भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 758

[ 17/10-15 आपका श्रीअद्वैत प्रभुके प्रति कोई अपराध नहीं रहा है, इसलिये अब आपको विष्णुभक्ति प्राप्त होगी।” एक दिन प्रेममें आविष्ट होकर श्रीअद्वैताचार्यने श्रीवास-अङ्गनमें महाप्रभुसे कहा—‘पहले आपने अर्जुनको जो विश्वरूप दिखलाया था, वह रूप मुझे भी दिखलाइये।’ तब महाप्रभुने दया करके उन्हें भी अपना विश्वरूप दिखलाया॥10॥ अनुभाष्य—‘शचीमाताको प्रेमदान’—चैःभाः मध्यखण्ड बाइसवाँ अध्याय और ‘श्रीअद्वैत-मिलन’—चैःभाः मध्यखण्ड छठा अध्याय; ‘श्रीअद्वैतका विश्वरूप दर्शन’—चैःभाः मध्यखण्ड चौबीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥10॥ प्रभुर अभिषेक तबे करिल श्रीवास। खाटे बसि' प्रभु कैल ऐश्वर्य-प्रकाश॥11॥ अनुवाद—तब श्रीवासने महाप्रभुका अभिषेक किया और महाप्रभुने सिंहासनपर बैठकर अपना ऐश्वर्य प्रकाश किया॥11॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन श्रीवासके घरमें सब भक्तोंने मिलकर महाप्रभुका अभिषेक किया। महाप्रभुने विष्णु-सिंहासनके ऊपर बैठकर अपने राजराजेश्वर-ऐश्वर्यका प्रकाश किया। अनेक भक्तोंने उस समय कीर्तन किया। इधर श्रीअद्वैतादि भक्त महाप्रभुकी षोड़श उपचारसे पूजा करने लगे। तब जिसकी जैसी अभिलाषा थी, महाप्रभु वैसा वर उसे प्रदान करने लगे॥11॥ अनुभाष्य—‘श्रीवास पण्डितके घरमें विष्णु-सिंहासनपर विराजमान महाप्रभु द्वारा ‘सातप्रहरिया’ भाव’—चैःभाः मध्यखण्ड नौवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥11॥ श्रीनित्यानन्दके साथ मिलन :— तबे नित्यानन्द-स्वरूपेर आगमन। प्रभुके मिलिया पाइला षड्भुज-दर्शन॥12॥ अनुवाद—तत्पश्चात् श्रीनित्यानन्द प्रभु नवद्वीप आये और महाप्रभुसे उनका मिलन हुआ। महाप्रभुने उन्हें अपने षड्भुज रूपके दर्शन करवाये॥12॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीनित्यानन्द प्रभुने वीरभूम जिलाके ‘एकचक्रा’ ग्राममें पद्मावतीके गर्भसे हड़ाई पण्डितके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण किया। श्रीनित्यानन्द प्रभु जब थोड़े बड़े हुए, तो एक संन्यासीने आकर हड़ाई पण्डितसे उनको माँग लिया। तब उस संन्यासीके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुने अनेक देशोंका भ्रमण करते-करते मथुरामण्डलमें आकर बहुत समय तक वास किया। महाप्रभुके आकर्षण करनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीनवद्वीपमें आकर नन्दन-आचार्यके घरमें आकर ठहरे। महाप्रभु भक्तोंको साथ लेकर वहाँ गये और श्रीनित्यानन्द प्रभुको अपने साथ अपने स्थानपर ले आये॥12॥ अनुभाष्य—‘नित्यानन्दमिलन’—चैःभाः मध्यखण्ड, तीसरा अध्याय और श्रीवासगृहमें श्रीव्यास-पूजाके उपलक्ष्यमें ‘श्रीनित्यानन्द प्रभुको महाप्रभुके द्वारा षड्भुजरूपका (शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, श्रीहल और मूशल धारण किये हुए रूपका) दर्शन’—चैःभाः मध्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥12॥ निताइको महाप्रभुका षड्भुज, चतुर्भुज और द्विभुज रूप-प्रदर्शन :— प्रथमे षड्भुज ताँरे देखाइल ईश्वर। शङ्खचक्रगदापद्म-शार्ङ्ग-वेणुधर॥13॥ पाछे चतुर्भुज हैला, तिन अङ्ग वक्र। दुइ हस्ते वेणु बाजाय, दुइ हस्ते शङ्ख-चक्र॥14॥ तबे त' द्विभुज केवल वंशीवदन। श्याम-अङ्ग पीतवस्त्र व्रजेन्द्रनन्दन॥15॥ अनुवाद—पहले महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, शार्ङ्ग और वेणुधारी षड्भुज रूप दिखलाया। बादमें वे त्रिभङ्ग ललित मुद्रामें चतुर्भुज रूप हो गये और वे दो हाथोंमें वंशी बजा रहे थे तथा उन्होंने अन्य दो हाथोंमें शङ्ख-चक्र धारण किये हुए थे। तब वे केवल वंशी बजाते हुए द्विभुज श्याम वर्णके पीतवस्त्रधारी व्रजेन्द्रनन्दन हो गये॥13-15॥ 222 | श्रीचैतन्यचरितामृत