श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें17/7-10 ] लगाकर उनका उपचार करनेकी चेष्टा करने लगे। परन्तु महाप्रभुके समस्त अङ्ग काँपने लगे और उनका शरीर तीव्रतासे झूमने लगा तथा उनकी हुँकार सुनकर सभी भयभीत हो गये। महाप्रभु कहने लगे,–“मैं ही सभी लोकोंका ईश्वर हूँ, मैंने ही विश्वको धारण कर रखा है, इसलिये मेरा नाम विश्वम्भर है। मैं वही हूँ, परन्तु मुझे कोई नहीं पहचानता।” ऐसा कहकर महाप्रभु दौड़कर लोगोंको पकड़ने लगे। उनके व्यवहारको देखकर किसीने कहा कि इनमें कोई दानव आ गया है, किसीने कहा कि यह किसी डाकिनीका काम है और कोई कहने लगे कि ये निरन्तर बोल रहे हैं, इसलिये निश्चित ही इन्हें वायु-विकार हो गया है। फिर एक बड़े लकड़ीके पात्रमें गलेतक तेल भरके उनको बैठाया। महाप्रभु तेलमें बैठकर खिलखिलाकर हँसने लगे, मानो वास्तवमें वायु अपना प्रभाव दिखा रही है। इस प्रकार कुछ देर लीला करनेके पश्चात् महाप्रभु अपनी स्वाभाविक स्थितिमें आ गये। सभी भक्त आनन्दसे 'हरि' 'हरि' ध्वनि करने लगे। परन्तु विष्णुकी मायासे मोहित होकर कोई उनके तत्त्वको नहीं समझ पाया॥7॥ गयामें ईश्वरपुरीके साथ मिलन और दीक्षाभिनय :– तबे त' करिला प्रभु गयाते गमन। ईश्वरपुरीर सङ्गे तथाइ मिलन॥8॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने गयाके लिये गमन किया और वहाँ उनका श्रीईश्वरपुरीसे मिलन हुआ॥8॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड सत्रहवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥8॥ दीक्षा-अनन्तरे हैल प्रेमेर प्रकाश। देशे आगमन पुनः, प्रेमेर विलास॥9॥ अनुवाद—दीक्षाके बाद महाप्रभुने प्रेमका प्रकाश किया और पुनः नवद्वीप आकर प्रेमपूर्वक लीला-विलास किया॥9॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'परलोकगत पिताका गयामें श्राद्ध करूँगा'—इस भावसे महाप्रभुने अनेक छात्रोंके साथ गयाकी यात्रा की। मार्गमें उन्हें ज्वर आ गया और ब्राह्मणके चरणोदकका पान करके वे उस रोगसे मुक्त हुए। इस लीलाके द्वारा उन्होंने संसारी लोगोंको ब्राह्मणोंको सम्मान देनेका कर्त्तव्यका प्रदर्शन किया। गया पहुँचकर उन्होंने श्रीईश्वरपुरीसे श्रीकृष्णमन्त्रकी दीक्षा ग्रहण की। उस मन्त्रको ग्रहण करते ही महाप्रभुमें प्रेमका प्रकाश होने लगा। गयामें कार्य समाप्त करके श्रीनवद्वीप धाममें आकर प्रेमका प्रचार करने लगे॥9॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड सत्रहवाँ अध्याय और मध्य पहला अध्याय द्रष्टव्य है॥9॥ दीक्षाके उपरान्त नवद्वीप-लीला, श्रीअद्वैतका विश्वरूप-दर्शन :– शचीके प्रेमदान, तबे अद्वैत-मिलन। अद्वैत पाइल विश्वरूप-दरशन॥10॥ अनुवाद—महाप्रभुने शचीमाताको प्रेमका दान किया। तब महाप्रभुका श्रीअद्वैताचार्यसे मिलन हुआ और बादमें महाप्रभुने उन्हें अपने विश्वरूपका दर्शन करवाया॥10॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक दिन महाप्रभुने श्रीवासके घरमें विष्णु-सिंहासनपर बैठकर कहा कि मेरी माताने श्रीअद्वैताचार्यके चरणोंमें वैष्णवापराध किया है। वह अपराध क्षमा न होनेतक उनको प्रेमभक्ति प्राप्त नहीं होगी। भक्त लोग यह सुनकर श्रीअद्वैताचार्यको वहाँ बुला लाये और श्रीअद्वैताचार्य (शचीमाताके माहात्म्यका कीर्त्तन करते-करते) प्रेममें आविष्ट हो गये। शचीदेवीने उस अवसरका लाभ उठाते हुए उनके चरणोंकी धूलि लेकर उस अपराधसे मुक्ति पायी। तब, “प्रसन्न हइया प्रभु बोले जननीरे। एखन से विष्णुभक्ति हइल तोमारे॥ अद्वैतेरे स्थाने अपराध नाहि आर।” “तब प्रसन्न होकर महाप्रभुसे मातासे कहा कि अब सत्रहवाँ अध्याय | 221