्च 'त'-कारेरे पाँति। तृतीय-चरणे हय पञ्च 'रेफ'-स्थिति॥74॥ सोलहवाँ अध्याय | 211

[ 16/74-84 चतुर्थ-चरणे चारि 'भ'-कार-प्रकाश। अतएव शब्दालङ्कार अनुप्रास ॥ 75 ॥ अनुवाद—प्रथम चरणमें पाँच बार 'त'-कार का, तीसरे पदमें पाँच बार 'र'-कार का और चौथे चरणमें चार बार 'भ'-कार का प्रयोग हुआ है। इसलिये यह अनुप्रास नामक शब्दालङ्कार है॥ 74-75 ॥ 'श्री'-शब्दे, 'लक्ष्मी'-शब्दे—एक वस्तु उक्त। पुनरुक्तवदाभासे, नहे पुनरुक्त ॥ 76 ॥ 'श्रीयुत लक्ष्मी' अर्थे अर्थेर विभेद। पुनरुक्तवदाभासे शब्दालङ्कार-भेद ॥ 77 ॥ अनुवाद—'श्री' और 'लक्ष्मी' शब्द एक ही वस्तुका नाम है, इससे पुनरुक्तिका आभास होता है, किन्तु यह पुनरुक्ति नहीं है। 'श्रीयुत लक्ष्मी' अर्थमें अर्थका विभेद है अर्थात् 'श्री' का अर्थ यहाँ शोभा है, इसलिये 'श्रीलक्ष्मी' का अर्थ 'शोभायुक्त लक्ष्मी' होनेसे यह पुनरुक्ति दोष नहीं है। इसी प्रकार पुनरुक्तवदाभास शब्दालङ्कारका एक भेद है॥ 76-77 ॥ तीसरा, चौथा और पाँचवाँ गुण—तीनों अर्थालङ्कार :- 'लक्ष्मीरिव' अर्थालङ्कार—उपमा-प्रकाश। आर अर्थालङ्कार आछे, नाम—'विरोधाभास' ॥ 78 ॥ 'गङ्गाते कमल जन्मे'—सबार सुबोध। 'कमले गङ्गार जन्म'—अत्यन्त विरोध ॥ 79 ॥ 'इहाँ विष्णुपादपद्मे गङ्गार उत्पत्ति'। विरोद्धालङ्कार इहार महा-चमत्कृति ॥ 80 ॥ ईश्वर-अचिन्त्यशक्त्ये गङ्गार प्रकाश। इहाते विरोध नाहि, विरोध-आभास ॥ 81 ॥ अनुवाद—'लक्ष्मीरिव' में 'उपमा' अर्थालङ्कार है। श्लोकमें एक और अर्थालङ्कार है जिसका नाम 'विरोधाभास' है। 'गङ्गासे कमलकी उत्पत्ति' होती है, यह सभी भली-भाँति जानते हैं, किन्तु 'कमलसे गङ्गाकी उत्पत्ति' जो कहा गया है—इसमें अत्यन्त विरोध है। यहाँ श्रीविष्णुके चरणकमलोंसे गङ्गाकी उत्पत्ति कही गयी है, यह महाचमत्कारी विरोद्धालङ्कार है। ईश्वरकी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे गङ्गाकी उत्पत्ति हुई है, इसमें कोई भी विरोध नहीं है; अपितु यह विरोधाभास अलङ्कार है॥ 78-81 ॥ श्रीकृष्णकी अचिन्त्य शक्तिका परिचय :- श्रीभगवत्-श्रीकृष्णचैतन्यपादोक्त श्लोक— अम्बुजमम्बुनि जातं क्वचिदपि न जातमम्बुजादम्बु। मुरभिदि तद्विपरीतं पादाम्भोजान्महानदी जाता ॥ 82 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 82 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जलमें ही कमल उत्पन्न होता है, कमलसे कभी भी जल उत्पन्न नहीं होता। किन्तु आश्चर्यका विषय यह है कि श्रीकृष्णमें इसके विपरीत देखा जाता है, उनके श्रीचरणकमलोंसे महानदी गङ्गाका जन्म हुआ है॥ 82 ॥ अनुभाष्य—अम्बुनि (जले) अम्बुजं (पद्मं) जातम् (उत्पन्नम्); क्वचित् (कुत्र) अपि अम्बुजात् (पद्मात्) अम्बु (जलं) न जातम्; किन्तु मुरभिदि (मुरारौ कृष्णे) तद्विपरीतं (कार्य-कारण-भावयोर्वैषम्यं) दृश्यते, यतः (कृष्णपादपद्मात्) महानदी (गङ्गा) जाता (निःसृता)। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 82 ॥ गङ्गार महत्त्व—साध्य, साधन ताहार। विष्णुपादोत्पत्ति—'अनुमान'—अलङ्कार ॥ 83 ॥ अनुवाद—इस श्लोकमें गङ्गाका महत्त्व वर्णन करना साध्य है और महिमाका साधन अर्थात् कारण उनका श्रीविष्णुके चरणकमलोंसे उत्पन्न होना है। यह अनुमान-अलङ्कार है॥ 83 ॥ स्थूल एइ पञ्च दोष, पञ्च अलङ्कार। सूक्ष्म विचारिये यदि आछये अपार ॥ 84 ॥ अनुवाद—स्थूलरूपसे विचार करनेपर ये पाँच दोष 212 | श्रीचैतन्यचरितामृत

और पाँच अलङ्कार दिखलायी पड़ते हैं, परन्तु यदि सूक्ष्म रूपसे विचार किया जाये, तो इसमें अपार गुण और दोष हैं॥84॥ अमृतप्रवाह भाष्य—“महत्त्वं गङ्गायाः”, इस श्लोकमें जो पाँच अलङ्कार हैं, वे गुण हैं; और इसमें पाँच दोष हैं अर्थात् दो स्थानोंपर ‘अविमृष्ट-विधेयांश’ दोष, तथा तीन स्थानोंपर ‘विरुद्धमति’, ‘पुनरुक्ति’ और ‘भग्नक्रम’ नामक दोष हैं। पहला ‘अविमृष्ट-विधेयांश’ दोष यह है कि इस श्लोकमें ‘गङ्गाका महत्त्व’ ही मूल विधेय है और ‘इदं’ शब्द अनुवाद है; इस स्थानपर ‘गङ्गाका महत्त्व’ पहले लिखकर ‘इदं’ शब्द बादमें लिखना अवैध है। अनुवाद अर्थात् पूर्व ज्ञात विषय पहले नहीं लिखनेपर अर्थकी हानि होती है। दूसरा ‘अविमृष्ट-विधेयांश’ दोष यह है कि ‘द्वितीय-श्रीलक्ष्मीरिव’ (द्वितीय श्रीलक्ष्मीके समान), इसमें प्रयुक्त ‘द्वितीयत्व’—विधेय अर्थात् पूर्व अज्ञात विषय है, उसको पहले लिखकर समास करनेसे अर्थ गौण होकर नष्ट हो जाता है, अर्थात् लक्ष्मीके समान कहनेका जो तात्पर्य था, वह समास-दोषसे नष्ट हो गया। तीसरा दोष जो ‘विरुद्धमति-कृत’ है, वह ‘भवानीभर्तुः’ शब्दमें दिखेगा; ऐसे प्रयोगसे ‘भवानी’ शब्दसे महादेवकी पत्नीको समझा जाता है, ‘भवानीभर्तुः’ शब्दसे ‘भवानीके दूसरे पति’—इस प्रकार द्वितीय-मति उदित होती है। ऐसे शब्द-व्यवहारसे काव्य ‘विरुद्धमति-कृत’ दोषसे दूषित हो जाता है। चौथा दोष यह है कि ‘विभवति’ क्रियामें वाक्य समाप्त होनेपर, उस स्थानपर ‘अद्भुतगुण’ विशेषणके प्रयोग करनेसे ‘पुनरुक्ति’-दोष हुआ है। पाँचवाँ दोष ‘भग्नक्रम’ है; पहले, तीसरे और चौथे, इन तीन पदोंमें ‘त’कार, ‘र’कार और ‘भ’कारका अनुप्रास है, दूसरे पदमें अनुप्रास नहीं है, यही ‘भग्नक्रम’ दोष है। पाँच अलङ्कार गुण होनेपर भी इन पाँच दोषोंके कारण इस श्लोकका महत्त्व नष्ट हो गया। दस अलङ्कारोंसे युक्त श्लोकमें यदि एक भी दोष रहे, तो वह श्वेतकुष्ठयुक्त भूषणोंसे भूषित सुन्दर शरीरके समान निन्दित होता है। अब गुणोंकी बात बतला रहा हूँ,—तुम्हारे इस श्लोकमें दो शब्दालङ्कार और तीन अर्थालङ्कार हैं। (1) तीन पादोंमें जो अनुप्रास हैं, वे शब्दालङ्कार हैं। (2) ‘श्रीलक्ष्मी’ इसके प्रयोगसे पुनरुक्ति दोष नहीं होता, अपितु ‘पुनरुक्तिवदाभास’रूप शब्दालङ्कार होता है। ‘श्री’ और ‘लक्ष्मी’ को एक वस्तु माननेपर किसी प्रकारका दोष नहीं होता। ‘श्रीयुत लक्ष्मी’—इस प्रकार अर्थ करनेपर अर्थका विभेद अवश्य होता है, परन्तु इससे जो पुनरुक्त्याभास होता है, वह एक विशेष शब्दालङ्कार है। (3) ‘लक्ष्मीरिव’ इस शब्दके प्रयोगमें उपमालङ्काररूप अर्थालङ्कार है। (4) और एक विरोधाभास-रूप अर्थालङ्कार है, वह विष्णुचरण-कमलसे उत्पन्न गङ्गाके सम्बन्धमें है। जलसे ही कमलकी उत्पत्ति होती है, किन्तु कमलसे जलकी उत्पत्ति होना—ऐसी विरुद्ध बातसे ‘विरोधाभास’ उत्पन्न होता है। ईश्वरकी अचिन्त्य शक्तिसे गङ्गाका प्रकाश होनेके कारण इसमें विरोधमात्र नहीं है, केवल ‘विरोधाभास’ है, वही अलङ्कार है। (5) जो वाक्य गङ्गाके महत्त्व-रूप साध्यवस्तुको साधन कर रहा है अर्थात् विष्णुपादोत्पत्ति-वाक्य, वह वाक्य ही ‘अनुमान’ अलङ्कार है॥54-84॥ अदोषदर्शी महाप्रभुके द्वारा कविको उत्साह-प्रदान :— प्रतिभा, कवित्व तोमार देवता-प्रसादे। अविचार काव्ये अवश्य पड़े दोष बाधे॥85॥ **अनुवाद—**देवताओंकी कृपासे आपने कविता रचनेकी प्रतिभा तो प्राप्तकी है, परन्तु अविचारपूर्वक कविता रचनेसे अवश्य ही उसमें दोष रहता है॥85॥ **अनुभाष्य—**काव्यका यदि विचार न किया जाये, तो अवश्य ही उसके दोष सहजमें दिखायी नहीं देते॥85॥ विचार करिले कवित्व हय सुनिर्मल। सालङ्कार हैले अर्थ करे झलमल॥” 86॥ **अनुवाद—**विचार करनेपर सुनिर्मल (दोषरहित)

[ 16/86-97 कविताकी रचना होती है और उसमें अलङ्कारोंके प्रयोगसे उसका अर्थ झलमल करता है अर्थात् स्पष्टरूपसे प्रकाशित होता है॥” 86॥ दिग्विजयीका विस्मित होकर मन-ही-मन विचार :- शुनिया प्रभुर वाक्य दिग्विजयी विस्मित। मुखे ना निःसरे वाक्य, प्रतिभा—स्तम्भित॥ 87॥ कहिते चाहये किछु ना आइसे उत्तर। तबे विचारये मने हइया फाँफर॥ 88॥ अनुवाद—महाप्रभुके वाक्योंको सुनकर दिग्विजयी बहुत विस्मित हुए। उनके मुखसे वाक्य नहीं निकल रहा था और उनकी प्रतिभा स्तम्भित हो गई। वे कुछ कहना चाहते थे, परन्तु कुछ उत्तर नहीं दे पाये। तब वे किंकर्त्तव्य-विमूढ़ होकर मनमें विचार करने लगे॥ 87-88॥ 'पडुया बालक कैल मोर बुद्धि लोप। जानि—सरस्वती मोरे करियाछेन कोप॥ 89॥ महाप्रभुकी अलौकिक व्याख्याको सरस्वतीकी व्याख्या समझना :- ये व्याख्या करिल, से मनुष्येर नहे शक्ति। निमाञि-मुखे रहिं' बले आपने सरस्वती॥'90॥ अनुवाद—'एक विद्यार्थी बालकने मेरी बुद्धिका नाश कर दिया है। ऐसा लगता है कि सरस्वतीदेवी मुझसे रुष्ट हो गयी हैं। इसने जो व्याख्याकी है, ऐसी व्याख्या करनेकी शक्ति किसी मनुष्यकी तो नहीं हो सकती। निमाइके मुखसे स्वयं सरस्वती ही बोल रही हैं॥'90॥ महाप्रभुके प्रति कविकी उक्ति :- एत भावि' कहे,—“शुन, निमाञि पण्डित। तव व्याख्या शुनि' आमि हइलाङ् विस्मित॥ 91॥ अलङ्कार नाहि पड़, नाहि शास्त्राभ्यास। केमने ए सब अर्थ करिले प्रकाश॥”92॥ अनुवाद—इस भावनासे दिग्विजयीने कहा,—“सुनो, निमाइ पण्डित ! तुम्हारी व्याख्या सुनकर मैं विस्मित हो गया हूँ। तुमने न तो अलङ्कार पढ़ा है और न ही शास्त्रोंका अभ्यास किया है। फिर तुमने किस प्रकारसे इन सब अर्थोंको प्रकाशित किया है॥”91-92॥ इहा शुनि' महाप्रभु अति बड़ रङ्गी। ताँहार हृदय जानि' कहे करि' भङ्गी॥ 93॥ महाप्रभुका सरस्वतीको ही व्याख्या- नैपुण्यका कारण बताना :- “शास्त्रेर विचार भाल-मन्द नाहि जानि। सरस्वती याहा बलाय, सेइ बलि वाणी॥”94॥ अनुवाद—यह सुनकर महान् कौतुकी महाप्रभुने उनके हृदयके भावोंको जानकर परिहासपूर्वक कहा—“मैं शास्त्रोंके गुण और दोषके विचारोंको नहीं जानता, सरस्वतीदेवीने मुझसे जो बुलवाया है, मैंने वही कहा है॥”94॥ सरस्वतीके ऊपर दिग्विजयीका अभिमान :- इहा शुनि' दिग्विजयी करिल निश्चय। 'शिशुद्वारे देवी मोरे करिल पराजय॥ 95॥ आजि ताँरे निवेदिब, करि' जप-ध्यान। शिशुद्वारे कैल मोरे एत अपमान॥'96॥ अनुवाद—यह सुनकर दिग्विजयीने निश्चय किया कि 'स्वयं देवीने ही मुझे इस बालकके द्वारा पराजित करवाया है। आज ही मैं जप-ध्यान करके उनसे पूछूँगा कि एक छोटेसे बालकके द्वारा क्यों मेरा इतना अपमान करवाया है?'॥ 95-96॥ ग्रन्थकारके द्वारा घटनाके मूल कारणका निर्देश :- वस्तुतः सरस्वती अशुद्ध श्लोक कराइल। विचार-समय ताँर बुद्धि आच्छादिल॥ 97॥ अनुवाद—वास्तवमें सरस्वतीदेवीने विचार करते समय 214 | श्रीचैतन्यचरितामृत

16/97-106 ] उनकी बुद्धिको आच्छादित करके ही उनसे अशुद्ध श्लोककी रचना करवायी थी॥97॥ कविके पराजित होनेपर शिष्योंके द्वारा हँसना और महाप्रभुके द्वारा उसका निषेध :- तबे शिष्यगण सब हासिते लागिल। ताँ-सबा निषेधि' प्रभु कविके कहिल ॥ 98 ॥ कविको महाप्रभुके द्वारा सम्मान प्रदान :- “तुमि महापण्डित हओ, कवि-शिरोमणि। याँर मुखे बाहिराय ऐछे काव्यवाणी ॥ 99 ॥ तोमार कवित्व येन गङ्गाजल-धार। तोमासम कवि कोथा नाहि देखि आर ॥ 100 ॥ जयदेव, कालिदास और भवभूतिके काव्यमें भी दोष :- भवभूति, जयदेव आर कालिदास। ताँ-सबार कवित्वे हय दोषेर प्रकाश ॥ 101 ॥ अनुवाद-दिग्विजयी पण्डितकी पराजयको देखकर तब महाप्रभुके सभी शिष्य हँसने लगे। महाप्रभुने उन सबको हँसनेसे रोका और उन्होंने कविसे कहा-“आप तो महापण्डित हैं और कवियोंमें शिरोमणि हैं, जिनके मुखसे ऐसी सुन्दर कविता निकलती है। आपकी कविता तो गङ्गाजलकी धाराके समान है। मैंने आपके समान कवि कहीं नहीं देखा है। भवभूति, जयदेव और कालिदास जैसे महान कवियोंकी कविताओंमें भी कुछ दोष रहते हैं॥ 98-101 ॥ अनुभाष्य-'भवभूति अथवा श्रीकण्ठ' - ये 'मालतीमाधव', 'उत्तर-चरित', 'वीरचरित' आदि संस्कृत नाटकोंके रचयिता हैं। भोजराजाके राज्यकालमें इनका जन्म हुआ था। ये पद्मनगर-निवासी भट्टगोपाल नामक काश्यप-गोत्रीय श्रोत्रिय ब्राह्मणके पौत्र नीलकण्ठके पुत्र थे। 'कालिदास' -सम्राट् विक्रमादित्यकी सभामें नवरत्नोंमें अन्यतम महाकवि थे। इन्होंने 'रघुवंश', 'कुमारसम्भव', 'अभिज्ञान-शकुन्तल', 'मेघदूत' आदि लगभग तीस-चालीस संस्कृत महाकाव्य, नाटक और अन्यान्य विषयक ग्रन्थोंकी रचना की थी। 'जयदेव' - चैःचः आदिलीला, 13/42 संख्या द्रष्टव्य है ॥ 101 ॥ इति अनुभाष्ये षोडश परिच्छेद। सोलहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। श्लोक-रचना ही वास्तविक गुण :- दोष-गुण-विचारे एइ अल्प करि' मानि। कवित्व-करणे शक्ति, ताँहा से बाखानि ॥ 102 ॥ महाप्रभुकी दैन्योक्ति :- शैशव-चापल्य किछु ना लबे आमार। शिष्येर समान मुञि ना हङ तोमार ॥ 103 ॥ महाप्रभुके द्वारा उनको सविनय-वाक्यसे विदायी-दान :- आजि बासा' याह, कालि मिलन आबार। शुनिब तोमार मुखे शास्त्रेर विचार ॥ " 104 ॥ अनुवाद-दोष और गुणोंके विचारसे यह तो बहुत साधारण सी बात है, किन्तु आपकी कविता रचनाकी शक्ति प्रशंसनीय है। मेरी बाल्य-चपलताको आप अपने हृदयमें मत रखना, मैं तो आपके शिष्यके भी समान नहीं हो सकता। आज आप अपने वास स्थानपर जाइये, हम कल पुनः मिलेंगे। तब मैं आपके मुखसे शास्त्रोंके विचार श्रवण करूँगा॥" 104 ॥ रात्रिमें कविके द्वारा सरस्वतीकी आराधना :- एइमते निज-घरे गेला दुइ जन। कवि रात्रे कैल सरस्वती-आराधन ॥ 105 ॥ सरस्वतीके उपदेशसे महाप्रभुमें ईश्वर-बुद्धि :- सरस्वती रात्रे ताँरे उपदेश कैल। साक्षात् ईश्वर करि' प्रभुरे जानिल ॥ 106 ॥ अनुवाद-इस प्रकार दोनों अपने-अपने घर चले गये और दिग्विजयी ब्राह्मण रात्रिमें सरस्वतीदेवीकी आराधना करने लगे। सरस्वतीदेवीने रात्रिमें दिग्विजयीको उपदेश दिया कि निमाइ पण्डित साक्षात् ईश्वर हैं॥ 105-106 ॥ सोलहवाँ अध्याय | 215

[ 16/107-111 प्रातःकाल महाप्रभुके श्रीचरणोंमें शरण-ग्रहण और महाप्रभुकी कृपा :- प्राते आसि' प्रभुपदे लइल शरण। प्रभु कृपा कैल, ताँर खण्डिल बन्धन ॥ 107 ॥ अनुवाद—प्रातःकालमें उन्होंने आकर महाप्रभुके चरणकमलोंकी शरण ग्रहण की और महाप्रभुने उनपर कृपा की, जिससे उनके सारे बन्धन कट गये ॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बन्धन'—पण्डिताभिमानरूपी मायाका बन्धन ॥ 107 ॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये षोड़श परिच्छेदे। सोलहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य पूर्ण हुआ। दिग्विजयीकी सुकृति :- भाग्यवन्त दिग्विजयी सफल-जीवन। विद्या-बले पाइल महाप्रभुर चरण ॥ 108 ॥ अनुवाद—भाग्यवान् दिग्विजयीका जीवन सफल हो गया। विद्याके बलपर उसने महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंको प्राप्त किया ॥ 108 ॥ ए सब लीला वर्णियाछेन वृन्दावनदास। ये किछु करिल इहाँ, विशेष प्रकाश ॥ 109 ॥ अनुवाद—इन सब लीलाओंका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने श्रीचैतन्यभागवतमें वर्णन किया है। जो कुछ विशेष लीला थी, उसका मैंने यहाँ वर्णन किया है ॥ 109 ॥ चैतन्य-गोसाञिर लीला—अमृतेर धार। सर्वेन्द्रिय-तृप्ति हय श्रवणे याहार ॥ 110 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ अमृतकी धाराओंके समान हैं, जिनका श्रवण करनेसे सभी इन्द्रियाँ तृप्त हो जाती हैं ॥ 110 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 111 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे कैशोरीलीला-सूत्र-वर्णनं नाम षोड़श-परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 111 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डका कैशोरीलीला-सूत्र-वर्णन नामक सोलहवाँ-अध्याय पूर्ण।

सतरहवाँ अध्याय

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सत्रहवाँ अध्याय **सतरहवें अध्यायका कथासार-**सतरहवें अध्यायमें महाप्रभुकी सोलह वर्षकी आयुसे लेकर संन्यास ग्रहण करने तककी समस्त लीलाओंका सूत्र रूपमें यहाँ वर्णन किया है, क्योंकि व्यासावतार श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने श्रीचैतन्यभागवतमें इन सब लीलाओंका विशेष रूपसे वर्णन किया है। तब भी जहाँ-जहाँ वृन्दावनदास ठाकुरने जिन अंशोंको छोड़ा है, उनका कुछ विशेष वर्णन इस अध्यायमें देखा जाता है। आम-महोत्सव लीला और काजीके साथ महाप्रभुका वार्त्तालाप विशेषरूपसे कहा गया है। बादमें यह दिखलाया है कि यशोदानन्दने शचीनन्दन होकर चार प्रकारके भक्तभावोंका आस्वादन किया। राधाके प्रेमरसके माधुर्यका आस्वादन करते हुए राधाभावको अङ्गीकार करके एकान्त रूपसे गोपीभावको स्वीकार किया। जितने प्रकारके भक्तभाव हैं, उनमें गोपीभाव श्रेष्ठ है, क्योंकि गोपीभावमें व्रजेन्द्रनन्दनके अतिरिक्त अन्य किसी भी भजनीयतत्त्वका प्रकाश नहीं है। श्रीकृष्ण कौतुकवश चतुर्भुज रूप धारणकर जब गोपियोंके सामने आये, तो वे उन्हें केवल नमस्कार करके वहाँसे चली गयीं। साधारण गोपीभावमें मात्र श्रीकृष्णमूर्तिके अतिरिक्त अन्य सभी मूर्तियोंका परित्याग है, किन्तु गोपी-शिरोमणि श्रीमती राधिकाका भाव सर्वोच्च है। राधाजीको देखकर श्रीकृष्ण अपने चतुर्भुज रूपको नहीं रख पाये। व्रजेश्वर नन्द इस (गौर) लीलामें पिता जगन्नाथ हैं और व्रजेश्वरी यशोदा शचीमाता हैं। चैतन्य गोसाञि साक्षात् नन्दनन्दन हैं अर्थात् नन्दनन्दनके प्रकाश अथवा विलास नहीं हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुके वात्सल्य, दास्य और सख्य-ये तीन भाव हैं। श्रीअद्वैतप्रभुके सख्य और दास्य-ये दो भाव हैं। अन्य सभी अपने-अपने पूर्वाधिकारके अनुसार महाप्रभुकी सेवा करते हैं। एक ही तत्त्व-वंशीवदन, गोप-विलासी, श्यामरूप श्रीकृष्ण कभी ब्राह्मण और कभी संन्यासी वेशमें गौररूपमें श्रीकृष्णचैतन्य हैं। अब विरोधका स्थान यह है कि श्रीकृष्ण ही अब गोपी हुए हैं। यह अवश्य ही अचिन्तनीय है, परन्तु श्रीकृष्णकी अचिन्त्यशक्तिके द्वारा यह भी सम्भव है। इस विषयमें तर्क करना व्यर्थ है, क्योंकि अचिन्त्यभावके विषयमें तर्क करना नितान्त मूर्खताका कार्य है। जिस प्रकार श्रीव्यासदेवने भागवतमें लिखा है, उसी प्रकार इस अध्यायके अन्तमें श्रीकृष्णदास गोस्वामीने आदिलीलाके सतरह अध्यायोंका अनुवाद पृथक्-पृथक् संक्षेपमें लिखा है। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौरकृपासे अपवित्र व्यक्तिकी भी पवित्रता :- वन्दे स्वैराद्भुतेहं तं चैतन्यं यत्प्रसादतः । यवनाः सुमनायन्ते कृष्णनामप्रजल्पकाः ॥ १ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनकी कृपासे यवन लोग भी सद्-चरित्र होकर श्रीकृष्णनामका जप करने लगे, उन स्वच्छन्द रूपसे अद्भुत चेष्टा करनेवाले श्रीचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥ अनुभाष्य-यत् (यस्य चैतन्यदेवस्य) प्रसादतः (अनुकम्पया) यवनाः (म्लेच्छाः) कृष्णनामप्रजल्पकाः (नामोच्चारणनिष्ठापराः सन्तः) सुमनायन्ते (सुमनसः इव आचरन्ति) तं स्वैराद्भुतेहं (स्वैरा स्वतन्त्रा अद्भुता अलौकिकी ईहा 'चेष्टा' यस्य तं स्मार्त्त-विधि-लङ्घनसमर्थं) चैतन्यम् अहं वन्दे। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है। उनकी अद्भुत (अलौकिक) चेष्टा अर्थात् वे यवनोंको भी श्रीकृष्णनाम प्रदानकर स्मार्त्त-विधिका उल्लङ्घन करनेमें समर्थ हैं॥ १ ॥

[ 17/2-7 जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीचैतन्यदेवकी जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर-भक्तवृन्दकी जय हो॥२॥ कैशोर-लीलार सूत्र करिल गणन। यौवन-लीलार सूत्र करि अनुक्रम॥३॥ अनुवाद—पूर्व अध्यायमें मैंने कैशोर-लीलाका सूत्ररूपमें वर्णन किया। अब क्रमशः यौवनलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन करूँगा॥३॥ यौवनमें अनेक लीला-विलास :- विद्या-सौन्दर्य-सद्वेश-सम्भोग-नृत्य-कीर्त्तनैः। प्रेमनाम-प्रदानैश्च गौरो दीव्यति यौवने ॥ ४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—विद्या, सौन्दर्य, सद्-वेश, सम्भोग, नृत्य, कीर्त्तन, प्रेम और नाम-दानके द्वारा श्रीगौरचन्द्र यौवनकालमें शोभाको प्राप्त हुए॥४॥ अनुभाष्य—गौरः यौवने (पञ्चदशवर्षातिक्रान्ते यौवन-प्राकट्ये) विद्या-सौन्दर्य-सद्वेश-सम्भोग-नृत्यकीर्त्तनैः (परमार्थज्ञानलावण्य- साधुवेशवसनमाल्यचन्दनादिसम्भोगनृत्यकीर्त्तनादिभीः एतैः) प्रेमनाम- प्रदानैः (प्रेम्णा सह कृष्णनाम-वितरणैः) दीव्यति (क्रीड़ति)। श्लोक भावानुवाद—पन्द्रह वर्षकी आयुके बाद यौवनके प्रकट होनेपर श्रीगौरचन्द्रने विद्या (परमार्थ-ज्ञान), सौन्दर्य (लावण्य), सद्-वेश (साधुवेश, वस्त्र, माला, चन्दनादि), सम्भोग, नृत्यकीर्त्तनादि और प्रेमके साथ श्रीकृष्णनामके वितरणकी क्रीड़ा की॥४॥ यौवन लीला :- यौवन-प्रवेशे अङ्गेर अङ्ग विभूषण। दिव्य वस्त्र, दिव्य वेश, माल्य-चन्दन ॥ ५ ॥ अनुवाद—यौवनकालमें प्रवेश करनेपर महाप्रभुके अङ्ग ही उनके अङ्गोंके आभूषण हो गये अर्थात् प्रत्येक अङ्गका गठन इतना सुन्दर था कि वह सम्पूर्ण देहका आभूषण प्रतीत होता था। वे दिव्य वस्त्र, दिव्य वेशभूषा और माला-चन्दनादिसे सुशोभित रहते थे॥५॥ विद्यार औद्धत्ये काहाँ ना करे गणन। सकल पण्डित जिनि' करे अध्यापन ॥ ६ ॥ अनुवाद—अपनी विद्याके अभिमानसे वे किसीको कुछ नहीं समझते थे। सभी पण्डितोंको अपने ज्ञानके द्वारा परास्तकर वे स्वयं पढ़ाने लगे॥६॥ वायुव्याधि-छले कैल प्रेम परकाश। भक्तगण लञा कैल विविध विलास ॥ ७ ॥ अनुवाद—वायु-रोगके छलसे उन्होंने प्रेमका प्रकाश किया। तब भक्तोंको लेकर नाना प्रकारकी लीलाओंका आस्वादन किया॥७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अध्ययन और अध्यापन समाप्त करके शुद्धभक्तिका प्रचार करनेके लिये श्रीगौरचन्द्रने कुछ दिन वायु-रोगके छलसे छात्रोंको सर्वत्र श्रीकृष्णनामकी व्याख्या की, सभी व्याकरणके सूत्रोंका श्रीकृष्णसे सम्बन्ध दिखलाया और उनको पढ़ानेके कार्यसे छुटकारा पानेकी चेष्टा करने लगे॥७॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड, बारहवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥७॥ अमृताणुकणिका—एक दिन महाप्रभु वायु रोगके छलसे प्रेम-भक्तिके समस्त विकारोंको प्रकट करने लगे। वे अकस्मात् अलौकिक शब्द बोलने लगते, कभी भूमिपर लोट-पोट करने लगते, कभी हँसते और घरमें तोड़-फोड़ करने लगते। कभी हुँकार करते, कभी ताल ठोकते और जिसे सामने देखते उसे मारने लगते। थोड़ी देर बाद वे निश्चल हो जाते और उन्हें ऐसी मूर्च्छा होती, जिसे देखकर लोग भयभीत हो जाते। सभी लोग अनेक प्रकारके खाद्य तेल उनके सिरमें 220 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/7-10 ] लगाकर उनका उपचार करनेकी चेष्टा करने लगे। परन्तु महाप्रभुके समस्त अङ्ग काँपने लगे और उनका शरीर तीव्रतासे झूमने लगा तथा उनकी हुँकार सुनकर सभी भयभीत हो गये। महाप्रभु कहने लगे,–“मैं ही सभी लोकोंका ईश्वर हूँ, मैंने ही विश्वको धारण कर रखा है, इसलिये मेरा नाम विश्वम्भर है। मैं वही हूँ, परन्तु मुझे कोई नहीं पहचानता।” ऐसा कहकर महाप्रभु दौड़कर लोगोंको पकड़ने लगे। उनके व्यवहारको देखकर किसीने कहा कि इनमें कोई दानव आ गया है, किसीने कहा कि यह किसी डाकिनीका काम है और कोई कहने लगे कि ये निरन्तर बोल रहे हैं, इसलिये निश्चित ही इन्हें वायु-विकार हो गया है। फिर एक बड़े लकड़ीके पात्रमें गलेतक तेल भरके उनको बैठाया। महाप्रभु तेलमें बैठकर खिलखिलाकर हँसने लगे, मानो वास्तवमें वायु अपना प्रभाव दिखा रही है। इस प्रकार कुछ देर लीला करनेके पश्चात् महाप्रभु अपनी स्वाभाविक स्थितिमें आ गये। सभी भक्त आनन्दसे 'हरि' 'हरि' ध्वनि करने लगे। परन्तु विष्णुकी मायासे मोहित होकर कोई उनके तत्त्वको नहीं समझ पाया॥7॥ गयामें ईश्वरपुरीके साथ मिलन और दीक्षाभिनय :– तबे त' करिला प्रभु गयाते गमन। ईश्वरपुरीर सङ्गे तथाइ मिलन॥8॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने गयाके लिये गमन किया और वहाँ उनका श्रीईश्वरपुरीसे मिलन हुआ॥8॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड सत्रहवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥8॥ दीक्षा-अनन्तरे हैल प्रेमेर प्रकाश। देशे आगमन पुनः, प्रेमेर विलास॥9॥ अनुवाद—दीक्षाके बाद महाप्रभुने प्रेमका प्रकाश किया और पुनः नवद्वीप आकर प्रेमपूर्वक लीला-विलास किया॥9॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'परलोकगत पिताका गयामें श्राद्ध करूँगा'—इस भावसे महाप्रभुने अनेक छात्रोंके साथ गयाकी यात्रा की। मार्गमें उन्हें ज्वर आ गया और ब्राह्मणके चरणोदकका पान करके वे उस रोगसे मुक्त हुए। इस लीलाके द्वारा उन्होंने संसारी लोगोंको ब्राह्मणोंको सम्मान देनेका कर्त्तव्यका प्रदर्शन किया। गया पहुँचकर उन्होंने श्रीईश्वरपुरीसे श्रीकृष्णमन्त्रकी दीक्षा ग्रहण की। उस मन्त्रको ग्रहण करते ही महाप्रभुमें प्रेमका प्रकाश होने लगा। गयामें कार्य समाप्त करके श्रीनवद्वीप धाममें आकर प्रेमका प्रचार करने लगे॥9॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड सत्रहवाँ अध्याय और मध्य पहला अध्याय द्रष्टव्य है॥9॥ दीक्षाके उपरान्त नवद्वीप-लीला, श्रीअद्वैतका विश्वरूप-दर्शन :– शचीके प्रेमदान, तबे अद्वैत-मिलन। अद्वैत पाइल विश्वरूप-दरशन॥10॥ अनुवाद—महाप्रभुने शचीमाताको प्रेमका दान किया। तब महाप्रभुका श्रीअद्वैताचार्यसे मिलन हुआ और बादमें महाप्रभुने उन्हें अपने विश्वरूपका दर्शन करवाया॥10॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक दिन महाप्रभुने श्रीवासके घरमें विष्णु-सिंहासनपर बैठकर कहा कि मेरी माताने श्रीअद्वैताचार्यके चरणोंमें वैष्णवापराध किया है। वह अपराध क्षमा न होनेतक उनको प्रेमभक्ति प्राप्त नहीं होगी। भक्त लोग यह सुनकर श्रीअद्वैताचार्यको वहाँ बुला लाये और श्रीअद्वैताचार्य (शचीमाताके माहात्म्यका कीर्त्तन करते-करते) प्रेममें आविष्ट हो गये। शचीदेवीने उस अवसरका लाभ उठाते हुए उनके चरणोंकी धूलि लेकर उस अपराधसे मुक्ति पायी। तब, “प्रसन्न हइया प्रभु बोले जननीरे। एखन से विष्णुभक्ति हइल तोमारे॥ अद्वैतेरे स्थाने अपराध नाहि आर।” “तब प्रसन्न होकर महाप्रभुसे मातासे कहा कि अब सत्रहवाँ अध्याय | 221

[ 17/10-15 आपका श्रीअद्वैत प्रभुके प्रति कोई अपराध नहीं रहा है, इसलिये अब आपको विष्णुभक्ति प्राप्त होगी।” एक दिन प्रेममें आविष्ट होकर श्रीअद्वैताचार्यने श्रीवास-अङ्गनमें महाप्रभुसे कहा—‘पहले आपने अर्जुनको जो विश्वरूप दिखलाया था, वह रूप मुझे भी दिखलाइये।’ तब महाप्रभुने दया करके उन्हें भी अपना विश्वरूप दिखलाया॥10॥ अनुभाष्य—‘शचीमाताको प्रेमदान’—चैःभाः मध्यखण्ड बाइसवाँ अध्याय और ‘श्रीअद्वैत-मिलन’—चैःभाः मध्यखण्ड छठा अध्याय; ‘श्रीअद्वैतका विश्वरूप दर्शन’—चैःभाः मध्यखण्ड चौबीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥10॥ प्रभुर अभिषेक तबे करिल श्रीवास। खाटे बसि' प्रभु कैल ऐश्वर्य-प्रकाश॥11॥ अनुवाद—तब श्रीवासने महाप्रभुका अभिषेक किया और महाप्रभुने सिंहासनपर बैठकर अपना ऐश्वर्य प्रकाश किया॥11॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन श्रीवासके घरमें सब भक्तोंने मिलकर महाप्रभुका अभिषेक किया। महाप्रभुने विष्णु-सिंहासनके ऊपर बैठकर अपने राजराजेश्वर-ऐश्वर्यका प्रकाश किया। अनेक भक्तोंने उस समय कीर्तन किया। इधर श्रीअद्वैतादि भक्त महाप्रभुकी षोड़श उपचारसे पूजा करने लगे। तब जिसकी जैसी अभिलाषा थी, महाप्रभु वैसा वर उसे प्रदान करने लगे॥11॥ अनुभाष्य—‘श्रीवास पण्डितके घरमें विष्णु-सिंहासनपर विराजमान महाप्रभु द्वारा ‘सातप्रहरिया’ भाव’—चैःभाः मध्यखण्ड नौवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥11॥ श्रीनित्यानन्दके साथ मिलन :— तबे नित्यानन्द-स्वरूपेर आगमन। प्रभुके मिलिया पाइला षड्भुज-दर्शन॥12॥ अनुवाद—तत्पश्चात् श्रीनित्यानन्द प्रभु नवद्वीप आये और महाप्रभुसे उनका मिलन हुआ। महाप्रभुने उन्हें अपने षड्भुज रूपके दर्शन करवाये॥12॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीनित्यानन्द प्रभुने वीरभूम जिलाके ‘एकचक्रा’ ग्राममें पद्मावतीके गर्भसे हड़ाई पण्डितके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण किया। श्रीनित्यानन्द प्रभु जब थोड़े बड़े हुए, तो एक संन्यासीने आकर हड़ाई पण्डितसे उनको माँग लिया। तब उस संन्यासीके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुने अनेक देशोंका भ्रमण करते-करते मथुरामण्डलमें आकर बहुत समय तक वास किया। महाप्रभुके आकर्षण करनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीनवद्वीपमें आकर नन्दन-आचार्यके घरमें आकर ठहरे। महाप्रभु भक्तोंको साथ लेकर वहाँ गये और श्रीनित्यानन्द प्रभुको अपने साथ अपने स्थानपर ले आये॥12॥ अनुभाष्य—‘नित्यानन्दमिलन’—चैःभाः मध्यखण्ड, तीसरा अध्याय और श्रीवासगृहमें श्रीव्यास-पूजाके उपलक्ष्यमें ‘श्रीनित्यानन्द प्रभुको महाप्रभुके द्वारा षड्भुजरूपका (शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, श्रीहल और मूशल धारण किये हुए रूपका) दर्शन’—चैःभाः मध्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥12॥ निताइको महाप्रभुका षड्भुज, चतुर्भुज और द्विभुज रूप-प्रदर्शन :— प्रथमे षड्भुज ताँरे देखाइल ईश्वर। शङ्खचक्रगदापद्म-शार्ङ्ग-वेणुधर॥13॥ पाछे चतुर्भुज हैला, तिन अङ्ग वक्र। दुइ हस्ते वेणु बाजाय, दुइ हस्ते शङ्ख-चक्र॥14॥ तबे त' द्विभुज केवल वंशीवदन। श्याम-अङ्ग पीतवस्त्र व्रजेन्द्रनन्दन॥15॥ अनुवाद—पहले महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, शार्ङ्ग और वेणुधारी षड्भुज रूप दिखलाया। बादमें वे त्रिभङ्ग ललित मुद्रामें चतुर्भुज रूप हो गये और वे दो हाथोंमें वंशी बजा रहे थे तथा उन्होंने अन्य दो हाथोंमें शङ्ख-चक्र धारण किये हुए थे। तब वे केवल वंशी बजाते हुए द्विभुज श्याम वर्णके पीतवस्त्रधारी व्रजेन्द्रनन्दन हो गये॥13-15॥ 222 | श्रीचैतन्यचरितामृत