भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 756

[ 17/2-7 जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीचैतन्यदेवकी जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर-भक्तवृन्दकी जय हो॥२॥ कैशोर-लीलार सूत्र करिल गणन। यौवन-लीलार सूत्र करि अनुक्रम॥३॥ अनुवाद—पूर्व अध्यायमें मैंने कैशोर-लीलाका सूत्ररूपमें वर्णन किया। अब क्रमशः यौवनलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन करूँगा॥३॥ यौवनमें अनेक लीला-विलास :- विद्या-सौन्दर्य-सद्वेश-सम्भोग-नृत्य-कीर्त्तनैः। प्रेमनाम-प्रदानैश्च गौरो दीव्यति यौवने ॥ ४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—विद्या, सौन्दर्य, सद्-वेश, सम्भोग, नृत्य, कीर्त्तन, प्रेम और नाम-दानके द्वारा श्रीगौरचन्द्र यौवनकालमें शोभाको प्राप्त हुए॥४॥ अनुभाष्य—गौरः यौवने (पञ्चदशवर्षातिक्रान्ते यौवन-प्राकट्ये) विद्या-सौन्दर्य-सद्वेश-सम्भोग-नृत्यकीर्त्तनैः (परमार्थज्ञानलावण्य- साधुवेशवसनमाल्यचन्दनादिसम्भोगनृत्यकीर्त्तनादिभीः एतैः) प्रेमनाम- प्रदानैः (प्रेम्णा सह कृष्णनाम-वितरणैः) दीव्यति (क्रीड़ति)। श्लोक भावानुवाद—पन्द्रह वर्षकी आयुके बाद यौवनके प्रकट होनेपर श्रीगौरचन्द्रने विद्या (परमार्थ-ज्ञान), सौन्दर्य (लावण्य), सद्-वेश (साधुवेश, वस्त्र, माला, चन्दनादि), सम्भोग, नृत्यकीर्त्तनादि और प्रेमके साथ श्रीकृष्णनामके वितरणकी क्रीड़ा की॥४॥ यौवन लीला :- यौवन-प्रवेशे अङ्गेर अङ्ग विभूषण। दिव्य वस्त्र, दिव्य वेश, माल्य-चन्दन ॥ ५ ॥ अनुवाद—यौवनकालमें प्रवेश करनेपर महाप्रभुके अङ्ग ही उनके अङ्गोंके आभूषण हो गये अर्थात् प्रत्येक अङ्गका गठन इतना सुन्दर था कि वह सम्पूर्ण देहका आभूषण प्रतीत होता था। वे दिव्य वस्त्र, दिव्य वेशभूषा और माला-चन्दनादिसे सुशोभित रहते थे॥५॥ विद्यार औद्धत्ये काहाँ ना करे गणन। सकल पण्डित जिनि' करे अध्यापन ॥ ६ ॥ अनुवाद—अपनी विद्याके अभिमानसे वे किसीको कुछ नहीं समझते थे। सभी पण्डितोंको अपने ज्ञानके द्वारा परास्तकर वे स्वयं पढ़ाने लगे॥६॥ वायुव्याधि-छले कैल प्रेम परकाश। भक्तगण लञा कैल विविध विलास ॥ ७ ॥ अनुवाद—वायु-रोगके छलसे उन्होंने प्रेमका प्रकाश किया। तब भक्तोंको लेकर नाना प्रकारकी लीलाओंका आस्वादन किया॥७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अध्ययन और अध्यापन समाप्त करके शुद्धभक्तिका प्रचार करनेके लिये श्रीगौरचन्द्रने कुछ दिन वायु-रोगके छलसे छात्रोंको सर्वत्र श्रीकृष्णनामकी व्याख्या की, सभी व्याकरणके सूत्रोंका श्रीकृष्णसे सम्बन्ध दिखलाया और उनको पढ़ानेके कार्यसे छुटकारा पानेकी चेष्टा करने लगे॥७॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड, बारहवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥७॥ अमृताणुकणिका—एक दिन महाप्रभु वायु रोगके छलसे प्रेम-भक्तिके समस्त विकारोंको प्रकट करने लगे। वे अकस्मात् अलौकिक शब्द बोलने लगते, कभी भूमिपर लोट-पोट करने लगते, कभी हँसते और घरमें तोड़-फोड़ करने लगते। कभी हुँकार करते, कभी ताल ठोकते और जिसे सामने देखते उसे मारने लगते। थोड़ी देर बाद वे निश्चल हो जाते और उन्हें ऐसी मूर्च्छा होती, जिसे देखकर लोग भयभीत हो जाते। सभी लोग अनेक प्रकारके खाद्य तेल उनके सिरमें 220 | श्रीचैतन्यचरितामृत